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“मैंने बड़े समीप से उन्हें देखा है। कब किस बात पर उनकी त्यौरियां चढ़ती-उतरती और कब उनकी आंखें अलग-अलग विषयों पर अलग अलग प्रकार से फैलतीं, सिकुड़ती व अलग-अलग आकार लेती हैं। उनकी आंखें ही सबकुछ मानो बोल देती थीं।”

– प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात ने कहा था कि जिस देश का राजा कवि होगा उस देश में कोई दुखी न होगा- अटल जी के प्रधानमंत्रित्व काल में यह बात चरितार्थ हो रही थी। स्वातंत्र्योत्तर भारत के नेताओं में कुछ ही ऐसे नेता हुए हैं जो विपक्षियों से भी सम्मान पातें हों। और ऐसे जननेता तो एक-दो ही हुए हैं जो विपक्षियों से न केवल सम्मान पाते हैं बल्कि दिग्गज से दिग्गज विपक्षी नेता भी उनके विषय में चर्चा करते हुए न केवल आदर अपितु श्रद्धा भाव से ही बात करता है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी निस्संदेह एकमात्र ऐसे जननेता थे जो जननायकों की श्रेणी में सम्मिलित होकर सम्पूर्ण भारत वर्ष का आदर और दुलार पाते थे।

जननायक की बात करें तो दूसरा नाम जयप्रकाश नारायण का नाम आता है, राममनोहर लोहिया का आता है। इन्हें भी सम्पूर्ण भारत वर्ष श्रद्धा से स्मरण करता है। स्वातंत्र्योत्तर भारत में यद्दपि इंदिराजी भी स्मरणीय जननेता रही हैं किन्तु आपातकाल का ग्रहण व उनके शासन काल में हुआ लोकतांत्रिक परम्पराओं का ह्रास, उनकी स्मृतियों को कटु बना देता है।

लोकतंत्र में जहां निर्वाचित होना एक उपलब्धि समझा जाता है वहीं जनमानस में बसी स्मृतियां ही नेता को जननेता बनाती हैं! इस दृष्टि से देखें तो यह स्पष्ट होता हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी उस श्रेणी के प्रथम स्वातंत्रयोत्तर जननेता थे और उनका श्रेष्ठत्व उनके जीवन काल में ही साबित हो चुका था। अटल जी के दल के हो या उनसे विलग दल के हो, उनके विचारों के राजनीतिज्ञ हो और उनसे अलग विचारों के राजनीतिज्ञ हो- कहीं यदि किसी नेता के सामने श्रद्धावनत रहते थे तो वे अटलजी ही थे। जनता ने उन्हें बड़े ही दुलार और सम्मान से एक उपनाम दिया था अटल जी। अटल जी जब चौक-चोराहों से लेकर लोकसभा-राज्यसभा तक में बोल रहे होते थे तब जैसे घड़ी की सुइयां भी मंत्रमुग्ध होकर ठहरने को उत्सुक होने लगती थीं। पिछले कुछ वर्षों से जबकि अटलजी स्वयं अपनी ही चेतना-संज्ञा-प्रज्ञा से विस्मृत होकर अपने कक्ष में सिमट गए थे तब भी उनका वैचारिक विस्तार प्रत्येक भारतीय के ह्रदय तक और विश्व भर में फैले उनके करोड़ों प्रशसंकों के मानस तक है।

