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     मानव इतिहास में पानी हमेशा समृद्धि और प्रगति का आधार रहा है। दुनिया में जहां-जहां सभ्यताओं का विकास हुआ वहां-वहां आसपास पानी जरूर था। जहां जल था, वहां जीवन था। पर जैसे-जैसे गरमी का पारा चढना शुरू हुआ, पानी को लेकर हाहाकार मच गया। इस वर्ष तो पानी को लेकर स्थितियां ज्यादा ही खराब हो गई हैं। महाराष्ट्र के लातूर जिले में जल संकट से निबटने के लिए पहली बार धारा १४४ लगाई गई। धारा १४४ लगाने का मतलब यह है कि कुएं, बोअरवेल, पानी का टैंकर, जलाशय, तालाब, ट्यूबवेल के नजदीक पांच से ज्यादा लोग जमा नहीं हो सकते। महाराष्ट्र में सूखे की भीषणता को देखते हुए न्यायालय ने यहां खेल, शादी, महोत्सवों और मनोरंजन के कार्यक्रमों में पानी के उपयोग पर पाबंदी लगा दी है। देश के आधे से अधिक राज्य सूखे की चपेट में आ गए हैं। सूखे के कारण अनेक किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। पशु-पक्षी पानी की कमी के कारण तडप कर मर रहे हैं। पूर्वी भारत के कई हिस्सों में ब्लैक आउट की नौबत आ गई है। अनेक नदियों का जल खत्म होने की कगार पर है।
     पानी की समस्या ज्वलनशील बनती जा रही है। जिससे आग बुझती है वही पानी अब ज्वलनशील बनता जा रहा है। यह चित्र हम मानवों ने खुद ही बनाया है। भारत के इतिहास को, परंपराओं को जब हम देखते हैं, तो एक खास बात हमें नजर आती है। भारत ने हमेशा नदी, पानी का सम्मान किया है। लेकिन यह सच अब इतिहास हो चुका है।
     नदियों का, पानी का सम्मान हमारी संस्कृति थी और है। क्योंकि इन्हीं नदियों के तटों पर हमारी संस्कृति का उदय हुआ है और इसी पानी ने मानव जाति को सुसंस्कृत बनाया है। हजारों सालों तक हमारी परंपरा कायम थी। कालांतर में मानव के विकास की परिभाषा बदल गई और उस बदली हुई परिभाषा में नदियों का उपयोग गंदा पानी, कूड़ा, रसायन मिश्रित द्रव्य बहाने हेतु होने लगा। नदी और मानव के बीच जो एक भावनात्मक रिश्ता था वह रिश्ता इस बदलती विकास की संकल्पना के प्रवाह में बह गया है। मानव जाति पर जल्द ही ऐसा संकट आएगा कि हमारी आने वाली नस्लें हमसे नदी क्या होती है, यह प्रश्न पूछेगी तो हमें उन्हें नदी का चित्र बनाकर दिखाना होगा; क्योंकि वास्तविक नदी तब तक बचेगी ही नहीं। मानव के मन में यह अहंकार निर्माण हो गया है कि विकास के बहते आवेश में, हम नया इतिहास रच सकते हैं। परंतु इस बात का ध्यान रखना होगा कि इस प्रकार रचे जाने वाले इतिहास का भविष्य अल्पजीवी न हो।
      कुदरत ने भारत को भरपूर पानी दिया था। लाखों तालाब, नदियां, कुएं, झीलें और झरनें हमारा वैभव थे। दुर्भाग्य की बात है कि हम इस पानी को सहेज-संभाल नहीं पाए। अब ज्यादातर तालाब, कुएं, झीलें, झरने गायब ही हो गए हैं। छोटी-छोटी नदियां तो मृत हो गई हैं, बड़ी नदियां भी गहरे संकट में हैं। बचे हुए पानी को हम पैसे में रूपांतरित करने का जोरदार प्रयास कर रहे हैं। इसके चलते बोतलबंद पानी की बिक्री ने जोर पकड़ा और पिछले तीन दशकों में यह धंधा देश के कोने-कोने में फैल गया है। बोतलबंद पानी के लगभग दो सौ ब्रांड देश में बिक्री के लिए उपलब्ध है। प्रकृति ने धरती के नीचे भी जल भंडार दिए हैं। लेकिन ये भंडार सीमित हैं। केवल विशेष परिस्थितियों में इसका उपयोग उचित है। पर हम इस भूमिगत जल को भी निचोड़ कर भूभाग को खोखला करने पर आमादा हो गए हैं। इस कारण पानी से जुड़े विविध संकटों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसा नहीं है कि भारत में वर्षा नहीं होती। समस्या यह है कि, हम इस जल को रक्षित और संभाल नहीं पा रहे हैं। वर्षाजल का प्रबंधन भी एक बड़ी समस्या है।
