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यह जरूरी नहीं कि किसी इंसान में हर समय आत्म-विश्वास का स्तर एक समान ही रहे. वास्तव में खुद की क्षमताओं पर कभी-कभी संदेह करना भी जरूरी है. इससे हमें जीवन में आगे बढ़ने और कुछ बेहतर करने की प्रेरणा मिलती है.जानिए कि किस तरह आत्म विश्वास हमारे व्यक्तित्व और हमारे व्यवहारों को प्रभावित करता है:

यह जरूरी नहीं कि जो लोग खुद पर संदेह करते हैं, वे गलत होते हैं या फिर उनकी निर्णय क्षमता कमजोर होती है या फिर उन्हें दूसरे लोग पसंद नहीं करते. आपको हमेशा अपनी सेल्फ-डाउट वाली फिलिंग से डरने की जरूरत नहीं है.  सच तो यह है कि खुद पर अविश्वास करने के भी कई फायदे होते हैं. इसकी वजह से व्यक्ति को कड़ी मेहनत करने, अपनी कमियों को दूर करने और खुद को एक बेहतर इंसान बनाने की प्रेरणा मिलती है. आत्म-संशयता व्यक्ति को अपने सामने उपस्थित अन्य विकल्पों पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है, अपने आस-पास होनेवाले परिवर्तनों को स्वीकार करने के लिए मानसिक रूप से तैयार करती है और उसे दूसरों की प्रशंसा और सहयोग का पात्र बनाती है.  व्यक्ति अपने अहम को त्याग कर झुकना सीखता है.उसके व्यवहारों एवं विचारों में लचीलापन आता है.

जो लोग खुद पर शक करने से डरते हैं, उन्हें यह जानना चाहिए कि ऐसा करना उनके लिए न केवल दुखद हो सकता है, बल्कि इसके कई अन्य तरह के नुकसान भी हो सकते हैं. इससे व्यक्ति में अहं पैदा हो सकता है. यह भी हो सकता है कि उसमें साइकोपैथ या सोशियोपैथ प्रवृतियों का विकास हो जाए.  हालांकि जो लोग खुद पर हद से ज्यादा संदेह करते हैं, वे भी सामान्य नहीं कहे जा सकते. ऐसे लोगों में तनाव, चिंता, ग्लानि आदि के लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं.

अब सवाल यह उठता है कि निम्न आत्म-विश्वासी लोगों को किन लक्षणों के आधार पर पहचाना जा सकता है :

  1. ऐसे लोग हमेशा अच्छे विचारों को खुद तक ही सीमित रखते हैं

जिन लोगों में आत्म-विश्वास की कमी होती है, वे अक्सर अपने विचारों को जाहिर करने से डरते हैं. उन्हें लगता है कि वे जो कुछ भी सोचते हैं, वह कुछ खास नहीं. बाकी कई लोग भी वैसी ही सोच रखते हैं. इसी वजह से वे अपने विचारों को खुद तक ही सीमित रखते हैं. सच तो यह है कि इस दुनिया में हर इंसान और उसकी सोच एक-दूसरे से भिन्न होती है. अत: चुप न रहें. अपने विचारों को व्यक्त करना सीखें. इस बात से डरें नहीं कि कोई आपके विचारों को सुनकर क्या प्रतिक्रिया देगा. किसी भी इंसान के विचारों पर उसके समाजीकरण की परिस्थितियों और इससे जुड़े लोगों का प्रभाव होता है, जो कि निश्चित तौर पर भिन्न होती हैं. इसी वजह से विचारों में भिन्नता होना बिल्कुल स्वाभाविक है.

