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युद्ध के प्रकारों में छद्म युद्ध बहुत मायने रखता है। जब एक पक्ष सेना के बल पर दूसरे पक्ष पर आक्रमण नहीं कर सकता या प्रत्यक्ष युद्ध कर अपनी सेना तथा युद्ध सामग्री को गंवाना नहीं चाहता तब विपक्ष के संवेदनशील भागों पर वार किए जाते हैं और उन्हें पराजित कर अपना उद्देश्य साधने की कोशिश की जाती है।

उन्नीसवीं सदी के मध्य में चीन और ब्रिटेन के बीच दो युद्ध हुए जिन्हें ‘अफीम युद्ध’ कहा जाता है। भारत पर भी उस समय अंग्रेजों का अर्थात ब्रिटेन का राज था। ब्रिटेन उस समय चीन से रेशम तथा चाय का आयात करता था। उसके लिए इन दोनों वस्तुओं के बदले अफीम का व्यापार करना फायदेमंद था और चीन में अफीम की अत्यधिक मांग थी। ब्रिटेन चीन में अफीम के व्यापार को बढ़ाना चाहता था। परंतु तत्कालीन चीनी शासन यह जानता था कि अफीम मादक पदार्थ है और इसके सेवन से चीनी जनता को नुकसान ही होगा। अत: चीनी शासन ने इसकी अनुमति नहीं दी और परिणामस्वरूप अफीम युद्ध हुआ। हालांकि इस युद्ध में चीन की हार हुई और ब्रिटेन का व्यापार बढ़ा।
जो प्रयोग ब्रिटेन ने अफीम युद्ध के समय चीन में व्यापार फैलाने के लिए किया था वही प्रयोग अब पाकिस्तान भारत में कर रहा है। इसका भीषण उदाहरण है पंजाब; जो कि काफी हद तक नशे की गिरफ्त में है। पाकिस्तान और
पंजाब की सीमाएं लंबी दूरी तक सटी हुई हैं। यहां से गैर कानूनी ढ़ंग से ड्रग्स का व्यापार होता है।
पाकिस्तान अपने निर्माण से लेकर अभी तक हमेशा ही पंजाब की विभिन्न गतिविधियों में दखलंदाजी करता रहा है। फिर चाहे वहां ड्रग्स का गैरकानूनी व्यापार करना हो, खलिस्तान आंदोलन का समर्थन करना हो या आतंकियों की घुसपैठ हो। पंजाब हमेशा ही पाकिस्तान के निशाने पर रहा है।
एक ओर आईएसआई आतंकी गतिविधियों के द्वारा भारत में भय का वातावरण निर्माण कर रही है और दूसरी ओर ड्रग्स के अवैध कारोबार को हवा देकर भारत की जनता को मौत के मुंह में धकेल रही है। लोगों में नशे की आदत डालना, उनको मानसिक तथा शारीरिक रूप से निष्क्रिय कर देना और फिर इस कदर अपना गुलाम बना लेना कि वे नशे के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाएं। अपने व्यापार को बढ़ाने और चीन पर राज करने के लिए जिस तरह ब्रिटेन ने यह नीति अपनाई थी उसी तरह अब पाकिस्तान की आईएसआई भारत में यह नीति अपना रही है। नशे का करोबार करने वाले लोगों की गांव-गांव तक पहुंच होती है। सीमा पार से आए लोगों का भारत के किसी राज्य के चप्पे-चप्पे को जानना भारत की सुरक्षा पर प्रश्नचिह्न है। इस समस्या को केवल किसी एक राज्य की समस्या के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। आज पंजाब के रूप में एक सीमावर्ती राज्य नशे की गिरफ्त में है परंतु पाकिस्तान की सीमा से भारत के गुजरात, राजस्थान जैसे राज्य भी सटे हुए हैं। अगर पाकिस्तान का यह फार्मूला पंजाब में कामयाब हो गया तो वह इसे भारत के अन्य राज्यों में फैलाने की कोशिश भी कर सकता है।
 

