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1991 के बाद से देश आर्थिक सुधार की जिस राह पर आगे बढ़ा, उस पर संप्रग सरकार के दूसरे कार्यकाल के अलावा उसकी दौड़ तेज ही रही। यही वजह है कि देश की आर्थिक विकास दर 1947 की तुलना में 20 गुना से भी अधिक हो गई है। इससे भारत विश्व की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है।

इसी वर्ष जुलाई में भारत सुर्खियों में आ गया, जब वह फ्रांस को पछाड़कर दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के वर्ल्ड इकनॉमिक आउटलुक के मुताबिक 2017 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 2.59 लाख करोड़ डॉलर पर पहुंच गया। उसी समय फ्रांस का जीडीपी 2.58 लाख करोड़ डॉलर रहा था। इस मोर्चे पर फिलहाल अमेरिका, चीन, जापान, जर्मनी और ब्रिटेन ही भारत से आगे हैं। लेकिन पिछले वर्ष ब्रिटेन का जीडीपी 2.62 लाख करोड़ यानी भारत से मामूली अधिक ही था और आईएमएफ के मुताबिक 2019 में भारत ब्रिटेन को भी पछाड़कर पांच सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार हो सकता है।

यह कोई मामूली बात नहीं है क्योंकि आजादी के समय और उसके बाद के वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था की जो लचर हालत थी, उसे देखते हुए शायद ही किसी ने कल्पना की हो कि 70 वर्ष में भारत यहां तक पहुंच जाएगा। आजादी के समय भारत का जीडीपी केवल 2.70 लाख करोड़ रुपये था, जो 1950 तक 2.80 लाख करोड़ रुपये तक ही पहुंच पाया था। उस समय भारत की अर्थव्यवस्था एकदम जर्जर हालत में थी और हर जगह गरीबी और आर्थिक असमानता थी। खाद्यान्न की समस्या मुंह बाए खड़ी थी। ऐसे में जवाहरलाल नेहरू की तत्कालीन सरकार ने समाजवादी रवैया अपनाया और देश की आर्थिक वृद्धि बहुत धीमी दर से हुई। वृद्धि कितनी लचर थी, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1980 के दशक के बाद के वर्षों तक हमारा जीडीपी करीब 3 प्रतिशत की वार्षिक दर से ही बढ़ रहा था। लेकिन उसी दौरान दक्षिण कोरिया की वृद्धि दर 10 प्रतिशत थी और छोटा सा ताइवान भी 12 प्रतिशत की वृद्धि दर दिखा रहा था।

अगर भारतीय अर्थव्यवस्था को ध्यान से देखें तो नीतिगत पहलों के मुताबिक इसे तीन कालों में बांटा जा सकता है – 1947 से 1991 तक, 1991 से 2014 तक और 2014 के बाद। 1991 को मील का पत्थर इसीलिए माना जाता है क्योंकि पी वी नरसिंह राव के सत्तारूढ़ होने के साथ ही उस वर्ष आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत कर दी गई थी, जिसके बाद भारत ने आर्थिक राह पर कुलांचे भरने आरंभ कर दिए थे।

1947-1991

आजादी के बाद से लेकर 1991 तक वृद्धि दर अगर घोंघे की गति से बढ़ रही थी तो इसके पीछे तत्कालीन परिस्थितियों के साथ ही सरकार की नीतियां भी जिम्मेदार थीं। 1947 से 1960 के बीच की बात करें तो निस्संदेह भारी जनसंख्या, भुखमरी, रोजगार की कमी, बुनियादी ढांचे की किल्लत जैसी दिक्कतों के बीच उद्योग लगाना नेहरू सरकार के लिए आसान काम नहीं था और चीन तथा पाकिस्तान के साथ युद्ध की तपिश भी हमें झेलनी पड़ी थी। लेकिन परमिट राज, लाइसेंस राज, नई तकनीक के प्रति बेरुखी, पूंजीवादियों और राजनेताओं की गलबाहियां, पारदर्शिता की कमी और विदेश से आयातित आर्थिक नीतियों ने भी अर्थव्यवस्था को कम नुकसान नहीं पहुंचाया। हालांकि हरित क्रांति और बैंकों के राष्ट्रीयकरण जैसे कुछ कदम जरूर क्रांतिकारी कहलाएंगे।

हरित क्रांति

किसी समय घटिया गेहूं आयात करने के लिए भी अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया पर निर्भर भारत में खेती की सूरत हरित क्रांति ने एकदम बदल दी। बेशक आजादी के इतने वर्ष बाद भी सिंचाई के लिए वर्षा पर निर्भर रहना भारतीय कृषि की विडंबना है, लेकिन यह भी सच है कि हरित क्रांति ने हमें शुद्ध आयातक से कई फसलों का शुद्ध निर्यातक बना दिया। 1967 से 1978 के बीच बेहतर बीज, उर्वरक, सिंचाई के बेहतर साधनों आदि के जरिये कृषि उत्पादन में अच्छी खासी वृद्धि की गई, जिसके फायदे आज भी नजर आते हैं। गेहूं का उत्पादन तो 1965 से 1969 के बीच ही 50 प्रतिशत बढ़ गया था और दूसरे अनाजों में भी हरित क्रांति ने हमें आत्मनिर्भर बना दिया। हरित क्रांति ने भूखे देश का पेट भर दिया, यह श्रेय कोई नहीं छीन सकता।

