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 प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया अमेरिकी दौरे से दोनों देशों में मैत्री के नए अध्याय की शुरूआत हुई है। ओबामा प्रशासन ने मोदी की इस यात्रा को ‘ऐतिहासिक’ करार देते हुए भारत -अमेरिका सम्बंधों के उनके दृष्टिकोण को ‘मोदी सिद्धांत’ का नाम दिया है। दक्षिण और मध्य एशिया के लिए अमेरिका की सहायक विदेश मंत्री निशा बिस्वाल ने कहा है कि ‘मोदी सिद्धांत’ ने एक विदेश नीति तैयार की जिसने इतिहास की हिचकिचाहट को दूर किया और दोनों देशों एवं हमारे साझा हितों के बीच समानता को गले लगाया। उन्होंने कहा कि यह मोदी सिद्धांत कहता है कि आपसी सहमति से बनाई गई सुरक्षा व्यवस्था की अनुपस्थिति में अनिश्चितता पैदा होती है और ये सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय कानूनों एवं नियमों के लिए भारत के समर्थन को दोहराता है तथा अन्य देशों से भी समर्थन की अपील करता है।
       प्रधान मंत्री के अमेरिकी कांग्रेस के संयुक्त सत्र को संबोधित करने के बाद दोनों सदनों के सदस्यों ने भारत और अमेरिका के बीच सम्बंधों को मजबूत करने की पैरवी की। सीनेट में बहुमत पक्ष के नेता मिच मैक कोनेल ने कहा, ‘हम व्यापारिक साझेदार हैं। दुनिया के दो सब से बड़े लोकतंत्र हैं। हमारे सम्बंध महत्वपूर्ण हैं और ऐसे कई फायदे हैं जिनको भविष्य में सहयोग से साझा किया जा सकता है।’
      प्रधान मंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान मिसाइल टेक्नॉलॉजी संगठन (एमटीसीआर) में भारत को जगह मिलना सुनिश्चित हो गया। इसकी अधिकृत घोषणा जून के अंत तक किए जाने की संभावना है। १९८७ में स्थापित एमटीसीआर का मकसद ऐसी मिसाइलों के प्रयोग को सीमित करना है, जिनका इस्तेमाल रासायनिक, जैविक और परमाणु हमलों के लिए किया जा सकता है। एमटीसीआर अपने सदस्यों से अपील करता है कि वे ५०० किलोग्राम के पेलोड की अपनी ३०० किलो मीटर तक की दूरी पर ले जा सकने वाली मिसाइल, इससे जुड़ी तकनीक और सामूहिक तबाही वाले किसी भी हथियार की बिक्री किसी अन्य देश को न करें। गौरतलब है कि एमटीसीआर में प्रवेश के लिए उसके सभी सदस्यों की सहमति आवश्यक है। भारत उन पांच देशों में से एक है जो २००८ से ही एमटीसीआर की सभी शर्तों का एकतरफा पालन कर रहे हैं। अमेरिका उसी समय से भारत को एमटीसीआर में शामिल करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इटली भारत की सदस्यता का विरोध करता आ रहा है। अब इटली का समर्थन हासिल हो जाने से भारत का मिसाइल टेक्नॉलॉजी रिजीम का हिस्सा बनना लगभग पक्का हो गया था। फिर भी भारत ने हाल ही में ‘हेग कोड ऑफ कंडक्ट’ पर भी हस्ताक्षर किया है, जिससे एमटीसीआर के लिए हमारी दावेदारी बढ़ गई है। ‘हेग कोड ऑफ कंडक्ट’ एक स्वैच्छिक बैलिस्टिक मिसाइल अप्रसार समझौता है, जिसे एमटीसीआर का पूरक माना जाता है। एमटीसीआर का सदस्य बनने बाद भारत के लिए अमेरिका से ड्रोन तकनीक पाना आसान हो जाएगा। साथ ही भारत निचले दर्जे की मिसाइल टेक्नॉलॉजी का निर्यात भी कर सकेगा।
      एमटीसीआर का सदस्य बनने के बाद भारत को परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी)में शामिल होने की राह में मदद मिलेगी। वार्सेनार अरेंजमेंट, ऑस्ट्रलिया ग्रुप और एमटीसीआर तथा एनएसजी दुनिया के उन चार विशिष्ट क्लबों में हैं जो परमाणु और मिसाइल तकनीक तथा इससे जुड़ी सामग्री के अवैध निर्यात पर नजर रखता है। १९७४ में स्थापित एनएसजी ४८ देशों का समूह है। इस समूह का मकसद है कि परमाणु सामग्री का इस्तेमाल बिजली बनाने जैसे शांतिपूर्व कामों के लिए हो। एनएसजी यह भी सुनिश्चित करता है कि परमाणु आपूर्ति का फौजी इस्तेमाल न हो। गौरतलब है कि एनएसजी के ४८ देशों मे से अगर एक देश भी भारत को शामिल करने का विरोध करता है तो एनएसजी में भारत को शमिल नहीं किया जा सकता।
