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हमारे बोलचाल की भाषा और हमारे विचारों में अन्योनाश्रय संबंध होता है, अर्थात दोनों एक-दूसरे से प्रभावित होते हैं. हम जैसी भाषा बोलते हैं, उसी तरह से सोचने भी लगते हैं और जिस तरह से सोचते हैं, हमारी बोली और व्यवहार भी वैसा ही हो जाता है.

प्रसिद्ध विचारक रूमी के शब्दों में- ”मौन ईश्वर की भाषा है और उसके अलावा बाकी सब उसका कमजोर अनुवाद होता है.”

भाषा का प्रत्यक्ष उद्देश्य एक मस्तिष्क के विचारों को दूसरे मस्तिष्क में संचारित करना होता है. हालांकि हर तरह के संचार के लिए भाषा की अनिवार्यता नहीं होती. जैसे गूंगे-बहरे लोग, जानवर, छोटे बच्चे आदि बातचीत करने के लिए सांकेतिक भाषा का उपयोग करते हैं. शाब्दिक भाषा का उपयोग हमारी अभिव्यक्ति को विशिष्ट बनाता है. भाषा हमारे विचारों का प्रतिनिधित्व करती है, लेकिन क्या यह हमारे विचारों को निर्धारित भी करती है?

एक अनुमान के अनुसार दुनिया भर में कुल सात हजार भाषाओं का अस्तित्व है. उनमें से एक-न-एक भाषा हर हफ्ते अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही है. इनके बीच के अंतर को समझने के लिए बस इतना ही जानना काफी है कि हर एक से दूसरी भाषा में प्राथमिक रंगों की संख्या और परिभाषा बदल जाती है. उदाहरण के तौर पर, डार्क / कूल कलर्स को न्यू गुआना में ‘डेनी’ कहा जाता है, वहीं लिबेरिया और सिएरा लिओन में उसे ‘बासा’ कहते हैं. इसी तरह लाइट/वॉर्म कलर्स के लिए इन शब्दों की परिभाषा इन देशों में ठीक विपरीत हो जाती हैं. हमारे लिए यह परिभाषा निश्चित रूप से बेहद कंफ्यूजिंग होगी, लेकिन उन देशों के निवासियों के लिए दुनिया के तमाम रंग उन्हीं दो शब्दों में सिमटे हुए हैं. उसके अतिरिक्त उनके दिमाग में कोई तीसरा शब्द आ ही नहीं सकता. इसी प्रकार से, जर्मन शब्द ‘Sehnsucht’ के लिए अंग्रेजी में कोई एक परफेक्ट शब्द नहीं है. इसका अर्थ होता है- ‘किसी चीज को पा लेने की तीव्र लालसा सहित हकीकत में अपूर्णता के आभास से उत्पन्न असंतुष्टि, जो कि उस वास्तविकता से भी कहीं अधिक वास्तविक दिखती हो.’ लेकिन इसके लिए एक उपयुक्त शब्द की कमी होने के बावजूद इसे परिभाषा के माध्यम से इसकी अवधारणा को स्पष्ट किया जा सकता है. कहने का मतलब यह कि जो अभिव्यक्ति जर्मन भाषा में एक शब्द में स्पष्ट समझी जा सकती है, उसी को समझने के लिए अंग्रेजी में लंबी चौडी परिभाषा की जरूरत पड़ती है. इसी तरह लैटिन भाषा में हां/ना के लिए कोई विशेष शब्द नहीं है.

इसी तरह अंग्रेजी में वैसे बच्चे के लिए, जिसके मां-बाप का निधन हो चुका हो ‘orphan’ शब्द प्रयोग करते हैं और जिस महिला/पुरुष के पति/पत्नी का निधन हो गया हो, उसके लिए widow/widower शब्द का प्रयोग करते हैं, लेकिन वैसे मां-बाप, जिन्होंने अपने बच्चों को खो दिया हो, उनके लिए अंग्रेजी डिक्शनरी में कोई शब्द नहीं है. इसका मतलब यह नहीं है कि ऐसे मां-बाप होते ही नहीं है, बल्कि सच तो यह है कि उनके बारे में हम ज्यादातर सोच ही नहीं पाते क्योंकि उनके लिए हमारे पास कोई शब्द ही नहीं है. अगर हम अपने देश की भी बात करें, तो यहां हर चार सौ मीटर पर लोगों की भाषा बदल जाती है और उसी के अनुसार उनके विचारों और व्यवहारों में भी बदलाव होता है.  दरअसल हम अक्सर उन्हीं चीजों को अपनी बोली/भाषा में प्रयोग  करते हैं, जिनके लिए हमारे पास उचित शब्द होते हैं या जिन्हें हम भली-भांति शाब्दिक रूप से अभिव्यक्त कर सकते हैं. जिनके लिए हमारे पास समुचित शब्दों का अभाव होता है, उनके बारे में हम केवल सोच पाते हैं, जैसे- सूर्योदय की लालिमा, पक्षियों का कलरव, आम की महक, किसी पुराने दोस्त से अचानक मुलाकात होने पर मन में  उत्पन्न एहसास आदि. मौखिक कार्य अथवा बोलचाल में निपुणता प्राप्त कर लेने पर विद्यार्थी लिखने में भी दक्षता प्राप्त कर सकते हैं. वास्तव में मौखिक भाषा का प्रभावोत्पादक होना आवश्यक है जिससे श्रोता वक्ता बात भली-भांति समझ सके तथा उससे प्रभावित हो सके. अत: जब भी बोले बहुत सोच-समझ कर बोलें क्योंकि आपकी बोली आपके विचारों को दर्शाती है और आपके विचार आपके संस्कारों को.

 

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