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अधिकतर मनोविशेषज्ञ का मानना है कि मनोरोगियों अथवा साइकोपैथ और सोशियोपैथ के व्यवहारिक शीलगुणों में काफी हद तक समानता देखने को मिलती है. ऐसे लोगों के सही और गलत की समझ काफी कमजोर होती है. वे अन्य लोगों की भावनाओं को समझने में असमर्थ होते हैं. इसके बावजूद इन दोनों व्यक्तित्व प्रकारों को कुछ विशेष अंतरों के आधार पर भिन्न रूप में पहचाना जा सकता है :

  1. उनकी आत्म चेतना में अंतर होता है

साइकोपैथिक लोगों में अच्छे/बुरे अथवा सही/गलत की आत्म चेतना नहीं होती है. यदि वे कोई झूठ बोलें, किसी की कोई चीज चुरा लें या फिर किसी का खून ही क्यों न कर दें, उन्हें किसी तरह का अपराधभाव महसूस नहीं होता. हां, कई बार बाहरी तौर से वह झूठ-मूठ का ऐसा दिखावा जरूर करते हैं. वह दूसरों के व्यवहारों का काफी बारीकी से निरीक्षण करते हैं और फिर उसके अनुसार अपनी कार्ययोजना बनाते हैं. कह सकते हैं कि इस मामले में वे बड़े ही शातिर दिमाग होते हैं.

दूसरी ओर, सोशियोपैथिक लोगों में अपने द्वारा की जानेवाली गलतियों की आत्मचेतना होती है, लेकिन इसके बावजूद वे खुद को ऐसा करने से रोक नहीं पाते. बाद में इसके लिए उन्हें पछतावा भी होता है.

इस तरह दोनों ही तरह के रोगियों में परानुभूति (empathy) का अभाव होता है. वे दूसरों की परिस्थितियों और भावनाओं को समझने में पूरी तरह से असमर्थ होते हैं. फिर भी एक साइकोपैथ, सोशियोपैथ की तुलना में दूसरों के प्रति कम आदरभाव रखता है. ऐसे लोग दूसरों को एक वस्तु के तौर पर देखते हैं और जितना हो सके, उससे लाभ पाने की कोशिश करते हैं और मतलब निकल जाने पर उन्हें चोट पहुंचाने में किसी तरह की दरियादिली नहीं बरतते.

  1. जरूरी नहीं कि ऐसे लोग हमेशा आक्रामक हों

अक्सर फिल्मों या टीवी सीरियल्स में हमें साइकोपैथिक या सोशियोपैथिक लोगों को विलेन के रूप में देखते हैं, जो मासूम लोगों को जान से मारते हैं या उन्हें टॉर्चर करते हैं, जबकि असल जिंदगी में ऐसे ज्यादातर लोग आक्रामक नहीं होते. बहुत कम ही लोगों में यह मार-काट वाली प्रवृति देखने को मिलती है. बजाय इसके ऐसे लोग बेहद चालाक और शातिर होते हैं. उन्हें जो चीज चाहिए, उसे पाने के लिए वे किसी भी हद तक जाने से गुरेज नहीं करते. संभव है कि अपने परिवार या ऑफिस में ऐसे कुछ लोगों के व्यवहारों को देख कर आपको उनके साइकोपैथ या सोशियोपैथ होने का शक हो, लेकिन यह जरूरी नहीं कि हर स्वार्थी व्यक्ति इस बीमारी से ग्रसित हो.

  1. साइकोपैथ संवेदनहीन होते हैं, जबकि सोशियोपैथ गर्म दिमागवाले

किसी साइकोपैथ की पहचान करना इतना आसान नहीं है. कारण कि ऐसे लोग बेहद बुद्धिमान, व्यवहार कुशल, देखने में सुंदर और अपनी बातों से सबको रिझानेवाले होते हैं. आपसे मिलने पर वे आपको यह जताने की कोशिश करते हैं कि उन्हें आपकी फिक्र है, जबकि सच तो यह है कि उन्हें आपमें कोई रुचि नहीं होती. वे सिर्फ और सिर्फ आपसे अपना उल्लू सीधा करने की फिराक में रहते हैं. उसके बाद वे अपनी जिंदगी से आपको ‘दूध की मक्खी’ की तरह निकालने में जरा-सी भी देरी नहीं करते.

इनके मुकाबले सोशियोपैथ थोड़े कम शातिर होते हैं. वे बाहरी तौर पर तो यही जताते हैं कि उन्हें दूसरों की कोई परवाह नहीं. उन्हें केवल अपनी चिंता हैं. वे अक्सर दूसरों के व्यवहारों के लिए दोष निकालते रहते हैं. छोटी-छोटी सी बात पर गुस्सा हो जाते हैं. किसी से बात करते समय यह नहीं सोचते कि उनकी किसी बात का सामनेवाले पर क्या प्रभाव पड़ेगा.

