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 जब मेरी ही छाया मेरे पांवों तले आती है, तब सूरज की गर्मी
अपनी चरम सीमा पर होती है। सूरज की अनगिनत किरणें पृथ्वी की जीवनदायिनी हैं। फिर भी वे हमें बेहद जलाती हैं। ये ही सहस्त्ररश्मियां ज्वालाओं में परिवर्तित होती हैं। पूरा बदन मारे गर्मी के झुलस दे ऐसा लगता है। पृथ्वी का हर जीवजन्तु, इन दाहक किरणों से अपने को बचाने के लिए किसी छांव का सहारा ढूंढता है। हर प्राणी, पशु, पक्षी सभी इन ज्वालाओं से डर कर छांह की छत्रछाया में आते हैं। ऊपर से छांह ठण्डक प्रदान करने की कोशिश करती है, परंतु बेचैन जीव तृषार्त होता है। वह जीवनरूपी अमृत बूंद की आस लगाए रहता है! कब ये गर्मी खत्म हो। तप्त वसुधा को शांत करने के लिए उसकी गोद में सोये। हर जीव को बूंद की आस लगी रहती है। जीव की हालत बारिश की राह देखने वाले चातक जैसी हो जाती है। उसका आगमन होते ही जीव शिव के मिलन की तरह तृषार्त मन अमृतमयी बूंदों के साथ काव्य धारा में सरावोर हो उठता है। शब्दों के छींटे तन-मन पर लेकर संतोष पाता है, नाचने लगता है। जिस मनुष्य को इसकी चाह नहीं उसे मानव कहना व्यर्थ है।
काळ्या काळ्या मेघांमधुनि,
शुभ्र अशा या धारा झरति।
अवति भवति जुळू लागल्या जळधाराच्या माळा
आला आला पाऊस, बघा बघा हो आला, आला
पाऊस आला,पाऊस आला॥
झाडे हसली, डसली पाने,
फुले पाखरे गाती गाणे।
ओल्या ओल्या मातीचाही श्वास सुंगधी आला।
    श्रीमती वंदना वटणकर की उपरोक्त बालकविता से प्रकृति के साथ बालमन भी उल्ल्लसित हुआ। कवयीत्री ने शुभ्र जलधाराओं की माला गूंथी। काले बादलों में से होने वाली बारिश शुभ्र कैसी? बालमन प्रश्न पूछता है। पेड़-पौधों को हंसाने वाली बारिश फूलों को, पंछियों को गाना सिखाती है।
     सबसे आश्चर्यपूर्ण बात तो यह है कि सौंधी मिट्टी से सांस सुगंधित हो जाती है। धरित्री को जीवन देने वाली बरसात जादू करती है। बालकों का मन दूर से ही बारिश देखने को तैयार नहीं होता। उसे तो बारिश में खेलना है। इसलिए वो मां से बारिश में जाने की जिद करता है और कहता है-
ए आई, मला पावसात जाऊ दे।
एकदाच गं भिजुनी मला चिंब चिंब होऊ दे॥
     मां मुझे एक बार बारिश में जाने दो। बारिश में खेलने तो जाना है, पर जब मां की मनाही हो तो कैसे जाएं? क्योंकि भीगने के बाद जुकाम, बुखार, छींके सब कुछ मां को ही संभालना है। फिर भी बच्चा कहता है-
ताप, खोकला, सर्दी, शिंका वाट्टेल ते होऊ दे
ए आई मला पावसात जाऊ दे
     बच्चों का मन केवल बारिश में भीगकर नहीं मानता बल्कि वे ये भी मनाते हैं कि किसी वहज से स्कूल की छुट्टी हो जाए तो और मजा आएगा।
सांग सांग भोलानाथ पाऊस पडेल का?
शाळेभोवती तळे साचून सुट्टी मिळेल का?
     वे शंकर भगवान को प्यार से भोलानाथ पुकारते हुए पूछते हैं कि क्या आज इतनी बारिश होगी कि स्कूल के चारों ओर पानी भर जाएगा और स्कूल की छुट्टी हो जाएगी।
      बालपन चंचल है, वह तो ऐसा कहेगा ही…..परंतु किशोरावस्था भी इससे अलग नहीं। वह तो और अधीर और भावविवश हो रही है। मंगेश पाडगावकर की काव्यपंक्तियों में यह भावना गहराई से व्यक्त हुई है…..
केस चिंब ओले होते, थेंब तुझा गाली।
ओठांवर माझ्या किती फुले झाली।
श्वासांनी लिहिली गाथा, प्रीतीच्या रसाची,
धुंद वादळाची होती रात्र पावसाची॥
सुगंधित हळव्या शपथा, सुगंधित श्वास।
स्वप्नातच स्वप्न दिसावे तसे सर्वभास।
सुखालाही भोवळ आली मधुर सुवासाची॥
     