सहकारिता कार्यक्रम

हरित क्रांति के दौर में ही सरकार ने सहकारिता आंदोलन को भी बढ़ावा दिया था। उसका नतीजा आज भी दिखता है, जब अमूल जैसा सहकारी आंदोलन दुग्ध उत्पादन में हमें कई कदम आगे खड़ा कर देता है। चीनी उत्पादन में दुनिया के तीन शीर्ष देशों में भारत को खड़ा करने का श्रेय भी सहकारी चीनी मिलों को ही जाता है।

बैंकों का राष्ट्रीयकरण

इंदिरा सरकार द्वारा किया गया बैंकों का राष्ट्रीयकरण भी ऐसा ही कदम था, जिसने भारत में बैंकिंग की सूरत ही बदल दी। 19 जुलाई, 1969 को निजी क्षेत्र के 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने से बैंकिंग में लोगों का भरोसा भी बढ़ा और इस क्षेत्र की प्रगति का रास्ता भी खुल गया। आज वाणिज्यिक बैंक शाखाओं का सबसे बड़ा नेटवर्क भारत में ही है और ग्राहक भी बहुत अधिक हैं।

लेकिन इनके अलावा अर्थव्यवस्था को गति देने वाली कोई नीति 1991 तक नहीं रही। 1985 के बाद स्थिति इतनी तेजी से बिगड़ी कि विदेशी मुद्रा भंडार केवल 24 करोड़ डॉलर पर सिमट गया, जिससे दो सप्ताह तक ही आयात किया जा सकता था। भारत को उस दौरान सोना भी गिरवी रखना पड़ा था। ऐसे में आईएमएफ और विश्व बैंक की शर्तों के मुताबिक आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत करनी ही पड़ी, जिसका बीड़ा नरसिंह राव ने उठाया।

1991-2014

राव ने अपने वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के साथ मिलकर जो पहलें कीं, उन्होंने आर्थिक इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण पन्ने लिखे। उन्होंने आयात शुल्क, सीमा शुल्क आदि की दरें घटा दीं, विनिमय दर की नीति बदल दी, उद्योगों के लिए लाइसेंस की नीति नरम बना दी और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की नीति में भी ढिलाई दे दी। इससे भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की कतार लग गई। 1991 से पहले किसी भी विदेशी कंपनी को भारत में कारोबार करने के लिए किसी देसी कंपनी के साथ साझा उपक्रम बनाना ही पड़ता था और तकनीक भी उसे देनी पड़ती थी। साथ ही उपक्रम में विदेशी कंपनी की साझेदारी 40 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती थी। राव ने ये अड़चनें खत्म कर दीं और तमाम क्षेत्रों में निवेश शुरू हो गया। यात्री कार निर्माण में अगर भारत आज अव्वल देशों में है तो उसका कारण ये नीतियां ही हैं।

नरसिंह राव सरकार ने अगर आर्थिक उदारीकरण शुरू किया तो अटल बिहारी वाजपेयी सरकार का ध्यान बुनियादी ढांचे और खजाने को मजबूती देने पर टिका रहा। हालांकि उनकी सरकार को करगिल युद्ध जैसी चुनौतियों से रूबरू होना पड़ा था, लेकिन इन दोनों मोर्चों पर वह पीछे नहीं हटे। स्वर्णिम चतुर्भुज योजना जैसे कार्यक्रमों के जरिये वाजपेयी सरकार ने देश भर में राजमार्गों का बेहतर निर्माण कराया और आर्थिक रूप से बेहद पिछड़े इलाकों को भी मुख्य धारा में लाने के लिए सड़कों से जोड़ा। इसका फायदा कई तरह से हुआ क्योंकि सड़कें उद्योगों के लिए पहली शर्त होती हैं और सड़कें बेहतर होने से विदषी कंपनियों और देसी उद्योगों ने अपने पांव पसारने में देर नहीं लगाई।

वाजपेयी सरकार का एक बड़ा कदम राजकोषीय दायित्व एवं बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) अधिनियम, 2003 को पारित कराना था। इससे तमाम राज्य भी अपनी राजकोषीय नीतियों में सुधार करने के लिए मजबूर हुए और जीडीपी की तुलना में राजकोषीय घाटे का अनुपात घटकर 3 प्रतिशत के करीब रह गया। इससे राज्य सरकारों ने भी कर्ज लेकर खर्च करना बंद कर दिया। नतीजतन निजी क्षेत्र ने खर्च बढ़ा दिया और आर्थिक वृद्धि की गति पहले से भी तेज हो गई।

