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**** डॉ. अशोक कुकडे****
संस्कृति के समुचित प्रवाह को आगे ले चलनेवाला संगठन करना, इसीको अपना काम मानते, उसकी अनुभूति तथा उससे मिलनेवाला आनंद प्रकट करना, इसमें मैंने सार्थकता मानी है। संयोग से उसी अवधि में नरेंद्रभाई का अमरिका में प्रवास होनेवाला था। और तो और सौभाग्य यही कि उसी अवधि में उस क्षेत्र में मेरा निवास होनेवाला था। एक सप्ताह पहले बोस्टन के नजदीक की एक संघशाखा के अधिकारी और कार्यकर्ताओं के साथ एक बैठक हुई। मॅडिसन स्न्वेअर में जिस सभा का आयोजन हुआ था, उसके बारे में उन्होंने मुझे जानकारी दी। उन्हें अपने देश की अन्य कुछ जानकारी नहीं थी, परंतू उनमें से कइयों ने मोदी जी के पक्ष में काम किया था। अर्थ कारण किया था। अपनी अपनी ओर से देश में जो संपर्क बने हुए थे, उनका उपयोग करने का उन्होंने प्रयास किया था।
२० सितंबर से २० अक्टूबर की अवधि में लगभग एक महीना मैं विदेश यात्रा पर था। पंद्रह दिन अमेरिका और पंद्रह दिन कॅनडा यह योजना थी। यात्रा का मूल प्रयोजन व्यक्तिगत तथ़ा पारिवारिक था। फिर भी विदेश विभाग के साथ रहे प्रदीर्घ काल के संपर्क के फलस्वरुप संघ के संदर्भ में बहुत सारे कार्यक्रमों की योजना सहज ही बन गयी।
इसके पीछे ताजा संदर्भ था, हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनावों का। भूतकाल में किये गये प्रवासों में मेरा यह अनुभव रहा है कि विदेशों में रहनेवाले भारतीय अपनी मातृभूमि के प्रति सचेत रहते हैं। अपने देश में क्या-क्या हो रहा है, इस पर नजर रखते हैं साथ ही विभिन्न प्रकार का योगदान भी देते हैं। संघ माध्यम से बारम्बार इसकी अनुभूति मिलती है।
यहां भी संपर्क हुआ था और कुछ कार्यक्रमों की योजना भी बनी थी। आजतक के अनुभवों के ही अनुरूप ही वहां पहुंचते ही कई लोगों ने व्यक्तिगत मुलाकात की इच्छा प्रकट की और बैठक की योजना बनी।बुलाने का प्रबन्ध हुआ। इधर अपने देश में क्या-क्या, कैसे हो रहा है, इसे जानने के लिए स्वाभाविक जिज्ञासा, उत्सुकता ही नहीं, तो एक प्रकार का मानसिक लगाव भी था। इसके फलस्वरुप, इन दोनों देशों के निवास के दौरान छोटी-बडी बैठकें हुई। कुछ खास कार्यकर्ताओं के साथ कुछ बडी बैठकें ऊंचे स्तर पर भी हुई। कुछ चुनिन्दा कार्यकर्ताओं के साथ बडी बैठक भी हुई। रा. स्व. संघ के विजयादशमी उत्सव जैसे कार्यक्रम भी संपन्न हुए। हरएक स्थान पर उन्हीं विषयों पर चर्चा हुई। वर्तमान परिस्थिति में भारत में जो परिवर्तन हुआ है, उस परिवर्तन को लेकर सभी के ही मन में विलक्षण आत्मीयता थी। ऐसी बैठकों में कई बार वैयक्तिक स्तर पर प्रश्नोत्तर हुए। भाजपा का राज आया, मोदी जी की विजय हुई। केवल देश में ही नहीं, बाहर विदेशों में भी उनकी बडी