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***ले .जनरल डॉ .दत्तात्रय शेकटकर***
     

मानव इतिहास में आतंकवाद नया विषय नहीं है। आतंकवाद मनुष्य जाति के प्रारंभ से शुरू हुआ और अंत तक जारी रहेगा। भारत पिछले पांच दशकों से आतंकवादी हमले के बाद आतंकवाद का नया स्वरुप झेल रहा है। क्या भारत में फैलाया गया आतंकवाद भारतीयों की सुरक्षा के लिए, शांति के लिए, राष्ट्रीय प्रगति के लिए खतरा नहीं था? परंतु हमारी लाख कोशिशों के बावजूद भी पूरे विश्व में किसी भी राष्ट्र ने हमारी बात नहीं सुनी। उल्टे हमें ही मानव अधिकार, सहिष्णुता, वेदना के उपदेश दिए गण् और हम सुनते भी रहे! पिछले पचास साल में प्रति वर्ष संयुक्त राष्ट्रसंघ में भारतीय प्रतिनिधि, भारतीय प्रधान मंत्री द्वारा किए गए भाषणों का यदि अध्ययन किया जाए तो पता चलेगा कि भारत के विरुद्ध पाकिस्तान व चीन द्वारा प्रेरित और समर्थित आतंकवादी, गुरिल्ला युद्ध से आंतरिक सुरक्षा पर आघात तथा भारत में सक्रिय राष्ट्रविरोधी तथा राष्ट्रद्रोही तत्वों के बारे में भारत ने अपनी चिंता जताई है। आज भी हम भाषणों में यही कहते हैं। परंतु क्या कोई भी राष्ट्र हमारी बात सुनता है? हमारी कठिनाइयां, हमारी समस्याएं, हमारी पीड़ाओं को समझता है? बिल्कुल नहीं। हर राष्ट्र, हर समुदाय, हर संगठन केवल अपने हितों की रक्षा के बारे में चिंतित है। अंतरराष्ट्रीय सम्बंधों में कोई किसी का सच्चा व विश्वसनीय मित्र नहीं होता है। सब स्वयं की स्वार्थसिद्धि की ही बात करते हैं। आज भी अमेरिका और चीन भारत से मैत्री, दूरगामी सम्बंध बनाने की बात करते हैं, तो केवल अपनी राष्ट्रीय व व्यावसायिक स्वार्थसिद्धि के लिए। स्वामी तुलसीदास ने रामायण में स्पष्ट कहा है कि-
‘‘स्वारथ लाग करही सब प्रीति’’
      जब हम चीन से सम्बंध सुधारने की बात करते हैं तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि १९५६ से लेकर २०१६ तक चीन लगातार भारत के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह करने वाले, अलगाववादी, उग्रवादी, आतंकवादी तथा राष्ट्रद्रोही संगठनों, जो उत्तरपूर्व भारत में सक्रिय हैं, की हर प्रकार से सहायता करता आ रहा है, और भविष्य में भी करता रहेगा। सैन्य प्रशिक्षण, शस्त्र तथा अन्य युद्ध सामग्री, आर्थिक सहायता, आज भी दे रहा है। उत्तर-पूर्व भारत में जो गुरिल्ला युद्ध भारत के विरुद्ध चल रहा है उसका प्रणेता चीन ही है।
     भारत में सक्रिय नक्सलवादी, माओवादी संगठनों को भी चीन से सहायता मिलती है। ‘‘माओवाद’’ विचारधारा आई कहां से? यू.पी.ए. शासन काल में भारत के विभिन्न राज्यों में सक्रिय नक्सलवादी एक ही दिन में अचानक माओवादी बने कैसे? उन्हें प्रोत्साहन दिया किसने? भारत में सक्रिय कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इडिया(मा.