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तकनीकी ज्ञान के उत्सर्जन के साथ हमारे जीवन के अधिकांश क्षेत्रों में बहुत तेजी से विकास हुआ है और हम आधुनिक बनते जा रहे हैं। लेकिन आज भी हम गरीबी, भुखमरी, आतंकवाद, जाति-जातियों  में द्वंद्व, अंधश्रद्धा, विषमता, धार्मिक द्वेष जैसे संकटों से जूझ रहे हैं। भारतीय समाज को लगी इस घुन को जिस दिन हम खत्म कर लेंगे उस दिन हम वाकई अत्याधुनिक हो पाएंगे।

1947 में भारत को स्वतंत्रता मिली। हम उपनिवेशवाद से मुक्त हुए। लाखों भारतीयों के मन में अचानक इच्छा-आकांक्षाएं जागृत हुईं। स्वतंत्रता ने भारतीयों के मन में नई आकांक्षाओं को जन्म दिया। कल-परसो तक जो असंभव लग रहा था, वह स्वतंत्रता से संभव दिखने लगा। इसके लिए प्रयत्नों की आकांक्षा बढ़ीं। डेढ़ सौ वर्षों तक गुलामी झेले लाखों भारतीयों के मन में विश्वास जगा कि, ‘हम भी दुनिया के साथ आधुनिकता की दिशा में जा सकते हैं।’ इस विश्वास के कारण ही पिछले 70 वर्षों में भारत ने हर क्षेत्र में निश्चित ही अच्छी प्रगति की है।

1947 में परिवर्तित परिस्थितियों के कारण बहुत बड़े बदलाव हुए। रेडियो, टीवी, रंगीन टीवी; बाद में फोन, कंप्यूटर, मोबाइल, इंटरनेट, डिजिटल युग में भारत का पदार्पण हुआ- यह बहुत तेजी से हुआ सफर है। स्वतंत्रता के बाद 1947 से 1980 तक संचार साधन के रूप में फोन के उपयोग की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। लेकिन अब बच्चा पैदा होते ही उसके हाथ में फोन आ जाता है! मानो मोबाइल याने दैवी शक्ति से मिला उपहार हो, जन्मजात प्राप्त होनेवाला एक अंग हो!! मानवी इतिहास में हुई सबसे बड़ी क्रांति है इंटरनेट, डिजिटल। लोग कहीं भी रहकर दुनिया के किसी भी कोने से सीधा सम्पर्क कर सकते हैं। लोग बहुत करीब आ गए हैं और आते रहेंगे। और, अब तक की आदतों की सारी सीमाएं मिटती जा रही हैं। नई चकित करनेवाली व्यवस्थाएं स्थापित हो रही हैं।

केवल विस्तार पर ही सोचना हो तो हमारे देश में रेल्वे का संजाल विश्व में दूसरे नम्बर का है। पिछले सात दशकों में रेल्वे के डिब्बे में बदन में चुभनेवाली पटिया की सीटों के बजाय अब गद्दे, सोने के लिए बिछौना, खानपान, वातानुकूलित डिब्बे आदि अनेक सुविधाएं उपलब्ध हुई हैं। पहले अपने गंतव्य पर जाने के लिए कई जगह ट्रेनें बदलनी होती थीं। अब बिना ट्रेन बदले एक गांव से दूसरे गांव तक बिनरुके सफर कर सकते हैं। ट्रेनों की गति तेज हुई है। स्टेशनों पर विभिन्न सुविधाएं मिलने लगी हैं। कंप्यूटरीकरण के कारण विभिन्न दिक्कतें हल हो रही हैं। फिर भी दुनिया की तुलना में हमारा सफर अब भी मंद है, यह भी सच है। कन्याकुमारी से कश्मीर तक पहुंचने में यदि दो दिन से अधिक का समय लगता हो तो यह भारत दर्शन प्रशंसनीय नहीं है। यही नहीं, लगभग जुड़वा बने मुंबई-पुणे अथवा दिल्ली-चंडिगढ़ जेसे महत्वपूर्ण शहरों की यात्रा में तीन घंटे से अधिक का समय लगे यह भी उचित नहीं है। इस स्थिति में सुधार के लिए अब अत्याधुनिक तंत्रज्ञान की सहायता से बुलेट ट्रेन जैसे विकल्पों पर गौर किया जा रहा है। उससे भी आगे का विचार हायपरलूप ट्रेन का है। बुलेट ट्रेन को भी यह तकनीक पीछे ढकेल देगी। एक घंटे में मुंबई-दिल्ली अंतर पार होगा, हवाई जहाज से भी लगभग अधिक गति से दौड़नेवाली हायपरलूप ट्रेन की कल्पना ही भौचक करनेवाली है। हमारे भविष्य के बारे में ऐसी अनेक चमत्कृत कर देनेवाली बातों का आज हम अनुभव कर रहे हैं। इंटरनेट, मोबाइल, डिजिटल से संचार के क्षेत्र में भविष्य में आनेवाली गतिशीलता के कारण भारत में सभी क्षेत्रों में चकित करनेवाला विकास होता रहा है। अब तक हुए बदलाव और भविष्य में होनेवाले बदलावों के बारे में सोचें तो मन में तरह-तरह के विचार आते हैं। शंका-कुशंकाओं का जाल बुनता है। यदि ऐसा हुआ तो उसका भारतीयों के भविष्य पर क्या असर पड़ेगा? भविष्य के लिए हम स्वयं को, परिवार को, समाज को किस तरह तैयार करेंगे? इन सारे परिवर्तनों का सामाजिक परिणाम क्या होगा? समाज और सरकार इन परिवर्तनों का किस तरह मुकाबला करेंगे? इन सारे प्रश्नों के विश्वसनीय उत्तर कहां मिलेगे और वे क्या होंगे यह हम आज निश्चित तौर पर नहीं बता सकते।

