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 ***दत्तात्रय शेडगे***
    

      मराठी के जाने-माने कवि बा.भ. बोरकर जी ने कहा था, ‘‘वे हाथ सुंदर हैं जिनसे निर्मिति होती है। जो हाथ निर्मिति करते हैं वे हाथ मंगलमय होते हैं। ऐसे ही कुछ जिम्मेदार और समाजसेवा करने वाले हाथों ने मिल कर पोलियोग्रस्त तथा जिनके हाथ-पांव नहीं हैं ऐसे विकलांग छात्रों के लिए काम शुरू किया, जिससे ‘अपंग कल्याणकारी शिक्षण संस्था और संशोधन केंद्र’ की निर्मिति हुई। पुणे की यह संस्था विकलांगों के लिए श्रेष्ठ कार्य कर रही है। इस संस्था को मिलने वाली प्रतिक्रिया भी अच्छी है। इस संदर्भ में संस्था के कार्याध्यक्ष तथा पुणे के एडवोकेट मुरलीधर कचरे जी के साथ हुई बातचीत के प्रमुख अंश-
    ‘अपंग कल्याणकारी शिक्षण संस्था व संशोधन-केंद्र’ की स्थापना किस प्रकार हुई? कृपया संस्था के बारे में विस्तार से बताएं।
६ नवम्बर १९५६ को संस्था की स्थापना हुई। ‘उध्दरेदात-तिमनात्मानम’ यह संस्था का नारा है। उस समय पोलियोे बड़ी मात्रा में फैला था। अभिभावक साक्षर नहीं थे। अज्ञानी होने के कारण बच्चों को पोलियोे का डोज नहीं दिया जाता था। तब ज्येष्ठ समाजसेवक रघुनाथ काकडे जी ने विकलांग छात्रों के लिए यह संस्था शुरू की। कोथरुड के ‘भालेराव बंगले’ में इस संस्था का आरंभ हुआ। इसके बाद १९५९ में ‘वानवडी‘ परिसर में संस्था का काम शुरु हुआ। संस्था ने विकलांग विद्यार्थियों के लिए काम करना तय किया। १९८५ में छात्रों के लिए छात्रावास शुरू हुआ तथा १९९१ से छात्राओं के लिए छात्रावास शुरू हुआ। पहले जिला परिषद के स्कूल में छात्र पढ़ने जाते थे। अब यहीं पहली से लेकर सातवीं कक्षा तक बच्चों को पढ़ाया जाता है। आठवीं से लेकर दसवीं तक के छात्र अन्य हायस्कूल में जाते हैं। पाठशाला के लिए इमारत, लड़के-लड़कियों का छात्रावास, चिकित्सालय, सांस्कृतिक सभागृह, ग्रंथालय, बच्चों को खेलने के लिए मैदान जैसी अनेक सुविधाएं इस साढ़े तीन एकड़ जमीन पर की गई हैं। विद्यार्थी स्वावलंबी हों, इसलिए उन्हें विविध कलाएं सिखाई जाती हैं। इनमें हस्तकला, सिलाई, इ-लर्निंग, बढ़ई-काम, कंप्यूटर-प्रशिक्षण जैसे विविध कोर्सेस शामिल हैं। इन छात्रों को भोजन, निवास, इलाज, शिक्षा जैसी सुविधाएं विनामूल्य दी जाती हैं। इनमें से ८५ लड़कियां और १६५ लड़के हैं। दूसरे राज्य के विद्यार्थियों का भी इनमें समावेश हैं। विकलांग छात्रों के लिए निवास, भोजन, चिकित्सा, शल्यक्रिया, शिक्षा जैसी सारी सुविधाएं यहां निशुल्क उपलब्ध हैं। ६ विद्यार्थियों से शुरू हुई इस संस्था में आज २५० विद्याार्थी हैं।
आपकी पारिवारिक पृष्ठभूमि बताइये। आप इस संस्था के कैसे जुड़े?