ले.) का सम्बंध माओवादियों से है। माओवादियों को राजनैतिक सहायता, संरक्षण और हर प्रकार की सहायता कम्यूनिस्ट पार्टी ही करती है। सन २००४ से २०१४ तक का काल भारत में सक्रिय नक्सलवादी, माओवादी (वास्तव में ये आतंकवादी ही हैं) कम्यूनिस्ट पार्टी तथा माओवादियों के लिए एक वरदान साबित हुआ है। भारत में बढ़ा हुआ माओवाद वास्तव में यू.पी.ए. शासन की देन है। कम्यूनिस्ट पार्टी (मा.ले.) को हर प्रकार से सहायता तथा प्रोत्साहन चीन से मिलती है। एक तरफ चीन भारत से मैत्री की बात करता है, दूसरी तरफ भारत में सक्रिय माओवादी आतंकवादी संगठनों की सहायता करता है। दुर्भाग्य से हमारे कूटनीतिज्ञों ने, शासकों ने इस वास्तविकता को कभी माना भी नहीं। आशा है वर्तमान शासन इन वास्तविकताओं को समझेंगे और आवश्यक कदम उठाएंगे। चीन के दक्षिणी राज्य यूनान प्रदेश की सीमा, म्यांमार से लगी है तथा भारत के समीप है, उत्तर भारत में सक्रिय सभी आतंकवादियों का, उग्रवादियों का, अलगाव-वादियों का प्रमुख गढ़ है। यूनान प्रदेश में कुनमिंग शहर भारत के विरुद्ध आर्थिक गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र है। उग्रवादियों का आर्थिक संचालन कुनमिंग से ही होता है। शासकीय स्तर पर, कूटनैतिक स्तर पर चीन इस सत्य को नकारता आया है और भविष्य में भी स्वीकार नहीं करेगा यह एक कटु सत्य है। भारतीय सुरक्षा व्यवस्था में, आंतरिक सुरक्षा में व्यवधान डालने के लिए, भारत के विरुद्ध सक्रिय सहायता देने के लिए, चीन को सबक सिखाने की आवश्यकता है। सबक सिखाने का अर्थ युद्ध नहीं होता है। भारत के पास अनेक विकल्प हैं। केवल राजनैतिक तथा शासकीय इच्छाशक्ति व संकल्प की आवश्यकता है।
      पाकिस्तान की राष्ट्रनीति, राजनीति, कूटनीति, रणनीति का प्रमुख अंग भारत के विरुद्ध घोषित युद्ध, अघोषित आतंकवादी युद्ध है। प्रत्यक्ष युद्ध का दुस्साहस करने के बाद पाकिस्तान भारत के विरुद्ध प्रत्यक्ष घोषित युद्ध नहीं जीत पाएगा। इसलिए पाकिस्तान की विदेश नीति, राजनीति के तहत भारत के विरुद्ध अघोषित आतंकवादी युद्ध छेड़ा गया है, जिसे धार्मिक रूप देने के लिए ‘जिहाद’ का जामा पहना दिया गया है, जो एक नई योजनाबद्ध, दूरगामी युद्ध पद्धति है। इसी युद्ध पद्धति तथा विचारधारा की तरह उग्रवादी, आतंकवादी संगठन पाकिस्तानी तालिबान, अलकायदा, जैश-ए-मोहम्मद, हिजबुल मुजाहीदिन सरीखे आतंकवादी संगठन खड़े किए गए हैं तथा उन्हें हर प्रकार की सहायता, प्रशिक्षण, निर्देशन तथा प्रोत्साहन दिया जाता है। इन तमाम आंतकवादी संगठनों का निर्देशन, नियंत्रण, प्रशिक्षण, अर्थ तथा युद्ध सहायता पाकिस्तान की सेना तथा पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आई.एस.आई ही करती है। पाकिस्तान में कार्यरत आतंकवादी संगठन, भारत के विरुद्ध घोषित आतंकवाद पाकिस्तान की राष्ट्रनीति, कूटनीति, युद्धनीति का एक अनुच्छेद है। यह सत्य हमें कभी भी नहीं भूलना चाहिए।