पिछले दशकों में हमने अपने आसपास सभी बातों, व्यवस्थाओं में उलटफेर होते देखा है। हमारी अब तक जारी या स्वतंत्रता के बाद नए सिरे से स्थापित सारी व्यवस्थाएं मूल रूप से बदल रही हैं। तकनीकी के आधार पर दुनिया, देश, समाज और व्यक्ति की सारी व्यवस्थाओं की नए सिरे से पुनर्रचना होते दिखाई दे रही है। इन महत्वपूर्ण बदलावों के सभी घटकों पर होनेवाले परिणामों के बारे में आज हम कोई पक्का अनुमान नहीं लगा पा रहे हैं। समाज, सरकार, विचारक इन बदलावों के संभाव्य परिणामों तथा इन परिणामों के भारतीय अर्थव्यवस्था, उद्योग, समाज, शिक्षा और व्यक्ति पर होनेवाले परिणामों का ऊहापोह कर ‘आगे क्या?’ इस पर बहस करते है॥ लेकिन वह किसी ठोस परिणाम की ओर न जाते हुए ‘संभावनाओं की मुलायम चर्चा’ भर रह जाती है।

‘डिजिटल भारत’ की संकल्पना भारत के विकास के पथ में सहायक हो रही है। भारत की अर्थव्यवस्था और उद्योगों में तेजी से होनेवाले बदलाव और उसके आर्थिक, सामाजिक लाभ समाज के सभी स्तरों पर पहुंचाने का ‘डिजिटल भारत’ सहायक माध्यम बन रहा है। डिजिटल संकल्पना में सूचना तकनीकी उद्योग का असाधारण महत्व होगा। कई परम्परागत उद्योगों में सूचनाओं का अधिकाधिक उपयोग कर उत्पादकता में उल्लेखनीय सुधार करने में डिजिटल व्यवस्था सहायक रहनेवाली है। भारत में आनेवाली नई तकनीक व उसके जरिए भारत के सभी क्षेत्रों का चेहरा ही बदलनेवाला है। अतः उसके लिए अनुकूल वातावरण निर्माण होना आवश्यक है। ऐसे समय प्रश्न उभरता है कि भारत की बौद्धिक सम्पदा के धनी युवक अमेरिका या अन्य विकसित राष्ट्रों में जाकर अधिक सफल होते दिखाई दे रहे हैं। यही युवक भारत में आए तो क्या सफल होंगे? इस प्रश्न का ईमानदार जवाब हमें खोजना होगा। ज्ञानाधारित उद्योग के क्षेत्र में भारतीय युवक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं, इसे भारतीय युवकों ने विश्व में साबित कर दिया है। यह ज्ञानशक्ति भविष्य में भारत की ओर मुड़नी चाहिए।