 किशोरावस्था का यह नशा पाडगावकर जी ने सही-सही वर्णन किया है। धीरे-धीरे बढ़ने वाली प्रीति भावना को सांसों से कहानी लिखनी है। सपने देखना है, उन पर सुख की भावना का नशा छा रहा है। यह सब मतवाली आंधी बारिश का ही जादू है।
      यह बारिश सिर्फ मानवीय स्तर पर सुख नहीं बरसाती बल्कि वह इस लोक से ऊपर उठ कर आध्यात्मिक स्तर पर पहुंच जाती है। बा.भ.बोरकर जी की काव्यपंक्तियां बारिश के संदर्भ में क्या कहती है।
सरिंवर सरी आल्या गं, सचैल गोपी न्हाल्या गं।
गोपी झाल्या भिजुन चिंब। थरथर कापति निंब कदंब।
घनामनांतुन टाळ मृदंग, तनूंत वाजवि चाळ अनंग।
पाने पिटिति टाळ्या ग, सरिवंर सरी आल्या गं॥
    बा.भ. बोरकर अपनी सिद्धहस्त कलम से बारिश का आध्यात्मिक लेखाजोखा प्रस्तुत करते हैं। गोपियों को भिगोने वाली यह बारिश मन और ईश्वर से नाता जोड़ती है। साथ- साथ पर्यावरण से अपना अनोखा रिश्ता भी जोड़ती है।
       बारिश होने पर आम आदमी तो खुश होता ही है, पर किसान, जो कि पूरी तरह से बारिश पर निर्भर है, वह हर्षोल्लास से पागल हुआ जाता है तो इस में आश्चर्य की क्या बात?
     शब्दों पर जिनकी हुकूमत है, वे खानदेश सरस्वती कवयित्री बहिणाबाई अपने अहिराणी शब्दों से मन की भावविभोर अवस्था को शब्दबद्ध करती हैं।
आला पह्यला पाऊस, आला पाऊस पाऊस
शिंपडली भुई सारी। आता सरीवर सरी।
धरतीचा परमय, शेत शिवार भिजले
माझ मन गेलं भरी॥ नदी नाले गेले भरी॥
आता जगू देरे शेतं देवा पाऊस पाऊस,
आला, पाऊस पाऊस। तुझ्या डोयातले आसं।
वद्हे येऊ देरे रोपं, देवा तुझा रे हिरास।
आता फिटली हाउस॥ जिवा तुझी रे मिरास॥

     धरती की खुशबू मेरा मन मोह लेती है। खेत खलिहान भिगोने वाली यह बारिश नदी-नालों को भर देती है। बारिश इतनी ज्यादा भी ना हों कि खेतों में बाढ़ आए। बारिश को ईश्वर को आंखों के आंसुओं की उपमा देकर मनुष्य की सुरक्षा करने की प्रार्थना करती है।
     कभी-कभी यह बारिश, जीवनदायिनी, आनंद का निर्झर नहीं रहती और ना ही रंगबिरंगी पंखों वाली। वह अचानक दु:ख देने वाली, आंसू बहाने वाली जानलेवा साबित होती है।
चार खोक्याचे बाजले, बाई बाळंत झोपली
लोट पाण्याचे वेढता, बाई बाहेर धावली।
रात्र पिऊन लांटाचे होते धिंगाणत थवे।
मेघ फुटे माथ्यावर दूर संस्कृतीचे दिवे।
बाई धावली धावली पडे खड्यामधी खोल।
प्रेत पोलिसांना मिळे उरी धरलेले मूल॥
     कवयित्री इंदिरा संत की उपरोक्त पंक्तियों से किसी ऐसी स्त्री की कथा उद्धृत होती है, जिसका हाल ही में प्रसव हुआ था। रात की मूसलाधार बारिश में बच्चे की जान बचाते-बचाते वह मर गई। अत्यंत दु:खद चित्रण इस कविता में व्यक्त हुआ है।
     मनुष्य जन्म मिलने पर सारे भाव, सारे रस देखने को मिलते हैं। ऐसे भावों से जीवन फलता-फूलता है। इसी जीवन रस को पोषण देने वाला, बल देने वाला अमृत रस है बारिश। यह चारों तरफ से मानव का जीवन समृद्ध सम्पन्न करती है। इसमें हास्य, करुण, दुःख, आनंद सब कुछ शामिल होता है। मानवीय जीवन के साथ एकरूप हो जाता है। शायद इसीलिए बारिश हमारे जीवन का अविभाज्य हिस्सा बन जाती है।

                                                      

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