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 ***तरुण विजय ***

     

       जिसे जीवन में सिर्फ पेन और प्रजा का प्रेम ही चाहिए हो और जो मुख्यमंत्री रहते हुए हवाई चप्पल में अक्सर स्कूटर पर ही दफ्तर जाने का आदी हो, वह रक्षा मंत्री बनकर कहीं भी जाए पर बिना किसी से दबे भारत का हित दंबगपन से सुरक्षित रखेगा, यह तो तय मानना चाहिए। 
     लोकसभा में रक्षा मंत्री श्री मनोहर पर्रीकर का अगस्ता के बारे में बयान इटली से लेकर भारत में इटली वालों तक थरथराहट पैदा कर गया। हालांकी राज्यसभा में भी उनका भाषण बहुत अच्छा था लेकीन एक तो वह अंग्रजी में था और दूसरे काफी लंबा तथा तथ्यों के विवरण जैसा। लोकसभा में पर्रीकर हिंदी में बोले तो बात सीधे दिल तक उतरती चली गई और भाषण के अंत में उन्होने जैसे ही यह वायदा किया कि जो गलती बोफर्स में उसे परिणती तक न ले जाने की गई थी, वह अगुस्ता मामले में नहीं दोहराएंगे और अपराधियों को सजा दिलाकर ही छोडेंगे, तो सदन साधुवाद की तालियों से गडगडा उठा।
      देश प्रतीक्षा कर रहा है कि सैनिकों और समाज के साथ विश्वासघात करने वाले अंगे्रजों से बदतर कौन अपराधी है जिन्होंने विदेशियों के साथ रक्षा संबंधी सौदे में भी संकोच नहीं किया। सवाल उठता है कि जनता अपनी भलमनसाहत में लोगों को वोट देती है, अपना समर्थन देती है, भरोसा सौंपती है और फिर उम्मीद करती है कि तपती धूप के साये में काम करने वाले मजदूरों और किसानों तथा -४० से लेकर ४८ डिग्री तक अतिरेकी तापमानों में सरहद पर रखवाली करने वाले जवानों के साथ ये लोग न्याय करेंगे, उनकी उम्मीदों और सपनों को पूरा करेंगे, यह सपने होते हैं देश की जनता के। उसके बाद जब जनता का मत और विश्वास लेकर ये लोग सत्ता में आ जाते हैं तो, विद्वेष और बादशाहत से भरे व्यवहार को अपनाकर यह भूल जाते हैं कि जिस जनता ने उन्हें सत्ता के शिखर पर पहुंचाया है, वही उन्हें धूल भी चटा सकती है।
     

             सियाचिन में सैनिक, दिल्ली में कपट कथा
     उस देश में जहां -४० डिग्री के प्राणांतक तापमान में सियाचिन में सैनिक देश की रक्षा के लिए तैनात रहते हैं और उनके माता-पिता शिकायत नहीं करते, उस देश में रक्षा मंत्रालय की खरीद में राजनेता सैंकड़ों करोड़ के घोटाले में, एक विदेशी अदालत द्वारा आरोपयी तय किये जाते हैं और संसद यह नज़ारा देखती है कि इटली की अदालत द्वारा आरोपित व्यक्तियों के समर्थन में भारत के राजनेता खड़े होते हैं।
   यह सैनिक विरोधी, देश विरोधी राजनीतिक कपट कथा की ऐसी शोकांतिका है जिसे पढ़ कर हर देशवासी का सर शर्म से झुक जाता है। पूरे विश्व में आज भारत अगस्ता हेलीकाप्टरों की खरीद में हुए घोटाले के कारण भ्रष्ट नेताओं के देश के नाते कुख्यात हो रहा है।
     हेलीकाप्टर खरीद में मानक बदले गए, ऊंचाई बदली गयी, भारतीय वायु सेना द्वारा न्यूनतम खरीद मूल्य को तिगुना कर दिया गया, यहां तक की अगस्ता कंपनी ने कहा की कृपया इतना ऊंचा दाम हमें मत दें, हम उससे काम दाम में ही हेलीकॉप्टर बेच देंगे। परंतु देश के साथ इस हद तक कपट किया गया कि हेलीकाप्टर का परीक्षण भारत के तापमान और धरातल के सन्दर्भ में न करते हुए इटली में किया गया। इतना ही नहीं, जिस हेलीकाप्टर पर परीक्षण किया गया वह तो खरीदारी की सूची में था ही नहीं, किसी और ही हेलीकाप्टर पर परीक्षण कर खरीदारी को अंतिम रूप दे दिया गया
     इस पाप के अपराधी कौन हैं? इस राजनीतिक कपट कथा के पापी कौन हैं? क्या यह देश उनको क्षमा कर सकता है?
   

