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मोबाइल और लैपटॉप पर सोशल मीडिया से जुड़े रहने के कारण हम रात में देर तक जागते रहते हैं। इसकी वजह से हमारी नींद पूरी नहीं हो पाती और स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है। नींद में व्यवधान ही जेट लेग जैसी मानसिक बीमारी का कारण है।

–    केस स्टडी: रुचिका पिछले कुछ समय से काफी बोझिल और थकी-थकी सी रहती है। किसी काम में पूरी तरह से ध्यान नहीं लगा पाती। उसे लगा कि वर्किंग डे में कई बार काम का एक्सट्रा प्रेशर होता है, ऐसे में वह ढंग से सो नहीं पाती, इसलिए ऐसा हो रहा है, पर अब तो वह छुट्टी के दिन 12-14 घंटे सोती है। फिर भी उसे फ्रेश फील नहीं होता है। बात-बात पर चिड़चिड़ाती रहती है। हर वक्त जम्हाई लेती रहती है। मन करता है बस एक झपकी ले लें। इन दिनों उसे वक्त-बेवक्त भूख भी लगती है। ऑफिस में भी हमेशा कुछ-न-कुछ चबाती हुई नजर आ जाती है। इन सबका नकारात्मक प्रभाव उसके वर्क परफॉर्मेंस पर पड़ रहा है। उसने डॉक्टर को भी दिखाया, पर रिपोर्ट में कोई बीमारी नहीं निकली। उसे समझ नहीं आ रहा कि उसे हो क्या गया है।

रुचिका की तरह कहीं आप भी तो इन लक्षणों से पीड़ित नहीं? हाल ही में हुए एक शोध से पता चला है कि अन्य दिनों के मुकाबले वीकेंड्स पर ज्यादा सोने वाले लोगों को सोशल जेट लेग होने की संभावना ज्यादा है। जेट लेग से पीड़ित व्यक्ति को नींद न आना, दिनभर जम्हाइयां लेना, बेवक्त भूख लगना, थकान- सिरदर्द, एकाग्रता की कमी वगैरह जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इससे दिल की बीमारी का खतरा बढ़ जाता है।

शोध में यह भी पता चला है कि करीब 85 फीसदी लोग वीकेंड्स पर ज्यादा सोते हैं। ऐसे लोगों में हार्ट प्रॉब्लम्स की संभावना 11 फीसदी बढ़ जाती है। एरिजोना यूनिवर्सिटी की सियेरा फोबुश ने बताया कि सोने के घंटों के साथ-साथ हमारे शरीर पर इसका भी गहरा प्रभाव पड़ता है कि हम नियमित रूप से कब सो रहे हैं। चिकित्सकों के अनुसार एक स्वस्थ शरीर के लिए नियमित सात से आठ घंटों की नींद पर्याप्त है, लेकिन अगर इस अवधि को टुकड़ों में बांट कर नींद पूरी करने की कोशिश की जाए या फिर हर दिन अलग-अलग शेड्यूल के हिसाब से सोया जाए, तो शरीर पर इसका निगेटिव इफेक्ट पड़ता है। ऐसे लोग ही अक्सर सोशल जेट लेग से पीड़ित हो जाते हैं। इसकी वजह से वे ब्लड प्रेशर, मोटापा, हार्ट प्रॉब्लम्स की गिरफ्त में आ जाते हैं। उन्हें शराब/सिगरेट/कैफीन की लत लग जाती है।

क्या है ’सोशल जेट लेग’

’सोशल जेट लेग’- इस शब्द की उत्पति यूरोपीय शोधकर्ताओं द्वारा की गई है। इससे सामान्य प्राकृतिक बॉडी क्लॉक तथा व्यक्ति के सोशल क्लॉक में असंगति का पता चलता है। हर व्यक्ति का शरीर एक तय रूटीन के अनुसार कार्य करता है। उसे कब जागना है, कब सोना है, कितना सोना है, कब खाना है, क्या खाना है और कितना खाना है आदि सब उसके इसी बॉडी क्लॉक के अनुसार निर्धारित होता है।

