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 भारतीय समाज ने अपनी हर अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए एक देव बना रखा है। जल के देव हैं इंद्र। उन्हीं की कृपा से वर्षा होती है। नदी, नाले, तालाब भरते हैं। सूखी धरती भींगती है। खेती होती है। जीव पलता है। पशु-पक्षी नहाते और तृप्त होते हैं। आकाश से धूल छंटती है। पेड़-पौधों की पत्तियों में निखार आता है। जल ही जीवन है। जल है तो हम ही नहीं सारी पृथ्वी है। इसलिए ग्रीष्म ॠतु में गर्मी अधिक बढ़ जाने पर इंद्र देव की पूजा होती है। जप-तप-हवन होता है। ताकि इंद्र भगवान प्रसन्न होकर जल बरसाएं। बिहार में महिलाएं रात्रि को पानी मांगने का खेल-खेलती थीं। वे इंद्र से अराधना करती थीं –
‘‘हाली हुली बरसु हे इन्नर (इंद्र) देवता
पानी बिनू पड़ल अकाले हो राम
हरवो न लागे, कुदाल नहीं पड़े
हेंगवा उछटी आड़ी लागे हो राम।’’
      इस गीत में पानी के बिना खेत-खलिहान-खेती तथा पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और मनुष्य के भयावह जीवन का वर्णन है। वर्षा के आने में थोड़ी देर हुई नहीं कि त्राहि-त्राहि मच जाती है। वर्षा क्या आई, मानो पृथ्वी पर बहार आ गई। मोर ही नहीं नाचता, मनुष्य का मन मयूर भी नाच उठता है। वर्षा मात्र पानी नहीं देती। हमारे मन के अंदर भी हरियाली भर देती है। हमारी पांचों ज्ञानेंद्रिय सुतुष्ट हो जाती हैैं। बारिश होते देखना, उसमें भींगना (स्पर्श करना), उसके नीचे नहाना, बादल का गर्जन-तर्जन और वर्षा के भिन्न-भिन्न रूपों के स्वर सुनना, प्रथम वर्षा से उठी मिट्टी की सुगंध लेना तथा शुद्ध मीठे जल का स्वाद लेना। आंख, त्वचा, कान, नाक और जिह्वा, पांचों ज्ञानेंद्रियों के लिए बारिश एक अनोखा विषय उपस्थित करती है।
      उस रात मौसम की पहली वर्षा हुई। दूसरी सुबह मेरी एक सहेली ने कहा -‘‘बहुप्रतिक्षित बारिश तो हुई। गर्मी कम हुई। पर रात में बारिश होने के कारण हम उसका आनंद नहीं ले सके। उसे बरसते देखा ही नहीं, तो क्या मजा?’’
मुझे स्मरण हो आया। बारिश प्रारंभ होते ही हम लोग आंगन में कूदने लगते थे। मां भी छप्पर की ओड़ियजी में जहां धार मोटी होती थी, नहाने चली आती थीं। बारिश की झड़ियों से शरीर भींगता था। फोड़े-फुंसी समाप्त हो जाते थे। बादल को बूंद बन कर बरसते देखना मानो आकाश और पृथ्वी का मिलन देखना हो। बारिश की लड़ियां ऊपर से नीचे आती हैं। हवा के बहाव में कभी पूरब से पश्चिम, कभी पश्चिम से पूरब तिरछी होकर गिरती है लड़ियां। सीधे गिरे या तिरछी। गिरती तो पेड़-पौधे, मकान-रोड, खेत-खलिहान, नदी-तालाब समुद्र में ही। मानो इन लड़ियों से आकाश और धरा का संबंध जुड़ता है। वर्षा की उपस्थिति से धरा खुशहाल हो जाती है। मिट्टी के अंदर अन्न, घास-पेड़ के बीज और छोटे-छोटे कीड़े-मकोैडों के अंडे होते हैैं। बारिश पड़ते ही वे जीवंत हो जाते हैं। जमीन के अंदर अनेक कीड़े-मकौड़े जो किसान की खेती के लिए महत्वपूर्ण हैं, वे जमीन की कोड़ाई करते रहते हैं। पर बिना वर्षा के उनकी जाति-प्रजाति जीवित नहीं रह सकती।
वर्षा ॠतु का वर्णन करते हुए तुलसीदास ने लिखा है –
‘‘दादुर धुनि चहुंओर सुहाई
वेद पढ़े जन वट समुदाई।’ ’