अटल बिहारी वाजपेयी जी ने मात्र एक राजनीतिज्ञ और सत्ता पुरुष का जीवन नहीं जिया, सत्ता में तो वे अल्पकाल को ही रहे। उनका सम्पूर्ण जीवन संघर्ष और श्रम की भेंट चढ़ गया तब जाकर कहीं वे अपने विचारों को सत्ता सदन में स्थापित करा पाए थे। 16 मई से 1 जून 1996 तथा फिर 19 मार्च 1998 से 22 मई 2004 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे अटल जी भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य रहे और  1968 से 1973 तक उसके अध्यक्ष भी रहे। आजीवन राजनीति में सक्रिय रहे अटल जी ने वैचारिक अधिष्ठानों से घनिष्ठता बनाए रखी। उन्होंने लम्बे समय तक राष्ट्रधर्म, पाञ्चजन्य और वीर अर्जुन आदि राष्ट्रवादी प्रकाशनों में सम्पादन और लेखन का कार्य किया जिससे उनकी मेधा और संज्ञा-प्रज्ञा-विज्ञा तीक्ष्ण-दर-तीक्ष्ण होती गई और वे भारतीय जनमानस से तादात्म्य बैठा पाने में सतत सफल होते चले गए। उनकी राजनैतिक अवधारणा, कल्पना और योजना दीर्घकालीन दृष्टि से सधी होती थी। तात्कालिक दृष्टि और तात्कालिक परिणाम की चिंता तो जैसे उन्हें छूती भी नहीं थी। यही कारण था कि जो उनके संपर्क में आता था वह धीर-गंभीर और शांत चित्त राजनीतिज्ञ बन जाता था। अटल जी ने अपने जीवन काल में हजारों राजनीतिज्ञों को गढ़ा और फिर उन्हें राष्ट्रवाद के यज्ञ में समिधा डालने योग्य बनाकर यज्ञ पीठ पर बैठाया किन्तु कभी श्रेय लेने और नियामक होने की राजनीति नहीं की। वे सदैव नेतृत्व करते किन्तु साथियों को स्वयं के अनुगामी रहने का विनम्र आभास कराते दिखते थे।

मुझे उनके साथ वर्ष 1985 में एक लंबी रेल यात्रा करने का सौभाग्य मिल चुका है। हुआ यह था कि वे जीटी ट्रेन से ग्वालियर से नागपुर जा रहे थे। मैं उस समय मेरे गृह ग्राम आमला में रहा करता था जहां वायुसेना केंद्र होने के कारण जीटी रूका करती थी। हमें जैसे ही पता चला कि अटल जी यहां से गुजर रहे हैं, हम भोजन- अल्पाहार आदि लेकर स्टेशन पहुंच गए। जीटी आमला स्टेशन पर बड़ी मुश्किल से एक मिनट ही रूका करती थी और इतने में कोई बात संभव थी नहीं। अतः मैंने यह योजना बना ली कि नागपुर तक जाऊंगा और उनसे दस पांच मिनट बात करने का प्रयास करूंगा।

आमला स्टेशन से जब गाड़ी निकली और मैंने फर्स्ट क्लास के उनके कैबिन में झांका और अंदर आने की अनुमति मांगी। उन्होंने सहर्ष अंदर बुला लिया और जब उन्हें पता चला कि मैं केवल उनसे दस पांच मिनट चर्चा के मोह में नागपुर तक जा रहा हूं तो वे बड़े प्रसन्न भी हुए और मेरी छोटी उम्र को देखते हुए तनिक आश्चर्यचकित भी हुए।

उन्होंने साथ बैठाकर मुझे भोजन भी कराया और आमला से नागपुर तक लगभग साढ़े तीन घंटे तक विभिन्न विषयों पर चर्चा करते रहे। मैंने बड़े समीप से उन्हें देखा कि कब किस बात पर उनकी त्यौरियां चढ़ती-उतरती हैं और कब उनकी आंखें अलग-अलग विषयों पर अलग अलग प्रकार से फैलतीं, सिकुड़ती व अलग-अलग आकार लेती हैं। मैंने उन्हें उन साढ़े तीन घंटों में इतना गहराई से पढ़ा था कि आज मैं कह सकता हूं कि अटलजी की आंखों की भाषा को पूर्ण तो नहीं किंतु थोड़ा बहुत तो मैं समझ ही सकता हूं।

अपना कार्यकाल पूर्ण करने वाले पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री अटलजी आजीवन अविवाहित रहे। बेहद स्पष्ट वक्ता और निर्भय वक्तृत्व के धनी अटलजी जब बोलते थे तो मामला श्रोता और वक्ता का नहीं बल्कि ह्रदय से ह्रदय के बोलने सुनने का हो जाता था। जिन्होनें अटलजी को सुना है वे इस कथन के भाव और आशय को बड़ा ही स्पष्ट समझ सकते है और महसूस भी कर सकते हैं।

