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 ***गंगाधर ढोबले ***
   

पनामा पेपर्स’ एक वृहद् आर्थिक रहस्यकथा ही है। आम रहस्यकथाओं में खलनायक के उत्कंठा बढ़ाने वाले कारनामों के बाद अंत में वह पकड़ा जाता है। लेकिन यह रहस्यकथा ऐसी है कि उसका सिरा और अंत शायद ही पता चले और उसमें उलझनें इतनी हैं कि कथित खलनायक शायद ही पकड़ में आए। इसमें लगने वाला समय भी बेहिसाब है। कब, कैसे, कहां और कौन है आदि प्रश्नों के उत्तर खोजना धूल में गिरी सुई खोजने जैसा ही है।
पनामा पेपर्स क्या है?
      मध्य अमेरिका का पनामा बेहिसाबी धन को पनाह देने वाला देश माना जाता है। इसी कारण वह काला धन और करवंचना करने वालों का नंदनवन बन गया है। वहां की एक कानूनी फर्म मोसैक फोंसेका ऐसे धनवानों को धन सुरक्षित करने रास्ता मुहैया करती है। इस फर्म के कोई ११.५ करोड़ गोपनीय दस्तावेज अखबारी दुनिया के हाथ लग गए और एक वैश्विक गड़बड़ी का भंड़ाफोड़ हो गया। ये दस्तावेज पिछले ४० वर्षों के लेन-देन के हिसाब से सम्बंधित हैं। ये लेन-देन भले वैधानिक हो, लेकिन इससे काला धन किस तरह वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में प्रवाहित होता है और इससे देशों के खजानों को करचोरी कर किस तरह लूटा जाता है और अपराध किया जाता है इसका अवश्य पता चलता है। इन दस्तावेजों में दुनिया के बड़े-बड़े राजनेताओं और कार्पोरेट सेक्टर के धनी लोगों के नाम सामने आए हैं। भारत के भी ५०० से अधिक व्यक्तियों के इसमें नाम हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि सभी ने गैरकानूनी ढंग से वहां अपना खाता खोला है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार के चलते कई वैध खाते भी हैं। भारत सरकार ने इसके लिए एक दल गठित किया है, जो अब इस बात का पता लगाएगा कि सही कौन हैं और गलत कौन हैं।
ऐसा हुआ भंड़ाफोड़

इस भंड़ाफोड़ की कहानी तीन वर्ष पूर्व शुरू होती है। जर्मनी के म्यूनिख से प्रकाशित होने वाले दैनिक अखबार ‘सुददॉइश जायतुंग’ को किसी अज्ञात सूत्र ने क्रिप्टेड फाइलें (फाइलों का अति संक्षिप्त रूप) भेजी थीं, जिन्हें निश्चित साफ्टवेयर या कोड से ही खोला जा सकता है। जानकारी भेजने वाले ने बदले में कोई रकम आदि भी नहीं मांगी थी। इसी अखबार ने बाद में आगे की खोज जारी रखी। चूंकि यह किसी अकेले के बलबूते की बात नहीं थी, अतः खोजी पत्रकारों के वैश्विक संगठन ‘इंटरनेशनल कंसोर्शियम ऑफ इन्वेस्टिगेटिव जर्नालिस्ट्स् (आईसीआईजे) ने इसमें हिस्सा लिया। इसमें ७८ देशों के १०७ वैश्विक मीडिया घराने शामिल हुए। ब्रिटेन के गार्जियन, बीबीसी, अमेरिका के कोलम्बिया विश्वविद्यालय एवं मियामी हेराल्ड, रूस के वेदेमोस्ती, स्पेन के अल-कांफिडेंशियल, फ्रांस के ल मॉंद, आस्ट्रेलिया के एबीसी फॉर कॉमर्स, कनाड़ा के सीबीसी/रेडियो, यूगांडा के डेली मॉनिटर, अर्जेंटीना के ला नेशन और भारत में इंडियन एक्सप्रेस समेत प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों ने इस भंड़ाफोड़ में हिस्सा लिया। इससे इस जांच की व्याप्ति और परिश्रम का अंदाजा लगाया जा सकता है। सम्बंधित देश के पत्रकारों को जानकारी मुहैया करने के बाद उनसे जांच-पड़ताल के लिए कहा गया। ऐसी जांच बारीकी से हुई। जांच पूरी होने के बाद ही इसे उजागर किया गया। इसके पूर्व ऐसा शुरुआती प्रयोग अप्रैल २०१३ में हुआ था, जब ब्रिटेन के ‘गार्जियन’ एवं आईसीआईजे ने मिल कर पहली बार इस मामले को उजागर किया था। बाद में पिछले वर्ष ‘स्विसलिक्स’ नाम से परिचित कांड में १२०० से अधिक भारतीयों के एचएसबीसी जिनिवा बैंक के खातों का पता चला था। काले या बेहिसाबी धन को खोजने की दिशा में इस पहल में और भी धमाकेदार बातें उजागर होने वाली हैं।
क्यों और कैसे धन रखा जाता है?
