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    सलमान खान स्टारर हालिया प्रदर्शित फ़िल्म रेस-3 ने भले ही अनुमान के मुताबिक कमाई शुरुआती दिनों में कर ली है, लेकिन इसके साथ ही रेस फ्रेंचाइसी ने दर्शकों में अपनी साख़ खोई है। यह रेस के निर्माता के लिए गंभीर मंथन का वक़्त है कि बड़े बजट की फ़िल्म को भव्यता देने के लिए भले ही करोड़ों रुपए दांव पर लगा दिए जाएं, लेकिन यदि अच्छी कहानी और अन्य महत्वपूर्ण बिंदुओं का अभाव हो तो दर्शकों के मन में कई सवाल घर कर ही जाते हैं। क्योंकि सिर्फ सलमान के कंधे पर चढ़कर सफलता का स्वाद चखना सही नहीं है। वे कितने बेहतर अभिनेता हैं इसके लिए उनका लंबा इतिहास देखा जा सकता है। लेकिन इतनी दूर जाने की ज़रूरत नहीं है। हम इसके लिए फ़िल्म सुल्तान का उदाहरण ले सकते हैं। निर्देशक अली अब्बास जफ़र ने फ़िल्म में बहुत संतुलन बनाए रखा। एक अच्छी कहानी की आत्मा को ज़िन्दा रखा।
उन्होंने सलमान के स्टारडम को भी प्रभावित नहीं होने दिया और उनसे वे सारे उम्दा भावनात्मक सीन भी बख़ूबी करा लिए जो सलमान का एक दूसरा प्लस पॉइंट है। कहने का तात्पर्य यह है कि सिर्फ सलमान के नाम पर फ़िल्म हिट करा लेना अलग बात है और फ्रेंचाइसी को आगे बढ़ाना अलग बात। बेशक रेस-3 में दर्शकों को सलमान के कारण मनोरंजन मिला, लेकिन फ़िल्म की कमियों ने दर्शकों को ठेस पहुंचाई है। यह और बात है कि रेस-3 में सलमान खान को-प्रोड्यूसर थे, लेकिन निर्माता रमेश तौरानी भविष्य में रेस-4 का निर्माण करते हैं तो रेस-3 की कमियों का खामियाजा रेस-4 को भुगतना होगा, बशर्ते कहानी सहित अन्य पक्षों पर गंभीरता बरती जाए। रेस और रेस-2 में जो अचंभित करने वाले दृश्य थे, रेस-3 में उनकी कमी खली है। जब किसी बड़ी फ़िल्म का दूसरा या तीसरा भाग बनाया जाता है तो दर्शकों में यही आस रहती है कि नवीन फ़िल्म पहले से बेहतर होगी। धूम, क्रिश जैसी फिल्मों में यह देखा भी गया है। ऐसे में कहानी, किरदार और अन्य महत्वपूर्ण बिंदुओं के नाम पर रेस-3 ने दर्शकों को जो निराशा भेंट की है, वह उन्हें लंबे समय तक याद रहेगी।

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