प्राकृतिक संसाधनों से सम्पन्न विस्तृत भूभाग, विश्व के नक्शे में भू-राजनीतिक द़ृष्टि से मौके का स्थान, बड़ी अर्थव्यवस्था, सुस्थापित औद्योगिक क्षमता, तुलनात्मक दृष्टि से विशाल जनसंख्या, बड़े पैमाने पर युवा शक्ति और प्रशिक्षित मानव संसाधन, सक्षम फौज, दिक्कतें होने के बावजूद लगभग ठीक से चल रही लोकतांत्रिक सरकार आदि अनेक क्षमताएं होने के बावजूद भारत वैश्विक क्षितिज पर महासत्ता के रूप में अपना सम्मानपूर्वक स्थान अब तक प्राप्त नहीं कर सका है। महासत्ता बनने के लिए देश के नेतृत्व और नागरिकों के समक्ष उसकी स्पष्ट कल्पना रखना सफलता का पहला सोपान है। बाद में उस संकल्पना को प्रत्यक्ष में उतारने के लिए दूरदृष्टि रखनेवाले नेतृत्व की अत्यंत आवश्यकता है। आज भारत के पास वैसा नेतृत्व है, फिर भी महासत्ता बनने के लिए कीमत चुकाने की तैयारी, जिद और प्रदीर्घ प्रयास करनेवाली सरकार इसके पूर्व भारत को कभी नहीं मिली यह भी सत्य है।

हाल में भारत के महासत्ता बनने की यात्रा के बारे में जो चर्चा विश्व के विकसित राष्ट्रों में हो रही है उसमें भारत में तेजी से बढ़नेवाला मध्यमवर्गीयों का बाजार और उससे उपलब्ध विशाल बाजार महत्वपूर्ण कारक हैं। इसे हमें अवश्य ध्यान में रखना चाहिए। भारत का हजारों वर्षों का गौरवशाली इतिहास है। हमारी संस्कृति, परम्परा महान है यह सच ही है। लेकिन इस कारण से विश्व हमारी महानता स्वीकार कर महासत्ता का पद हमारी झोली में नहीं डालेगा। हमें तो भारत की संस्कृति, परम्परा से प्राप्त तेज को प्रभावी कर भारतीय महत्वाकांक्षा की रश्मियां प्रतिरक्षा, व्यापार-उद्योग, शिक्षा, सामाजिक भाव, अंतरराष्ट्रीय प्रभाव इन क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से दिखाई देनी चाहिए। ऐसा हो तभी हमने महासत्ता की दिशा में कदम उठाए यह माना जाएगा। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूप में देश को एक द्रष्टा और वैश्विक स्तर पर अपनी भूमिका दृढ़ता से रखनेवाला नेतृत्व मिला है। लेकिन इसके साथ यह भी आवश्यक है कि आरक्षण, जातीयता, महिलाओं की उपेक्षा, अंधश्रद्धा में ही उलझा भारतीय मन इनसे बाहर निकलें। भारत ने अपने बारे में यह धारणा बनाकर रखी है कि ‘भारत एक समझदार और जिम्मेदार देश है’। मौका पड़ने पर अवमान भी पचाकर विश्व शांति बनाए रखनी चाहिए यह उदात्त भूमिका भारत की है। पाकिस्तान के सीधे हमारी संसद पर भी आतंकवादी हमला करवाने के बावजूद हम अपना संयम नहीं टूटने देंगे, करगिल युद्ध में भी अपनी ही भूमि वापस लेने के लिए प्रत्यक्ष नियंत्रण रेखा पार नहीं करेंगे जैसी हमारी दब्बू भूमिका है। लेकिन जरा सोचिए कि वैश्विक स्तर पर अपना सामार्थ्य सिद्ध करने में क्या हमारी यह अच्छाई काम आई? नहीं। वैश्विक स्तर पर मौजूद शक्ति को मौका आने पर चुनौती देकर हमें अपना अपेक्षित स्थान छीन लेना होता है। यह प्रक्रिया कभी समझाने-बुझाने की नहीं होती, बल्कि शक्ति स्थान की ओर ले जानेवाली होती है। 1974 में पहले परमाणु विस्फोट के बाद दूसरे परमाणु विस्फोट के लिए 1998 तक हमें इंतजार करना पड़ा। और, आज हमें लड़ाकू विमानों समेत हमारी आवश्यकता के 70 फीसदी हथियार विदेशों से आयात करने पड़ते हैं।

