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***सुरभि*** 
    

         नेचर फॉर  एवर सोसायटी पर्यावरण के प्रति जनजागरण में लगी है। हम पारिस्थितिकी के सभी घटकों की सुरक्षा चाहते हैं जैसे कि पशु-पक्षी, नदी-वन और अन्य। संस्था ने घरेलू चिड़िया गोरैया को बचाने के लिए व्यापक अभियान चलाया। फलस्वरूप दुनियाभर में ‘गोरैया दिवस’ मनाया जाता है। अब हम दुर्लभ देसी वनस्पतियों के संवर्धन का अभियान भी चलाने वाले हैं। संगठन के संस्थापक मोहम्मद दिलावर को टाइम पत्रिका ने अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणविदों की सूची में शामिल किया है।
    अपने इस कार्य के संदर्भ में मोहम्मद दिलावर ने ‘हिंदी विवेक’ से कुछ बातें साझा की। प्रस्तुत हैं उसके कुछ अंश :-

नेचर  फॉर  एवर सोसायटी स्थापित करने का उद्देश्य क्या है?
      नेचर फॉर  एवर सोसायटी के निर्माण का उद्देश्य एक और संरक्षण संगठन बनाना मात्र नहीं था, परंतु जिस प्रकार संरक्षण संगठनों के द्वारा सामान्य वनस्पति और प्राणियों की ओर ध्यान नहीं दिया गया, हम उससे आगे समय की मांग के अनुसार काम करना चाहते हैं।
     हम इस कार्य में समाज के सभी वर्गों को, भिन्न-भिन्न पृष्ठ भूमि के, देश और दुनिया के अलग अलग भागों के नागरिकों को सम्मिलित करना चाहते हैं।
नेचर फॉर  एवर सोसायटी ने अपना कार्य पर्याप्त आर्थिक आधार के बिना छोटे स्तर पर इस विश्वास एवं नजरिये से प्रारम्भ किया कि नागरिकों के सहयोग से साधारण वनस्पति तथा जीवों को बचाया जा सके।
     नेचर फॉर  एवर सोसायटी का उद्देश्य भारत के संरक्षण आंदोलन में, विशेष रूप से शहरी भूमि में, अधिक से अधिक नागरिकों को जोड़ना है। इसे प्राप्त करने के लिए नेचर फॉर  एवर सोसायटी ऐसी पहल कर रही है, जो करने में आसान हो परंतु संरक्षण के महत्व को व्यापकता प्रदान करती है।
    नेचर फॉर  एवर सोसायटी २००५ से शहरी क्षेत्र में घरेलू चिड़ियां (गोरैया) तथा अन्य साधारण वनस्पति तथा जीवों के संरक्षण के लिए काम कर रही है। यह एक रजिस्टर्ड परोपकारी न्यास है, जिसके संस्थापक तथा अध्यक्ष मोहम्मद दिलावर हैं।
नेचर फॉर  एवर सोसायटी के द्वारा कौन से कार्य किए गए हैं?
१) राष्ट्रीय गोरैया दिवस मनाना
२) भारतीय पौधों का संरक्षण
३) विप्रो फॉर  एवर सोसायटी गोरैया पुरस्कार की घोषणा
४) घोसलों को गोद लेने व चिड़ियां के दाने के पात्र के कार्यक्रम
५) भारत में साधारण चिड़ियों के संरक्षण के लिए जागृति
६) गोरैया के लिए चावल संग्रह
७) पुरानी दूरबीन योजना
८) ग्रीष्म काल में चिड़ियों को सहायता का अभियान
९) चाइनीज मांजा पर प्रतिबंध
१०) गुलेल पर प्रतिबंध

