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***अनमोल ***
   

   जहां सेवा ही धर्म और अध्यात्म है, जहां प्रेम के नेह से चौबीसों घंटे पीड़ित मानवता की सेवा का अखण्ड दीप प्रज्ज्वलित होता है। दीनदु:खियों, वंचितों, मनोरोगियों, दिव्यांगों, निराश्रित-मरणासन्न, बीमारों के साथ विक्षिप्त अभागी गर्भस्थ माताओं और उनके बच्चों को भी मिलता नवजीवन। बच्चे, बूढ़े और बीमार ही परमात्मा का सच्चा परिवार है, सेवा ही जप-तप-पूजा-प्रार्थना-इबादत और अरदास है।
     आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरीजी ने यहां आने पर कहा था- मैं एक जागृत और जीवंत मंदिर में हूं जो संवेदनाओं का मंदिर है, कुछ मंदिर तो ऐसे होते हैं जहां प्रतिमाएं होती हैं और पूजनीय होती हैं पर सेवाधाम में मुझे, जीवित प्रतिमाओं के दर्शन हुए।
    वहीं विश्वविख्यात पत्रकार और चिंतक डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने सेवाधाम को मंदिर, मस्जिद, गिरिजा और गुरूद्वारे से अधिक पवित्र स्थल बताया। इसी प्रकार आचार्य श्रीमद् विजयरत्नसुन्दर सुरीश्वरजी म.सा. ने आश्रम परिवार से मिलने के बाद कहा-‘‘दिमाग से काम मत लो हृदय की बात सुनो और सेवाधाम को हृदय की आंखों से देखो, सहयोगी बनो इन दीनदु:खियों के जो तुम्हारे उद्धारक बनेंगे।’’
मनुष्य जीवन की सार्थकता परोपकार में है। इसके बिना जीवन व्यर्थ है और पशुवत है। हमारी संस्कृति से मिले संस्कारों और नैतिक मूल्यों ने हमें दीनदु:खी पीड़ितों, वंचितों की सेवा की शिक्षा दी। हमारे धर्मग्रंथों-पंथों-संतों ने हमें मानव सेवा-माधव सेवा का संदेश दिया लेकिन आज के भौतिकवादी स्व-आधारित परिवेश में हम केवल अपने तक सीमित होते जा रहे हैं। यहां तक कि परिवार में अपने बुजुर्गों को, दादा-दादी को अपनाना तो दूर माता-पिता को घर में जगह नहीं है, जबकि माता-पिता और बुजुर्ग ही साक्षात देवतुल्य हैं, जिनका निरंतर अनादर-तिरस्कार-बहिष्कार ही समाज की संस्कृति बनता जा रहा है।
    

  घर में घरवालों के लिए स्थान नहीं है और बाहर वालों के साथ मौज मस्ती के बिना रात का मजा नहीं, कमाई में इतने मदमस्त कि एक नहीं अनेक पीढ़ियों के लिए पुत्र के पौत्र के पौत्र के पौत्र के पुत्र के पुत्र तक के लिए धन संचय में हम अपनी नैतिक जिम्मेदारियों को ही भूल बैठे और हमारे अपने बच्चे ही हमसे दूर होते जा रहे हैं। ऐसे में घर के बुजुर्गों, बीमारों, अशक्त-नि:शक्तों के साथ खून का रिश्ता समाप्त होता जा रहा है। इन्हें हम अपने से और घर से ऐसे बाहर कर देते हैं जैसे कोई अनुपयोगी वस्तु हो जिसे कूड़े-कचरे के ढेर में फेंक दिया जाता है, इनमें अधिकांश मनोरोग का शिकार होकर नारकीय जीवन जीने को मजबूर हो जाते हैं। ऐसे लोगों के लिए अनादि कुंभ नगरी उज्जयिनी का सेवाधाम आश्रम एक ऐसा स्थान है जहां निरंतर चौबीसों घंटे समाज के इन बहिष्कृत-तिरस्कृत पीड़ितों को सम्मानजनक आश्रय ही नहीं मिलता अपितु उनका अंधकारमय जीवन प्रकाशित होता है और ये समाज की मुख्य धारा से जुड़ कर स्वावलम्बी भी बनते हैं और पुनर्वसित भी होते हैं।
      

