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भारतीय फिल्मों में मीडिल क्लास को हमेशा से ही तवज्जो दी जाती रही है। लेकिन जैसे-जैसे सिनेमा का स्वरूप बदलता गया, दर्शकों की पसंद-नापसंद भी बदलती गर्इ। मध्यमवर्गीय परिवारों की जिंदगी, उनका  संघर्ष सिनेमार्इ पर्दे से गायब होता गया। इसके स्थान पर उच्च वर्ग की हार्इ प्रोफाइल वाली लाइफ स्टाइल पर्दे पर दिखार्इ जाने लगी और मध्यमवर्गीय परिवार के सदस्य भी ऐसी जिंदगी के सपने सिनेमा के माध्यम से बुनने लगे। लेकिन मीडिल क्लास फैमिली के संघर्ष की दास्तान एक बार फिर पर्दे पर लौट आर्इ है।

बीते कुछ वर्षों में मध्यमवर्गीय परिवारों को ध्यान में रखते हुए कहानियां लिखी गर्इ हैं। इन्हें उसी स्वरूप में पर्दे पर पेश करने का सार्थक प्रयास  भी किया गया है। जब बड़े पर्दे पर ये कहानियां दर्शकों को पसंद आने लगी और बॉक्स ऑफिस कलेक्शन में बढ़ौत्तरी करने लगीं तो मानो ऐसी कहानियां का दौर ही शुरू हो गया। अब फिल्मकार ऐसी कहानियों और किरदारों के प्रति न सिर्फ गंभीर नजर आने लगे, बल्कि पूरी शिद्दत से इन्हें पूरा भी कर रहे हैं। इनमें सबसे अच्छी बात यह है कि वे नामी प्रॉडक्शन हाउस जो कुछ वर्ष पहले तक उच्च वर्ग की जिंदगी को आधार बनाकर फिल्में बनाते थे, अपनी फिल्मों में बड़े-बड़े बंगले दिखाते थे, किरदारों को महंगे-महंगे परिधान पहनाकर एक्टिंग करवाते थे, वे भी अब मीडिल क्लास की ओर रुख करने लगे हैं। कुछ वर्ष पहले आर्इ शरत  कटारिया की फिल्म ‘‘दम लगा के हर्इशा‘‘ ऐसी ही फिल्म थी। इसमें दो मध्यमवर्गीय परिवारों की न सिर्फ उलझने दर्ंर्शा गर्इ थीं, बल्कि दो किरदारों की विवाह के बाद की परेशानियां, उनकी अपनी-अपनी सोच को भी बखूबी पेश किया गया था। फिल्म में मुख्य भूमिका आयुष्मान खुराना  और भूमि  पेडनेकर ने निभार्इ थी। मध्यमवर्गीय कहानी को प्रस्तुत भी उसी  स्वरूप में किया गया था। किरदारों की वेषभूषा, उनका घर, शहर आदि बिल्कुल वास्तविक रखे गए थे। इन सबसे साथ किरदारों की टकराहट और कहानी के आगे बढ़ने के तरीके ने दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी। यही वजह रही कि ऐसी कहानियां और फिल्में बॉक्स आफिस पर हिट साबित होने लगीं। इरफान खान अभिनीत फिल्म ‘‘हिंदी मीडियम‘‘ में भी मध्यमवर्गीय परिवार और ऐसे बच्चों शिक्षा की शिक्षा से जुड़ा मुद्दा उठाया गया था। अनुराग कश्यप की फिल्म ‘‘गैंग्स ऑफ वासेपुर‘‘ में किरदार, उनकी वेशभूषा, बोलचाल ने दर्शकों को बेहतर मनोरंजन दिया था। रजत कपूर की फिल्म ‘‘आंखों देखी‘‘ में मध्यमवर्गीय परिवार की जिंदगी, उनकी परेशानियां और जद्दोजहद को जिस  अंदाज  में  पेश  किया गया,   वह काबिल-ए-तारीफ  था। फिल्म में संजय मिश्रा ने यादगार  भूमिका   अदा की थी। इनके अलावा सीमा पाहवा, रजत कपूर सहित अन्य कलाकारों ने भी कहानी के साथ न्याय किया।  कनू बहल की फिल्म ‘‘तितली‘‘, आनंद एल राय  की  ‘‘तनु वेड्स मनु‘‘, ‘‘रांझणा‘‘, ‘‘टॉयलेट एक प्रेम कथा‘‘, ‘‘पेडमेन‘‘ सहित अन्य कर्इ ऐसी फिल्में हैं जो मध्यमवर्गीय परिवारों की कहानियां कहती हैं और बॉक्स ऑफिस पर हिट साबित हुर्इ हैं। फिल्म ‘‘तितली‘‘ को समीक्षकों ने भी सराहा है। निर्देशक हबीब फैजल की फिल्म ‘‘दो दुनी चार‘‘ में एक मध्यमवर्गीय शिक्षक को आर्थिक स्थिति से जूझते दिखाया गया है। फिल्म में ॠषि कपूर ने बेहतरीन अभिनय किया था।  अब एक बार फिर शरत कटारिया एक मध्यमवर्गीय परिवार के संघर्ष की कहानी लेकर आ रहे हैं। उनकी आगामी फिल्म ‘‘सुर्इ-धागा‘‘ में भूमिका वरूण धवन और अनुष्का शर्मा ने निभार्इ है। फिल्म की इन दिनों खासी  चर्चा है और इसका प्रचार भी अनूठे तरीके से किया जा रहा है। इसके अलावा श्री नारायण सिंह की फिल्म ‘‘बत्ती गुल मीटर चालू‘‘ में बिजली समस्या को लेकर बुनी गर्इ कहानी का दर्शकों को खासा इंतजार है। अच्छी बात यह है कि मल्टीप्लेक्स के दौर में महंगी टिकट लेकर पॉपकॉर्न खाते हुए दर्शक ऐसी मध्यमवर्गीय जिंदगी पर आधारित फिल्मों को खासा पसंद कर रहे हैं।

 

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