      भारत की एनएसजी की सदस्यता मिलने में चीन सबसे बड़ा बाधक बना हुआ है। उसे न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका, तुर्की, ऑस्ट्रिया और आयरलैंड का भी समर्थन प्राप्त है। यह बात उल्लेखनीय है कि एनएसजी के बावजूद पाकिस्तान और उत्तर कोरिया परमाणु और मिसाइल ताकत बन गए। इसी श्रेणी में ईरान का भी नाम लिया जाता है। यह एक खुला रहस्य है कि पाकिस्तान और उत्तर कोरिया को परमाणु और मिसाइल ताकत बनाने में चीन का हाथ रहा है। इसके बाद ईरान को परमाणु ताकत बनाने में चीन और पाकिस्तान की भरपूर मदद मिली।
      सन २००८ में जब भारत और अमेरिका के बीच परमाणु सहयोग समझौता सम्पन्न हुआ था तब भी चीन ने भारत विरोधी रुख दिखाया था। उस समय भारत अमेरिका परमाणु सहयोग समझौता इस्तेमाल होने के लिए यह जरुरी था कि एनएसजी की निर्यात बंदिशें भारत पर से उठ जाए। तब तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश ने चीनी राष्ट्रपति को खुद फोन कर आग्रह किया था कि एनएसजी की बंदिशें भारत पर से हटाने का जो प्रस्ताव एनएसजी की बैठक में रखा गया है चीन उसका विरोध न करें।
     एनएसजी की बंदिशें हटने का भारत को लाभ यह मिला कि भारत ने परमाणु तकनीक रखने वाले और परमाणु ईंधन पैदा करने वाले कई देशों के साथ परमाणु सहयोग समझौता किया। इससे भारत को परमाणु ईंधन यूरेनियम की आपूर्ति होने लगी जिससे भारत के परमाणु बिजली घर अपनी पूरी क्षमता से चलने लगे। भारत में परमाणु ईंधन यूरेनियम का इतना उत्पादन नहीं होता है जिससे भारतीय परमाणु बिजली घरों के परमाणु ईंधन की जरूरतें पूरी हो सकें। भारत पर एनएसजी प्रतिबंध इसलिए लगा था कि भारत ने परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर दस्तखत नहीं किए थे। इस बार भी जब एनएसजी की सदस्यता का सवाल उठा है तब चीन एनपीटी की सदस्यता को आधार बना कर भारत की सदस्यता का विरोध कर रहा है।
       वाशिंगटन मे राष्ट्रपति ओबामा ने प्रधान मंत्री मोदी से साफ शब्दों में कह दिया है कि २०-२४ जून को दक्षिण कोरिया की राजधानी सोल में एनएसजी की प्रस्तावित बैठक में अमेरिका भारत की सदस्यता का औपचारिक समर्थन करेगा। लेकिन इस मसले पर चीन ने अपना रुख और कड़ा बना लिया है। इसके पहले वह यही कहता रहा है कि एनएसजी की सदस्यता के दावेदार और देश (जैसे पाकिस्तान) भी हैं। इसलिए जब भारत को इसकी सदस्यता दी जाती है तो इसी क्षेत्र के दूसरे महत्वपूर्ण देश पाकिस्तान को भी सदस्यता दी जाए। यह बात जगजाहिर है कि एक परमाणु ताकत के तौर पर पाकिस्तान कितना गैरजिम्मेदार देश है। इसके बावजूद चीन पाकिस्तान के समर्थन में अड़ा हुआ है। यह जानते हुए भी कि पाकिस्तान ने भारत की तरह एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। चीन भारत को काटने के लिए पाकिस्तान का नाम ले रहा है।
     वाशिंगटन में सात जून को ओबामा-मोदी वार्ता के बाद उल्लेखनीय निष्कर्ष यह निकाला जा सकता है कि चीन की चुनौतियों के मद्देनजर दोनों देश अब चीन के खिलाफ और नजरआएंगे। भारत को अत्याधुनिक सैन्य साजो-सामान हस्तांतरित करने और भारत में परमाणु बिजली घर लगाने पर हुई अमेरिकी सहमति से दोनों देश दशकों के लिए एक दूसरे पर निर्भर होकर आपसी सम्बंध में बंध जाएंगे।