      

 बेहिसाबी और काले धन की सरल व्याख्या यह है कि सरकारी करवंचना कर छिपाया गया धन या भ्रष्टाचार से प्राप्त धन। सरकारी करवंचना के लिए व्यक्ति इसलिए प्रेरित होता है कि क्योंकि कई विकसित या विकासशील देशों में तरह-तरह के कर चुकाने के बाद शेष बचे मुनाफे पर भी भारी कर लगाया जाता है। भारत में कार्पोरेट कर ३० फीसदी से ऊपर है। मतलब यह कि जो कमाया गया उसमें से ३० फीसदी सरकार को देना ही है। इससे बचने के लालच में यह राशि अन्यत्र हस्तांतरित कर दी जाती है। एक और कारण यह है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में दलाली देना आम बात है। यह भी सर्वश्रुत है कि कई राजनेताओं या उनके एजेंटों को दलाली देनी ही पड़ती है। (याद रहे, बोफोर्स कांड में सोनियाजी के रिश्तेदार क्वात्रोची को दी गई दलाली, यह बात अलग है कि बाद में वह इस मामले से बरी हो गए।) ऐसी किसी राशि के भुगतान के लिए काले धन की व्यवस्था करनी पड़ती है। दुनियाभर में हवाला कारोबार करने वाले गिरोह और आपकी राशि को कानूनी जामा पहनाने वाले कानूनी सलाहकारों के झुंड बने हुए हैं। काला धन छद्मी कम्पनियों, विदेशी वित्तीय केंद्रों, बेअरर शेयर या बॉंड या हवाले के जरिए कर नंदनवन में भेजा जाता है।
     राजनेताओं के धन को बहुत बार उनके गुर्गों के नाम रखा जाता है; ताकि मौका पड़ने पर नेताजी पाकसाफ बच जाए। यह गुत्थी इतनी उलझी हुई है कि उसे खोलना ही मुश्किल हो जाता है। कभी एकाध सिरा पकड़ में आता है, बस इतना ही!
जर्मनी, ब्रिटेन ने भी दी दलाली
     खोजी पत्रकारों के समूह तक ये दस्तावेज जरूर पहुंचे हैं; लेकिन इन दस्तावेजों को पाया और किसी ने है। अपने-अपने देशों की बेहिसाबी सम्पत्ति को खोजने में विभिन्न देश लगे हुए हैं ही। उनकी गुप्तचर संस्थाएं ये काम कर ही रही हैं। इसके अलावा कार्पोरेट क्षेत्र में भी एक दूसरे पर हावी होने की स्पर्धा में गुप्तचरी चलती है। उनके अपने स्रोत होते हैं और इसे पाने के लिए वे भारी धन भी खर्च करते हैं। सन २००८ में जर्मनी ने स्वीकार भी किया कि उसने हेनरी कीबर नामक एक व्यक्ति को ४.२ करोड़ यूरो (लगभग ३०० करोड़ रु.) दलाली दी, ताकि लिसेस्टर की बैंक एलजीटी ट्रौहंद के गुप्त खातों की उसे जानकारी मिल सके। कीबर महोदय बैंक के महत्वपूर्ण डेटा के प्रभारी थे। ब्रिटिश सरकार ने इसी दिन एक लाख पौंड अदा किए। कीबर ने और किस-किस को यह डेटा बेचा यह जांच का विषय है। जर्मनी और ब्रिटेन ने इसे स्वीकार किया, लेकिन बाकी देश शायद ही इसे स्वीकार करें। इससे बैंकों के गोपनीय खातों का पता लगाने के लिए देश और राजनेता कितने लालायित हैं, इसका अवश्य पता चलता है। राजनेताओं के हाथ में इस तरह विरोधियों को तबाह करने का एक अस्त्र आ जाता है।
कर नंदनवन क्यों?