वाजपेयी सरकार के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार ने लगातार दो कार्यकालों तक शासन किया। पहले कार्यकाल में उसने वाकई कराधान में सुधार समेत कुछ अच्छी पहल कीं, लेकिन उसके दूसरे कार्यकाल में भ्रष्टाचार का बोलबाला रहा। मनमोहन सिंह जैसे अर्थशास्त्री के प्रधानमंत्री रहते हुए भी नीतियों और सुधार के मोर्चे पर मामला आगे नहीं बढ़ा और कई अहम मामलों में सरकार ने चुप्पी साध ली। बहरहाल वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का खाका तैयार करने का श्रेय उनकी सरकार को दिया जाना चाहिए, जिसे नरेंद्र मोदी की सरकार ने लागू कर अप्रत्यक्ष कर प्रणाली को सुचारू रूप प्रदान कर दिया।

2014 और उसके बाद

मोदी सरकार जब प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई तो सुधार के पक्षधरों को उससे बहुत उम्मीद थीं और उन पर खरा उतरने की पूरी कोशिश भी उसने की। पूंजी बाजार नियामक सेबी को अधिक अधिकार देने, हरेक व्यक्ति को बैंकों से जोड़ने, एफडीआई की शर्तें और नरम बनाने, खुदरा क्षेत्र को जबरदस्त बढ़ावा देने, वित्त आयोग की शर्तें मानकर राज्यों को अधिक राशि देने, नोटबंदी करने और जीएसटी लागू करने जैसे कई ऐतिहासिक कदम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उठाए।

नोटबंदी और जीएसटी

रियल एस्टेट में कीमतें गिरने जैसे प्रत्यक्ष और आम लोगों के लिए हितकारी नतीजे तो प्रत्यक्ष नजर आते हैं। इसके अलावा अधिक सुविधाजनक डिजिटल भुगतान को इससे बढ़ावा मिला है, इसमें भी कोई विवाद नहीं है। जीएसटी ने पूरे देश में कर की दर एक समान करके आम जनता और कारोबारी दोनों को काफी राहत दी है। वाजपेयी सरकार की ही तरह मोदी सरकार भी सड़कों और बिजली जैसे बुनियादी ढांचे को बेहतर करने पर बहुत जोर दे रही है। सड़कों और पुलों का निर्माण इस समय अभूतपूर्व रतार से हो रहा है और उदय योजना के जरिये सरकारी बिजली कंपनियों को अपनी हालत सुधारने तथा आपूर्ति बेहतर करने का मौका मिल रहा है।

रियल एस्टेट नियामक

लेकिन इस सरकार के दो कदम बेहद दूरगामी प्रभाव वाले हैं और वे हैं – रेरा तथा आईबीसी। रेरा यानी रियल एस्टेट विनियामक प्राधिकरण निर्माण कंपनियों विशेषकर मकान बनाने वाली डेवलपर कंपनियों पर लगाम कसने के लिए है। जिन राज्यों में इसे लागू किया गया है, वहां मकानों की कीमत कम हुई है और ग्राहकों को उनके घरों की चाबियां भी सही समय पर मिल रही हैं। उम्मीद कर सकते हैं कि इससे रियल एस्टेट उद्योग में लोगों का भरोसा लौटेगा और वह उद्योग भी पटरी पर आएगा।

दिवालिया संहिता

आईबीसी यानी धनशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता आजकल सुर्खियों में है। एस्सार स्टील, एस्सार पावर, भूशण स्टील जैसे नाम आपको भी याद आ रहे होंगे। इन कंपनियों ने पिछली सरकारों के समय में बैंकों से अच्छा खासा कर्ज लिया था, जिसे वापस करने के नाम पर उन्होंने हाथ खड़े कर दिए। इस तरह कर्ज डूबने और बैंकों पर चोट पड़ने का किस्सा बहुत पुराना नहीं है। लेकिन बैंकों में एनपीए की बढ़ती समस्या के बीच मोदी सरकार ने आईबीसी पर जो निर्णायक कदम उठाए, उनके कारण कर्ज चुकाने से इनकार करने पर प्रवर्तकों के हाथ से कंपनी ही छिन जाती है। ऊपर जो नाम गिनाए गए, उनकी चाबी प्रवर्तकों के हाथों से छिनकर नए मालिकों के पास जा चुकी है। इस संहिता का असर इसी बात से पता चलता है कि हजारों करोड़ रुपये के बकाये वाली कई कंपनियों के मालिक अपनी कंपनी और जायदाद गंवाने के डर से बैंकों के पास खुद ही पहुंचने लगे हैं और बकाया चुकाने भी लगे हैं।

हकीकत यह है कि 1991 के बाद से देश आर्थिक सुधार की जिस राह पर आगे बढ़ा, उस पर संप्रग सरकार के दूसरे कार्यकाल के अलावा उसकी दौड़ तेज ही रही। यही वजह है कि देश की आर्थिक विकास दर 1947 की तुलना में 20 गुना से भी अधिक हो गई है, निर्यात के मोर्चे पर यह अलग ही नजर आ रहा है और तमाम आर्थिक संस्थाओं को इससे बहुत आशाएं हैं।

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