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***विकास पाटिल ***
      

सर्वसामान्य व्यक्ति श्री सत्यसांईबाबा को एक चमत्कारी व्यक्ति के रूप में जानता है। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु के बाबा के भक्तों एवं चाहने वालों को उनके सामाजिक कार्यों की जानकारी है; परंतु अन्य राज्यों में सर्वसामान्य लोगों को इसकी जानकारी बहुत कम होगी। बाबा का जनहित कार्य इतना विशाल था कि जो प्रकल्प राज्य सरकार के अंतर्गत आते थे उन्हें भी बाबा ने एक आदेश देकर एवं सम्पूर्ण आर्थिक भार उठा कर सहजता से पूर्ण किए। बाबा के भक्त तथा हितचिंतक केवल बाबा की आज्ञा का इंतजार करते थे। इस महामानव ने नि:स्वार्थ बुद्धि से अपना तन, मन, धन लगा कर मानव कल्याण का कार्य किया था। उनके द्वारा सम्पन्न विशाल कार्य आज भी सब को स्फूर्ति एवं प्रेरणा देते हैं। बाबा द्वारा सफलतापूर्वक पूर्ण किए गए सांई गंगा प्रकल्प, पुट्टपर्ती का सुपर स्पेशलिस्ट हॉस्पिटल, बेंगलुरू का सत्यसांई इंस्टिट्यूट ऑफ हायर मेडिकल सायन्स, ग्राम सेवा योजना, जांबिया एवं कीनिया में गरीबी से जूझ रहे बच्चों हेतु सत्य सांई स्कूल इ. जनकल्याण कार्य ऐेसे हैं जिनकी कल्पना भी शासन नहीं कर सकता।
         जब जब पृथ्वी पर पाप बढ़ता है तब तब परमेश्वर का अवतार होता है। सत्यसांई का ध्येयवाद था कि पापियों का नहीं, पापों का अवसान होना चाहिए। इसके लिए सर्वसामान्य को शिक्षा का मार्ग उन्होंने दिखाया। शिशु वर्ग एवं तरुण पीढ़ी के उत्कर्ष हेतु उन्होंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। बाबा की दृढ़ भावना थी कि सत्य, धर्म, शांति, प्रेम और अहिंसा इन पांच मंत्रों के साथ यदि शिक्षा को भी जोड़ दिया जाए तो आज की पीढ़ी सन्मार्ग पर चलेगी और समाज की उन्नति हेतु कारणीभूत होगी।
       पुट्टपर्ती गांव के बच्चे शिक्षा हेतु खेत, नदी पार कर पास के गांव बुक्कापटनम् जाते थे यह बात बाबा की मां ईश्वरम्मा को सालती थी। बाबा जब दस वर्ष की उम्र के थे तब उन्होंने मां को वचन दिया था कि मैं पुट्टपर्ती में बच्चों के लिए स्कूल खोलूंगा। बाबा ने मां को दिया हुआ वचन पूरा किया। यह स्कूल बाद में हायस्कूल, कॉलेज होते हुए यूनिवर्सिटी तक पहुंच गया है। १९६८ सें अनंतपुर में महिलाओं के लिए, १९६९ में लडकों के लिए बेंगलुरू में एवं १९७८ में पुट्टपर्ती में कॉलेज की स्थापना हुई। पुट्टपर्ती का कॉलेज ‘‘गुरुकुल पद्धति’’ पर आधारित है अर्थात गुरु एवं शिक्षक दोनों के निवास एक ही छत के नीचे-हॉस्टेल में।