सेवाधाम आश्रम की स्थापना १९८९ में मध्यप्रदेश में मालव ी अनादि प्राचीन नगरी उज्जयिनी में उबड़-खाबड़, बंजर १४ बीघा भूमि पर एक साधारण से व्यक्ति ने की, जो न कोई बड़ा उद्योगपति था, न ही स्वनामधन्य नेता या समाजसेवी। यह ऐसा निर्जन स्थान था जहां न पहुंच मार्ग था, न पानी था और न ही बिजली थी, था तो जंगली जानवरों का बसेरा और सांय-सांय करती अंधेरी रातें। इस आश्रम ने आज तक पांच हजार से अधिक को अपनाया और जीवनाधार बना उनका जो कभी अस्पतालों, बस या रेलवे स्टेशनों और सड़कों पर नारकीय जीवन जी रहे होते हैं जिनसे बात करना तो दूर उनके पास खड़े रहना भी मुश्किल होता है।
     यहां जात-पात, धर्म-संप्रदाय, छूत-अछूत से परे मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, बिहार, केरल, असम, बंगाल सहित भारत के विभिन्न राज्यों के ४०० से अधिक पीड़ित यहां आने के बाद निरंतर प्रेम की बहती धारा के साथ ऐसे परिवार के सूत्र में बंध जाते हैं, जो अपने आप में जन्मजात बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक का सम्पूर्ण परिवार है।
      खण्डेला सीकर राजस्थान मूल के सुधीर भाई गोयल ने १२ वर्ष की उम्र में महावीर स्वामी, महाराजा अग्रसेन, महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद आदि महापुरूषों की प्रेरणा से सेवा की शुरूआत अजनोटी ग्राम से की उसके बाद सेवा-शिक्षा-स्वास्थ्य-स्वावलम्बन और सद्भाव के पंच सूत्रों के लक्ष्य पर कार्य करते-करते सन् १९८६ में उज्जयिनी वरिष्ठ नागरिक संगठन की स्थापना की। हामूखेड़ी में कुष्ठजनों को नारकीय जीवन से मुक्ति दिलाने के संकल्प के साथ मरणासन्न लकवा पीड़ित कुष्ठरोगी नारायण के बेडसौर पर मलहम पट्टी के साथ अपने गैरेज में जीवन की अंतिम सांस तक सेवा-सुश्रुषा के साथ ही कुष्ठ सेवा केन्द्र स्थापित किया।
     बाबा आमटे और मदर टेरेसा के संस्था में आगमन के बाद बीमार-मरणासन्न- निराश्रितों-नि:शक्तों के लिए आश्रम बनाने का संकल्प लिया। अपने पैतृक और स्वयं के व्यापार, व्यवसाय और ऐश्वर्यशाली जीवन छोड़ कर १४ बीघा भूमि दान देकर गंभीर बांध के समीप अम्बोदिया में दादा-दादी आश्रम की स्थापना की जो आज सेवाधाम के रूप में पीड़ित मानवता की सेवा का तीर्थ बन गया है और राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाता जा रहा है।
      

सुधीर भाई को अपने पिता स्व.श्री सत्यनारायणजी, माता स्व. श्रीमती सत्यवती देवी के साथ परिवार के स्वतंत्रता आंदोलन के सहयोगी और समाजसेवी बुजुर्गों से भी सेवा की प्रेरणा मिली। इकलौते पुत्र अंकित की मृत्यु, इकलोती बहन की पति के क्रूर हाथों हत्या, असमय पिता का निधन भी आपके सेवा कार्यों में बाधक नहीं बन सका अपितु सेवा संकल्प और दृढ़ हुआ। उनका कहना है ‘‘सेवा से मिलने वाला आत्मसंतोष ही उनका वास्तवित धन है’’ किसी दु:खी की सेवा से उसके चेहरे की मुस्कान में ही उन्हें अपने प्रभु के दर्शन हेाते हैं। जीवात्मा की सेवा से उनके अंत:करण से मिलने वाले शुभाशीषों की तुलना दुनिया की किसी भी सम्पत्ति से नहीं की जा सकती। सेवा ही धर्म और अध्यात्म है जो जीवन में हर पल खुशी ही नहीं देता अपितु ईश्वरीय कृपा और अशीर्वाद से जीवन को लबालब कर देता है। सेवा और प्रेम की कमाई सम्पत्ति कभी क्षय नहीं होती है।’’
सेवाधाम आश्रम के विकास में श्री सद्गुरू सेवा संघ ट्रस्ट चित्रकुट
के संस्थापक मानवतावादी स्वप्नद्रष्टा सेवाधाम के आराध्य स्वामी रणछोड़दासजी महाराज की परोक्ष उपस्थिति और आशीर्वाद के साथ प्रखर परोपकार मिशन के महापुरूष महाण्डलेश्वर स्वामी प्रखरजी महाराज का विशेष योगदान उनके आश्रम के जीवनदाता के रूप में मुंबई के श्री रतनलाल डिडवानिया, इन्दौर से सर्वश्री प्रबलसिंह सुराणा, श्री सुधीर भाई कुमट, श्री समरथमल संघवी की भूमिका कभी भूलाई नहीं जा सकती। डिडवानिया रतनलाल चेरिटेबल ट्रस्ट ने आश्रम को नई पहचान दी और ४५००० स्क्वेयर फीट में निर्मित अवेदना केन्द्र में ट्रस्ट की मुख्य भूमिका रही। इसके साथ ही श्री त्रिलोकीनाथ वली (श्रीनगर-कश्मीर) का योगदान भी अविस्मरणीय है।
    

