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                                                                                                                                              -डॉ0 रविराज अहिरराव

शीर्षक से प्रकाशित इस आलेख में उन्हीं बिंदुओं का उल्लेख किया गया है, जिसमें वास्तु शास्त्र के अनुसार बने घरों में रहने वाले परिवार का जीवन कैसे आनंददायी होता है। कुछ वर्ष पूर्व प्रदर्शित किया गया हिंदी फिल्म स्वर्ग-नरक अर्थात् वैवाहिक जीवन का विश्लेषण करने वाली उत्कृष्ट कलाकृति। फिल्म में दो परिवारों के बीच प्रदर्शित किया गया विरोधाभास ही सबसे महत्त्वपूर्ण बिंदु है। जीवन के दो मुख्य पहलू, जो आपके घर को स्वर्ग अथवा नरक बना सकते हैं। अत्यंत मनोरंजक, हृदयस्पर्शी इस फिल्म के माध्यम से सुखी-वैवाहिक जीवन कैसे जीया जाये, इसका फार्मुला    बताया गया है। अगर इस फार्मुले को सभी दर्शकों ने आत्मसात किया होता तो करोड़ों घरों में चल रहे संघर्ष को विराम लग गया होता और अधिकाधिक परिवार आनंद के साथ रहते हुए दिखाई देते, पर अफसोस की बात यह है कि स्वर्ग-नरक फिल्म देखकर दर्शकों में ऐसा कुछ परिवर्तन नहीं हुआ, जिसके माध्यम से सर्वत्र प्रसन्नता का संचार हो। सच तो यह है कि उपरोक्त फिल्म को दर्शकों ने एक मनोरंजन का साधन मानकर सिनेमा घर से बाहर पांव रखते ही भुला दिया।

संयुक्त परिवार पद्धति लगभग खत्म होने की कगार पर है और विभक्त परिवार पद्धति समाज में अपनी गहरी जड़ें बना रही हैं। संयुक्त परिवार में व्यक्तित्व विकास का दोष पूरी तरह से खत्म होगा, जबकि विभक्त पद्धति में वह पूरी तरह से विकसित होगा। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा था, लेकिन वैक्तिगत व्यक्तित्व विकसित करने के साथ-साथ अहंकार, निजी स्वतंत्रता तथा व्यभिचार को मुक्त वातावरण प्राप्त होने के कारण छोटा परिवार सुखी परिवार की कहावत पूर्णत: असत्य साबित हो गई। व्यक्तिगत दावे-प्रतिदावे, अहंकार, समानता तथा अति महत्त्वाकांक्षा के कारण पति-पत्नी के संबंधों में अब पहले की तरह मिठास नहीं रह गई है। छोटे-छोटे मुद्दों को लेकर घर में होने वाले वाद-विवाद पारिवारिक द्वंद्व का कारण बन रहे हैं। ज्यादातर घरों में सहमति के मुकाबले मतभेद का प्रमाण ज्यादा दिखाई दे रहा है।