     

 हम लोग पुणे से ही हैं। पुणे के पास वानवडी में मेरा जन्म हुआ। मेरा बचपन यहीं पर गुजरा है। मेरे पिताजी किसान थे और मां गृहिणी थी। हमारी किराने दुकान थी। पहली से लेकर सातवीं तक की मेरी शिक्षा वानवडी के महापालिका स्कूल में हुई। उसके बाद ८वीं से लेकर ११वी तक मैं कैम्प एज्यूकेशन में पढ़ा। उसके बाद गरवारे कॉलेज में प्रवेश लिया और १९७७ में कॉमर्स शाखा से स्नातक हुआ। मुझे वकील बनना था, इसलिए मैंने बी.कॉम. के बाद आय. एल.एस. विधि महाविद्यालय में प्रवेश लिया। १९८१ में वकालत की शिक्षा पूरी की। उसके बाद वकालत करना शुरू किया। अनेक केस लड़े। ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया के परिवार का मैं पारिवारिक वकील नियुक्त किया गया। इसके कारण सारी पार्टियों के राजनीतिज्ञों के साथ नजदीकी समबंध बने। इसी समय यानी १९८६ में मैं इस संस्था से जुड़ा। संस्था की जानकारी मुझे पहले से ही थी। जिला परिषद के स्कूल में पढ़ते समय इस संस्था के छात्र मेरे साथ पढ़ते थे। तब संस्था की अपनी स्वयं की पाठशाला नहीं थी। उस वक्त मैं अपने विकलांग मित्रों को त्योहारों पर घर बुलाता था। बचपन से वही संस्कार मिले। उसी प्रकार मैं संघ-संस्कारों में पला-बढ़ा। कुछ साल प्रचारक के रूप में काम किया। संघ के संस्कार हैं कि हमें समाज के लिए कुछ करना चाहिए। इसी संस्कार के कारण मैं इस संस्था में काम करने हेतु प्रेरित हुआ। आज तीस साल से मैं यहां कार्यरत हूं।
       मेरा पूरा परिवार रा.स्व.संघ से सम्बंधित है। मेरे पिताजी की उम्र नब्बे साल की है। पिताजी और मेरी दादी स्व.चंद्रभागाबाई वानवडी में खेती करते थे। मेरे चाचाजी रघुनाथ जिन्हें सब ‘नाना’ कहते थे, खेती और किराना दुकान चलाने में पिताजी की मदद करते थे। वे कुछ समय नगर के ‘नगर संघचालक’ थे। वे पुणे की प्रसिद्ध जनसेवा सहकारी बैंक के संस्थापकों में से एक थे। वे लगभग तीस साल बैंक के संचालक और अध्यक्ष रहे। मेरे दो भाई हैं। बड़े भाई बालासाहब और छोटे भाई गिरी भी संघ के स्वयंसेवक थे। वे अपना स्वयं का स्वतंत्र उद्यम संभालते हैं। हम तीनों भाई, उनके परिवार, मां, पिताजी सभी का संयुक्त परिवार है।
यह संस्था चलाने के पीछे आपका उद्देश्य क्या है?
    

 विकलांग विद्यार्थियों के मन में उत्साह निर्माण करना, उनको स्वावलंबी बनाना। जो छात्र बचपन से (घुटनों के बल) हमारे पास आया है, उसे चलना सिखाना। ‘हम भी सामान्य है, अलग नहीं’ यह भावना उनके मन में उत्पन्न करना हमारा प्रमुख उद्देश्य है। इस उद्देश्यपूर्ति के लिए हम विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम करते हैं। गणेशोत्सव, दीवाली जैसे त्यौहार मनाते हैं। लंबी सैर करते हैं। कई छात्रों को लेकर हमने कश्मीर के सफर का आयोजन किया था। तब कइयों को आश्चर्य हुआ। विकलांग व्यक्ति इतने ठंडे वातावरण में कैसे रह पाएंगे? उन्हें तकलीफ हुई तो? जैसे सवाल खड़े हुए; पर किसी भी तकलीफ के बगैर उन विद्यार्थियों ने उस सैर के मजे लूटे।
इन विद्यार्थियों का खर्च, कर्मचारियों का वेतन जैसा आर्थिक नियोजन आप किस प्रकार करते हैं?