भव्य प्रतिमा निर्माण हुई। सभी के लिए यह बडे ही आनंद का, अभिमान का विषय था। मुलाकातें हुईं, उनमें से कोई भी भारतीय ऐसा न था, कि जिसने इससे भिन्न कुछ भावनाएं व्यक्त की हों! उनमें से बहुतसे ऐसे हैं, जिन्हें मैं पिछले तीस बरसों से पहचानता हूं। वे तो मूक्त भाजपा की विचारप्रणाली से संबोधित थे नहीं, लेकिन ऐसे भी लगभग सभी ने व्यक्तिगत बातचीत में भी ‘जो कुछ भी हुआ है, वह बडा ही अच्छा है।’ ऐसी अपनी प्रतिक्रिया प्रकट की। इसी संदर्भ में मैं एक निर्देश करना चाहता हूं कि दि. १७/१८ मई को लोकसभा चुनावों के नतीजे घोषित होने के पश्चात् ‘लंडन हेरल्ड’ ने एक अग्रलेख लिखा था। उसमें बडे ही स्पष्ट शब्दों में कहा था कि स्वाधीनता प्राप्ति के उपरान्त भारत की ऐसी सरकार, वहां की परम्परा सामने रखते उसका वहन करनेवाली, ऐसी यह पहली ही सरकार है। आगे उन्होंने साफ शब्दों में कहा, कि इसके पहले की यहां की सरकारे विदेशी सामंतशाही की परम्परा ही निभानेवाली थीं। लंडन हेवल्ड के इस कथन का संदर्भ मैं वहां की हर बातचीत में दिया।
बात तो बडी साफ है, कि मोदीजी की सफलता के संदर्भ में मोदी जी की प्रतिमा बडी महान है, यह सभी जानते हैं। प्रतिमा को महान बनाया गया, पर वास्तव में वह तो महान ही थी। उन्होंने भारी मात्रा में प्रचार किया यह तो बिल्कुल सही था। उसका रहस्य कितने ही उदाहरणों के माध्यम से खोलकर बताना आवश्यक था। वह ऐसा कि उसके पीछे संघ की विचारप्रणाली, विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करनेवाली संस्थाएं- संगठन, जनसंघ के रुप में राजनीतिक दल, पिछले पचीस-तीस बरसों में भारतीय जनता पार्टी का मार्गक्रमण आदि सभी की पूरी ताकत जुटी हुई है। मोदीजी ने लोकसभा में अपने पहले ही भाषण में जो कुछ कहा, उसमें केवल अलंकारिकता नहीं थी, इसका मैं अनुरोध पूर्वक निर्देश किया करता था, कि कुल पांच पीढियों ने इस हेतु बहुत सारे कष्ट उठाए हैं। तब जाकर संघ कार्य के विभिन्न रुप इसके पूरक कैसे बने? उसका विश्लेषण मैं किया करता था। इतना सारा सुनने सभी उत्सुक थे, इतनाही नहीं तो आनंदित होते दिखाई दिये। सबकुछ सुनने पर लोगों ने केवल आश्चर्य प्रकट नहीं किया, बल्कि बडे अभिमान से अपनी धारणा व्यक्त की, कि संघ ने इन सभी विषयों में निश्चित रूप में उचित मार्गदर्शन किया। संघ ने बहुत कुछ पर्दे की आड से ही किया-कराया, लेकिन स्वयं उसमें लिप्त न होते- न उलझते संगठन बांधनेवाला, भारतीय विचारप्रणाली की प्रतिष्ठापना करनेवाला, हिंदू संस्कृति के समुचित प्रवाह को आ ले चलनेवाला संगठन करना, इसीको अपना काम मानते, उसकी अनुभूति तथा उससे मिलनेवाला आनंद प्रकट करना, इसमें मैंने सार्थकता मानी है। संयोग से उसी अवधि में नरेंद्रभाई का अमरिका में प्रवास होनेवाला