      कर नंदनवन माने जाने वाले विश्व में कोई १७० से अधिक देश हैं। ये ज्यादातर पश्चिमोत्तर यूरोप और मध्य अमेरिकी देश हैं। कभी लेबनान का बेरूत, लाइबेरिया, साइप्रस आदि देश कर नंदनवन माने जाते थे; लेकिन इन देशों की आंतरिक स्थिति के कारण अब वे वैसे नहीं रहे। यह स्थान यूरोप व मध्य अमेरिका के छोटे देशों ने ले लिया है। पनामा के अलावा इनमें हैं बहामा, बेलिज, बरमुड़ा (बरमुड़ा वह इलाका है जहां समुद्री त्रिकोण में हवाई जहाज खो जाते हैं और बाद में जिनका अतापता तक नहीं मिलता। वहां लापता विमानों को आज तक कोई खोज नहीं पाया।), ब्रिटिश वर्जिन द्वीप समूह, लक्जेम्बर्ग, आयरलैण्ड, मारिशस, स्विट्जरलैण्ड, नेदरलैण्ड, प्यूट्रो रिको, सेंट कीट्स आदि प्रमुख हैं। इसकी फेहरिश्त बहुत लम्बी है। इन देशों में पनामा की कानूनी सलाहकार कम्पनी मोसैक फोंसेंको के जरिए कोई दो लाख कम्पनियों ने कारोबार किया। इनमें ब्रिटिश वर्जिन द्वीपसमूह में एक लाख कम्पनियों का कारोबार शामिल है, जबकि बहामा, पनामा, नीवू, समोआ, सेशल्स देशों में शेष कारोबार हुआ।
      इन देशों में लगभग ३.७० फीसदी ब्याज दिया जाता है। बचत खाते का ब्याज मात्र ०.७५ फीसदी है। अलग-अलग देशों में ब्याज की दर में मामूली कमोबेशी है। अब इस ब्याज पर स्थानीय कर का हिसाब करें। मिसाल के तौर पर पनामा में कर की आम दर १.४ फीसदी है, जबकि मुक्त व्यापार क्षेत्र में हो तो यह दर मात्र १ फीसदी हो जाती है। यह कर घटा देने पर भी लगभग ३ फीसदी का लाभ बचता है और रकम भी वैध हो जाती है। इसे वैध बनाने के लिए वहां की कम्पनियों से संयुक्त उद्यम स्थापित किए जाते हैं। बहुत सी ऐसी कम्पनियां कागजी होती हैं, लेकिन उनके तुलनपत्र में अरबों-खरबों का कारोबार और मुनाफा दिखाई देता है। भारत में ऐसी कम्पनियों की स्थापना पर काफी कानूनी पचड़े थे, लेकिन सन २००४ के बाद उसे उदार बना दिया गया है। रिजर्व बैंक की अनुमति लेकर ऐसी कई कम्पनियां भारतीय उद्यमियों ने स्थापित की हैं। इसलिए जिनके नाम आए हैं, वे सब काला कारोबार ही करते हैं, ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है।
फर्जीवाड़ा
     जिन पांच सौ से अधिक भारतीयों के नाम ताजा दस्तावेजों में आए हैं उनमें अमिताभ बच्चन का भी नाम है, जबकि उनका कहना है कि उन्हें तो ऐसी किसी कम्पनी का पता तक नहीं है। हो सकता है उनके नाम का इस्तेमाल कर किसी ने वहां कम्पनी खोल ली हो। ऐसा ही एक नाम मध्यप्रदेश के विवेक जैन का है। वे कृषि सामानों की दुकान चलाते हैं। उन्हें ब्रिटिश वर्जिन आइलैण्ड एवं हांगकांग में सैक्विनम ग्लोबल एसए एवं रैडिएंट वर्ल्ड होल्डिंग्ज का शेयरधारी एवं निदेशक बताया गया है। ऐसे अनेक फर्जी नाम होंगे। आपको याद होगा कि विश्वनाथ प्रताप सिंह जब गैर-कांग्रेसी सरकार के प्रधान मंत्री थे, तब उन पर भी विदेश में सम्पत्ति होने के आरोप लगे थे। यहां तक कि साजिश करने वालों ने उनके खातों की जेराक्स प्रतियां भी जारी की थीं; ताकि लोगों को विश्वास हो। बाद में जांच हुई तो पता चला कि ये सारे फर्जी दस्तावेज थे और वि.प्र. को बदनाम करने की साजिश थी। इस जांच के बाद मामला ठंडा पड़ गया।
फंसे विश्व नेता