  1. मस्तिष्कीय संरचना में अंतर

हाल के शोधों में पता चला है कि साइकोपैथिक लोगों के दिमाग की संरचना आम लोगों से भिन्न होती है, जिसकी वजह से वे अन्य लोगों की परेशानियों की पहचान कर पाने में असमर्थ होते हैं. इस अंतर के कारण उनके आम शारीरिक कार्यों में भी भिन्नता देखने को मिलती है. उदाहरण के तौर पर, साधारणत: किसी फिल्म या रियल लाइफ में खून-खराबा या दहशतगर्दी देख कर लोगों के हृदय की धड़कनें बढ़ जाती हैं, उनकी सांसें तेज हो जाती हैं, वे पसीने से तर-बतर हो जाते हैं, जबकि एक साइकोपैथ में इसके बिल्कुल उलट प्रतिक्रिया देखने को मिलती है. वे इस तरह की परिस्थिति या दृश्यों को देख कर शांत, निडर और सुकून महसूस करते हैं. उन्हें ऐसे कार्यों के संभावित बुरे परिणाम की चिंता नहीं होत

अमेरिकन साइकैट्रिक एसोशिएसन डायग्नोस्टिक एंड स्टैटिस्टिकल मैन्युअल के अनुसार- एक साइकोपैथ को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसमें दूसरों के अधिकारों का व्यापक हनन और उपेक्षा व हिंसा करने का भाव पाया जाता है, जिसकी शुरुआत बचपन में अथवा आरंभिक किशोरावस्था में होती है और वयस्कावस्था तक कायम रहती है.

सोशियोपैथ जन्मजात नहीं होते, बल्कि अपने जीवन की आरंभिक अवस्थाओं में विभिन्न पर्यावरणीय कारकों तथा अनुभवों के परिणामस्वरूप वे ऐसी प्रवृति विकसित कर लेते हैं. हालांकि उनकी ये प्रवृतियां जल्दी पहचान में नहीं आती, क्योंकि शुरुआत अभिभावकों को लगता है ‘बच्चा है. धीरे-धीरे सुधर जायेगा,’ लेकिन जब वे दूसरों को गंभीर नुकसान पहुंचाना शुरू कर देते हैं, तब लोग उन्हें नोटिस करते हैं.

आमतौर पर सोशियोपैथिक लोगों को निम्नलिखित गुणों के आधार पर पहचाना  जा सकता है

  1. ऐसे लोग बड़े शातिर होते हैं

सोशियोपैथ ऐसा मानते हैं कि दूसरों को छल कर या धोखा देकर काफी कुछ हासिल किया जा सकता है. इस दिशा में वे दूसरों को अपने द्वेषपूर्ण विचारों के बारे में राजी करने में जरा भी देरी नहीं लगाते. वे अपनी लच्छेदार बातों और अपनी चतुराई से उन्हें अपने पक्ष में करने की पूरी कोशिश करते हैं. वे अपनी योजनाओं को सफल बनाने के लिए दूसरे लोगों को एक वस्तु की तरह यूज करते हैं और जब उनका काम निकल जाता है, तो उसे अपनी जिंदगी से निकाल बाहर करते हैं

  1. दूसरों की भावनाओं और संवेदनाओं को समझने में असमर्थ होते हैं

सेाशियोपैथ आम लोगों की तरह भावुक और संवेदनशील नहीं होते. वे मात्र संवेदनशील होने का ढोंग करते हैं. यहां तक कि उनका हंसना, रोना, गुस्सा होना या दुखी होना भी क्षणिक होता है और इसके पीछे भी उनका स्वार्थ निहित होता है. वे अपनी ही दुनिया में जीते हैं, जिसमें वे अपनी सहुलियत से अपनी नैतिकता के मापदंड भी बनाते हैं. वे अक्सर इस विश्वास के साथ जीते हैं कि किसी के प्रति उनकी कोई जबावदेही नहीं बनती और न ही उनके कार्यों से किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचता. भावनाओं और संवेदनाओं का अभाव होने के कारण ही वे दूसरों के प्रति लापवरही बरतते हैं और सारा दोष उन पर मढते हैं.

  1. ऐसे लोग झूठ बोलने में माहिर होते हैं

सोशियोपैथ झूठ बोलने की कला में इस कदर माहिर होते हैं कि कई बार झूठ पकड़नेवाली मशीन भी उनके झूठ को पकड़ने में नाकामयाब होती है. वे अपनी शातिर योजनाओं या कमियों को छिपाने के लिए लगातार झूठ बोलते रहते हैं. उन्हें इसके परिणाम की फिक्र नहीं होती. यदि कभी उनका झूठ पकड़ा भी जाये, तो वे दूसरों पर इसका दोष मढने में जरा भी देर नहीं करते या फिर उस परिस्थिति से मुंह चुराते हैं. इसी वजह से सोशियोपैथिक क्रिमिनल्स को पकड़ना कई बार काफी मुश्किल होता है. 