था। और तो और सौभाग्य यही कि, उसी अवधि में उस क्षेत्र में मेरा निवास होनेवाला था। एक सप्ताह पहले बोस्टन के नजदीक की एक संघशाखा के अधिकारी और कार्यकर्ताओं के साथ एक बैठक हुई। मॅडिसन स्न्वेअर में जिस सभा का आयोजन हुआ था, उसके बारे में उन्होंने मुझे जानकारी दी। उन्हें अपने देश की अन्य कुछ जानकारी नहीं थी, परंतू उनमें से कइयों ने मोदीजी के पक्ष में काम किया था। अर्थक़ारण किया था। उपनी अपनी ओर से देश में जो संपर्क बने हुए थे, उनका उपयोग करने का उन्होंने प्रयास किया था। लेकिन इससे भी बढकर एक अच्छी बात ऐसी थी, कि सिर्फ गुजरात में ही नहीं तो, और भी अलग अलग प्रांतों में, विदेश के स्थायी निवासी बने थे, उन सभी ने- वे चाहे एन्. आर्. आय्. हों अथवा और कोई- उन्होंने पंद्रह दिन, तीन हप्ते- पूरा महिना छुट्टी लेकर अपनी अपनी जगह भारतीय जनता पार्टी का काम किया। धन देने की बात हो, बाहर से समर्थ देने की बात हो, लेकिन उससे भी ज्यादा सही समय पर काम में अपना खुद का सहयोग देना, यह वहां दिखाई दिया। मॅडिसन स्न्वेअर के समारोह की योजना काफी सराहनीय बनी हुई, बहुत बडी व्याप्ति थी उसकी। पिछले दस वर्षों में संघ के प्रमुख अधिकारियों का उस क्षेत्र में प्रवास हुआ था। विद्यमान पूजनीय सरसंघचालक जब सहकार्यवाह थे, तब अमरिका के चार कोनों में चार बडे ही भव्य कार्यक्रम संपन्न हुए थे। वहां दैनंदिन संघकार्य बडे ही सुचारू ढंग से चलता है। संघ शिक्षा वर्ग नियमित रूप से वहीं अब आयोजित किये जा रहे हैं। केवल कृतिवर्ष हेतु इधर आना, ऐसी रचना की जा रही है। हमें इस पार्श्वभूमि पर ध्यान देना चाहिए।
स्वाभाविक रूप में मोदीजी के इस कार्यक्रम को सफल बनाने में संघ तथा संघ संबंधित संस्थाएं इनसे काफी सहायता मिली इसमें कोई संदेह नहीं। इनके बीच की सीमारेषाएं काफी धुंधली हैं। अपने यहां उनकी अपेक्षा वे अधिक स्पष्ट हैं। फिर भी वहां वे ही लोग ये काम करते हैं, वे ही दूसरे भी काम करते हैं। आखिर हर एक के अपने कुछ अलग काम तो होते ही हैं। कॅनडा में से ‘सेवा कॅनडा इंटरनॅशनल’ यह संस्था किसी खास विषय को लेकर काम करती है, लेकिन संघ के वहां के सभी पदाधिकारी उसकी ओर से काम कर रहे थे। वैसे तो वहां मूल में ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ है नहीं, वह है ‘हिंदू स्वयंसेवक संघ’। प्रार्थना कुछ भिन्न है, रचना भी कुछ अलग सी है। फिर भी बडी ही सहजता से वे सभी उसमें जुट गये थे, इसमें कोई संदेह नहीं।