     आश्रम के विकास पुरूष के रूप में श्री गिरीश जे. शाह मैनेजिंग ट्रस्टी समस्त महाजन मुंबई ने सेवाधाम विकास परिषद् के अध्यक्ष का दायित्व स्वीकार कर आश्रम को विषम परिस्थितियों में उबारा और इसके विकास को एक नई दिशा दी, वहीं श्री जयेश एम. शाह मुंबई में उपाध्यक्ष के रूप में संस्था कार्यों को गति प्रदान कर रहे हैं।
     पद्मभूषण डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन, महामहोपाध्याय आचार्य श्रीनिवास रथ अपने जीवन काल में संस्थाध्यक्ष रहे। वर्तमान में विश्वख्यात पत्रकार एवं चिंतक डॉ. वेदप्रताप वैदिक जैसे महापुरूष संस्था का अध्यक्षीय पद सुशोभित कर रहे हैं।
    भारत के अनेक राष्ट्रपति, राजनेताओं, विश्वख्यात समाजसेवकों के अतिरिक्त लोकसभा अध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा महाजन, केन्द्रीय मंत्री श्री नितीन गडकरी, श्रीमती सुषमा स्वराज, थावरचंद गेहलोत, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान, पूर्व मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह सहित भारत के स्वनामधन्य संत-भगवंतों ने भी सेवाधाम की सराहना की और भारत शासन, प्रदेश शासन सहित अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा सेवा कार्यों की सराहना की।
    सुधीर भाई की पत्नी कांता भाभी, पुत्री मोनिका और गौरी भी आपके सेवा कार्य में सहभागी होकर सेवाधाम में रह कर यहां के विभिन्न प्रकल्पों में सेवा दे रही हैं। इसी प्रकार आपके दोनों भाई परिवार सहित अप्रत्यक्ष रूप से तन-मन-धन से सेवाधाम के उत्थान में अपना समय-समय पर सहयोग करते हैं।
    

आश्रम में फिजिओथैरेपी केन्द्र, गौशाला एवं जीवदया के साथ सांस्कृतिक, स्वावलम्बन प्रशिक्षण के साथ ही आश्रमवासियों के समग्र उत्थान हेतु सतत कार्य किए जा रहे हैं।
     मध्यप्रदेश सोसायटी एक्ट में पंजीकृत, सामाजिक न्याय, महिला बाल विकास विभाग, एफसीआरए, नेशनल ट्रस्ट भारत शासन में पंजीकृत संस्था उज्जयिनी वरिष्ठ नागरिक संगठन का मुख्य सेवा प्रकल्प सेवाधाम आश्रम जन सहयोग से संचालित है। आश्रम में निरंतर पीड़ितों की संख्या में वृद्धि हो रही है। आयकर अधीनियम की धारा ८० जी में कर छूट के प्रावधान है। आश्रम के नियमित संचालन हेतु लगभग २० लाख रूपये प्रति माह के साथ ही आश्रम के वृद्धाश्रम, मनोरोग विभाग, नशा मुक्ति केन्द्र, महिला प्रकल्प, मंदबुद्धि बच्चों हेतु विशेष विद्यालय, प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्र विभिन्न रास्तों पर पेवेर्स लगाने के साथ ही इसके सम्पूर्ण विकास हेतु तत्काल ५ करोड़ रूपये की आवश्यकता है।
        कलियुग में रिश्ते का कोई मतलब नहीं – सेवाधाम के रिश्तें प्रेम के रिश्ते हैं और प्रेम का दूसरा नाम ईश्वर है और यहां रहने वाले ईश्वर स्वरूप ही है। सेवाधाम परिवार में आपका बारम्बार स्वागत-अभिनंदन-वंदन है, कृपया अवश्य पधारे और सेवा गतिविधियों का प्रत्यक्ष अवलोकन करें। हमें समयदानी दाताओं की भी नितांत आवश्यकता है जो चिकित्सा, नर्सिंग, सेवा, कार्यालयीन, निर्माण, उद्यानिकी, गौशाला, बच्चों, बुजुर्गों, मनोरोगियों के साथ ही स्वावलम्बन प्रकल्पों में अपनी प्रतिभाओं और अनुभवों का सदुपयोग कर मानव सेवा – माधव सेवा के विचार को सार्थक करना चाहते हैं।
दीनदु:खी पीड़ितों के प्रति परोपकार भाव से भामाशाह, दानदाता निम्नलिखित नम्बरों पर सम्पर्क कर सकते हैं :-
७३५४९९२०४१, ७३५४९९२०४५,
वाट्स अप नम्बर-९४२५०९२५०५।
विस्तृत जानकारी हेतु हमार