      हालांकी अगस्ता कांड के बारे में काफी कुछ जानकारी मीडीया में आ चुकी है लेकीन बार बार यह पूछने को मन चाहता है कि जिस किसी ने भी अगस्ता हेलीकॉप्टर के लिए भारतीय वायुसेना द्वारा निर्धारित आधारभूत कीमत ७९३ करोड रुपये प्रति हेलिकॉप्टर से बढाकर ४ हजार रुपये करोड प्रति हेलीकॉप्टर कर दी होगी, उसके दिलो-दिमाग में क्या हिंदुस्तान का कोई कण बचा रहा होगा? जिस देश की मिट्टी में रचे, बसे,पले और बडे हुए, उसी के साथ विश्वासघात करने का मन किसका हो सकता है? विदेशियों को दलाली दी। देश का नाम डुबोया और जब सारी दुनिया में घोटाले की चर्चा शुरु हो गई, उसके बाद भी उसकी जांच को बहुत ढीलेढाले ढंग से चलने दिया ताकि बरसों तक यह मामला खिसकता ही रहे। तत्कालीन प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री ने फाईल पर जो नोट करते थे, उसकी भी अवहेलना करते हुए उन फैसलों को बदलवाने की ताकत किसमें थी? हेलीकॉप्टर का आकार बदलवाया, उसकी उडान क्षमता और ऊंचाई बदलवाई और भारत में परिक्षण की बजाए इटली में परिक्षण किया, जबकि भारतीय तापमान और धरातल की स्थिति के अनुरुप परिक्षण यही होना चाहिए था और उसके बाद भी जो हेलीकॉप्टर खरीदा जा रहा था, परिक्षण उसका नहीं किया गया, बल्कि किसी और ही हेलीकॉप्टर का किया गया, जबकि परीक्षण के समय अगस्ता हेलीकॉप्टर बनकर तैयार ही      नहीं हुआ था।
      यह सब भारत में अभारतीय एवं देश से निरपेक्ष उन लोगों की ओर इशारा करता है जिनके लिए धन ही देश और समाज, बर्तमान और भविष्य है। ये लोग दलाली गणतंत्र के नागरिक होते हैं जहां डॉलर और यूरो के झंडे लहराए जाते हैं। इन्हें सामान्य व्यक्ति फांसी पर लटकते देखना चाहता है।
इसके साथ ही इटली के फैसले में एक और बात सामने आयी है कि अगस्ता कंपनी ने भारतीय मीडिया में अपने प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण बनाने के लिए ६० लाख यूरो की़ व्यवस्था की ताकि वे अगस्ता खरीद के विरोध में लिखने वालों के खिलाफ लिखें तथा ऐसा वातावरण बनाएं कि मानो अगस्ता के बिना देश का काम ही नहीं चल सकता। ये पत्रकार कौन थे? ये मीडिया घराने कौन थे? इसकी भी पूरी जांच होगी ही।
      ये देश किसका है? जो भी इस देश के निवासी हैं, उनका अपने देश और देशवासियों के प्रति कोई कर्तव्य होता है या नहीं? जिन लोगों ने अगुस्ता किया, वे भले ही दंड पा जाएं लेकिन देश की छवि और आत्मसम्मान को जो चोट पहुंची है, उसकी भरपाई कौन करेगा? क्या बार बार हमें सोमनाथ की कथा से सबक नहीं लेना चाहिए कि विदेशी आक्रमणकारी या दलाली देने वाले तो विदेशी ही थे, लेकिन अपनों ने अपनों के साथ दगा क्यों की?

मो. ः ९०१३१८१८८८

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