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जीवन कितना अनिश्‍चित है, इसका अनुभव हमें अनेक बार होता है| नियति हमें समय-समय पर इस अनिश्‍चितता का अनुभव कराती रहती है| बीस जुलाई को तड़के ऐसे ही एक फोन से हृदय की धड़कनों के रुकने का आभास हुआ| वह फोन था, शहाजी जाधव साहब की मृत्यु का संदेश देनेवाला| वस्तुत: सुबह की गहरी नींद के समय आए हुए किसी संदेश का अर्थ समझने में के लिए हमें पहले ठीक से जागना होता है| ऐसी नींद में सुने शहाजी जाधव साहब की हृदयाघात से हुई मृत्यु के संदेश पर विश्‍वास ही नहीं हो रहा था; क्योंकि एक दिन पूर्व ही विवेक के प्रभादेवी कार्यालय में उनसे मुलाकात हुई थी| उनकी तबियत का हालचाल पूछने के बाद उन्होंने मुझे कहा था, ‘‘तुमसे कुछ मुद्दों पर बात करनी है, कभी मिलो|’’ काम होने के कारण मैंने निकलते हुए कहा कि, ‘‘मैं अगले दो-तीन दिनों में आपसे मिलता हूं|’’ अब जाधव साहब के निधन का समाचार सुनकर मेरा मन मुझे कचोट रहा है कि काश मैं उस दिन ही उनकी बात सुनकर निकलता, क्योंकि अब हम जाधव साहब से कभी नहीं मिल सकेंगे|
कोई संस्था निरंतर प्रगति क्यों करती है? इसका कारण यह है संस्था के कुछ लोग स्वयं को उस संस्था के विकास के लिए समर्पित कर देते हैं| फिर उस संस्था को सफलता के पंख लग जाते हैं| ‘साप्ताहिक विवेक’ से शुरू हुए ‘विवेक’ का स्वरूप आज इक्कीस विविध संस्थाओं के समूह के रूप में हो गया है| इन सभी संस्थाओं ने राष्ट्रीय पत्रकारिता के साथ सामाजिक, राजनैतिक, शैक्षणिक क्षेत्रों में नाम कमाया है| ये सभी संस्थाएं पूरे देश में अपना स्थान निर्माण कर रही हैं| संस्थाएं शुरू करते समय उनकी स्थापना के उद्देश्य के साथ ही भविष्य के मार्ग की दिशा भी तय करनी होती है| साथ ही उस तय दिशा की ओर जाते हुए अन्य कोई विचार न करना ही अपेक्षित होता है| जाधव साहब ने विवेक के सम्पूर्ण प्रवास में यही किया|
आज विवक समूह के अंतर्गत आने वाली सभी संस्थाओं को खड़ा करने के लिए, उनके ध्येय, उद्देश्य, मार्ग निश्‍चित कर उन्हें उस मार्ग पर ले जाने हेतु एक ध्येयनिष्ठ व्यक्ति के रूप में जाधव साहब का अमूल्य योगदान रहा है| इस पूरी यात्रा में हिंदुस्थान प्रकाशन संस्था की रीढ़ की हड्डी के रूप में जाधव साहब का उल्लेख किया जा सकता है| अत्यंत परिश्रम तथा लगन के साथ उन्होंने प्रत्येक प्रकल्प की नींव रखते समय संगठनात्मक दृष्टि से हर छोटी से छोटी बात का ध्यान रखा इसलिए आज ये सभी प्रकल्प मजबूत रूप से खड़े हैं|
मूलत: शहाजी जाधव साहब की तबियत कठोर परिश्रम के अनुकूल नहीं थी| हम मजाक में कभी-कभी चिढ़ाते भी थे कि जाधव साहब के बाजू से भी यदि मच्छर निकल जाए तो जाधव साहब को बुखार आ जाएगा| परंतु विवेक में जिस विचारधारा के अनुरूप कार्य किया जाता है उससे वे प्रभावित थे| अत: विवेक का कार्य करते समय उन्होंने अपनी तबियत की कभी अत्यधिक चिंता नहीं की|
जाधव साहब विवेक समूह के व्यवस्थापक के रूप में कार्यरत थे| ऐसे अनेक प्रसंग आए जब जाधव साहब को कर्मचारियों को डांटना पड़ता था| परंतु चूंकि नाराज रहना उनका स्वभाव नहीं था अत: थोड़ी देर के बाद केबिन से बाहर आते ही वे उसी कर्मचारी से हंसते हुए बात करते हुए दिख जाते थे| दूसरे दिन जब केबिन के सामने से वह कर्मचारी गुजरता तो जाधव साहब उसे अंदर बुलाकर विवेक के आगे के कार्यों के संदर्भ में बात करने लगते थे| अत: विवेक के कर्मचारी वर्ग में जाधव साहब सभी के अत्यंत प्रिय व्यक्ति थे| विवेक की चार दशकों की यात्रा में साथ रहने के कारण उन्होंने विवेक को मजबूती प्रदान करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया| अत: किसी भी निर्णय के समय उनसे सलाह लेना अनिवार्य सा लगता था|