मॅडिसन स्न्वेअर के कार्यक्रम के लिए पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) करना आवश्यक था। अमरिका में किसी भी बडे मैदान पर कितनी भी बडी संख्या में एकत्रित होना, यह वहां की व्यवस्था में मंजूर नहीं होता। मॅडिसन स्न्वेअर की आसन क्षमता अठारह हजार की है। उससे ज्यादा संख्या में सभा में लोगों का आना मंजूर होने की संभावना नहीं थी। आसनों के बाहर लोगों का खडे रहना-बैठना आदि की कोई व्यवस्था वहां नहीं होती फिर भी अतिरिक्त जोडते हुए बीस हजार संख्या के लिए वहां पंजीकरण हुआ था। उसके लिए पैसा लिया गया था और लगभग १०-१५ दिन ही यह पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) बंद हुआ था। दुगूना, तिगूना, दसगुना पैसा देने किसी के राजी होने पर भी उन्हें पंजीकरण नहीं दिया गया। अमरिका में से सभी स्तरों में से भारतीय, भारत के सभी प्रांतों से अमरिका आये हुए भारतीय इन सभी का इस कार्यक्रम हेतु एकत्रित होने का बडा ही अद्भुत चित्र देखने का सौभाग्य मिला। अमरिका के आम भारतीय निवासियों में उस अवधि में वायुमंडल मोदीमय बना हुआ था। जिस दिन प्रधानमंत्री मोदी जी वॉशिंग्टन ही. सी. में थे, संयोग से उसी दिन मैं भी अपने प्रवास के दौरान वहीं था और उस गांव का वायुमंडल भी मैंने अनुभव किया। असल में तो उन्होंने बराक ओबामा के साथ मार्टिन ल्यूथर किंग की समाधिस्थान की भेंट की, उसके एक घंटा बाद ही मैं भी पहुंचा था। उससे उन सभी बातों की जानकारी बडी ही आसानी से मिल सकी। वैसे तो किसी एक व्यक्ति से प्रभावित होना, यह भारत में जैसे होता है, उसकी मात्रा अमरिका में कम रहती है, फिर भी अमरिकी माध्यमों ने इस विषय को काफी महत्व दिया था। कुल मिलाकर भारतीयों के साथ, अमरिका के राजनीतिक क्षेत्र में भी मोदीजी के व्यक्तित्व का आकर्षण बडी मात्रा में दिखाई दिया, ऐसा हम मान सकते हैं। वैसे उस संदर्भ में कितने ही समाचार सभी ने दूरदर्शन पर देखे हैं, समाचार पत्रों में पढ़े हैं। फिर भी कुल मिलकर यह विषय बडा ही संतोषदायी था कि जिससे हम निश्चित रूप से कह सकते हैं, कि विश्व में हर तरह से अपना बडा प्रभाव फैलाया है और वह राजनीति के माध्यम से व्यक्त भी हुआ है। मेरे मतानुसार इसके बीज काफी पहले बोये गये थे। कॅनडा में से टोरांटो के निवास के दौरान जगदीश जी शास्त्र नाम के ९४ वर्ष आयु के ज्येष्ठ स्वयंसेवक के साथ मेरी दो बार मुलाकात हुई। संघ के विदेश विभाग का बीज बोनेवाले कार्यकतर्ाओं में से वे एक हैं। भारत की सीमाओं के बाहर संघ की प्रार्थना का प्रथम गायन हुआ जगदीशजी शास्त्री के प्रयासों से ऐसा कहा गया। वे तरुण पंजाबी स्वयंसेवक थे, उस समय लगभग १९४५-४६ में वे धंधा-कारोबार करने आफ्रिका के लिए बिदा हुए थे और अब कॅनडा के स्थायी निवासी बने हुए हैं। फिर भी आज ९४ वर्ष की आयु में भी उनका उत्साह देखने लायक हैं। इस आयु में भी वे स्वयं कुछ काम करते रहते हैं। हमारी बैठक बडी ही अच्छी हुई। उन्होंने और भी कुछ लोगों को आमंत्रित किया था। वे संघ साहित्य वितरण किया करते हैं, अलग-अलग