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       जून-जुलाई की शुरुआत होते ही साथ दिमाग में पहला खयाल आता है बारिश और नई किताबों की खुशबू का। स्कूल-कॉलेजों का नया सत्र शुरू होने का यही समय है। इसी वक्त कई विद्यार्थी अपना शहर छोड़ कर नए शहर में अपने-सपने पूरे करने के उद्देश्य से आते हैं। हॉस्टेल, मेस, नए दोस्त, नए लोग सब कुछ नया। घर वालों से दूर रहने का दु:ख तो होता ही है, साथ ही धीरे-धीरे आत्मविश्वास भी बड़ने लगता है। सच कहा है किसी ने, अपना घर तो बस अपना ही होता है। कई विद्यार्थी अपने शहर से दूसरे शहर आने के बाद अपने नाना-नानी, चाची, बुआ आदि रिश्तेदारों के यहां भी रहते हैं। लेकिन यहां भी कई ऐसी अनकही बातें या समस्याएं होतीं हैं जो विद्यार्थी बयां नहीं कर पाते। पढ़ाई और करिअर की दृष्टि से अपने शहर से दूसरे शहर में आने पर विद्यार्थियों को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
१. घर की याद : अक्सर दूसरे शहर से आए विद्यार्थियों में यह देखा गया है कि शुरुआती दिनों में उन्हें घर की बहुत याद आती है। नए माहौल से नए लोगों के साथ सामंजस्य बिठाने में विद्यार्थियों को काफी समय लगता है। इस बारे में दापोली में रहने वाली सायली करमरकर बताती हैं, पत्रकारिता की पढ़ाई करने जब पहली बार अपने शहर से पुणे आई तब मन में बहुत सारे नए सपने थे। अकेले सब करना, रहना, यह सोच कर ही बहुत अच्छा लगता था। लेकिन जब सचमुच रहने की बारी आई, सब कुछ खुद करना पड़ा तब हर समय घर की, घर वालों की बहुत याद आई। वह कहती है, घर से निकलने से पहले इस तरह की नई जिंदगी बहुत ही एक्सायटिंग और आकर्षक लगती है। लेकिन धीरे-धीरे परिस्थिति की गंभीरता समझ में आती है। और इसी को हम सीखना या बड़ा होना कहते हैं।
२. सांस्कृतिक फर्क : वैसे तो हर शहर एक दूसरे से अलग होता है। वहां रहने वाले लोगों का रहन-सहन, बात करने का लहजा, खानपान सभी कुछ एक दूसरे से बहुत भिन्न होता है। इसे ही सांस्कृतिक बदलाव कहा जाता है। और हर विद्यार्थी शुरू से जहां रहा है वहां की संस्कृति में ढल चुका होता है। नई संस्कृति के साथ तालमेल बिठाने में उसे काफी वक्त लगता है। इस बारे में जबलपुर की रहने वाली प्रांजली हर्डीकर बताती हैं कि बी. कॉम. करने जब वे पुणे आई उन्हें मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की संस्कृति में बहुत ही फर्क नजर आया। जबलपुर के लोगों का रहन-सहन, खानपान, भाषा सब कुछ यहां से अलग था। यहां का गणेशोत्सव, यहां के खाद्य पदार्थ बहुत ही अलग हैं। शुरुआती कुछ दिनों में थोड़ी तकलीफ हुई लेकिन बाद में आदत हो गई।

३. भाषा : वैसे तो एक ही राज्य के अलग-अलग शहरों में भाषा का लहजा बदल जाता है। लेकिन अगर राज्य भी अलग हों तो फिर पूछिये ही मत! भाषा की यह समस्या नए आए विद्यार्थियों को बहुत सताती है। किसी स्थान पर पहुंचना हो या किसी से मदद मांगनी हो जब तक आपको स्थानीय भाषा नहीं आती तब तक उस शहर में आपका टिके रहना मुश्किल है। इस बारे में छत्तीसगढ़ के रायपुर से पुणे पढ़ने आई दिव्या अग्रवाल बताती हैं, शुरुआती दिनों में कॉलेज में प्रोफेसरों से लेकर साथियों तक सभी मराठी बोलते थे। एक अक्षर भी समझ में नहीं आता था। इस बात को लेकर इतना तनाव हो गया था कि मुझे नहीं लग रहा था कि मैं पास भी हो पाऊंगी। लेकिन धीरे-धीरे मराठी समझ में आने लगी और समस्या अपने-आप सुलझ गई। नए आने वाले विद्यार्थियों को संदेश देते हुए दिव्या बताती हैं कि अगर हम चाहें और सीखने की इच्छा रखें तो हम कुछ भी कर सकते हैं। नई भाषा सीखने का बोझ सर पर रहेगा तो हम कभी सीख नहीं पाएंगे लेकिन अगर अच्छे दोस्तों का साथ हो और मन में सीखने की इच्छा हो तो नई भाषा भी आपको आपकी मातृभाषा जितनी ही अच्छी लगने लगेगी।