परिवार की सुख-शांति तथा सौहार्द्रपूर्ण वातावरण व्यक्ति को प्रगति के शिखर पर ले जा सकता है, या नहीं, सुखी तथा सौहार्द्रपूर्ण वातावरण के कारण लोगों का घर स्वर्ग जैसा लगने लगता है। पूरी तरह शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य मिलने पर व्यक्ति के अंदर के लिए कला, गुणों को पोषक वातावरण मिलता है, इसके माध्यम से अच्छा कार्य करने का संबंध प्राप्त होता है। दूसरी ओर अगर घर से ऑफिस जाने के लिए निकलते समय अहंकार अथवा आत्म-सम्मान को ठेस पहुंची तो इस बात का असर पूरे दिन व्यक्ति के कार्य पर पड़ता है। जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति के कार्य का स्तर गिर जाता है। साधारण से साधारण काम में भी गलतियां होती हैं। काम-काज में दोष होने पर अपमान, अवहेलना तथा अवमूल्यन या अध:पतन होता है और व्यक्ति की सामाजिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कार्य क्षेत्र में स्थिति खराब होने का सीधा असर उस व्यक्ति के पारिवारिक जीवन पर भी पड़ने लगता है। जिसके कारण पारिवारिक कलह, गुस्सा, मारपीट, झगड़े होते हैं और परिवार सुख-शांति खत्म हो जाती है। स्थिति यहाँ ंतक पहुंच जाती है कि कल तक परिवार के जो सदस्य एक-दूसरे के साथ प्रेम व्यवहार से रहते थे, वे ही एक-दूसरे का चेहरा देखना भी पसंद नहीं करते। वास्तु दोष के कारण घरों में अक्सर टकराव की स्थिति पैदा होती है। अगर वास्तु दोष नहीं है तो घर का वातावरण अच्छा रहता है। गृह रचना यदि अच्छी तरह से की गयी हो तो घर के लोगों के बीच सुसंवाद तो स्थापित होता ही है, साथ ही पारिवारिक सदस्यों के बीच सहयोग की भावना भी बलवती होती है। वस्तुत: वास्तु दोष तथा अहंकार ये दो बातें ही पति-पत्नी तथा पारिवारिक सदस्यों के बीच मनमुटाव के मुख्य कारण हैं। अहंकार प्रत्येक व्यक्ति में होता है, हां यह अलग बात है, किसी में यह अधिक मात्रा में होता है और किसी में अल्प मात्रा में होता है। अहंकार रूपी आग में जब वास्तु दोष का तेल पड़ता है, तब उस अहंकार की दाहकता और अधिक बढ़ जाती है और पल भर में शांत स्वभाव वाला व्यक्ति भड़क जाता है। इस कारण परिवार के लोगों के बीच का प्रेम-भाव प्रभावित हो जाता है और पल भर में शांतिपूर्ण वातावरण हिंसक बन जाता है। पारिवारिक जीवन में जब द्वंद्व ज्यादा बढ़ जाते हैं तो कुछ भी अच्छा नहीं लगता। घर में सुख-शांति रखने के लिए शयन गृह, नैर्ऋत्य दिशा में होना चाहिए, क्योंकि नैर्ऋत्य दिशा का शयन गृह गृह स्वामी को शारीरिक, मानसिक तथा आर्थिक स्थिरता प्रदान करता है। अगर मन, स्वास्थ्य तथा शरीर तंदुरुस्त होगा तो छोटे से कारण से मानसिक स्थिति प्रभावित नहीं होती। आपस में अच्छा समन्वय रहता है, जिससे पारिवारिक वातावरण में सुख-शांति का प्रसार होता है, इसके अलावा जो दूसरी सबसे महत्त्व  पूर्ण बात यह है कि अगर आपके घर की दिशा उत्तर-पश्चिम की तरह होनी चाहिए। वास्तु शास्त्र की मान्यता के अनुरूप घर में बना शौचालय अतिथियों के लिए शयन गृह, भोजन गृह, पढ़ाई का स्थान, भंडार गृह, पार्किंग की व्यवस्था की गई हो तो उस घर में रहने वाला परिवार भी प्रसन्नता पूर्वक वहां रहता है, यदि घर में उपलब्ध इन सुविधाओं की दिशा वास्तु शास्त्र के सिद्धांत के विपरीत होगी तो वहां गुजरने वाला हर दिन दु:खदायी तथा परेशानी खड़ी करने वाला ही होगा। घर में अगर रसोई घर वायव्य दिशा होगा तो पति-पत्नी के बीच कलह होता है। वायव्य दिशा का वास्तु दोष व्यक्ति को दूसरों की ओर से होने वाली परेशानी का कारण बनता है। यह परेशानी उस वास्तु के मालिक को बहुत ज्यादा समय तक परेशान करती रहती है। कोई भी व्यक्ति किसी समस्या को एक निश्चित अवधि तक ही बर्दाश्त कर सकता है, पर लंबे समय तक बाधा आने के कारण वह व्यक्ति परेशान हो जाता है, उसे अपना जीवन नीरस तथा व्यर्थ लगने लगता है, इस कारण उसकी मानसिक स्थिति पर भी विपरीत परिणाम पड़ता है। इसलिए वायव्य दिशा का वास्तु दोष की तीव्रता को कम करना बहुत जरूरी है।

सुखी-आनंददायक तथा सफल वैवाहिक जीवन के लिए चौथी महत्वपूर्ण बात यह है कि आप जिस वास्तु में रह रहे हैं, वहां का माहौल सदैव आनंददायी बना कर रखा जाये। प्रसन्न वातावरण का अर्थ है प्रसन्न मन, दूसरे शब्दों में कहें तो परिवार के सदस्यों के बीच मेल-मिलाप, समन्वय। वास्तु में अगर वातावरणीय प्रसन्नता होगी तो उसमें रहने वाले परिवार का जीवन भी आनंददायी होगा। घर का वातावरण आनंददायी होगा। घर का वातावरण आनंनदायी रखने की पहली शर्त यही है कि घर का पूर्वी तथा उत्तरीय भाग को खुला रखा जाये। जिस घर में सूर्य की सुबह-सुबह प्रसारित होने वाली किरणें अधिक से अधिक जाती हैं, वहां उल्लास, प्रसन्नता, प्रगति होती है, वहां सदैव शांति तथा उल्लासपूर्ण वातावरण रहता है। घर को अच्छा रंग, उसकी निर्माण पद्धति उचित हो, वहां पूजा-अर्चना, मंगलमय स्तोत्र अथवा श्लोकों के पाठ के माध्यम मे ईश वंदना की जाती हो, ऐसे घर में ‘आनंद का वास अपने-आप हो जाता है, इसलिए घर में हर दिन पूजा-पाठ किया जाता अत्यंत जरूरी है। मंगलमय वातावरण के कारण वास्तु में जो दोष होते हैं, वे स्वत: ही दूर हो जाते हैं तथा भक्ति मार्ग का अनुसरण करने से उसके मन में व्याप्त अहंकार का भी नाश हो जाता है। वास्तु दोष तथा अहंकार निर्मित दोष के कारण जो परिवार संकटमय स्थिति में अपने जीवन का गुजारा कर रहा था, उसके जीवन में खुशहाली आ जाती है।