बैठकों में उपस्थित रहते हैं, बातचीत करते हैं। अब कुछ विकलांग बने हैं, फिर भी प्रवास करते ही रहते हैं। आज तक संपन्न हुए सभी विश्व संघ शिविरों में वे उपस्थित थे और बातचीत के सिलसिले में उन्होंने कहा, ‘अगले बरस विश्व संघ शिविर’ इंदौर में संपन्न होने जा रहा है, उसमें मैं निश्चित रूप से उपस्थित रहूंगा और वह मेरा आखिरी शिविर होगा। सन २००४-०५ में संपन्न हुए विश्व संघ शिबिर के शिविराधिकारी का उत्तरदायित्व मैंने निभाया था, जिससे इन सभी स्वयंसेवकों से परिचय पुराना ही था। विश्व संघ शिविर का वायुमंडल कैसा होता है, यह मैंने अनुभव किया था। विश्व संघ शिविर का वायुमंडल कैसा होता है, यह मैंने अनुभव किया था। उससे जगदीशजी शास्त्री की भावनाओं को उचित मात्रा में मैं समझ सका। इसी ढंग से काम करनेवाले कितने ही स्वयंसेवक वहां है। टोरांटो महानगर में ६ शाखाएं नियमित रुप से चलती हैं। परिस्थिति के अनुरुप ये शाखाएं शनिवार-रविवार के दिन लगती हैं और उनका रुप ‘परिवारशाखा’ का होता है।
संयोगवश मेरी उपस्थिति में ही वहां का विजयादशमी उत्सव संपन्न हुआ। वहां के गणवेश में बडे ही अच्छे ढंग से लगभग ४०० स्वयंसेवक उसमें उपस्थित थे। आश्चर्य करनेलायक ऐसा, कि इस उत्सव में ७०-८० वर्ष आयु के अपनी तारुण्यावस्था में स्वयं सेवक बने हुए थे पहली पीढी के थे, उन्हीं के साथ बिल्कुल बीस गपचीस वर्षों के उसी देश में जनमे, फिर भी संघ स्वयंसेवक के नाते संस्कार जिन्होंने ग्रहण किये हों, ऐसे भी आधे से ज्यादा-माने डेढ, पावने दो सौ से सौ तक की संख्या में थे। उन्होंने वहां बढिया प्रात्यक्षिक पृस्तुत किये, गीतगायन किया, योगासन कर दिखाए। शारीरिक में कहीं कुछ कम-ज्यादा होगा जो मैं भारत में भी प्रवास के दौरान अनुभव करता हूं उससे वहां वैसे होना कुछ गैर सा नहीं, इस का भी वहां अच्छा सा प्रत्यय मिला। कितने ही तरुणों के साथ बातचीत हो सकी। इस विषय के संदर्भ में आखिरी एक तथ्य का निर्देश करते इस कथन को विराम देता हूं। खुद होकर काम करनेवाले कई छोटे-बडे समूह वहां निर्माण हुए हैं। टोरांटो में मेरा ‘सेवा केनडा इंटरनॅशनल’ के साथ परिचय हुआ। वहां के निवासी कुछ स्वयंसेवकों ने इस संस्था की स्थापना की है। आरंभ में मैंने जो कहा है, उसके अनुसार इन सभी लोगों के मन भारत के साथ जुडे हुए होते हैं। अपने-अपने प्रांतों में तो वे काम करते ही हैं, लेकिन जहां किसी तरह कुछ संबंध न हो, वहां की आवश्यकता देख, वहां के काम का बडा दायित्व उठाते हैं। सुरेंदरजी ये सेवा इंटरनॅशनल के प्रमुख हैं। उनके साथ मैंने एक दिन बिताया। वे पूर्वांचल के लिए बडे पैमाने पर धन संकलन करते हैं। वैसे तो पूर्वांचल से उनका कुछ संबंध नहीं, परंतू उन्होने उसके बारे में कुछ सुना, एक बार प्रवास