       राष्ट्रनीति में वास्तविकता की अनदेखी करना, तथ्यों को भूलना, इतिहास को भूलना हमारे अनुभवों को भूलना एक मानसिक बीमारी होती है। जबकि माफ कर देना, क्षमा कर देना महानता की निशानी होती है। केवल समर्थ सशक्त, सक्रिय तथा सक्षम व्यक्ति या राष्ट्र ही क्षमा कर सकता है। दुर्भाग्य से हमारा लगभग ७० वर्ष का राष्ट्रीय अनुभव, इतिहास, शासकीय, कूटनीतिक तथा राजनैतिक अनुभव यह सिद्ध करता है कि हमें भूलने की बीमारी है। यह बीमारी दीमक की तरह हमें अंदर से खोखला कर देती है। यही कारण है कि हमारी आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था अंदर से खोखली, निष्क्रिय, अक्षम, अकर्मण्य हो गई है। पिछले एक वर्ष में इसमें कुछ सकारात्मक परिवर्तन तथा आवश्यक बदलाव आ रहा है। पूर्व सक्षमता के लिए कम से कम हमें पांच वर्ष तक अथक परिश्रम करना आवश्यक है। इस ‘भूलने’ की बीमारी का पूरा-पूरा फायदा पाकिस्तान ने उठाया है। हम पाकिस्तान की दूरगामी चाल में, पाकिस्तान द्वारा फैलाए जाल में तथा पाकिस्तान द्वारा रचित, संचालित, नियंत्रित चक्रव्यूह में फंसते ही जा रहे है। पिछले ६० वर्षों का इतिहास इस कटु सत्य, कठोर वास्तविकता का साक्षी है। मैं पिछले २९ वर्षों से कुरान का अध्ययन कर रहा हूं। क्योंकि आतंकवाद (जिहाद) का सम्बंध कट्टरपंथियोंे ने पवित्र कुरान से जोड़ दिया है। इसलिए उर्दू भाषा की थोड़ी जानकारी है। एक अत्यंत वास्तविक तथा सत्य कहावत है।
‘‘वक्त ऐसा भी देखा है तारीख की घड़ियों में
लम्हों ने खता की सदियों ने सजा पाई!’’
      हमारे पूर्व शासकों ने, स्वयंभू राजनीतिज्ञों ने, बिके हुए कूटनीतिज्ञों ने जो गलतियां की हैं, उनकी सजा पूर्व भारत पिछले ३० साल से भुगत रहा है। यदि हम सचेत नहीं हुए तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। भविष्य हमें माफ नहीं करेगा और इतिहास भी हमें माफ नहीं करेगा। हमारे राजनीतिज्ञों ने हमारे शासकों ने तथा सुरक्षा एवं संरक्षण तंत्र को भी यह समझना आवश्यक है।
     पाकिस्तान कश्मीर का मुद्दा भारत के खिलाफ आतंकवाद की जड़ मानता है। इसी मुद्दे के कारण पाकिस्तान भारत के विरुद्ध आतंकवाद को जायज मानता है। पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर के पूर्व क्षेत्र में से कारगिल ४८०० वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पाकिस्तान ने चीन को १९६३ में एक समझौते के तहत दे दिया था। भारत सरकार ने उस समय कोई आक्षेप नहीं उठाया। इस क्षेत्र में चीन की पूरी पकड़ है, नियंत्रण है। चीन को अब अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के क्षेत्र का महत्व तथा उस क्षेत्र पर नियंत्रण आवश्यक हो रहा है। पाकिस्तान के बलुचीस्तान आदि प्रांतों के समुद्री क्षेत्र की आवश्यकता चीन को है। इसलिए चीन को पाकिस्तान की आवश्यकता है। चीन पाकिस्तान का इस्तेमाल भारत के खिलाफ भी कर रहा है और करता रहेगा। एक सोचीसमझी चाल के तहत चीन पाकिस्तान को आर्थिक तथा सैनिक रूप से