सेवा भावी -गिरीश भाई शाह 
    

  गिरीशभाई शाह सेवा को समर्पित व्यक्तित्व है। भारत के किसी भी राज्य में या पडोस के देशों मे जहां समस्या है; वहां गिरीशभाई शाह सेवा कार्य के लिये तत्पर होते है। चाहे भूकंप हो, सूखे की, पानी की समस्या हो, झुग्गी झोपडी में आग लगने की घटना हो, चाहे जिस तरह की समस्या हो, उस समस्या के निवारण के लिए जिस प्रकार के सेवा कार्योकी आवश्यकता होती है, वह सेवा गिरीशभाई के माध्यम से अभाव ग्रस्तों तक पहुंचती है।
     गिरीशभाई शाह सेवाधाम आश्रम में पांच साल पहले गये थे। उन्होंने सुधीरभाई गोयल के माध्यम से हो रहे कार्यों को हृदय से महसूस किया। जिन ऐसे भाग्यहीन लोग जिन्हे उनके घर वाले अपने साथ नही रखते, कुष्ठरोगी, एड्स ग्रस्त, शारिरीक रुप से विकलांग,मानसिक रुप से विक्षिप्त, जखमों से आहत व्यक्तियों को सेवाधाम आश्रम में सुधीरभाई गोयल आश्रय देते है और अत्यंत मन:पूर्वक उनकी सेवा करते है। इस कार्य का निरीक्षण करते हुए एक बात गिरीशभाई के ध्यान में आई कि यहां रोज भोजन व्यवस्था कैसे की जाये इस बात की चिंता होती है। समस्या निवारण के लिए गिरीशभाई प्रत्यक्ष इस कार्य में सम्मिलित हुए। पांच साल पहले गिरीशभाई शाह ने सेवाधाम आश्रम में सेवा कार्य प्रारंभ किया। सेवाधाम आश्रम में रोज ४०,००० रुपये सिर्फ वहां पर रहने वाले आश्रितों के लिए खान-पान व्यवस्था में खर्च होते है। उन्होंने सर्व प्रथम समाज के सधन व्यक्तियों को आग्रह करके सेवाधाम की रोज की खान पान की चिंता का निवारण करने का प्रयास किया। इसके साथ सेवाधाम में आश्रितों को रहने के लिए ४०० लोगों का निवासस्थान बनवाया। आश्रम में रहने वाले आश्रित विविध रोगों से पीडित होते है। उनके ऐसी गद्दियों जिन्हे धोया जा सकता है। सेवाधाम की व्यवस्था से जुडी विविध बातों में गिरीशभाई ने अपना योगदान दिया।
     सेवाधाम आश्रम के सेवा कार्य से जुडा हुआ समस्त महाजन ट्रस्ट भी गिरीशभाई स्वतंत्र रुप में चलाते है। उस ट्रस्ट के माध्यम से उन्होंने महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, नेपाल जैसे कई जगहों पर सेवा दी है।
      सेवाधाम आश्रम भविष्य में किस प्रकार से कार्य विस्तार करेगा? इस प्रश्न पर गिरीशभाई कहते हैं ‘‘एक तो सेवाधाम पूरी तरह से बंद होना चाहिये। यानी समाज में कोई दु:खी, रोगी, विकलांग नहीं होना चाहिये। पर यह संभव नहीं है। समाज में ऐसे सेवा कार्योकी आवश्यकता बढने वाली है।’’ इस बात को ध्यान में रखकर भविष्य में सक्षम सेवाधाम की रचना सुधीरभाई के साथ मिलकर गिरीशभाई कर रहे है। पिछले पांच सालों में सेवाधाम आश्रम में किये हुए सकारात्मक कार्योसे गिरीशभाई का मनोबल बढा है। उस बढे हुए विश्वास के आधार पर वे कहते है कि भविष्य में सेवाधाम में इस प्रकार के रोगियों की जितनी भी संख्या बढे हम समाज के सहयोग से परिपूर्ण सेवा करने में सफल होंगे।
       मूलत: जैन तत्वज्ञान में विश्वास रखने वाले गिरीशभाई गो-सेवा, पशु-सेवा के लिए अपना योगदान देते थे। पांच साल पहले सेवाधाम आश्रम में गये और वहां सुधीरभाई के माध्यम से मनुष्य रुपी जीवों को जो आत्मीय सेवा दी जा रही है उससे प्रभावित हो गए। और पशुओं के लिए कार्य करने वाले गिरीशभाई मनुष्य जीवों के लिए भी तन-मन-धनपूर्वक अपना योगदान देने लगे।

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