  1. निम्न आत्मविश्वासी लोग सोचते ज्यादा और करते कम हैं.
    ऐसे लोगों की एक खासियत यह है कि ये अपनी जिंदगी का अधिकांश समय सोचने में ही बिता देते हैं और जब जहां जो कहना या करना चाहिए, वह कह या कर नहीं पाते. उदाहरण के तौर पर, ऑफिस में अगर उनके बॉस द्वारा अगर एक प्रेजेंटेशन बनाने के लिए कहा जाता है, तो वह पूरा दिन यह सोचने में ही बिता देते हैं कि वो ये करेंगे, वो करेंगे या फिर बॉस से ये कहेंगे, वो कहेंगे…वगैरह-वगैरह जबकि करते कुछ नहीं हैं. फिर अंत समय में आपाधापी में जैसे-तैसे अपना काम निपटाने की वजह से उन्हें बॉस की डांट सुननी पड़ती है. इसके विपरीत आत्मविश्वासी लोग शुरुआत से ही अपनी जानकारी के अनुसार एक बेहतर कार्ययोजना तैयार करके उस पर काम करते हैं और सही समय पर अपना काम सबमिट करके सबकी प्रशंसा के पात्र बनते हैं.
  2. ऐसे लोग हारने से डरते हैं.

निम्न आत्मविश्वासी लोगों द्वारा अपनी भावनाओं और विचारों को व्यक्त न करने या फिर कोई निश्चित निर्णय न ले पाने का एक कारण यह भी होता है कि वे ‘ना’ सुनने या हारने से डरते हैं. उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने किसी को कुछ कहा और सामनेवाले व्यक्ति ने इंकार कर दिया, तो इससे उनकी बेइज्जती हो जायेगी. लोग उनका मजाक उड़ायेंगे. उन्हें यह समझना चाहिए कि जिंदगी में हर किसी को सब कुछ नहीं मिल सकता. न ही हर कोई हमारी बातों/निर्णयों से सहमत या अहसमत हो सकता है, इसलिए ‘लोग क्या सोचेंगे या कहेंगे’… इसकी चिंता छोड़ कर अपनी बातों को पूरे आत्मविश्वास के साथ व्यक्त करें. बेहतर होगा जिस विषय या क्षेत्र के बारे में आप अपनी राय रख रहे हैं या निर्णय लेने जा रहे हैं, उससे जुड़े किसी विशेषज्ञ से राय-मशविरा कर लें.

  1. निम्न आत्मविश्वासी लोग अक्सर इसी चिंता में डूबे रहते हैं कि वेदूसरों को किस तरह अपनी बातों या व्यवहारों के समर्थन में लाएं.

वे इस बात को स्वीकार नहीं कर पाते कि हम एक सीमा तक ही दूसरों की बातों या विचारों को प्रभावित कर सकते हैं. यह जरूरी नहीं कि हमेशा हम इसमें सफल हों ही. बेहतर होगा दूसरों को प्रभावित करने के बजाय खुद के लिए अपना एक मानदंड बनाएं और उसके अनुरूप कार्य करने का प्रयास करें. साथ ही, दूसरों की प्रतिक्रियाओं के पीछे निहित कारणों को समझने के लिए खुद को उनके स्थान पर रख कर विचार करें.

  1. निम्न आत्मिविश्वासी लोग अपनी पूर्व में हुई गलतियों से जल्दीपीछा नहीं छुड़ा पाते.

अगर उन्हें अपनी किसी बात या व्यवहार से पूर्व में लज्जित होना पड़ा हो, तो वे उसे हमेशा अपने साथ ढोते रहते हैं और उसकी वजह से वर्तमान में भी निर्णय लेने से कतराते हैं. उदाहरण के तौर पर, मान लिया किसी व्यक्ति को पूर्व में किये गये अपने किसी निवेश में हानि उठानी पड़ी, तो वह भविष्य में निवेश करने से घबरायेंगे. अपनी कमजोर निर्णय क्षमता की वजह से कई बार वे अपने रिश्तों को भी खो देते हैं. इसके विपरीत आत्मविश्वासी लोग अपने पूर्व की भूलों से सीख लेते हुए उन गलतियों को दुहराने से बचते हैं और भविष्य में बेहतर निर्णय ले पाने में सक्षम होते हैं.

 

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