          बाबा का शैक्षणिक कार्य केवल भारत तक ही सीमित नहीं है। जांबिया के पामोझी में १९९२ में ‘‘सत्यसांई बॉइज स्कूल’’की स्थापना की गई। स्कूल ने शिक्षा में अंतरराष्ट्रीय मानदंड अपनाए हैं। विद्यार्थियों को सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों की शिक्षा दी जाती है। जिसके कारण स्कूल का दर्जा काफी ऊंचा है। मानवीय मूल्यों की शिक्षा (जिसकी ओर विदेशों में ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता है) ही स्कूल की प्रगति का रहस्य है। स्कूल की फीसकम होने के कारण गरीब विद्यार्थी भी विद्यार्जन कर सकते हैं। केंब्रिज विश्वविद्यालय ने अपने केंद्र के रूप में स्कूल को मान्यता दी है। संस्था के संचालक डॉ. विक्टर कानू मानते हैं कि यह सब बाबा की कृपा है। विदेश में सत्यसांई स्कूल की संख्या ४५ है एवं भारत में भी इतने ही स्कूल हैं।
सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल
       देश में हृदय रोग के महंगे इलाज एवं आपरेशन खर्च को देखते हुए २२ नवम्बर १९९० को बाबा ने घोषणा की थी कि अगले साल इसी दिन पुट्टपर्ती में सौ करोड़ की लागत से इस हेतु एक अत्याधुनिक अस्पताल की स्थापना की जाएगी; जहां गरीबों का नि:शुल्क इलाज किया जाएगा। इसके अलावा रोगी एवं उनकी सेवा करने वाले व्यक्ति को नि:शुल्क निवास एवं भोजन मिलेगा। २२ नवंबर १९९१ को इस अस्पताल में पहला ऑपरेशन होगा। बाबा द्वारा सहज रूप से की गई यह एक ऐतिहासिक घोषणा थी।
        आइजैक टिग्रेट नामक बाबा का एक अमेरिकी भक्त पिछले कुछ वर्षों से उनके दर्शन हेतु नियमित भारत आ रहा था। बाबा के किसी भी जनकल्याणकारी कार्य में आर्थिक सहायता करने की उसकी इच्छा थी; परंतु बाबा उसे हमेशा कहते कि उन्हें उसका धन नहीं प्रेम चाहिए। बाबा की इस नकारात्मक भूमिका के बारे में विचार करते हुए उसे ध्यान में आया कि उसकी परोपकार भावना में दातृत्व की अपेक्षा ‘‘मैं दे रहा हूं’’ यह भाव था। अपनी भूल ध्यान में आने पर वह पुन: बाबा की शरण में आया। बाबा को उसके हृदय परिवर्तन की ही अपेक्षा थी। उन्होंने उसे कहा ‘‘मुझे धन की अपेक्षा नहीं है, तुम अस्पताल बनाने का काम प्रारंभ करो।’’ उसने कहा- न वह उत्कृष्ट डाक्टर है, न ही प्रशासक। वह तो एक होटल चालक है। परंतु बाबा ने निश्चयपूर्वक कहा कि तुम काम प्रारंभ करो। मैं तुम्हारे साथ हूं।
     टिग्रेट ने एक प्रसिद्ध डॉक्टर को साथ लेकर अन्य अनुभवी डॉक्टरों सेे विचारविमर्श कर ‘‘श्री सत्यसांई इंस्टिट्यूट ऑफ हायर मेडिकल सायंस’’ पर एक निवेदन बाबा के सम्मुख प्रस्तुत किया। बाबा की मान्यता मिलने पर वह आगे की तैयारी हेतु लंदन गया। वहां उसने विश्वप्रसिद्ध वास्तुशास्त्री किच क्रिटच्लो से भेंट की एवं प्रकल्प की जानकारी दी। यह भी बताया कि प्रकल्प एक वर्ष में तैयार होगा। उसमें भारतीय स्थापत्यशास्त्र के साथ आधुनिकता का भी अंश होगा। क्रिटच्लो को यह आभास हो रहा था कि हजारों मील दूर बैठा हुआ कोई एक महायोगी उसका मार्गदर्शन कर रहा है। उसे उस महायोगी से मिलने की इच्छा हुई व टिग्रेट व क्रिटच्लों ने भारत आकर बाबा से भेंट की। बाबा ने उनको अस्पताल की प्रत्येक जगह रचना, आकार, अलग-अलग प्रकार की सुविधा के सम्बंध में मार्गदर्शन किया। दोनों को ऐसा लग रहा था जैसे बाबा को अस्पताल के नक्शे के बारे में पूर्व जानकारी थी। क्रिटच्ले को बाबा द्वारा बतलााए गए परिवर्तनों पर दृढ़ विश्वास हुआ और उसने उनके द्वारा बताए परिवर्तन प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किए।