पूर्णत: नियंत्रित रखना चाहता है। यही कारण ह कि १९९९ में कारगिल युद्ध के बाद चीन-पाकिस्तान सम्बंधों में नया मोड़ आया है। चीन के राष्ट्रपति, चीन के प्रधान मंत्री, रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री, तथा सेना अध्यक्ष एक नई विचारधारा को प्रोत्साहित कर रहे हैं। चीन-पाकिस्तान सम्बंध व मैत्री को चीन के शासक ‘‘मांउट एवरेस्ट से ऊंची, अरब सागर की गहराइयों से गहरी तथा शहद से ज्यादा मीठी’’ मानते हैं। शाब्दिक अर्थ से ज्यादा इस वास्तविकता का सैद्धांतिक अर्थ महत्वपूर्ण है, यह समझना आवश्यक है।
       हमें यह नही भूलना चाहिए कि कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल मुशर्रफ चीन में ही थे। वे युद्ध काल में चीन से सैन्य सहायता मांगने गए थे। वे चीन की सक्रिय सहायता चाहते थे। उस समय चीन ने पाकिस्तान की सहायता की भी थी। कारगिल युद्ध के समय में मैं स्वंय अरुणाचल प्रदेश में भारत-तिब्बत सीमा, भारत भूतान सीमा तथा भारत-म्यांमार सीमा पर कार्यरत था। मुझे पूरी जानकारी है कि कारगिल युद्ध के दौरान, पाकिस्तान की सहायता करने के लिए ही अरुणाचल प्रदेश की विवादित सीमा तथा सीमा क्षेत्र में चीन ने बखेड़ा खड़ा किया। हमने चीन की चाल को सफल नहीं होने दिया। तत्कालीन भारतीय सेनाअध्यक्ष जनरल वी. पी. मलिक ने उनकी पुस्तक (र्डीीिीळीश ळपींे तळलींेीू) में अरुणाचल प्रदेश में चीन की कार्रवाई का थोड़ा सा उल्लेख किया है। १९९९ के बाद से चीन पाकिस्तान सम्बंधों में एक नया मोड़ आया है। जिनका प्रभाव भारत के विरुद्ध आतंकवादी युद्ध पर पड़ रहा है।
पाकिस्तान की बागडोर, उसका शासन केवल तीन शक्तियां चलाती हैं- पाकिस्तान की सेना, आई.एस.आई. तथा आतंकवादी संगठन, जो पाकिस्तान शासन का ही एक अंग है। पाकिस्तान के तथाकथित राजनैतिक तथा शासकीय अधिकारी, कूटनीतिज्ञ आदि सभी पाकिस्तान की सेना तथा आई.एस.आई की मर्जी पर ही सत्ता में रहते हैं और उन्हीं के इशारों पर नाचते हैं।
     

 पाकिस्तान की जमीन का उपयोग करने के लिए चीन को पाकिस्तान की सेना, आई.एस.आई. तथा आतंकवादी संगठनों का समर्थन व उनकी मदद आवश्यक है। इसिलिए भारत के अनेक प्रयासों के बावजूद भी चीन, संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान तथा पाकिस्तान संरक्षित आतंकवादियों के विरुद्ध कोई भी प्रस्ताव पारित नहीं होने देता। यदि चीन ने पाकिस्तान के आतकवादियों का समर्पन नहीं किया तो चीन को इसकी कीमत चुकाना पड़ेगी तथा चीन का यातायात, व्यापार पाकिस्तान के मार्फत बंद हो सकता है। चीन कभी भी पाकिस्तान या पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान में सक्रिय आतंकवादियों के खिलाफ कोई भी कार्रवाई न तो करेगा, न ही किसी को करने देगा। इसलिए चीन हमेशा भारतीय प्रस्तावों के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्रसंघ में नकाराधिकार का उपयोग करता है।