  1. उनकी भावनाएं बेहद सतही होती हैं

सतही भावनाओं का अर्थ होता है- मात्र दूसरों का मन रखने के लिए झूठ-मूठ की खुशी, गम या उत्साह प्रदर्शित करना या फिर ऊपरी मन से किसी की बड़ाई या प्रोत्साहन करना. सोशियोपैथ अक्सर अपने फायदे के लिए इस तरह का ढोंग करते हैं, ताकि सामनेवाले व्यक्ति को लगता है कि वे उसकी परवाह करते हैं. उन्हें अपना काम निकालने के लिए झूठे कसमें-वादे करने से भी परहेज नहीं होता और एक बार जब उनका काम निकल जाये, तो उन्हें अपनी बात से मुकरने में भी देरी नहीं लगती. 

  1. उनका चित अशांत होता है

किसी भी काम को करने या किसी बात को बोलने से पूर्व उस बारे में तर्कपूर्ण विचार-विमर्श करने की क्षमता सोशियोपैथ में नहीं होती. एक बार उनके दिमाग में कोई विचार आ गया, तो वे बस उसे कर गुजरते हैं. उनके ऐसे कार्यों के पीछे अक्सर धोखाधड़ी, चोरी या झूठ शामिल होता है. वे अपनी योजना को लागू करने को लेकर इतने उत्साहित होते हैं कि इसके उचित-अुनचित परिणामों के बारे में भी नहीं सोच पाते.

  1. आकर्षक व्यक्तित्व के धनी होते हैं

सोशियोपैथ अक्सर खूबसूरत, स्मार्ट और आकर्षक नैन-नक्श वाले होते हैं. उन्हें यह अच्छी तरह से पता होता है कि वे अपने इन गुणों को कैसे और कहां यूज करके अपना उल्लू सीधा कर सकते हैं. वे

अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से बहुत जल्द लोगों को प्रभावित करने और उनसे अपने मन का करवाने की क्षमता रखते हैं. जब तक सामनेवाले से उन्हें काम रहता है, वे उन पर निर्भर या उनसे चिपके रहते हैं. अक्सर जो लोग उनके करीब होते हैं या उन पर भरोसा करते हैं, वे उन्हें ही अपना शिकार बनाते हैं. एक बार उनका काम निकल जाये, फिर वे उस व्यक्ति में तरह-तरह की कमियां निकाल कर या फिर उन पर दोष मढ कर खुद को उनसे अलग कर लेते हैं.

  1. आत्मकेंद्रित प्रकृति के होते हैं

सोशियोपैथ अक्सर खुद को ‘तीस मार खां’ समझते हैं. खुद को सबसे अलग और बेहतर साबित करने के लिए वे अक्सर डीगें हांकते रहते हैं. उन्हें लगता है वे कि जो कुछ भी सोचते या करते हैं, वह सही है. वे कभी भी कुछ गलत कर ही नहीं सकते. इसी वजह से वे अपने जीवन, शादी-विवाह, धनोपार्जन आदि के बारे में समुचित और व्यावहारिक निर्णय नहीं ले पाते हैं. वे इस बात को समझने में असमर्थ होते हैं कि उनके आस-पास मौजूद अन्य लोग क्यों उनका

विरोध करते हैं या उनसे सहमति नहीं रखते हैं.

  1. आत्मग्लानि का अभाव होता है

सोशियोपैथिक व्यक्तित्व का एक सबसे अहम विशेषता ऐसे लोगों में आत्मग्लानि का अभाव होना है. वे कितनी भी घातक या गंभीर अपराध क्याें न कर दें, उन्हें इसका कोई अफसोस नहीं होता. हां दुनिया को दिखाने के लिए वे ‘घड़ियाली आंसू’ बहाने में जरूर माहिर होते हैं, जिससे लोगों को लगता है कि उन्हें वास्तव में अपने किये का पछतावा है, जबकि ऐसा होता नहीं है.

अन्य सामान्य विशेषताएं

– आरंभिक व्यवहारिक समस्याएं, जिन्हें बाल अपराध की श्रेणी में रखा जा सकता है.

– ऐसे लोगों में अपनी बातों या व्यवहारों से दूसरों का अपमान करने या दिल दुखाने की प्रवृति होती है.

– गिरगिट की तरह हर पल अपना रंग बदलने में माहिर होते हैं.

–  हमेशा अपने फायदे की सोचते हैं भले ही उससे दूसरों का नुकसान ही क्यों न हो जाये.

– दबंग और रहस्यमयी प्रकृति के होते हैं. अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में ये ज्यादा बातें करना पसंद नहीं करते.

– हमेशा अपनी खूबियों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते हैं, जबकि कमियों को छिपाते हैं.

– अपनी योजनाओं को सफल बनाने के लिए ये घटिया से घटिया तरीके अपनाने से भी परहेज नहीं करते.

 

This Post Has One Comment

  1. शानदार

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