आपने अपने संगठन का नाम नेचर  फॉर  एवर सोसायटी कैसे रखा?
      ‘‘यह पृथ्वी हमारी पैतृक सम्पत्ति नहीं है, वरन यह आने वाली संतति का हमारे ऊपर ॠण है’’ इस आशय से प्रेरणा लेकर हम प्रकृति को बचाने का काम करते हैं। हम विश्वास करते हैं कि, केवल प्रकृति और इसके सभी घटक ही स्थायी है, इन्हें  फॉर  एवर’ बने रहना चाहिए, मानव तो एक अस्थायी अवस्था है।
      सोसायटी का प्रतीक चिह्न पर्यावरण का सम्पूर्ण विचार प्रदर्शित करता है। यह प्रचार, खोज, शिक्षा और जन समर्थन के द्वारा प्रकृति को बचाने की हमारी प्रतिबध्दता को प्रतिनिश्चित करता है। यह प्रतीक चिह्न प्रकृति के निम्न घटकों का प्रतिनिधित्व करता हैः-
     सूर्य ः सूर्य पूरे परिस्थितिक तंत्र के लिए ऊर्जा का सर्वश्रेष्ठ स्रोत है। यह शक्ति, अक्षय, आशा तथा शुध्दता का द्योतक है।
दो चिड़ियां ः ये जैव विविधता तथा उसके महत्व को दिखाती हैं।
हरी पत्तियां ः पत्ती, जो चिड़िया जैसी दिखाई देती है, वनस्पति और प्राणियों की परस्पर निर्भरता को तथा पर्यावरण के लिए उसकी महत्वपूर्ण सहभागिता को प्रदर्शित करती है।
पर्यावरण संरक्षण के किस क्षेत्र में नेचर ङ्गॉर एवर सोसायटी कार्य कर रही है?
     नेचर  फॉर  एवर सोसायटी प्रकृति के किसी भी घटक में भेद नहीं करती, यह मानती है कि चिड़िया से लेकर हाथी तक तथा नदी पर्वत सभी महत्वपूर्ण हैं, हम उन सभी का समर्थन करते हैं, जिनका ठोस वैज्ञानिक आधार है। पिछले दस वर्षों से नेचर ङ्गॉर एवर सोसायटी घरेलू चिड़िया (गोरैया), सामान्य चिड़िया तथा देशी पौधों के संरक्षण का काम प्राथमिकता से कर रही है।
आपका काम समाज के लिए किस प्रकार सहायक है?
     घरेलू चिड़िया तथा देशी पौंधे पारिस्थितिकी तथा पर्यावरण का महत्वपूर्ण भाग हैं, इसकी समाज को स्वस्थ बनाए रखने में विशेष भूमिका है। आज बच्चों में पर्यावरण हृास के लक्षण दिखाई दे रहे हैं, वे मोबाइल तथा आईपैड जैसी तकनीकों के आदि होते जा रहे हैं।
      हम जो कर रहे हैं, उससे पर्यावरण को बनाने में घोंसले गोद लेकर और दाना बर्तन वितरण में बच्चों की भागीदारी बढ़ रही है। इसी प्रकार ग्रीष्म काल में पक्षियों की सहायता करने तथा देशी पौंधों को बचाने में उनको सक्रिय रूप से सम्मिलित करते हैं।
     हिन्दुस्तान में विदेशी वनस्पति के आव्रजन के कारण देशी पौंधों के अस्तित्व पर खतरा महसूस हो रहा है। हम देशी पौंधों का संरक्षण कर, देश और समाज के लिए महत्वपूर्ण काम कर रहे है।
आपके संगठन के द्वारा किए गए किस कार्य ने गौरव प्रदान किया है?
      हमारे काम करने का एकमात्र उद्देश्य पक्षियों तथा प्रकृति का संरक्षण है। हमारे द्वारा अब तक हजारों की संख्या में घोंसले के बाक्स तथा अन्य बर्तन बांटे जा चुके हैं। हर बार जब हमें किसी से ङ्गोन पर या ङ्गोटो द्वारा यह ज्ञात होता है कि चिड़ियों ने घोंसले का या अन्न के बर्तन का उपयोग करना शुरू कर दिया है तो वह हमारे लिए गर्व तथा प्रसन्नता की बात होती है, उससे अधिक गौरव या खुशी कोई और नहीं दे सकता।
     इसके अलावा टाइम मैगजीन ने मोहम्मद दिलावर का नाम तीस अत्यंत प्रभावशाली पर्यावरणविदों में रख कर हमारे कार्य के द्वारा देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गौरव प्रदान किया, इस पर हमें नाज है।
क्या आपको कोई पुरस्कार प्राप्त हुआ?
     एन्.एफ.एस. के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार तो यही है किजब ङ्गोन पर या ङ्गोटो द्वारा कोई हमें सूचित करता है कि पक्षियों द्वारा घोंसले का या अन्य के बर्तन का उपयोग करना शुरू कर दिया गया है। यही हमारे लिए सब से बड़ा पुरस्कार है। 