       वास्तुविद् क्रिटच्लो को भारतीय धार्मिक विधियों का ज्ञान था, अत: उसने इस भव्य दिव्य प्रकल्प हेतु ‘‘मंडल पूजा’’ करने का आग्रह किया। इस पूजा के समय भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ का दर्शन होना चाहिए अन्यथा पूजा अधूरी रहती है इसका भी उसे पता था। पूजा के समय क्रिटच्लो को आश्चर्य हुआ कि एक नहीं पांच गरुड़ एकसाथ दर्शन देने हेतु वहां उपस्थित थे। बाद में बाबा ने कहा कि आप एक गरुड़ की अपेक्षा कर रहे थे पर मैंने पांच भेज दिए।
         अस्पताल निर्माण का कार्य धीमी गति से चल रहा था। बाबा अप्रैल १९९१ में जब कोडईकनाल गए तब ट्रस्ट के कार्यकर्ता प्रकल्प निश्चित समय पर पूर्ण होगा कि नहीं एवं धन की व्यवस्था कैसे होगी इस चिंता में थे। बाबा ने सामने रखे पत्रों के ढेर से एक पत्र उठाया और खोलने को कहा। उसमें पांच लाख डॉलर के दान का चेक था। बाबा ने कहा, जब हम सत्कार्य कर रहे हैं तब पैसों की चिंता नहीं करनी चाहिए। उनकी इस बात को आगे आने वाले कई प्रकल्पों के निर्माण के समय याद रखा गया।
         मई १९९१ में कोडईकनाल से बेंगलुरू वापस आने पर बाबा ने अस्पताल के नक्शे को मूर्त रूप दिया। डॉ ए.एफ सफाया की अस्पताल की कमेटी में चेअरमैन के रुप में नियुक्ति हुई। आगे वे अस्पताल के संचालक बने।
हृदय रोग विभाग एवं सर्जरी हेतु अत्याधुनिक उपकरण मंगाए गए। बाबा द्वारा चुने हुए विद्यार्थियों को एम्स दिल्ली में खास प्रशिक्षण दिया गया। अस्पताल के भवन का निर्माण कार्य मई १९९१ में प्रारंभ हुआ।
        ५ महिने के अल्प काल में वह पूर्ण कैसे होगा इसकी सब को चिंता थी। परंतु प्रत्येक भक्त, कार्यकर्ता, डॉक्टर, लार्सन एण्ड दुब्रो के वास्तुविद इन सब के अथक परिश्रम से चमत्कार हुआ एवं २२ नवंबर १९९१ को बाबा के जन्म दिन के अवसर पर सुबह ठीक ९ बजे डॉक्टरों ने रोगी के शरीर को स्पर्श किया। सब कुछ बाबा की इच्छानुसार हुआ। तत्कालीन प्रधान मंत्री ने अस्पताल का उद्घाटन किया। बाबा की बात सही साबित हुई। उद्घाटन के दिन चार ओपन हार्ट सर्जरी सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई। अद्यतन सामग्री, ३०६ बिस्तर और १२ ऑपरेशन थियटरों से सुसज्जित बाबा की प्रेरणा से स्थापित यह ‘‘सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल’’ गरीबों के लिए वरदान है।