एक बात अवश्य है कि विवेक पत्रकारिता क्षेत्र का प्रभावी माध्यम होने के कारण यहां कार्य करने वाले अनेक व्यक्तियों को सामाजिक-राजनैतिक प्रतिष्ठा तथा मान-सम्मान  मिला; परंतु जाधव साहब के हिस्से में इस तरह का कोई प्रसंग नहीं आया| जाधव साहब मूलत: संघ स्वयंसेवक नहीं थे| अत: उनपर प्रसिद्धि से दूर रहने का कोई संस्कार नहीं हुआ था| परंतु उनके कार्यों को देखकर मैं यह कह सकता हूं कि स्वयंसेवक के रूप में जो संस्कार आवश्यक थे वे संस्कार जाधव साहब ने अपने ऊपर स्वयंप्रेरणा से किए थे| विवेक की अब तक की यात्रा में कई भव्य कार्यक्रम हुए| ये कार्यक्रम सफल होने में जाधव साहब का अमूल्य योगदान था| परंतु वे उस कार्यक्रम को पर्दे के पीछे से या स्टेज के सामने की अंतिम कुर्सी से सफल होते हुए देखते थे| कार्यक्रम की सफलता को देखकर उनके चेहरे के भाव विलक्षण होते थे|
जब किसी संस्था को स्वयं की महत्वाकांक्षा को अलग रखकर संस्था के विकास का जो प्रारूप तय है उस मार्ग पर अविरत चलने वाले कार्यकर्ता मिलते हैं तब संस्था सफल होती है|
विवेक परिवार के रूप में हम सभी स्वयं को सौभाग्यशाली समझते हैं| क्योंकि जाधव साहब पिछले चार दशक इसी मार्ग पर चले और इस मार्ग पर चलकर विवेक को आगे ले जाने वाला कर्मचारी वर्ग निर्माण करने में उनका अमूल्य योगदान है| दो दिन पूर्व ही ‘तुमसे बात करनी है’ कहकर मैत्रीपूर्ण भाव प्रकट करने वाले जाधव साहब का हृदय विकार से अकस्मात निधन होने की खबर सुनकर मैंने तुरंत ही उनके घर की ओर प्रस्थान किया| हमेशा विवेक के लिए मजबूती से खड़े रहने वाले जाधव साहब को मृत्युशैया पर लेटे देखकर उस नियति के बलवान होने का आभास हुआ| उनकी पत्नी अत्यंत दुखित होकर बता रही थीं कि ‘वे रात तक अच्छे थे| अचानक दम घुटने के कारण कुछ आवाज उनके मुंह निकली और फिर वे शांत हो गए| उन्हें कुछ बताने का समय ही नहीं मिला|’ उनकी पत्नी के ये वाक्य सुनकर मुझे लगा कि नियति ने जाधव साहब को विचार करने का समय ही नहीं दिया; क्योंकि अगर उन्हें समय मिलता तो निश्‍चित ही वे ठीक होकर फिर से विवेक के अन्य प्रकल्पों के बारे में सोचने लगते| परंतु ऐसा हुआ नहीं| विवेक की यात्रा में जाधव साहब का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता| जाधव साहब! आपको भले ही नियति ने समय न दिया हो परंतु आपने विवेक के लिए अपना जीवन देकर साप्ताहिक विवेक से इक्कीस संस्थाओं वाले विवेक परिवार का जाल बुनने में जो योगदान दिया है उसकी प्रेरणा से हम सभी,विवेक को उज्ज्वल भविष्य की ओर ले जाएंगे यह हमारा विश्‍वास है| चूंकि ‘शो मस्ट गो ऑन’ अत: विवेक आपकी आशा के अनुरूप आगे बढ़ता ही रहेगा; परंतु यह करते समय हमारे जाधव साहब अब हमारे बीच नहीं रहे, यह भावना हमेशा हमारे मन में रहेगी|

This Post Has 2 Comments

  1. स्वर्गिय जाधवजी के आत्मा को शान्ति मिले

  2. जो हुवा बहोत बुरा हुवा… जाधवजी अब हमारे बिच नही हैयह सुनकर बडा द:ख हुवा.. उनके आत्मा को चिर:शांती दे यही प्रार्थना सर्व शक्ती मान परमेश्वर की चरणो में प्रार्थना….. ओम् शांती शांती शांती.

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