      ऐसा नहीं कि हालात सुधर ही नहीं सकते। इसके लिए पक्का इरादा, हमारी जीवनशैली में बदलाव, अच्छी रणनीति और ठोस जमीनी प्रयास करने होंगे। दुनिया में विविध देशों ने पानी की समस्या को लेकर आदर्श बदलाव किए हैं। इजराईल, दक्षिण कोरिया, फ्रान्स, स्विट्जरलैंड जैसे देशों ने पानी के उपयोग के संदर्भ में जो गलतियां उनसे हुई थीं वे अब उसका परिमार्जन करते हुए दिखाई दे रहे हैं। पानी ‘दुनिया का सबसे अमूल्य घटक है’, यह उनके ध्यान में आ गया है। पानी का गलत उपयोग अपने विकास की रफ्तार को बुरी तरह रोक सकता है; यह वे जान गए हैं। इस कारण वे इतना सूक्ष्म निरीक्षण करते हैं कि पानी की एक बूंद का भी गलत उपयोग न हो। पानी का पुनर्प्रयोग करने का नियोजन भी उन्होंने प्रभावी ढंग से किया है।
      देश के कुल ६०० में से ३०० से ज्यादा जिले सूखे की मार झेल रहे हैं। ऐसा नहीं कि इस सूखे की नौबत इस साल किसी खास कारण से आई है। विगत कुछ सालों की वर्षा की स्थिति को देखें तो ऐसा नहीं है कि हर वर्ष इन दिनों में बारिश होती ही है। अत: पानी का नियोजन १५ महीने के लिए होना आवश्यक है। परंतु हमारा व्यवस्थापन कभी इस प्रकार का विचार भी नहीं कर पाया। परिणाम स्वरुप अप्रैल, मई, जून ये तीन महीने आंखों में पानी लाने वाले होते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि, प्रकृति के मौन हो जाने का मतलब ज्यादा घातक होता है। पानी के संरक्षण के प्रति हमारी उदासीनता एक ऐसे युद्ध को जन्म देगी, जिसमें हम सबकी हार तय है। रेलगाडी से पानी की आपूर्ति करना एक उपाय की तौर पर ठीक है, पर इससे प्रश्न खत्म नहीं होता। पानी का सुनियोजन करना, वह नियोजन कालबद्ध तरीके से करना यही सयानापन है। देश पर छाया हुआ पानी संकट बहुत बड़ा है। उस संकट पर तात्कालिक उपाय ढूंढने से बेहतर है शाश्वत उपाय ढूंढा जाए। हम भारतीय नदियों की पूजा करते हैं, परंतु नदियों के पानी के संरक्षण के लिए आगे नहीं आते। हम फेसबुक, व्हॉट्सएप पर तोते की तरह रटीरटाई बातें दोहराते रहते हैं परंतु चुपचाप दम तोड़ती नदियों का संरक्षण हम नहीं कर पा रहे हैं। हमें यह याद रखना होगा कि देश के विकास और पानी का सीधा सम्बंध है। यदि पानी न रहा तो हमारे समूचे विकास पर पानी फिर सकता है। केवल मशीने, तकनीक, कारखानें, बहुमंजिला इमारतें ही विकास नहीं है। सूखता पानी हमारे विकास के मॉडल पर ही प्रश्नचिह्न लगा सकता है। भविष्य में युध्द पानी के कारण होंगे ऐसा कहा जा रहा है; लेकिन इस पानी के कारण दुनिया में शांति भी आ सकती है। दुनिया में शांति लाने का एकमात्र उपाय पानी भी हो सकता है। देश, विश्व, जीवन को सुंदर, समृद्ध बनाना हो तो सरकार और समाज को मिलकर नदियों को पुनर्जीवन देना आवश्यक है। इस वर्ष सूखे ने हमें जो जीवनरूपी पानी का महत्व समझाया है उसे ध्यान में रखते हुए निश्चित ही हम पानी संरक्षण के लिए प्रामाणिक प्रयास करेंगे।

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