यदि आपके हर दिन की शुरुआत एक तय समय पर होती है और वीकेंड पर आप यह सोच कर देर तक जागते हैं या देरी से उठते हैं कि ’आज तो छुट्टी है’ तो यह आदत धीरे-धीरे आपके बॉडी क्लॉक पर निगेटिव इफेक्ट डालने लगती है। आप अगर गौर करें, तो पाएंगे कि शुरुआत में आप सोने के तय समय से एक घंटा अधिक ही जाग पाते थे। धीरे-धीरे यह समय बढ़ता जाता है और एक समय के बाद आप अनिद्रा की बीमारी से ग्रस्त हो जाते हैं। म्यूनिख यूनिवर्सिटी के मेडिकल साइकोलॉजी इंस्टिट्यूट के शोधकर्ता डॉ. टिल रोयेनबर्ग के अनुसार- ”पूरे कार्य सप्ताह में लोगों के जागने और सोने का समय निश्चित होता है। उन्हें इस दौरान सोने का कम ही समय मिल पाता है। अक्सर नींद आते रहने पर भी उन्हें अलार्म घड़ी की आवाज सुनते ही उठना पड़ता है, क्योंकि उनके दिमाग में वर्क प्रेशर होता है। सप्ताहांत में वे अधिक देरी तक सोकर अपनी इस नींद की कमी को पूरा करना चाहते हैं, लेकिन यह संभव नहीं है।”

सोशल मीडिया की है बड़ी भूमिका

स्वास्थ विशेषज्ञों की मानें, तो मोबाइल और लैपटॉप पर सोशल मीडिया से जुड़े रहने के कारण हम रात में देर तक जागते रहते हैं। इसकी वजह से हमारी नींद पूरी नहीं हो पाती और स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है।

अगर आप इन दिनों किसी व्यक्ति से पूछें कि पिछली रात सोने से पहले उसने आखिरी काम क्या किया था, तो संभावना है कि उनमें से ज्यादातर लोगों का जबाव यही होगा कि उन्होंने अपना इमेल, व्हाट्सएप या फेसबुक आदि चेक किया था या फिर अन्य किसी सोशल साइट्स की सर्फिंग में वक्त बिताया था।

विशेषज्ञों का मानना है कि सोने से पहले हमारे मस्तिष्क को कम-से-कम आधे से एक घंटे नींद की तैयारी करने की जरूरत होती है, ताकि हमारा दिमाग दिन भर के तनाव से मुक्त होकर शांत हो सके। एकाग्रचित्त होने से हम धीरे-धीरे नींद के आगोश में चले जाते हैं, लेकिन अगर इस बीच में किसी बाधा से इस प्रक्रिया में खलल पड़ता है, तो इससे हमारी नींद टूट जाती है।

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में न्यूरोसाइंस और मनोविज्ञान के प्रोफेसर मैथ्यू वॉकर कहते हैं- ”आजकल ज्यादातर लोग (खास कर युवा) सोने से पहले बिस्तर पर लेट कर फेसबुक या व्हाटसएप के मैसेज चेक करते या पढ़ते हैं। जब कोई संदेश आता है और हमारा 20-30 मिनट का समय बर्बाद हो जाता है। जब हम कोई मैसेज करते हैं, फेसबुक पर कुछ पोस्ट करते हैं या कोई मेल भेजते हैं, तो उस पर लोगों की प्रतिक्रिया जानना चाहते हैं। यह सब करते वक्त हमारा तंत्रिका तंत्र सक्रिय रहता है। उसके बाद भी जो लोग अपने फोन को एक्टिव मोड पर अपने बिस्तर के पास या तकिये के नीचे रख कर सो जाते हैं, उनकी नींद हर नये संदेश के साथ बजने वाली आवाज से बुरी तरह प्रभावित होती है। उन्हें चैन नहीं पड़ता और वे दोबारा से मैसेज चेक करने लग जाते हैं कि किसने क्या भेजा।”

गैजेट्स की लत चुरा रही है हमारी नींद

दरअसल नींद आने से पहले गैजेट्स का इस्तेमाल करने की हमारी आदत हमारी नींद हराम करने के लिए मुख्य रूप से जिम्मेवार है। गैजेट्स से निकलने वाली नीली रोशनी नींद लाने में मददगार हॉरमोन मेलाटोनिन के स्राव को प्रभावित करती है। इससे हमारे शरीर की जैविक घड़ी पूरी तरह गड़बड़ा जाती है, जिसके चलते हम देर रात तक जगे रहते हैं। नींद के आगोश में जाने से चंद सेकेंड्स पहले भी हमारा दिलो-दिमाग शांत नहीं हो पाता। रात में भी कई बार हमारी नींद टूटती रहती है। हालात यह है कि आज हर तीन में से एक व्यक्ति अनिद्रा की समस्या से ग्रसित है।

