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  शिवसेना के राज्यसभा सदस्य संजय राउत ने महाराष्ट्र के औरंगाबाद में कहा कि ‘भाजपा सरकार निजामशाही का बाप है।’ भाजपा की बदली हुई भूमिका के कारण शिवसेना में जो अस्वस्थता है उसका दाहक प्रकटीकरण सेना के नेतृत्व से लेकर अन्य नेताओं तक सभी की भाषा में दिखाई दे रहा है। शिवसेना, जिसने अभी अभी ५० वर्ष पूरे किए है के नेतृत्व की यही कमी है। लम्बे अरसे से शिवसेना की प्रतिमा आक्रामक राजनीति करने की रही है। २५ साल शिवसेना और भाजपा का गठबंधन था। इस गठबंधन में हर मामले में भाजपा के साथ शिवसेना के नेताओं ने दोयम व्यवहार किया। शिवसेना में पिछले २५ वर्षों में इस आदत ने गहरी पैठ बना ली है। भाजपा ने यह सब सहन इसलिए किया ताकि हिंदुत्व की शक्ति का विभाजन न हो। यह भी एक कारण है कि भाजपा ने दोयम दर्जा स्वीकार किया।
अक्टूबर २०१४ में हुए महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में परिस्थिति पूर्ण रूप से बदल गई। विधान सभा चुनावों में भाजपा को १२३ सीटें मिलीं जबकि शिवसेना को ६३ सीटों पर संतोष करना पड़ा। शिवसेना का स्थान दोयम दर्जे का हो गया। चुनाव प्रचार के दौरान अगर शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह की तुलना अफज़ल खान से न की होती और उनके ‘बाप’ तक न पहुंचे होते तो शिवसेना पर शायद यह नौबत न आती। २५ साल की आदत के अनुसार उद्धव ठाकरे ने भाजपा की बढ़ी हुई ताकत को कम आंकने की जिद नहीं छोड़ी और असफल हो गए। नेतृत्व अगर समझदार हो तो उसे वातावरण में हो रहा बदलाव तुरंत समझ में आ जाता है। परंतु उत्तराधिकार में मिली दादागीरी करने की आदत तुरंत नहीं जाती। उसके लिए कुछ कड़वे अनुभवों से गुजरना जरूरी होता है। शिवसेना को लोकसभा में जो १८ सीटें मिलीं है उस आधार पर ‘बहुुत कुछ’ पा लेने की भूमिका में फिलहाल शिवसेना नज़र आ रही है। परंतु कोई भी जानकार व्यक्ति यह समझ सकता है कि इस ‘बहुत कुछ’ में सबकुछ शिवसेना का नहीं है।
लोकसभा चुनावों की घोषणा के बाद देश भर में केवल एक ही सिक्के की तूती बोल रही थी; वे थे नरेंद्र मोदी। अत: इस सिक्के के आधार पर जिन्होंने भी चुनाव लड़ा वे सभी जीते। क्या शिवसेना यह भूल गई है? शिवसेना ने आत्मपरीक्षण किए बिना ही यह मान लिया है कि उन्हें जो भी मिला वह शिवसेना के अपने बलबूते पर मिला है।
शिवसेना को महाराष्ट्र की जनता के सम्मान और परेशानियों से ज्यादा चिंता अपने खोते जा रहे सम्मान की है। उनके दाहक वक्तव्यों से भी यही चिंता साफ जाहिर होती है। शिवसेना की वर्तमान भूमिका कुछ ऐसी है कि भाजपा बाहर के राज्यों से आया हुआ कोई शत्रु है और उससे महाराष्ट्र को बचाना हमारा कर्तव्य है। कभी भाजपा नेतृत्व को अफज़ल खान की उपमा देना, कभी आदिलशाह कहना, तो कभी सरकार को निज़ामशाही का बाप कहना इत्यादि वक्तव्यों से होने वाले जख्म न केवल भाजपा कार्यकर्ताओं के दिलों पर हो रहे हैं वरन देश की सामान्य जनता पर भी हो रहे हैं। उद्धव ठाकरे इसका एक अनुभव विधानसभा चुनावों में ले चुके हैं। और, ऐसा भी नहीं है कि भाजपा कार्यकर्ता शिवसेना के द्वारा दिए गए जख्मों पर विचार नहीं करते हैं। २५ साल में किए गए अपमान का