        ‘‘श्री सत्यसांई इंस्टिट्यूट ऑफ हायर मेडिकल सायन्स’’ के दूसरे अस्पताल का उद्घाटन १५ जानवरी २००१ को तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बेंगलुरू (व्हाइट फील्ड) में किया। विश्व के इस सब से बड़े अस्पताल में हृदय रोग एवं न्यूरो सर्जरी से सम्बधित इलाज बिना किसी भेदभाव के नि:शुल्क किया जाता है। बाबा कहते थे-‘‘अस्पताल मैंने गरीबों के कल्याण के लिए अर्पित किया है। जब गरीब लोग यंहा चिकित्सा के लिए आते हैं तब मुझे संतुष्टि होती है। मेरा संपूर्ण जीवन इन गरीबों के पुर्नस्थापन हेतु अर्पित है।’’
         पहले श्री सत्यसांई बाबा जनरल अस्पताल का उद्घाटन बाबा के जन्म ग्राम पुट्टपुर्ती में ४ अक्टूबर १९५६ को आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ बी. गोपाल रेड्डी के हाथों हुआ। बाबा के भक्तों ने श्रमदान से इस अस्पताल का निर्माण किया। फरवरी १९८४ में अस्पताल का स्थलांतर प्राथमिक शाला के पास एक बड़े भवन में हुआ। १९९१ में यह ५० बिस्तरों वाला अस्पताल १०० बिस्तरों वाले अस्पताल में रुपांतरित हुआ। इस अस्पताल में गरीबों के लिए नि:शुल्क इलाज की व्यवस्था हुई। इसका निर्माण बाबा की माताजी श्रीमती ईश्वरम्मा की प्रेरणा से हुआ।
        इस अस्पताल के अतिरिक्त श्री सत्य सांई सेवा संगठन झोपड़पट्टी में रहने वाले गरीबों को मुफ्त चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराती है। इसके अतिरिक्त कुछ गांव गोद लेकर वहां मासिक चिकित्सा शिविर

        आयोजित किए जाते हैं। आंखों की मुफ्त जांच की जाती है। एवं दवाइयों का वितरण होता है। ये सब जनहित के कार्य इस संस्था के माध्यम से किए जाते हैं। उद्देश्य एक ही है-सभी से प्रेम करो। सब की सेवा करो।
                                      पानी योजना
       वर्षा ऋतु में भरपूर बारिश होने के बावजूद भी पश्चिम भारत में आंध्र प्रदेश के बेकारी, अनंतपुर, कडप्पाह और कुरनूल जिलों में पानी की किल्लत रहती है। ये जिले पिछड़े जिलों की श्रेणी में आते हैं। यह अकालग्रस्त इलाका रायलसीमा के नाम से जाना जाता है। यहां की जनता अधिकतर कुओं के पानी पर निर्भर थी। परंतु कुएं के पानी में फ्लोराइड की मात्रा बहुत अधिक होने के कारण हड्डियों की बीमारी होती थी। जिससे कमजोरी एवं विकलांगता आती थी। यह परिस्थिति स्वतंत्रता के ५० वर्ष बाद भी थी। परंतु श्री सत्य सांईबाबा का आगमन हुआ एवं इस क्षेत्र का कायापलट हो गया।
         पुट्टपर्ती के सुपर स्पेशलिस्टी अस्पताल में की गई बहुमूल्य डॉक्टरी सेवा के लिए २२ नवम्बर १९९४ को डॉ. वेणुगोपाल का सम्मान किया गया। प्रधान मंत्री पी.वी.नरसिंह राव मुख्य अतिथि थे। उनके सामने बाबा ने रायलसीमा क्षेत्र की पानी की समस्या रखी। बाबा ने सरकार से पीने के पानी की समस्या हल करने के लिए कहा एवं उसमें अपने पूर्ण सहयोग का वादा किया। परंतु सरकार की तरफ से कुछ नहीं किया गया तब बाबा ने सत्य साई ट्रस्ट को इस योजना को हाथ में लेने का आदेश दिया। ट्रस्ट के लोगों को दस लाख की जनसंख्या वाले एवं सैकड़ों किलोमीटर में फैले क्षेत्र में पीने के पानी की अल्पावधि में व्यवस्था करने का कार्य असंभव सा लगा। इसके लिए बहुत सारा मनुष्यबल एवं भारी पैसे की आवश्यकता थी। सर्वसामान्य के लिए यह प्रश्न था, परंतु बाबा के लिए यह बहुत छोटी बात थी। ‘‘जहां चाह वहां राह’’ यह बाबा का गुरुमंत्र था।