अमेरिका के नेशनल स्लीप फाउंडेशन (National Sleep Foundation) के एक अध्ययन के मुताबिक 48% अमेरिकी सोने से पहले टैबलेट या लैपटाप जैसे गैजेट्स इस्तेमाल करते हैं। अन्य देशों में किए गए अध्ययनों के मुताबिक ऐसा करनेवालों में युवाओं का प्रतिशत बहुत अधिक है।

किंग्स कॉलेज लंदन में इंस्टिट्यूट ऑफ साइकैट्री (Institute of Psychiactry) के विशेषज्ञ बेन कार्टर पिछले कुछ सालों से नींद पर टेक्नोलॉजी के असर के बारे में अध्ययन कर रहे हैं। उन्होंने अपने शोध अध्ययनों के आधार पर पाया कि बेडरूम में बेड के पास पोर्टेबल इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस रखने से हम अच्छी नींद से वंचित हो जाते हैं। कई अन्य अध्ययनों में भी यह पाया गया है कि, रात में इन गैजेट्स के इस्तेमाल से तनाव बढ़ता है। इससे व्यक्ति के आत्म विश्वास में कमी आती है। उसका मानसिक स्वास्थ्य बुरे तरीके से प्रभावित होता है। नींद पूरी न होने से हमारी कार्यक्षमता भी कम होती है और स्वास्थ्य पर दीर्घकालीन बुरा असर पड़ता है।

कैसे पाएं छुटकारा

सोशल जेट लेग से छुटकारा पाना मुश्किल जरूर है, पर नामुमकिन नहीं। हद तो यह है कि अब इन गैजेट्स की लत को छुड़ाने के लिए भी कुछ कंपनियों ने नए गैजेट्स लॉन्च कर दिए हैं। कहने का मतलब यह कि बाजार हमें पूरी तरह से गैजेट-डिपेंडेंट बनाने पर तुला हुआ है। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम किस तरह से इस लत से छुटकारा पाना चाहते हैं, ताकि जीवन के पलों का सुखद आनंद प्राप्त कर सकें। योग और व्यायाम की मदद से इसके हानिकारक प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके अलावा, कुछ प्रमुख बातों पर ध्यान देकर भी व्यक्ति इसके प्रभावों से छुटकारा पा सकता है, जैसे-

-हर रोज अपने सोने और जागने का समय निश्चित करें।

-रात में सोने से आधे घंटे पहले टीवी, मोबाइल आदि गैजेट्स को स्वीच ऑफ कर दें या साइलेंट/एयरप्लेन मोड पर डाल दें।

-रात में चाय/कॉफी/चॉकलेट आदि के सेवन से परहेज करें।

-सोने से पहले किताब (बायोग्राफी/ट्रेवलॉग/संस्मरण आदि) पढ़ने की आदत डालें।

-दिन में ज्यादा लंबे समय तक न सोएं।

-सोने से पहले किताब पढ़ने या गर्म दूध पीने से नींद अच्छी और गहरी आती है।

’जेट लेग’ से जुड़ा है सोशल जेट लेग

     हर देश का टाइम जोन भिन्न होता है। जब भारत में सुबह होती है, तो कई देशों में सोने का वक्त हो जाता है। इसी तरह हमारे यहां लोग सोने जा रहे होते हैं, तो कुछ देशों में यह लोगों के ब्रेकफास्ट करने का समय होता है। हवाई यात्रा के दौरान जब हम इस टाइम जोन को पार करते हैं, तो जेट लेग एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आता है। अक्सर उड़ान भरनेवाले पायलट्स या एयर होस्टेस को इस समस्या का सामना करना पड़ता है।

      हालांकि जेट लेग कोई शारीरिक समस्या नहीं है। यह मात्र नए वातावरण के कारण हमारी बॉडी क्लॉक के बिगड़ जाने का परिणाम है। जैसे मान लें, भारत में रहनेवाला कोई पायलट यहां से रात 9 बजे अमेरिका के लिए उड़ान भरें, तो कायदे से अगले बारह घंटों बाद उसका शरीर रात के नौ बजे की दैनिक क्रिया का अभ्यस्त होगा, लेकिन जब वह अमेरिका पहुंचता है, तो पाता है कि वहां उस वक्त दिन है। इस वजह से उसे अपनी रूटीन फॉलो करने में परेशानी होती है।

     इन्हीं सब कारणों से जेट लेग से पीड़ित व्यक्ति को नींद न आना, दिनभर जम्हाइयां लेना, बेवक्त भूख लगना, थकान- सिरदर्द, एकाग्रता की कमी, चक्कर व मितली आना, घबराकर उठ जाना वगैरह जैसी कुछ प्रॉब्लम्स से गुजरना पड़ता है।

 

 

 

 

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