एक-एक पाठ भाजपा के शहर से लेकर गांव स्तर के कार्यकर्ता के मन पर अंकित है। इनमें प्रतिभा पाटिल, प्रणब मुखर्जी को वोट देने, दैनिक सामना में मा.सरसंघचालक जी से लेकर भाजपा तक सभी के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग करने इत्यादि सभी का समावेश है। इसके साथ ही भाजपा नेताओं को इंतजार कराने, उनके फोन न सुनने, महत्वपूर्ण चर्चाओं के लिए सामान्य नेताओं को भेजने आदि भी भाजपा कार्यकर्ता भूले नहीं हैं।
दूसरों के सम्मान की परवाह किए बिना अपने सम्मान की आशा करना भी दुर्व्यवहार ही है। पिछले २५ सालों की आदत के कारण शिवसेना की सम्मान की संकल्पनाएं भी बचकानी हो गई हैं। बालासाहब को उनके कर्तृत्व के कारण सम्मान मिला था, उत्तराधिकार के कारण नहीं। परंतु आज शिवसेना के नेतृत्व से लेकर गांव स्तर के नेताओं तक सभी शिवसेना नेता सम्मान सम्बंधित गलत धारणा में जी रहे हैं।
हर बार दाहक वक्तव्य के द्वारा वार करना, टीका-टिप्पणी करना और अंत में ‘सत्ता में रह कर शिवसेना जनता के हित में विरोधी दल की भी भूमिका निभाती रहेगी’ यह स्वार्थी वाक्य कहते जाना। शिवसेना की इस भूमिका से जनता के मन में उसके प्रति घट चुका आदर और भी कम होता जाएगा।
लगभग ३५ हजार करोड़ के बजट वाली मुंबई महापालिका पर शिवसेना-भाजपा की नज़र है। भाजपा को मात देने के लिए शिवसेना ने अभी से तैयारी शुरू कर दी है। लोकसभा-विधान सभा में भाजपा को मोदी लहर के कारण विजय मिली यह सत्य है; परंतु सत्ता में आने के बाद महाराष्ट्र के अन्य प्रमुख शहरों में भाजपा को स्थानिय चुनाओं में यश नहीं मिला; यह वास्तविकता भाजपा नेतृत्व को ध्यान में रखनी चाहिए। मुंबई-ठाणे महापालिका में अपनी सत्ता कायम रख कर भाजपा की फजीहत करना शिवसेना का मुख्य उद्देश्य है। आने वाले समय में शिवसेना सत्ता में हिस्सेदार भी और विरोधी भी ऐसी दोहरी भूमिका में रहेगी। मुद्दे को बेवजह खींचना शिवसेना का पारम्परिक स्वभाव है। राजनैतिक शत्रु वैचारिक शत्रु भी हो यह आवश्यक नहीं है। मूलत: राजनीति निरंतर प्रवाही है; वह कमल के पत्ते पर पड़ी पानी की बूंद के समान है। किस मुद्दे पर उसकी स्थिरता को धक्का लग जाएगा इसका अंदाजा अच्छे से अच्छा नेता भी नहीं लगा सकता तो शिवसेना नेताओं का क्या कहना! सत्ता में भागीदार होने पर पार्टी में सम्मान की भावना होती है और सत्ता से बाहर होने पर पार्टी में हलचल शुरू होती है। यही हलचल पार्टी टूटने के लिए कारण बनती है यह ५० वर्षों की आयु पूरी कर चुकी शिवसेना के नेतृत्व को निश्चित ही समझ में आता होगा।
बदलती परिस्थितियों का यह संकेत है कि हिंदुत्ववादी शक्तियों को राज करना चाहिए। इसे राष्ट्रीय विचारधारा का आधार है। अत: सम्मान की कपोलकल्पनाओं से बाहर निकल कर परस्पर सम्मान के व्यासपीठ पर शिवसेना का आना आवश्यक है। बालासाहब ठाकरे ने दशहरा सम्मेलन में शिवसैनिकों एवं महाराष्ट्र की जनता से आह्वान किया था कि,
‘‘आपने मुझे ४५ साल सम्हाला है अब उद्धव और आदित्य को भी सम्हालिए।’’ बालासाहब के द्वारा निर्मित साम्राज्य की जिम्मेदारी जिस तरह महाराष्ट्र की है उसी तरह उसकी चिंता करने की जिम्मेदारी उद्धव ठाकरे की भी है। महाराष्ट्र में हिंदुत्ववादी विचारधारा की सरकार पांच साल उत्तम रीति से चले और फिर से चुनाव जीते यही जनता की इच्छा है। इस इच्छा को पूरी करने की जिम्मेदारी भाजपा-शिवसेना के अलावा और किसी में है ही कहां?

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