      चीन के पश्चिमी सीमा प्रांत ‘सिकियांग’ में, जिसकी सीमा अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान से लगी है, ‘उईगर’ जैसे आतंकवादी संगठन कार्यरत हैं। ये संगठन चीन से स्वतंत्रता प्राप्त करना चाहते हैं। चीन को यह वास्तविकता मालूम है कि इन आतंकवादी संगठनों को पाकिस्तान में सक्रिय आतंकवादियों की सहायता तथा समर्थन प्राप्त है। तालिबान एवं अलकायदा संगठन भी चीन में सक्रिय आतंवादियों का समर्थन तथा संरक्षण करते हैं। इन कारणों से भी चीन पाकिस्तान में सक्रिय आतंकवादियों के बीच में कभी नहीं जाएगा।
चीन नहीं चाहता कि अमेरिका तथा भारत के सम्बंध अफगानिस्तान से अच्छे हों। पाकिस्तान भी यह नहीं चाहता है। इसलिए पाकिस्तान तथा चीन भारत व अमेरिका के समर्थन में कार्य नहीं करते हैं तथा आतंकवाद को बढावा देते हैं। निष्कर्ष यह है कि चीन भारत को पाकिस्तान या पाकिस्तान द्वारा समर्थित आतंकवादियों के खिलाफ किसी भी प्रकार की कार्रवाई नहीं होने देगा। भारत को अपने ही बलबूते पर आतंकवाद से निपटना पड़ेगा।
       भारत ने पिछले २० वर्षों से पाकिस्तान पर लगाम लगाने के लिए अमेरिका से सतत मदद मांगी; क्योंकि पाकिस्तानी आतंकवादी तथा पाकिस्तान द्वारा समर्पित आतंकवाद केवल भारत के लिए ही नहीं परंतु पूरे विश्व के लिए भयंकर खतरा है। पाकिस्तान की अमेरिका के साथ की गई गद्दारी का अनुभव अमेरिका को तब हुआ जब अमेरिका को उसके सब से बड़े शत्रु ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान में ढूंढ़ कर वहीं मारना पड़ा। अमेरिका पाकिस्तान के इस विश्वासघात को कभी भी भूलेगा नहीं और माफ भी नहीं करेगा। फिर उसी अमेरिका ने पाकिस्तान में संरक्षित तथा निर्देशित आतंकवादियों पर लाखों डॉलर का ईनाम रखा है। अमेरिका ने सद्दाम हुसैन, लीबिया के राष्ट्रपति कर्नल गद्दाफी, अनेक कुरव्यात आतंकवादियों, अफगानिस्तान में प्रमुख आतंकवादियों को ढूंढ़ कर हवाई हमलों के माध्यम से, हेलिकॉप्टर, द्रोण का इस्तेमाल करके मारा। परंतु, अमेरिका के पास ऐसी व्यवस्था नहीं है कि लाहौर, इस्लामाबाद, रावलपिंडी, सियालकोट सरीखे बड़े-बड़े शहरों में खुले आम घूमने वाले, भारत द्वारा बताए गए आतंकवादियों को ढूंढ़ कर मार सके! इसका अर्थ स्पष्ट है कि भारत के विरुद्ध आतंकवादी युद्ध करने वालों को अमेरिका कभी भी नहीं मारेगा। हम लाख गिड़गिड़ाएं, प्रार्थना करें, मन्नतें करें परंतु अमेरिका पाकिस्तान समर्थित, निर्देशित आतंकवादयों पर कभी भी क ्री कार्रवाई नहीं करेगा। आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका की दुहरी चाल, दुहरा मापदंड, भारतीय सुरक्षा के लिए अत्यंत घातक है।
