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      अभी हाल ही में एक शोध अध्ययन में यह पता चला है कि माता-पिता द्वारा की गयी आलोचना बच्चों के संवेदनात्मक सूचनाओं के प्रति प्रतिक्रिया व्यक्त करने की क्षमता को प्रभावित करते हैं. यह शोधकार्य बिंघमटन यूनिवर्सिटी,न्यूयॉर्क के साइकोलॉजी विभाग में पढ़नेवाले एक छात्र द्वारा किया गया था. अध्ययन में यह पाया गया कि जिन बच्चों के माता-पिता उनके प्रति आलोचनात्मक रवैया अपनाते हैं, अपने बच्चों के हर कार्य में मीन-मेख निकालते हैं और उन्हें हमेशा हतोत्साहित करते हैं, तो ऐसे बच्चों में संवेदनाओं की कमी देखने को मिलती है. वे किसी अन्य व्यक्ति के चेहरे पर उभरने वाले विभिन्न भावों को पढ़ने में असमर्थ होते हैं. इसका नकारात्मक असर उनके व्यवहारों पर पड़ता है, क्योंकि वे दूसरे के चेहरे पर उभरनेवाले मनोभावों को पढ़ कर उसके अनुकूल व्यवहार करने या उचित प्रतिक्रिया व्यक्त करने में असमर्थ होते हैं. फलत: सामनेवाले व्यक्ति से भी उन्हें वह प्रतिक्रिया नहीं मिल पाती है, जिनकी वे अपेक्षा करते हैं. इस वजह से उनमें तनाव और अवसाद के लक्षण उभरने की संभावना बढ़ जाती है.

शोधकर्ताओं ने अपने शोध अध्ययन में माता-पिता के आलोचनात्मक रवैये का बच्चों के मनोभावों पर पड़नेवाले प्रभाव को जांचने के लिए एक तटस्थ चिन्हक (neutral marker) का उपयोग किया, जिसे Late Positive Potential (LPP) कहा जाता है. इससे यह जांचना आसान हो जाता है कि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति की मनोभावनाओं अथवा संवेदनात्मक अभिव्यक्ति पर किस तरह और कितना ध्यान दे रहा है. कहने का तात्पर्य यह है कि इस अध्ययन में यह पता लगाने की कोशिश की गयी कि कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से व्यवहार करते समय इस बात को नोटिस करने में कितना सक्षम सक्षम है कि वह खुश है या दुखी; चिढ़ा हुआ है अथवा आत्मग्लानि से भरा हुआ है.

इस शेाध अध्ययन में 7 से 11 वर्ष के करीब 500 बच्चों को शामिल किया गया. उनके पैरेंट्स से कहा गया कि वे अपने बच्चे से बस पांच मिनट अकेले में बात करें. उनके द्वारा की जानेवाली बातचीत को बाद में आलोचना के स्तर के आधार पर डिकोड किया गया. इसके अलावा, विभिन्न प्रकार के मनोभावों को प्रदर्शित करती तस्वीरें दिखा कर उन बच्चों की मौखिक अभिव्यक्ति को मापा गया. परिणामस्वरूप पाया गया कि उन बच्चों की तुलना में, जिनके पैरेंट्स उनकी आलोचना नहीं करते हैं, वैसे बच्चों की संवेदनशीलता का स्तर निम्न होता है, जिनके अभिभावक हमेशा उनमें कमियां निकालते रहते हैं या किसी भी तरीके से उनकी आलोचना करते रहते हैं.  ऐसे बच्चों में विपरीत या संघर्षपूर्ण परिस्थितियों से बचने की प्रवृति भी पायी गयी. वे ऐसी परिस्थितियों में खुद को असहज, बैचेन और दुखी महसूस करते हैं.

अतः अगर आप अपने बच्चों को संवेदनशील और भावनात्मक रूप से मजबूत इंसान बनाना चाहते हैं, तो बात-बात पर उनमें कमियां निकालना या उनके प्रति आलोचनात्मक रवैया अपनाना छोड़ दीजिए. बच्चे कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं. उन्हें जितने ही प्यार और खूबसूरती से गढ़ा जायेगा, उनका व्यक्तित्व उतना ही सुंदर और मुखर होगा.

 

This Post Has One Comment

  1. अति सुंदर
    माँ बाप अपनी अपेक्षाओं को लेकर काफी संवेदनशील हो जाते हैं तथा expectation बच्चों में देखने लगते
    हैं पूणॅ न होने पर आलोचना का घर बन जाता है
    यही काफी दुखद होता है ।

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