करते उन्होंने स्वयं कुछ देखा और तय किया कि ‘सेवा कॅनडा इंटरनॅशनल’ के माध्यम से बडे पैमाने पर निधि संकलन करते, पूर्वांचल के प्रदेशों में छात्रावास, वहां हो रहा धर्मान्तरण रोकना और उसी के साथ शिक्षाक्षेत्र में विभिन्न सेवाएं उपलब्ध कराना, आदि के हेतु विभिन्न उपक्रम करने का व्रत उन्होंने स्वीकार किया। मेरे वहां के निवास के आखिरी दिन एक मेरेथॉन वहां आयोजित थी। ऐसे मेरेथॉनों का आयोजन उन दोनों देशों में एक आदतसी बनी थी। चालीस कि. मी. की यह मेरेथॉन रविवार की सुबह होनेवाली थी। इस मेरेथॉन के दरमियान वे निधिसंकलन करते हैं। अभीतक लगभग सत्तर लाख रुपये उन्होंने पूर्वाचल के विभिन्न कामों के लिए भेजे थे। उस दिन के मेरेथॉन में क्या हुआ इसकी जानकारी मुझे मिली नहीं, लेकिन उनकी तैयारियां बडे जोरशोर से हो रही थीं। भारत के विभिन्न प्रांतों से आये, बहुत से स्वयंसेवक कार्यकर्ता उस विशेष कार्यक्रम में जुटे थे। भारत के साथ जिनका रिश्ता किसी न किसी तरह जुडा हुआ है, उनका और रूप होता है- उन के अंदर की लगन एक ज्येष्ठ महाराष्ट्रीय महिला ने दूरभाष पर अपनी यह लगन कुछ बेचैनी के रूप में प्रकट की- ‘अपने देश में ऐसा कहीं कुछ होता क्यों नहीं? सफाई का मामूली सा मामला, उसके लिए कुछ पैसे खर्च करने पडते हैं। तमाखू खाकर थूकना रोकने, पैसों की क्या जरुरत? रास्ते पर की अनुशासन हीनता कम होने पैसा कहां तक जरूरी। मैं बारम्बार पुणे आया करती हूं। रास्ते के चौराहे पर के सिग्नल बारम्बार क्यों तोडे जाते हैं?’ उनके इन में से किसी भी सवाल का जवाब मेरे पास नहीं था। मैं अंतर्मुख होकर सोचने लगा, तब ऐसा दिखाई दिया, कि क्या अपने समाज में इच्छाशक्ति कहीं है ही नहीं? परंतू इस इच्छाशक्ति को निर्माण करने के प्रयास अब बडे पैमाने पर हो रहे हैं। मैंने उस महिला को दिलासा देते हुए कहा, ‘ऐसा कुछ नजारा आप देख रही होंगी, परंतू आज कितने ही छोटे-बडे केंद्र, संगठन, विभिन्न प्रकार के संस्कार करनेवाले माध्यम आदि के द्वारा इस चित्र में परिवर्तन लाने के प्रयास हो रहे हैं। उनमें से हरएक संस्था के कार्यक्रमों में उपक्रमों में उसके दर्शन हो रहे हैं, समाज में भी वह दिखाई देगा। और तो और आज के अभी आगे बढे प्रधानमंत्री, ये उसके मार्गदर्शक अथवा उसका झंडा या मशाल उठाकर आगे बढनेवाले होंगे, ऐसा निश्चित रुप में कहा जा सकता है।’ अब २ अक्तूबर के कचरा हटाव अभियान के रुप में तुरन्त उसके दर्शन हो सके। इस प्रकार लगभग एक महीने के कार्यक्रमों में जो कुछ भी संपर्क हो सका, उसके माध्यम से दोनों ओर लाभ हुआ होगा, ऐसा मुझे लगता है। भारत की वर्तमान परिस्थिति, इन सभी विषयों की पार्श्वभूमी, संघ की इस संबंध में धारणा, आगे चलकर आनेवाली चुनौतियां, आदि सबकुछ एक तरह से आरंभ ही है, इसका यहां के लोगों को लिहाज करा देना और उसी के साथ वहां के बहुतसे लोगों को वहां के कामों हेतु प्रवृत्त करना, यह भी निश्चित रूप से बन पाया, ऐसा मैं कह सकता हूं।