         यह प्रकल्प एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। पत्थर तोड़ना, प्रचंड खुदाई करना, पाइपलाइन डाल कर पानी के लिए रिजरवायर बनाना, जल शोधन यंत्र लगाना, इ. लगभग सभी महत्वपूर्ण काम पूरे हो गए। यह सब दैवी इच्छाशक्ति का खेल था। सम्पूर्ण प्रकल्प १८ माह में बन कर तैयार हुआ। ७४१ गावों के दस लाख प्यासे लोगों को इतनी दूर से वर्षभर पानी की आपूर्ति करना यह एक असाधारण कार्य था।
        पहले प्रकल्प के पूर्ण होने के बाद बाबा का ध्यान आंध्र प्रदेश के मेहबूब नगर और मेड़क इन क्षेत्रों की ओर गया। मेहबूब नगर प्रकल्प पर ३० करोड़ से अधिक खर्च कर १४१ गावों के साढ़े चार लाख लोगों के लिए पानी की व्यवस्था की गई। वैसे ही मेडक प्रकल्प से १७९ गावों के साढ़े पांच लाख लोगों को फायदा हुआ।
         चेन्नई की पानी की समस्या हल करने के लिए तमिलनाडु सरकार ने आंध्र प्रदेश से कृष्णा नदी का पानी लाने की महत्वाकांक्षी योजना हाथ में ली। श्री सैलम बांध में जमा पानी को नहर द्वारा कुंडालेस रिजरवायर में एवं वहां से १५० किमी लंबी नहर द्वारा चेन्नई को निर्धारित १२ टी.एम.सी. पानी प्राप्त नहीं हुआ। १९९६ से २००० तक तो मात्र आधा टी.एम.सी. पानी ही पहुंचा। नहर के टूटने से पानी अंदर रिस जाता था इसलिए पानी का प्रवाह धीमा हो गया था। कई जगह किसानों ने नहर से अपने खतों में पानी खींच लिया था। इस प्रकार यह ‘‘तेलगू गंगा’’ प्रकल्प असफल रहा। इस कालखंड में जब चैन्नई में पानी का प्रश्न अत्यंत विकट हो गया तब सत्य सांई बाबा ने घोषणा कि की इस १५० किमी लंबी नहर का पुन: निर्माण साई ट्रस्ट अपने खर्च पर करेगा। वर्ष २००८ में यह प्रकल्प पूरा हुआ एवं आंध्र प्रदेश ने प्रकल्प का नाम ‘‘तेलगू गंगा’’ से बदल कर ‘‘सांई गंगा’’ किया।
          सांई गंगा प्रकल्प पूरा होने पर बाबा ने ट्रस्ट को दो नई योजनाएं प्रारंभ करने को कहा। पूर्व एवं पश्चिम गोदावरी जिलों के पिछड़े क्षेत्रों में गरीब जनता एवं आदिवासियों को पीने का शुद्ध पानी मिले यह उद्देश्य था। ट्रस्ट ने सफलतापूर्वक इन योजनाओं को पूरा कर १५० गावों की आठ लाख जनता की समस्या का समाधान किया।
         श्री सत्य सांईबाबा के जनकल्याण के कार्य केवल भारतवर्ष तक ही सीमित नहीं थे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सत्य सांई आर्गनाइजेशन की तरफ से युंगाडा में ८० बोरवेल की व्यवस्था कर अकालग्रस्त गावों में पीने के शुद्ध पानी की व्यवस्था कर गांव वालों की प्यास बुझाई।
                                           ग्राम सेवा