     २००८ पर्यावरण नायक ः टाइम्स मैगजीन ने दुनिया के ३० पर्यावरण नायकों में मोहम्मद दिलावर को नामित कर उनकी गिनती अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रभावशाली पर्यावरणविदों में की। २०१० बीस मार्च को अंतरराष्ट्रीय पक्षी दिवस घोषित किया जाना, इन सूबसूरत पक्षियों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम था।
२०११ में एन् एफ. एस. द्वारा २८ शहरों में ५२०० अन्न पात्र बांटे गए, जिसका उल्लेख गिनीज बुक्स ऑङ्ग वर्ल्ड रेकार्ड में किया गया। इस कार्य में बुरहानी ङ्गांउडेशन ऍाङ्ग इंडिया (मुंबई) का सहयोग भी प्राप्त हुआ।
     २०१२ में १५ अगस्त को पक्षियों के लिए चावल आंदोलन शुरू किया गया। इसी दिन दिल्ली की मुख्य मंत्री शीला दीक्षित ने गोरैया को राज्य पक्षी घोषित किया।
भविष्य में एन्.एफ.एस. द्वारा किए जाने वाले कार्यों की कौनसी योजनाएं हैं?
    भारत की मूल वनस्पति को संरक्षण देने के लिए उनका प्रचार करने, उन्हें लोकप्रिय बनाने का बहुत बड़ा कार्य सोसायटी ने हाथ में लिया है। सांस्कृतिक, धार्मिक तथा औषधीय महत्व के पौंधे लुप्त होते जा रहे हैं। उनके विषय में जागृति पैदा करना बड़ा काम है, जो हमारी योजना में है।
    आज अनेक पौंधों, जो हमारी संस्कृति तथा परम्परा का हिस्सा है, के लिए विदेशी वनस्पति का ङ्गैलाव विनाश का कारण बन रहा है। हम इसे बदलना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि पार्क में, स्कूल में, मंदिरों में तथा सड़क के किनारे, तथा आवासीय परिसर में भारतीय मूल के पौंधे लगाए जाने चाहिए।
देशी पौंधों के विषय में जागृति पैदा करना यह हमारा भविष्य का मिशन है।
जो काम आपने प्रारम्भ किया क्या उसे पूरा करने में आप सक्षम हैं?
     हमने जब काम प्रारंभ किया था तब पक्षियों के संरक्षण के विषय में बहुत कम चेतना थी। आज पूरी दुनिया के ५० राष्ट्रों में ‘चिड़िया दिवस’ मनाया जा रहा है।
बहुत से संगठन आज चिड़ियों के संरक्षण का काम कर रह हैं। नागरिकों में भी अब चिड़ियों के लुप्तप्राय होने के खतरे के प्रति जागृति आई है। बहुत बड़ी संख्या में लोगों ने घोंसलों को स्वीकार करना तथा अन्न पात्र का वितरण का काम चालू कर दिया है, जिससे गोरैया के लिए अनुकूल वातावरण बन सके। लोगों ने उनके लिए पानी भी रखना प्रारंभ कर दिया है।
निश्चित रुप से हम थोड़ा बदलाव लाने में समर्थ हो सके हैं। हमें तब बहुत प्रसन्नता होगी जब कोई खड़ा होकर कहेगा कि आपने जो काम चिड़ियों के लिए या देशी वनस्पति के लिए किया है, वैसा ही काम हम गार्डन, छिपकली या कहें, बुलबुल के लिए करना चाहते हैं। हम इसे लोकप्रिय बनाना चाहते हैं, तो हमें उन्हें मार्गदर्शन करने में तथा सहयोग करने में खुशी होगी।
आपके कार्य में समाज का क्या योगदान रहा?
     

 दस वर्ष पहले जब हमने यह कार्य प्रारंभ किया था तब मैं एकला था। केवल मेरा परिवार तथा मेरे मार्गदर्शक को मुझ पर विश्वास था। आज १० वर्ष बाद देखता हूं तो हमारे परिवार में २५००० एन्.एफ.एस. के सदस्य तथा अनगिनत समर्थक हैं। हमें हमारे देश में तथा दुनिया में जो प्यार मिला, वह हमें शक्ति प्रदान करता है, तथा कार्य की सीमाओं को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है।
जो काम हमने किया है वह जन सहयोग के बिना किया जाना संभव नहीं था, जो हमें देश के अलग-अलग भागों से प्राप्त हुआ। साथ ही भारतीय मीडिया ने भी हमें सहयोग दिया।
    भारतीय मीडिया हमारे लिए सबसे बड़ा सहयोगी रहा। मीडिया के सहयोग से जागृति पैदा की। इसने हमारे उद्देश्य पर तब विश्वास किया जब लोग हम पर हंसा करते थे।
समाज के बिना सहयोग के हमारा इतना आगे बढ़ना संभव नहीं था।

                                                                 मो. : ९५९४९६१८४९

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