वॉशिंग्टन और न्यूयॉर्क में जो कुछ कॉट्रॉव्हर्सी हुई, उसमें मामूलीसा कुछ तो हुआ होगा (राजदीप के सदर्ंभ में), उसको तो यहां अनदेखा ही किया गया। कुछ प्रतिक्रियाएं जो व्यक्त हुईं, उनमें लोगों ने राजदीप कोही जिम्मेदार माना। वहां के बहुत से भारतीय व्यापारी या अन्य लोग मोदी इफेक्ट से भारत में लौट आने की बातें कर रहे हैं, इसमें भी कोई तथ्य नहीं। ऐसा किसी ने कहा हुआ, मैंने तो कहीं सुना नहीं। और तो और वैसा कुछ होगा ऐसा मुझे लगता नहीं और साथ ही ऐसा कुछ होना चाहिए, यह भी मैं कहना नहीं चाहता। इसका कारण यही, कि कई बरस मैं वहां जा रहा हूं, देख रहा हूं, तो मुझे उसमें कुछ तथ्य दिखाई नहीं देता। इसके माने यही, कि वे वहीं रहकर भली भांति योगदान दे सकते हैं। आज भारत के पक्ष में वहां की लॉबी-एक संगठित शक्ति- निश्चित रूप से बडी अच्छी तरह प्रस्थापित हुई है, इसमें कोई संदेह नहीं। मूलत: सभी भारतीय अपने अपने क्षेत्रों में बडे ही ऊंचे पदों पर हैं। वैसे तो सभी उच्चतम पदों पर अमरिकन ही होंगे, लेकिन उनके निकट के लगभग सभी स्थानों पर भारतीय ही हैं और वे सभी व्यवसायों-कारोबारों में हैं। मैं जिस व्यवसाय में वहां तो विशेष रूप से दिखाई देता है। वैद्यकीय व्यवसाय में बहुत ही बडी मात्रा में भारतीय व्यक्ति (डॉमिनेटिंग) अग्रक्रम निभा रहे हैं और उनकी वहां की प्रतिमा बहुत ही अच्छी है।
अमरिका ने नरेंद्र मोदीजी को व्हिसा देने से इन्कार किया था, लेकिन उन्हीं नरेंद्र मोदीजी के प्रधानमंत्री बनने पर बराक ओबामा उनका स्वागत करने उत्सुक हुए। अमरिका ने अपनी नीति में परिवर्तन किया और नरेंद्र मोदी जी को अमरिका आने निमंत्रण भी भेजा। प्रदीर्घकाल वहां के निवासी बने हुए अमरिकी राजनीति अच्छी तरह जानते हैं। अमरिकी सरकार का लाइलाज होकर ऐसा कुछ करना बिल्कुल संभव नहीं, वैसे तो वे लोग निरे व्यापारी हैं। अपने लिए लाभदायी होनेवाले, तो वे करेंगे ही। उससे लाचार होकर करने की अपेक्षा जरूरत देखकर वे ऐसा करते हैं और उसी कारण वे उसमें अपनी कुछ लाचारी अथवा अनिवार्यता (कम्पन्शन) हरगिज नहीं मानते। तभी तो इस विषय को लेकर वहां कहीं बहस होती ही नहीं, कि उन्हें व्हिसा देने से कभी इन्कार किया गया था। किसी समय शीर्षक के रूप में एकाध पंक्ति उभरी होगी, उससे बढकर- अपने यहां किसी मामूली से विषय को लेकर बारम्बार माथापच्ची करने का रिवाज है- वैसा कुछ दिखाई न दिया। भारतीय लोगों के मन में भी इसे लेकर किसी प्रकार का गंड होने की संभावना नहीं।

 

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