सुखी जीवन के लिए पांचवीं जो महत्त्वपूर्ण बात है, वह यह है कि घर का प्रवेश द्वार वास्तु शास्त्र के अनुरूप ही बनाया जाये। घर का प्रवेश द्वार ईशान्य दिशा में होना चाहिए। जिस घर का प्रवेश द्वार ईशान्य दिशा में होने के साथ-साथ, वहां जल सुविधा ‘अंडर ग्राउंड’ हो तो उस परिवार में रहने वाले लोग प्रसन्न रहते हैं, इतना ही नहीं घर का पूजा स्थान तथा शयन गृह भी ईशान्य दिशा में ही होना चाहिए। बच्चों की शैक्षणिक प्रगति तथा प्रौढ़ों की आध्यात्मिक प्रगति के साथ-साथ परिवार के सभी सदस्यों का स्वास्थ्य अच्छा रहने का राज भी ईशान्य दिशा में ही छिपा हुआ है। यदि मनुष्य को सुख-शांति के साथ रहना हो तो उसे वास्तु शास्र की निर्धारित मान्यताओं के आधार पर बने घर में ही रहना चाहिए। अगर घर वास्तु दोष से मुक्त नहीं हुआ तो वहां न प्रगति होगी और न ही सुख प्राप्त होगा। वास्तु दोष व्यक्ति की सुख-आनंद से दु:ख परेशानी की ओर से जाता है।

परिवार में सुख-शांति बनी रहे, इसके लिए जो छठवीं बात है, वह यह है कि घर में अग्नि तत्व की स्थापना आग्नेय दिशा में की जानी चाहिए। घर का रसोई घर आग्नेय दिशा में होना चाहिए। इस कारण परिवार की एक साथ प्रगति होती है, ऐसे घर में रहने पर जो पैसा आता है, वह योग्य कार्यों में ही खर्च होता है। इतना ही नहीं, जिस घर का रसोई घर आग्नेय दिशा में होता है, वहां रहने वाली महिलाओं का स्वास्थ्य तो अच्छा रहता ही है, साथ ही साथ उसकी मानसिक स्थिति बहुत अच्छी रहती है।

सुखी परिवार के लिए जो सातवीं बात महत्त्वपूर्ण है, वह यह है कि जिस घर में वह रहता है, वहां का परिसर  पूर्ण रूप से स्वतंत्र हो। जब सभी बातें अपेक्षानुरूप होती हैं, तभी व्यक्ति आनंदित होता है। यह आनंद व्यक्ति को जीवन भर प्रसन्नता का अनुभव कराता रहता है। इस प्रसन्नता के बल पर वह अपने जीवन में आए किसी भी संकट को हल करने में सफलता अर्जित करता है। इसलिए घर को ब्रह्मतत्व दोष से सदैव मुक्त रखना बहुत जरूरी है। अगर घर में ब्रह्मतत्व का वास्तु दोष होगा तो सभी नियोजन बिगड़ेगा, जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि का पलायन हो जाएगा।

सुखी जीवन के लिए आठवीं महत्वपूर्ण बात यह है कि घर का बाथरूम तथा शौचालय सही दिशा में बना हो। आज बनाये जाने वाले घरों में इस बात की ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा कि घर में बाथरूम तथा शौचालय कहां बनाये जाएं, लोग अपनी सुविधा के अनुसार बाथरूम, शौचालय बनवाने लगे हैं, जो उचित नहीं है। सुखी जीवन के लिए शौचालय, बाथरूम की दिशा भी काफी महत्त्वपूर्ण है, अत: वास्तु निर्माण के समय बाथरूम तथा शौचालय का निर्माण भी वास्तु शास्त्र के मान्यता प्राप्त नियमों के अनुरूप ही किया जाना चाहिए।

 

 

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