       हमारी संस्था का पूरा भार हमारे दानदाताओं पर हैं। अनेक दाताओं ने हमें धनराशि दी, उसी में से सारा कामकाज चल रहा है। हमारा काम, पारदर्शिता, निर्मल व्यवहार, पैसे का यथोचित खर्च देख कर, स्वयंप्रेरणा से लोग धन देते हैं। रोटरी क्लब जैसी संस्थाएं भी मदद देती हैं। हमें दान तो चाहिए पर वह दया या सहानुभूति की भावना से नहीं। स्वयंप्रेरणा से निमिर्र्त संस्था, संस्था का काम देख कर दाता हमें स्वयं दान देते हैं यह महत्वपूर्ण बात है। हमारी यही कमाई है। शासन की ओर से हमें अनुदान प्राप्त होता है। एक छात्र के लिए प्रति महीना ९०० रु.(नौ सौ रुपये) अनुदान मिलता है। एक छात्र का महीने का खर्च ३५०० रु. से ४००० रु तक है। वह खर्च संस्था करती है। संस्था में अध्यापक, चपरासी, चौकीदार, मददगार जैसे कुल ६५ कर्मचारी हैं। उनमें से पैंतीस लोगों का वेतन शासन देता है। शेष कर्मचारियों को संस्था पारिश्रामिक देती है। हमारे विश्वस्त-मंडल का एक भी व्यक्ति वेतन या परिश्रामिक नहीं लेता। हम समाजसेवा के तौर पर यह काम करते हैं।
      ‘‘विकलांग विद्यार्थियों को स्वावलंबी बनाना, जो विद्यार्थी बचपन से हमारे पास आया है, उसे चलना सीखना। उसके मन में सामान्य होने की भावना जगाना यह हमारा प्रमुख उद्देश्य है।’’
आपने कहा की इन छात्रों पर शल्यक्रियाएं की जाती हैं। वे किस प्रकार की होती हैं?
       कई छात्र शल्यक्रिया के बाद चलने लगते हैं। बैसाखी, व्हील चेअर, कृत्रिम हाथ- पैर जैसे साधन हम छात्रों को बिना मूल्य देते हैं। डॉ. विलास जोग, डॉ. सतीश जैन जैसे हमारे डॉक्टर एक रुपया भी न लेते हुए छात्रों की शल्यक्रिया करते हैं। केवल दवा और बाहर के डॉक्टरों का खर्च हम करते हैं। उन्होंनें आज तक हमारे ३००० छात्रों की मुफ्त शल्यक्रिया की होंगी। उसी प्रकार हमने छात्रों के लिए फिजियोथेरेपी कक्ष भी शुरू किया है।
महाराष्ट्र में ऐसी कितनी संस्थाएं कार्यरत हैं? उनके आज के हालात कैसे हैं?
      

 राज्य में तकरीबन ६०० संस्था कार्यरत हैं। पुणे में हमारे अलावा और भी एक-दो हैं। अनेक संस्थाओं के हालात आज की स्थिति में अच्छे नहीं। संस्थाओं में विद्यार्थी नहीं टिक पाते। जरूरी निधि उपलब्ध नहीं, कर्मचारियों की पारश्रमिक नहीं, दाता (पैसे देने वाला) नहीं मिलते। अनेक संथाओं में भ्रष्टाचार का बोलबाला है, तो कुछ स्थानों पर संस्था के प्रमुख अपने रिश्तेदारों कों संस्था में नौकरी पर रख लेते है्र। परिणामस्वरुप हमारी संस्था में हर साल प्रवेश पाने के लिए लंबी कतारें लगती हैं। अभिभावक अनुरोध करते हैं; पर हमारी मर्यादाएं भी सीमित हैं।
संस्था की प्रवेश प्रक्रिया किस प्रकार होती है?