डोकलाम मामले में भारत ने साबित कर दिया है कि चीन की दादागीरी को कोई यदि चुनौती देने तैयार हो जाए तो उसे रोका जा सकता है। चीन का मुकाबला न्यू इंडिया के साथ है। जिस भारत का नेतृत्व समर्थ है, जिसे पूरा राष्ट्रीय समर्थन है, उसने किसी भी मामले में कमजोरी नहीं दिखाई और चीन को पीछे हटना पड़ा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न्यू इंडिया का यह सामर्थ्य दिखा दिया कि हम केवल भारत के लिए ही नहीं बल्कि भूटान जैसे छोटे देश की सुरक्षा के लिए भी चीन से टक्कर ले सकते हैं। इसमें किसी तरह का वैचारिक संभ्रम नहीं, होहल्ला नहीं। चीन की युद्ध की धमकी से विचलित न होते हुए, चीन के गुर्राने से न डरते हुए मोदी ने लक्ष्मण रेखा का सम्मान कर चीन को पीछे हटने के लिए बाध्य किया। अब भारत चीन की दादागीरी को घास नहीं डालता। यह न्यू इंडिया है। और, नेतृत्व भी ऐसा है कि किसी भी स्थिति के आगे नहीं झुकेगा, यह साबित हो गया। यह भारत के लिए बड़ा परिवर्तन है। इसका भविष्य पर बड़ा प्रभाव पड़नेवाला है। लेकिन चीन डोकलाम का बदला अवश्य लेगा, समय और स्थान वह अपने हिसाब से तय करेगा। भारत और चीन के बीच 4000 किमी की लम्बी सीमा है। चीन कहीं भी गड़बड़ी कर सकता है। चीन का केवल भारत से संघर्ष नहीं है; बल्कि नरेंद्र मोदी के रूप में भारतीय नेतृत्व वैश्विक स्तर पर उसके लिए चुनौती है। चीन वहां भारत को बड़ी क्षति पहुंचाने की कोशिश करेगा यह निश्चित है। यह चीऩ का इतिहास है। माओ और चाऊ की नेहरू के नेतृत्व की चुनौती थी, जो 1962 में चीन-भारत युद्ध में परिवर्तित हुई। लेकिन आज न्यू इंडिया 1962 की तुलना में कई गुना शक्तिशाली है।

1947 से 2018 तक परिवर्तन की चर्चा करते समय एक बात अनुभव होती है कि सूचना क्रांति से भारत के सभी देहात, गांव, शहर एक-दूसरे से जुड़ गए हैं। 1980 के दशक में भारत में केवल 20 लाख फोन थे। अब 2018 में आधा भारत संचार माध्यमों से जुड़ा है। इसी कारण भारत एक-दूसरे से जुड़ा राष्ट्र बन गया है। इंटरनेट, मोबाइल, डिजिटल के क्षेत्र में आए परिवर्तन भारत को विश्व में मान्यता प्रदान करनेवाले हैं। सम्मान, मानव संसाधन, विश्वास और व्यापार में वृद्धि हो रही है। लेकिन हम इन सबका क्या करनेवाले हैं यह भी एक मुद्दा है ही। नए सिरे से उपलब्ध अत्याधुनिकता के, संवाद बनाने के अवसर का उपयोग कर देश किस तरह, किस गति से और किस दिशा में बढ़ रहा है- यह सवाल अब अपनी नीतिगत चर्चाओं के मूल में होना चाहिए। हमारे यहां इंटरनेट, स्मार्टफोन, सुपर डाटा, रोबोटिक्स सुविधा आदि सबकुछ आ गया है। इन सबके साथ अब आगे क्या हो?

तकनीकी ज्ञान के विकास के साथ हमारे जीवन के अधिकांश क्षेत्रों का विकास हुआ है। मृत्यु दर घट गई है। संवाद क्षेत्र विकसित हुआ है। संचार व्यवस्था सुधर गई है। लेकिन आज भी गरीबी, भुखमरी, आतंकवाद, जाति-जातियों के बीच द्वंद्व, अंधश्रद्धा, विषमता, धार्मिक द्वेष जैसी समस्याओं को हम हल नहीं कर पाए हैं। ग्रामीण-शहर भेद मिटने के बजाय और गहरा होता जा रहा है। सुशिक्षित- अशिक्षित जैसा नया वर्ग-भेद बनते जा रहा है। देश का हर घटक जाति के आधार पर आरक्षण की मांग के लिए हिंसक होता जा रहा है। अफवाह के आधार पर मासूम लोगों की जान ली जा रही है। केवल जीडीपी, प्रति व्यक्ति आय, देश का बजट, व्यापार में वृद्धि जैसे पैमाने लगाकर ही क्या देश के विकास की गणना की जा सकती है? यह गंभीर प्रश्न आज मन में उभर रहा है। विकास की गणना करते समय किसी देश में शांति है या नहीं, लोग प्रसन्न हैं या नहीं- क्या ये मानक होंगे? इसकी रूपरेखा भी हमारे समक्ष आना शेष है।