      मेढ़कों की कई जातियां बरसात में ऊपर आ जाती हैं। एक प्रजाति तो अपने पीले रंग के लिबास में गड्ढ़ा-तालाब के भरे जल के किनारे बैठ कर ऊंची आवाज में टर्र-टर्राती है। उनका सामूहिक स्वर चहुंओर गूंजता है। तुलसीदास ने उनके ऊंचे-नीचे होते स्वर की ब्राह्मणों द्वारा वेद पढ़ने के स्वर से तुलना कर दी है।
      बरसात में बरसने वाले बादल की एक स्थिति नहीं होती। विभिन्न रूप-रंग और सुगंध होती है उन बूंदों की। इसलिए उनके रूप के अनुकूल भिन्न-भिन्न नाम है, पहचान है। पानी पड़ना, बरखा, बरसात, बारिश, मेह, वृष्टि तो वर्षा के पर्यायवाची शब्द हैं। पर उसके विभिन्न रूपों के लिए झींसी, फुहार, बूंदा-बांदी, रिमझिम जैसी पहचान है। वहीं झड़ी लगना, मूसलाधार पानी बरसना, बारिश की भिन्न-भिन्न स्थितियों की पहचान है। कई दिनों तक बादल लगा रहे, कभी बूंदा-बांदी, कभी झिसी-फूही, कभी रिमझिम, कभी मुसलाधार बारिश होती रहे तो कहा जाता है कि झपसी लग गई। यानी कई दिनों तक सूर्य नहीं दिखेगा।
     जरूरत के अनुसार बारिश तो अमृत ही है। परंतु यह भी सच है कि बारिश सदा किसानों की जरूरत के अनुसार नहीं होती।
    भारत का किसान अनावृष्टि, अतिवृष्टि और असमय वृष्टि से परेशान रहता है। यहां नदियों का जाल बिछा है। इसलिए पहाड़ों से निकलने वाली नदियां भयंकर रूप दिखाती हैं। बाढ़ आ जाती है। हजारों एकड़ फसलें बर्बाद होती हैं। जान-माल की सुरक्षा नहीं हो पाती। फिर भी वर्षा तो वर्षा है।

 यूं तो सभी ॠतुओं के मिजाज को जानना कठिन है। परंतु ॠतुओं के साथ जीते हुए लोगों ने इनकी विभिन्न मनोदशाओं को पहचाना है। कौन-सा बादल बरसने वाला है, कौन-सा नहीं, किसानों को ज्ञात था। किस रुख़ की हवा से बारिश होगी, किस माह में कौन हवा बहे तो बारिश हो सब पता था।
‘‘सावन पुरवा, भादो पछुआ
आश्विन बहे इशान
कार्तिक मास शीश न डोले
कहां के रखवा धान।’’
      ग्रामीण जीवन में आकाश तले सोने वाले लोगों का बारिश के साथ विशेष संबंध था। वे वर्षा के हर मन: स्थिति को समझते थे। पानी इकट्ठा करते थे। बारिश का जल सबसे मीठा और शुद्ध होता है। समुद्र के जल से बादल बनता है। पर बादल के जल में खारापन नहीं होता। प्रकृति में सब आश्चर्यजनक मौसम ही हैैं। परंतु वर्षा ॠतु मनभावन, भयानक और आश्चर्यजनक है।
     बारिश के साथ हमारा सहजीवन रहा था, है और रहेगा। परंतु खेद की बात है कि शहरी लोगों के जीवन में बरखा, बहार लेकर नहीं आती। वे बरखा में न नहाते हैं, न उसे बरसते देखते हैं। उनके खेत खलिहान भी तो नहीं हैं। इसलिए बरखा से खेत को लाभ या हानि, वे इस सुख-दु:ख से वंचित रहते हैं।
‘‘मेघा न बरसे भरे न खेत,
माता न परसे भरे न पेट।’’
माह, नक्षत्र, ॠतुएं हमारे जीवन में समरस होते थे। मघा नक्षत्र में पानी नहीं भरे तो खेत भर ही नहीं सकता। उसी प्रकार मां भोजन नहीं परोसेगी तो पेट नहीं भरेगा। दोनों का महत्त्व समझ में आ जाता था। साहित्यकारों ने वर्षा को आंखों में भरने, झर-झर बरसने और टपक पड़ने के अनेक संबंध रखे हैं।
‘‘माता के रोअले गंगा बहत है,
बाबा के रोअले भींजले चदरिया।‘‘
यानि माता-पिता दोनों के आंखों से आंसू बरसे तो गंगा के समान है। पर दोनों के आंसुओं में अंतर है।
वर्षा का आनंद लेने के लिए भी अंगना, दादा-दादी और बच्चे चाहिए। तभी तो बरखा लाएगी बहार।

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