        प्रति वर्ष सामान्यत: फरवरी में प्रवेश संबंधी विज्ञापन स्थानीय समाचार पत्रों में दिया जाता है। अप्रैल के अंत तक प्रवेश अर्जी का वितरण होता है। प्रवेश अर्जी की छानबीन कर छात्र और अभिभावकों से मिलना जुलना होता है। मुलाकात और चिकित्साक समिति के मार्गदर्शन के अनुसार प्रवेश दिया जाता है।
अपना बच्चा यहां छोड़ कर जाने वाले अभिभावकों की मानसिक स्थिति कैसी होती है?
        माता पिता अपने बच्चों के प्रवेश के लिए बहुत विनती करते हैं। विकलांग विद्यार्थियों की शल्यक्रिया, उनकी दवाइयों, शिक्षा का खर्च आम आदमी नहीं उठा सकता। बच्चों का भला हो इसलिए माता-पिता उन्हें यहां छोड़ते हैं। कुछ अभिभावकों ने मुझसे कहा भी था कि ‘‘सर आपने २५० बच्चों का नहीं अपितु २५० अभिभावकों का टेंशन अपने सिर पर लिया है।’’ उनका विश्वास हमें प्रेरणा देता है।
सारे अपंग विद्यार्थियों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
       ‘‘स्वावलंबी बने, आप दूसरों के जैसे ही हो अलग नहीं, यह भावना मन में पालें; आत्मसम्मान के साथ जियें। किसी के सामने हाथ ना फैलाएं, आप स्वयं अपना आधार बनें।’’
आप की संस्था को आज तक कौन-कौन से पुरस्कार प्राप्त हुए?
        विकलांग व्यक्तियों को सक्षम बनाने वाली संस्थाओं को राष्ट्रपति के हाथों दिया जाने वाला राष्ट्रीय पुरस्कार और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर समाजभूषण पुरस्कार जैसे दो बड़े पुरस्कार संस्था को प्राप्त हैं। विविध क्षेत्रों के सम्माननीय व्यक्तियों ने संस्था को भेंट दी है। कइयों ने निधि दी है। सन २००६ से २००७ में संस्था का सुवर्ण महोत्सव सम्पन्न हुआ। उस समय पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम आए थे। उनहोंने संस्था को एक लाख रुपये की राशि प्रदान की। उसी प्रकार पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील, ज्येष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, स्व.विलासराव देशमुख, स्व.गोपीनाथ मुंडे जैसे कई मान्यवरों ने संस्था में आकर विद्यार्थियों से बातचीत की है।
आपके परिवारजनों के बारें में बताइये। क्या उन्होंने इस कार्य का कभी विरोध किया?
       बिलकुल भी नहीं। मेरी पत्नी और बच्चों ने मुझे हमेशा संभाला है और मेरा समर्थन किया है। मेरी पत्नी साधना, मेरे बड़े बेटे निखिल और छोटे बेटे अखिल ने इस सफर में हमेशा मेरा साथ दिया है।
आपकी आगामी योजनाएं क्या हैं?
      हमें अब ११वीं और १२ वीं की कक्षाएं शुरु करनी है। इसलिए नए छात्रावास का निर्माण करना है। कृत्रिम साधनों का आधुनिक वर्कशॉप, ग्रंथालय के महत्वपूर्ण, दुर्लभ संदर्भ ग्रंथ का संग्रह करने जैसे कुछ उपक्रमों की शुरूआत करनी है।
                                                                 मो.ः ९५९४९६१८४४
 

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