     ऐसा लगता है कि २१वी सदी में अमेरिका और उसके साथी देशों तथा चीन के बीच शीत युद्ध की स्थिति उभरने वाली है। चीन को रोकने के लिए अमेरिका ने एशिया रिबैलेंसिंग की नीति घोषित की है जिसमें सीधे तौर पर भागीदार बनने से भारत कतराता रहा है। परंतु, ओबामा-मोदी वार्ता के बाद भारत को अमेरिका का प्रमुख रक्षा साझेदार बनाने की बात जिन शब्दों में कही गई है, उससे साफ है कि आने वाले सालों में भारत- अमेरिका के रक्षा रिश्तें न केवल सैनिक साजो-सामान हासिल करने के लिए गहरे होंगे; बल्कि रणनीतिक स्तर पर भी दोनों देश चीन विरोधी अभियान में एकसाथ होंगे। भारत और अमेरिका नाटो जैसे किसी सामरिक गठबंधन में बंध गए हैं ऐसा तो अभी नहीं कहा जा सकता, लेकिन अमेरिकी प्रशासनिक दल को भारत को विशिष्ट दर्जा देने की बात से इतना तो साफ हो गया है कि अमेरिका भारत को अपने खेल में शामिल करने के लिए बेहद उत्सुक है।
       ओबामा-मोदी शिखर वार्ता के बाद जारी संयुक्त बयान में चीन सागर का नाम इस बार नहीं लिया गया है, लेकिन जिन शब्दों में इस इलाके के विवादों को आपसी बातचीत से सुलझाने और नौवहन की आजादी सुनिश्चित करने की बात कही गई है उससे इशारा साफ है। यह समुद्री इलाका काफी व्यस्त व्यापारिक मार्ग है जहां से एशिया- प्रशांत देशों के बीच भारी व्यापारिक आदान-प्रदान, व्यापार होता है जिसकी चौकसी के लिए यह जरूरी है कि यह रास्ता हमेशा खुला रहे और इस पर किसी का आधिपत्य न रहे, ताकि इससे होकर भारत आने जाने वाले व्यापारिक जहाजों को बेरोकटोक आवाजाही का मौका मिले। पर, जिस तरह चीन ने दक्षिण चीन सागर के कई द्वीपों पर अपना अधिकार जताया है, यदि उसे वैधता प्रदान कर दी जाए तो दक्षिण चीन सागर के ८५ प्रतिशत इलाके पर चीन की संप्रभुता कायम हो जाएगी और यहां से होकर गुजरने वाली जमीनी और हवाई दोनों तरह की आवाजाही पर चीन का नियंत्रण होगा। चीन यदि चाहे तो किसी देश के व्यापारिक आवागमन में बाधा पैदा कर सकता है। यह स्थिति न केवल भारत बल्कि अमेरिका और जापान के अलावा दक्षिण चीन सागर के सभी तटीय देशों के लिए खतरनाक होगी। चीन कहता रहा है कि दक्षिण चीन सागर पर उसका सदियों से अधिकार रहा है इसलिए इस इलाके में पड़ने वाले द्वीप भी उसी के हैं। फि लीपींस, बु्रनेई, ताइवान, वियतनाम, मलेशिया आदि देश चीन के इस दावे को नकारते हैं। ये देश इन द्वीपों पर अपना अधिकार भी जताते हैं।
       अमेरिका, जापान और अन्य देशों की तरह भारत भी खुलेआम कहता रहा है कि इन द्वीपों पर अधिकार का मसला १९८२ में बने समुद्री अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक हल हो। इसके लिए चीन को सभी सम्बंधित देशों के साथ सामूहिक तौर पर बातचीत करनी होगी। परंतु चीन ऐसा करने से कतरा रहा है और विवाद से जुड़े मुल्कों के साथ अलग-अलग साझी बातचीत के जरिए मसला हल करना चाहता है। साफ है कि वह इन देशों पर दबाव डाल कर उनके द्वारा विवादस्पद द्वीपों पर अपना अधिकार जताने के खिलाफ में है। चीनी अधिकारी तो अब खुले शब्दों में कहने लगे हैं कि दक्षिण चीन सागर पर अधिकार कायम करने से चीन को कोई नहीं रोक सकता। इसे रोकने के लिए भारत, अमेरिका और उसके साथी देश लामबंद होने की जरूरत महसूस कर रहे हैं।

                                                                                                                          

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