      युद्धशास्त्र का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है- आपका युद्ध स्वयं आपको ही लड़ना पड़ता है। युद्ध तथा राष्ट्रीय सुरक्षा किसी और के जिम्मे नहीं कर सकते हैं। अमेरिका ने अफगानिस्तान में सोवियत संघ के साथ आतंकवादी युद्ध लड़ने की जिम्मेदारी पाकिस्तान, तालिबान, अलकायदा पर सौंपी थी। उसकी किमत अमेरिका को ९/११ को चुकाना पड़ी। आज भी उन गलतियों की सजा अमेरिका की युवा पीढ़ी भोग रही है। इसी प्रकार से पाकिस्तान के द्वारा भारत पर किए जाने वाले आतंकवादी हमलों का जवाब भारत को ही देना होना। हमें न तो अमेरिका पर या संयुक्त राष्ट्रसंघ पर निर्भर रहना चाहिए। महाशक्तियां विश्व शांति के नाम पर, आतंकवाद के खिलाफ युद्ध के नाम पर केवल अपने राष्ट्रीय हितों का संरक्षण करते हैं। इसी कारण वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ युद्ध केवल एक नारा बन कर रह गया है।
       संत तुलसी कहते हैं- समरथ को नहीं दोश गुसाई। सामर्थ्यवान का कोई दोष नहीं होता है। चाहे वह सामर्थ्यवान व्यक्ति हो, संगठन हो, देश या राष्ट्र हो। यदि आप हर क्षेत्र में समर्थ हैं तो आप कुछ भी कर सकते हैं। आपको दोषी नहीं माना जाएगा। आतंकवादयों से युद्ध के नाम पर अमेरिका ने अफगानिस्तान को तबाह कर दिया, इराक को तबाह कर दिया, लीबिया, मिस्र, सीरिया जैसे देशों को बरबाद कर दिया है। युद्ध के नाम पार विध्वंसक कार्रवाई अधिकृत रुप से, हर प्रकार से की जा रही है। किसी भी राष्ट्र में सत्ता परिवर्तन ये केवल कुछ चुने हुए देशों की ‘ठेकेदारी’ बन गई है। लाखों लोग निर्वासित हो रहे हैं। दूसरे देशों की ओर विस्थापित, शरणार्थियों के रुप में पलायन का रहे हैं। सब से ज्यादा नुकसान महिलाओं और बच्चों का हो रहा है। बच्चे अंपग हो रहे हैं। अनाथ हो रहे हैं। यही बच्चे ५-१० साल के बाद आतंकवादी, विध्वसंक बनेंगे और उनके माता,पिता, पर हुए क्रूर प्रहार, अत्याचार का बदला अवश्य ही लेंगे।
     आज लगभग सभी यूरोपीय देश, अमेरिका, इसीस नामक आतंकवादी संगठन के निशाने पर क्यों है? फ्रांस, ब्रिटेन, बेल्जियम, तुर्की तथा अन्य राष्ट्रों में आतंकवादी हमलें क्यों बढ़ रहे हैं? विश्व में कहीं भी, विशेष कर यूरोप में आतंकवादी हमलें कर देते हैं, क्यों? क्योंकि, उनका स्वयं पर नियंत्रण नहीं रह गया है, दुस्साहस बढ़ गया है। उन्हें मालूम है कि विश्व संगठन, विश्व संस्थाएं व विश्व की एकत्रित, एकीकृत शक्ति कभी आतंकवादी संगठन तथा उन्हें विविध प्रकार से सहायता, संरक्षण, निर्देशन देने वालों के खिलाफ कोई भी कार्रवाई नहीं करेंगे। यही कारण है कि हाल ही में भारत पर हुए आतंकवादी हमलों की खुले रुप में जिम्मेदारी पाकिस्तान में कार्यरत, पाकिस्तान द्वारा समर्थित, पाकिस्तान द्वारा निर्देशित आतंकवादी खुले रूप से ले रहे हैं। भारत के विरुद्ध दुस्सहस करने की यह प्रवृत्ति, मानसिकता व शक्ति आती कहां से है? कौन उनकी सहायता करता है, संरक्षण करता है? पाकिस्तान द्वारा समर्थित, नियंत्रित एवं निर्देशित भारत के खिलाफ अघोषित युद्ध एक युद्ध पद्धति बन गई हैै।