यह सारा खेल भारत को अंदर से खोखला करने का षड्यंत्र है। तभी तो हरित क्रांति से लहलहाता पंजाब अब गर्दुलों का अड्डा बनता जा रहा है। नशे के कारण वहां का हर जिला प्रभावित है। पंजाब के गांव मकबूलपुरा को तो विधवाओं का गांव कहा जाता है; क्योंकि वहां अब एक भी पुरुष नहीं बचा है।
ऊपरी तौर पर देखा जाए तो ऐसा लगता है कि पंजाब सम्पन्न होने से पैसे की अधिकता होने के कारण यहां ड्रग्स का कारोबार बढ़ा है, परंतु यह सच्चाई नहीं है। ड्रग्स की चपेट में आने वाले लोग मुख्यत: मध्यमवर्गीय या निम्न-मध्यमवर्गीय लोग हैं। खास कर कॉलेज जाने वाले युवा हैं। ये लोग पहले स्वयं नशा करना शुरू करते हैं और बाद में लोगों को फांसना भी शुरू करते देते हैं। ड्रग्स बेचने वालों का एक ग्रुप इसमें सक्रिय होता है। जो लोग नए लोगों को फांस कर लाते हैं उन्हें कमीशन के तौर पर अधिक ड्रग्स दिए जाते हैं।
नशे की आदत छुड़ाने के लिए मुख्यत: दो तरीके समांतर रूप से कारगर होते हैं। पहला यह कि नशा करने वाले व्यक्ति की विल पावर बहुत स्ट्रांग हो और दूसरा उसे नशीले पदार्थ प्राप्त ही न हों। अभी तक जिस तरह के नशीले पदार्थों का व्यवसाय हो रहा था उसमें व्यक्ति की विल पावर मजबूत हो तो उससे पीछा छुड़ाया जा सकता था, परंतु अब ‘सिंथेटिक ड्रग्स’ का बाजार बढ़ रहा है। जो व्यक्ति एक बार इन ड्रग्स की चपेट में आ जाता है वह इन्हें पाने के लिए हत्या, आत्महत्या या अन्य आपराधिक कार्यों में भी लिप्त हो जाता है। उसे हर कीमत पर ड्रग्स चाहिए ही; फिर चाहे उनके लिए कुछ भी करना पड़े। अत: अगर पंजाब को ड्रग्स के चंगुल से छुड़ाना है तो प्रशासन को कठोर कार्रवाई करके इसकी बिक्री बंद करानी होगी। परंतु साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि ड्रग्स का सेवन करने वाले लोग अपराधी नहीं रोगी हैं। उन्हें अस्पताल या नशामुक्ति केंद्र की जरूरत है जेल की नहीं। असली अपराधी तो वे हैं जो इन लोगों तक ड्रग्स पहुंचा रहे हैं।
लेकिन उनको तो बड़ों-बड़ों का संरक्षण प्राप्त है। जाहिर है कि पुलिस की सहायता के बिना इतना बड़ा गैरकानूनी कारोबार नहीं चलाया जा सकता और पुलिस को राजनेताओं का वरदहस्त प्राप्त है। विके्रता, पुलिस और राजनेताओं की मिली भगत का परिणाम पंजाब को भुगतना पड़ रहा है। पंजाब की बादल सरकार भी यह जानती है कि वे भले ही कितना भी ना कह ले परंतु पंजाब में नशे ने अपना असर फैला रखा है।
पंजाब में नशा कोई नई बात नहीं है। सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण अफगानिस्तान से पाकिस्तान के रास्ते पंजाब तक नशीले पदार्थ बहुत पहले से आ रहे हैं। तब पंजाब में इसकी मांग के कारण अलग थे। हरित क्रांति के कारण लोगों के पास बहुत धन आ गया था।पंजाब के हर घर का एक व्यक्ति कनाडा जैसे विदेशों में नौकरी करने के कारण विदेशों से भी पैसा मिल रहा था। परंतु तब नशे के रूप में शराब का चलन अधिक था परंतु इस शराब का असर इतने बे पैमाने पर नहीं दिखता था।

दूसरा तबका वह था जो इस तरह की शराब का खर्च नहीं उठा सकता था। वह डोडा जैसी नशे की गोलियों का सेवन करता था जो कि चंद रुपयों में हासिल थीं। पंजाब का कोई भी ट्रक ड्राइवर बिना नशे के ट्रक नहीं चलाता था। यहां पहले पुरुषों की तुलना में महिलाओं का अनुपात भी बहुत कम था। कई पंजाबी पुरुष अविवाहित रह जाते थे जिन्हें छडा कहा जाता था। परिवार इत्यादि की जिम्मेदारी न होने के कारण भी ये लोग गलत संगत में पड़ जाते थे और उन्हें नशे की लत लग जाती थी।
नशा करने के ये सभी तरीके उतनी बड़ी मात्रा में हानि नहीं कर रहे थे जितने आज सिंथेटिक ड्रग्स कर रहे हैं। इसे एक दूसरे दृष्टिकोण से ऐसे भी देखा जा सकता है कि पाकिस्तान ने अपने विपक्षी की अर्थात भारत की संवेदनशील नस को पकड़ लिया है। उसे छद्म युद्ध के लिए ऐसा हथियार मिल गया है जिसमें उसे किसी तरह के जानमाल की हानि नहीं है। और जैसा कि पहले कहा गया है अगर नशे के इस सांप का फन यहीं नही कुचला गया तो वह देश के अन्य सीमावर्ती राज्यों में अपना विष फैलाने में नहीं चूकेगा।

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