    इन दस्तावेजों में आइसलैण्ड के प्रधान मंत्री एस.डी.गुनियाग्सन, रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के गुर्गेसर्गेई रोल्डगिन, पाकिस्तान के प्रधान मंत्री नवाज शरीफ एवं पूर्व प्रधान मंत्री बेनजीर भुट्टो, ब्रिटिश प्रधान मंत्री डेविड कैमरान के पिता इआन कैमरान, सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद चचेरे भाइयों, सऊदी अरब के राजा सलमान बिन अब्दुलअजीज अल-औद, मिस्र के पूर्व राष्ट्रपति होस्नी मुबारक के पुत्र अल्ला मुबारक, दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जेकब झुमा के भतीजे क्लाइव झुमा, अर्जेंटीना के राष्ट्रपति मारिसियो मसरी, यूक्रेन के राष्ट्रपति पेट्रो पोरोशेंको, पूर्व चीनी प्रधान मंत्री जिनपिंग की कन्या आदि शामिल हैं। हो सकता है और कई नाम उजागर न हुए हों; अलबत्ता ये लोग इसका खंडन करेंगे। कहा जाता है कि इस घपले में १४० से अधिक वैश्विक नेता या उनके रिश्तेदार या दोस्तों के नाम हैं। हालांकि, आइसलैण्ड के प्रधान मंत्री गुनियाग्सन ने आरंभिक हीलेहवाले के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। वैश्विक राजनीति में यह एक बड़ा भूचाल साबित होगा।
     वैश्विक नेताओं में क्रीड़ा क्षेत्र के लोग भी शामिल हैं। बार्सेलीना के प्रसिद्ध फुटबॉल खिलाड़ी लियोनील मेस्सी, फ्रांस के पूर्व फुटबॉल खिलाड़ी मायकल प्लेतिनी, ‘फीफा’ की नैतिक समिति के एक ताकतवर सदस्य।
भारतीय नाम
       जिन ५०० भारतीयों के नाम इसमें आए हैं उनमें अमिताभ बच्चन व उनकी बहू ऐश्वर्या (अमिताभ ने किसी कम्पनी से इनकार किया है, जबकि ऐश्वर्या ने कहा है कि सब कुछ वैध तरीके से हुआ है और जो उजागर हुआ वह झूठ है।), डीएलएफ के प्रमोटर के.पी.सिंह (उनका भी कहना है कि सब वैध रूप से हुआ है), इंडिया बुल्स के समीर गहलोत (कहते हैं, सभी जानकारी रिजर्व बैंक को दी गई है), पूर्व महाधिवक्ता सोली सोराबजी के पुत्र जहांगीर सोराबजी, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील हरिश सालवे, अपोलों समूह के ओंकार कंवर, गोवा के खान मालिक अनिल सालगांवकर, कोलकाता के व्यापारी शिशिर बजोरिया, सायप्रस पूनावाला के भाई झवेरी पूनावाला, अदानी समूह के गौतम व विनोद अदानी, उनके पुत्र प्रणव व पत्नी रंजनाबेन, गरवारे समूह के अशोक, आदित्य व सुषमा (हालांकि कम्पनी ने इसका खंडन किया है), क्राम्पटन ग्रीव्ज के गौतम व करण थापर, मेहरासन्स ज्वेलर्स के अश्विनी कुमार मेहरा, रेडीमेड वस्त्रों के व्यवसायी सतीश समतानी, विप्लव बहादुर व हरीश मोहनानी, पंचकुला के आईटी सलाहकार गौतम सिंघल, पुणे के सावा हेल्थकेयर के विनोद रामचंद्र जाधव, आटोमोबाइल के कारोबारी राजीव दहुजा व कपिल सैन, कार्पोरेट सम्पर्क कम्पनी वैष्णवी कम्यूनिकेशन्स की नीरा राडिया, दिल्ली के एक राजनेता अनुराग केजरीवाल (मुख्यमंत्री केजरीवाल नहीं), पूर्व क्रिकेटर अशोक मल्होत्रा, भारत का मोस्ट वांटेड अपराधी दाऊद इब्राहीम, उसका गुर्गा इकबाल मिर्ची आदि नामों की लम्बी सूची है।
      यह आर्थिक रहस्यकथा ४० वर्षों के रहस्य बयां करती है और जितनी परतें खोलो उतनी और खुलती जाती हैं। यह दलदल है, जितने पैर खिंचों उतने और गड़ते चले जाते हैं और लौटने का रास्ता तक खो जाता है। वैश्विक स्तर पर इतना विशाल भंड़ाफोड़ करने का मीडिया ने साहस तो किया है, लेकिन उसकी फलश्रुति का कोई अंदाजा नहीं है। जांच की जुगाली इतनी लम्बी चलेगी कि लोग भूल ही जाएंगे कि कहीं कुछ हुआ था। बोफोर्स लोग भूल गए कि नहीं?

मो.: ९९३०८००४५३

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