भारत को एक शरीर मान लें तो विकास शरीर का बाहरी हिस्सा हुआ। सामाजिकता, सुशिक्षितता, महिलाओं के प्रति सम्मान, जाति-पांति विरहित समाज व्यवस्था, रोजगार उपलब्धता, अंधश्रद्धा रहित माहौल, शिक्षा का प्रसार व जाति-पांति के आरक्षण के बजाय मूल सामर्थ्य के आधार पर आरक्षण देने का माहौल पैदा होना याने भारत का पूर्ण शरीर विकसित होना है। लेकिन 1947 से 2018 तक विकास के बड़े-बड़े मानक हमने पार किए लेकिन समाज की इस घुन को हम खत्म नहीं कर पाए। दुनिया बदल रही है और उसके प्रभाव भी दिखाई दे रहे हैं। पिछले दस वर्षों में सुनामी की तरह अचानक आई और सर्वत्र उफन उठी अत्याधुनिकता का क्या करें? इस कनेक्टिविटी को कैसे सम्हालें? यही लोगों को ठीक से पता नहीं होता। जरूरी यह है कि इससे उत्पन्न संदर्भहीनता, संभ्रम, अनिश्चितता का एक नया मॉडल भविष्य में न उभरे इसके प्रति हमें सजग रहना होगा। अबतक हमारी आदतों में शुमार सभी बातें क्या मिटती जा रही हैं? अब क्या करें? ये प्रश्न लोगों को सताने लगे हैं। क्या पहले का कुछ नहीं रहेगा? सारी व्यवस्था बदलेगी याने ठीक से कैसे बदलेगा? फिर हमारे जीने का क्या होगा? हमारे अस्तित्व का क्या होगा? ये प्रश्न लोगों को परेशान करने लगे हैं। मेरी संस्कृति का क्या होगा? मेरे मूल्यों का क्या होगा? अंत में एक व्यक्ति के रूप में मेरे जीने का क्या अर्थ है? इस तरह भूत काल से लेकर भविष्य काल तक लोग विचार कर रहे हैं। नया भारत निर्माण होते समय भूत काल व भविष्य काल को ध्यान में रखते हुए इन प्रश्नों के उत्तर नए भारत की पीढ़ी को ही खोजने होंगे। सामने कौन हैं- उसका धर्म, लिंग, जाति, भाषा, वंश क्या है इसका यत्किंचित विचार मन में न रखते हुए देहातों से शहरों तक ‘भारत एक है’ यह विचार भविष्य में चले इस तरह के भारत का निर्माण करने के प्रयास होने चाहिए। इंटरनेट, डिजिटल से नए भारत की रचना की रूपरेखा बन रही है। प्रतिरक्षा, अत्याधुनिक विकास हम करेंगे ही; 1947 से लेकर 2018 तक के सफर में उसे हमने साबित किया भी है। लेकिन भारतीय मन विकसित होकर एक दूसरे के मन की कनेक्टिविटी करना यह नए भारत की नई रूपरेखा में होना आवश्यक है। यदि विषमता, जातिवाद, आरक्षण की मांग, शैक्षणिक असमानता से व्यक्ति, समाज, समुदाय सड़ता जा रहा हो तो अत्याधुनिक विकास महत्वपूर्ण नहीं होता।

भारत प्राचीन काल से विश्व के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है। इसी भारत देश ने विश्व को आध्यात्मिक, भौतिक ज्ञान के साथ चांद-सितारों का विज्ञान भी ज्ञान रूप में दिया है। आज प्राचीन ज्ञान कुछ ऐतिहासिक कारणों से हम तक नहीं आया है। फिर भी हम अत्यंत विश्वासपूर्वक मार्गक्रमण कर रहे हैं। यही हमारी विशेषता है। स्वतंत्रता के बाद फैले भ्रष्टाचार के देशभर में अनेक आघात हुए। सभी क्षेत्र इसके भुक्तभोगी हैं। लेकिन भविष्य पर भरोसा रखकर सतत मार्गक्रमण करनेवाला भारतीय मानस कभी थमता नहीं है। फीनिक्स पक्षी की तरह फिर से उड़ान भरने का हुनर भारतीयों में है। यही कारण है कि कुछ ही वर्षों पूर्व स्वतंत्र हुआ भारत सभी क्षेत्रों में प्रभावी बदलाव कर भविष्य में जगद्गुरु होने का स्वप्न देख रहा है।

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