        गरीबों का कल्याण यही बाबा का गुरुमंत्र होने के कारण जनकल्याण के नए-नए विचार बाबा के मन में थे। ग्रामसेवा यह भी बाबा की संकल्पना का एक अनोखा अविष्कार था।
          भारत की वास्तविक सम्पदा गांवों में फैली है। गांव पूरे देश का पेट भरते हैं। गांव की जनता सही अर्थो में भारतीय संस्कृति की रक्षक है। गांव की उन्नति याने राज्य की उन्नति एवं देश की उन्नति है। भारत का भविष्य गांवों की समृद्धि पर निर्भर है। प्रत्येक व्यक्ति को गांव की समृद्धि का बीड़ा उठाना चाहिए। इसी उद्देश्य से बाबा ने गांव-गांव की गरीब जनता की उन्नति के कार्यक्रम में शालेय विद्यार्थियों का समावेश किया। गांव की जनता के कल्याण की इच्छा के बीज स्कूल शिक्षा पूर्ण कर बाहर निकलने वाले छात्रों के मन में यदि अंकुरित हुए तो वे अधिक परिणामकारक रहेगा ऐसा बाबा का दृढ़ विश्वास था। इसी संकल्पना के कारण बाबा ने विद्यार्थियों के सहभाग से गरीबों के लिए अन्न एवं वस्त्र की व्यवस्था हेतु ‘‘ग्राम सेवा’’ कार्यक्रम शुरू किया था।
        सन २००० से विद्यार्थियों की मदद से प्रति वर्ष ग्रामसेवा कार्यक्रम किया जाता है। करीब १०० गावों की एक लाख गरीब जनता को अन्न (प्रसाद) एवं वस्त्र बांटे जाते हैं। इसकी सारी पूर्व तैयारी विद्यार्थियों द्वारा की जाती है। प्रसाद बनाने से लेकर पैकेट बनाने तक एवं फिर उन्हें दूसरे गांवों तक ले जाकर गरीबों में वितरण का कार्य विद्यार्थियों द्वारा निकलने के पूर्व बाबा का आशीर्वाद लेकर किया जाता था। बाबा स्वयं इस कार्य में ध्यान देते थे एवं आवश्यक मार्गदर्शन करते थे। कुछ गांवों में मुस्लिम बहुलता में होने कारण वहां विद्यार्थियों के सांईराम अनिवारण को ‘‘सलाम अलैकुम’’ से प्रतिसाद मिलता था। मुस्लिम भी प्रसाद का स्वीकार करते थे। बाबा की प्रेमभावना को सीमा नहीं थी।
        कुछ लोगों के मन में प्रश्न उठेगा कि इस कार्यक्रम से ग्रामीण गरीब जनता की समस्याएं कैसे हल होंगी। इसका उत्तर बाबा के पास था। कार्यक्रम का मूल उद्देश्य है विद्यार्थियों के मन में गरीबों के प्रति आस्था निर्माण करना। उनके प्रति आत्मीयता के बीज अंतकरण में बचपन से अंकुरित हो जिसमें बड़े होकर गरीबों की सेवा ही उनका केद्र बिंदु हो।
        बाबा का बोधवाक्य है विनम्रशीलता का मार्ग जनकल्याण से होकर जाता है। ग्राम सेवा के इस मार्ग में कार्यकर्ता थकते थे परंतु उन्हें मानसिक संतोष मिलता था यह उनके चेहरे से प्रकट होता था। एक दिन के भोजन या कुछ वस्त्रों से गरीब ग्रामवासियों के जीवन में कुछ विशेष अंतर नहीं पड़ता। परंतु पुट्टपर्ती के परमात्मा का ध्यान हमारी ओर है और हमारे भविष्य की उन्हें चिंता है इस विचार से उनमें आशा का संचार होता है, और यह सब संभव था बाबा के प्रेम एवं उनके प्रति आस्था से।

मो. ९८६९४७१५३६

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