      मैं अपने अनुभव, अध्ययन व विश्लेषण के आधार पर स्पष्ट कहता हूं कि आने वाले केवल कुछ वर्षों में ही अमेरिका क्रोधित दृष्टि पाकिस्तान पर अवश्य ही पड़ेगी। इसके अंत्यत घातक परिणाम पाकिस्तान पर ही होंगे। हो सकता है आज पाकिस्तान में सक्रिय, पाकिस्तान द्वारा समर्थित तथा निर्देशित आतंकवादी संगठन ही पाकिस्तान में बगावत करके एक नवीन राष्ट्र को जन्म देेंगे। हम इस दूर्भाग्यपूर्ण वास्तविकता को नकार नहीं सकते है। चिंता हमें भी करनी चाहिए क्योंकि पाकिस्तान का यदि फिर विघटन हुआ तो इसके दुश्परिणाम भारत पर भी होंगे। यही कारण है कि पिछले चार दशकों में किसी भी भारतीय केन्द्र शासन ने पाकिस्तान का विघटन नहीं चाहा है और न कभी चाहेंगे।
      आने वाले काल में भविष्य, पाकिस्तान के विघटन के तूफान को सिर्फ पाकिस्तान ही सम्हाल सकेगा, पाकिस्तान ही रोक सकेगा। क्योंकि समय के, दशा के बदलाव का जब तूफान या सुनामी आती है तो आपकी हिमालय जैसी ऊंची दोस्ती, अरेबियन समुद्र की गहराई जैसी गहरी दोस्ती, तथा शहद से भी मीठी दोस्ती किसी भी काम नहीं आएगी। अतरराष्ट्रीय संम्बंधों में व्यक्ति, राजनीतिक दल कोई मायने नहीं रखते हैं, केवल राष्ट्रीय हित ही सर्वोपरि होते हैं। बदलते समय के साथ राष्ट्रीय हितों में भी बदलाव आ जाता है। यदि दुर्भाग्य से (मेरी ईश्वर से प्रार्थना है कि मेरी भविष्यवाणी सही न हो) पाकिस्तान का फिर से विघटन हुआ तो फिर चीन या अमेरिका को पाकिस्तान की आवश्यकता नहीं रहेगी। जब किसी संगठन या राष्ट्र का महत्व कम हो जाता है तो उसके शुभचिंतक, मित्र भी कम हो जाते हैं, बदल जाते है। अभी भी वक्त है कि पाकिस्तान की जनता, विशेषकर युवा पीढ़ी अपना भविष्य बचा लें, अपना भविष्य दांव पर न लगाए।
      भारतीय शासन को पाकिस्तान के साथ सम्बंध सुधारने का, मैत्री व विश्वास बढ़ाने का हर प्रकार प्रयास करते रहना चाहिए। शायद मानसिकता में कोई परिवर्तन आ जाए। इसीलिए कहा जाता है-
‘‘गुप्तगू चलती रहे बात से बात बने’’।
यदि वार्ताएं बंद हो गईं, गुप्तगू न चली तो फिर बात बनेगी कैसे? भारत -पाकिस्तान सम्बंधों की चर्चा करते समय, आतंकवादी प्रवृत्ति को कम करने की बात करते समय, ध्यान में रखना जरुरी है-
दुश्मनी लाख सही, खत्म ना कर रिश्ता,
दिल मिले ना मिले, मगर हाथ मिलाते रहिए।
भारतीय शासकों से, कूटनीतिज्ञों से, विशेषज्ञों से, विश्लेषकों से तथा अंगे्रजी टीवी चैनलों पर अमद्र, अशोभनीय भाषा में चिल्लाने वाले राष्ट्रभक्तों से, स्वंयभू विशेषज्ञों से मेरा निवेदन हैं ‘धैर्य रखिए’, ‘मनुष्य बड़ा नहीं होता है-समय होता है बलवान। भारतीय उत्थान, प्रगति, प्रख्याति का समय आ गया है। अपनी सकारात्मक शक्ति राष्ट्रनिर्माण में लगाइये। हमें धैर्यपूर्वक लम्बी अवधि तक कार्य करना है, शायद सुबुद्धि आ जाए। इसीलिए कहा है-
जिस्म की बात नहीं है- उनके दिल तक जाना है।
अब लम्बी दूरी तै करने में वक्त तो लगता है।

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