अटल जी का चमकदार संसदीय जीवन बेदाग ही नहीं अपितु बेहद उज्ज्वल रहा। उनके संसदीय भाषण, आक्षेप, टिप्पणियां, चर्चाएं, कविताएं सभी कुछ जैसे एक शोध ग्रंथ का विषय है। अटल जी का संसदीय इतिहास भारत ही नहीं अपितु विश्व के सभी लोकतंत्रों में एक संदर्भ के रूप में आकलित होता है तो इसके पीछे अटलजी की मेधा-प्रज्ञा के साथ-साथ उनकी संवेदना-प्रज्ञा प्रमुख कारण है। उनके समकालीन बताते हैं कि जब वे संसद में आंखें बंद करके बोलना प्रारम्भ करते थे तो लगता था अटल जी जागते हुए नहीं बल्कि सोते हुए बोल रहें हैं किन्तु जो शब्द वे बोलते थे वे शब्द संवेदना, व्यथा, पीड़ा और अनुभव की शाब्दिक पराकाष्ठा को पार कर महसूस होने के धरातल पर उतर आते थे।

जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी तक की उनकी गौरव और गरिमामय राजनैतिक यात्रा तो उनकी वैचारिक यात्रा का एक अंश मात्र है। वस्तुतः वे दार्शनिक, राजनीतिज्ञ थे जिस कारण वे कई बार व्यावहारिक राजनीति में अनफिट होने का आभास देते थे। किन्तु आनंद तब आता था जब वे जिस क्षण अनफिट होने का आभास देते उसके दूसरे ही क्षण वे अपने कृतित्व और वाक्चातुर्य से विरोधियों को पटखनी दे देते और उन्हें चारो खाने चित कर, वापस अपनी बाहों में लेकर, अपने विचारों से साम्य बैठा लेने का दुलारपूर्ण अवसर भी देते दिखते। यही वह कला या विधा थी जो उन्हें अटलजी बना गई।

कविताओं और संवेदनाओं की परिधि में आजीवन खड़े इस जननायक ने जब 11 और 13 मई 1998 को पोखरण में भूमिगत परमाणु परीक्षण विस्फोट करके राष्ट्रवाद के भाव को क्षितिज पर पहुंचाया तब सम्पूर्ण विश्व चमत्कृत रह गया था। उन्होंने भारत को परमाणु शक्तिसंपन्न देश घोषित कर दिया और वैश्विक समुदाय को भारत की शक्ति का निर्विवाद परिचय दिया तब सभी आश्चर्य में डूब गए थे। उन परिस्थितियों में जब कि वैश्विक परिदृश्य उलझा हुआ था और राजनयिक गणनाएं भारत के पक्ष में बिलकुल भी नहीं थीं और आर्थिक पक्ष भारत के धूर विरोध में था तब परमाणु विस्फोट का संकल्प और उसका क्रियान्वयन एक दुस्साहस ही था। किन्तु यह भी सत्य था कि अटल जी जन्मजात साहसी थे और उनका वही गुण इस कार्य को करा पाया था। इस कदम से उन्होंने भारत को निर्विवाद रूप से विश्व के मानचित्र पर एक सुदृढ़ वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया। बेहद गोपनीय पद्धति से किए गए परमाणु बम विस्फोट की सूचना और भनक तक अति विकसित जासूसी उपग्रहों व तकनीकी से संपन्न पश्चिमी देशों को नहीं लग पाई थी। इस परमाणु विस्फोट के होने तक जो हुआ वह एक असंभव कथा है किन्तु इस विस्फोट के बाद वैश्विक समुदाय के सामने बन गई भारत की खलनायक की छवि को पुनः विश्व गुरु और शांति दूत की छवि में लौटाना असंभव ही नहीं अपितु अकल्पनीय योजना थी जिसे कोई सामान्य जननेता और प्रधानमंत्री नहीं कर सकता था और यह कार्य केवल एक जननायक और वैश्विक संदर्भों में संवेदनशील रहे प्रधानमंत्री से ही संभव था। इस परीक्षा में अटल जी तो जैसे पहले ही सफलता की पटकथा को तैयार किए बैठे थे। अटल बिहारी वाजपेयी को उनके सहस्रों अन्य गुणों, उपलब्धियों के कारण ही भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

 

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