४. मेस का खाना : अपने शहर से दूसरे शहर में आने वाले विद्यार्थियों की सब से बड़ी समस्या है- मेस का खाना। मां के हाथ का खाने का स्वाद तो किसी भी खाने में नहीं आ सकता, लेकिन हर रोज एक ही तरह का खाना खाने के लिए भी बहुत हिम्मत चाहिए होती है। खानपान की आदतें बदलने और मेस या इसी तरह के बाहर के खाने की आदत डालने में विद्यार्थियों को थोड़ा वक्त लगता है। कई बार तो विद्यार्थी खुद ही खाना बनाना सीख लेते हैं।
५. साथियों का दबाव : नए शहर में आने के बाद यह भी एक काफी बड़ी समस्या होती है। यहां रहने वाले साथियों की एक लाईफस्टाईल होती है। रहन-सहन का तरीका होता है। और यदि आपका तरीका अलग हो तो उन साथियों में शामिल होना थोड़ा मुश्किल हो जाता है- उदा.: बड़े शहरों में व्यसनाधीनता अधिक है। युवाओं में यह काफी सामान्य माना जाता है। ऐसे में छोटे शहरों से आए विद्यार्थियों पर भी इस तरह की लाईफस्टाईल अपनाने का दबाव बढ़ जाता है। और कई विद्यार्थी इन्हीं हालातों में बहक जाते हैं। लेकिन यदि विद्यार्थी खुद पर विश्वास रखें और अपने निश्चय पर अटल रहें तो इस समस्या को सुलझाया जा सकता है।
६. आत्मविश्वास में कमी : ऐसा कहा जाता है, जब इंसान अपने घर में, अपने शहर में होता है तो उसमें प्रचुर मात्रा में आत्मविश्वास होता है। परंतु जैसे ही वह अपने कंफर्ट झोन से याने कि अपने घर व शहर से दूर जाता है, उसमें आत्मविश्वास की कमी हो जाती है। शहर का नया रहन-सहन, नए लोग, पूरा माहौल नया होता है। ऐसे में यदि आत्मविश्वास की कमी रहे तो व्यक्तित्व पर भी असर पड़ता है। और पहली छवि ही आखरी छवि होती है। यदि वह छवि प्रभावशाली बनानी हो तो आत्मविश्वास का होना बहुत जरूरी है। स्वयं को बार-बार प्रेरित करने से और हर समस्या को सामान्य रूप से लेने से आत्मविश्वास पुन: प्राप्त किया जा सकता है।

७. पहनावे को लेकर न्यूनगंड : इस समस्या का सामना छोटे शहरों से बड़े शहरों में जाने वाले विद्यार्थियों को करना पडता है। हर शहर की एक संस्कृति होती है। बड़े शहरों में पाश्चात्य संस्कृति की मात्रा पिछले कुछ सालों में बढ़ी हुई नज़र आती है। ऐसे में यहां का पहनावा, कपड़ों का स्टाईल अलग होता है। लड़के एवं लड़कियों दोनों के मन में पहनावे को लेकर एक न्यूनगंड होता है। यदि वह नहीं निकला तो कॉलेज के शुरआती दिनों में सब के साथ तालमेल बिठाना मुश्किल हो जाता है। अत: कपड़ों पर ध्यान जरूर देना चाहिए, जहां तक योग्य हो वहां तक नए पहनावे को अपनाना भी गलत नहीं है। केवल यह ध्यान रखना जरूरी है कि पहनावे से भी अधिक जरूरी आपका ज्ञान और आपका आत्मविश्वास है। आत्मविश्वास के साथ आप किसी भी पहनावे को अपना सकते हैं एवं खूबसूरत भी लग सकते हैं।
८. रास्तों का पता न होना : किसी भी शहर को पूरी तरह से जानना है तो उसके भीतरी रास्तों पर घूमना चाहिए। नए शहर में जाने के बाद रास्ते पता न होने के कारण भी विद्यार्थियों को कई मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है। किंतु यदि लोगों से बेधड़क पूछने की हिम्मत हो तो इस समस्या से भी निजात पाई जा सकती है। हर शहर में स्वयं को ढालने के लिए समय तो लगता ही है। बस जरूरत है तो स्वयं को और शहर को एक दूसरे को अपनाने के लिए कुछ समय देने की। कुछ साल बाद शहर का चप्पा-चप्पा भी आपका दोस्त बन जाता है।
९. रिश्तेदारों के घर रहते समय आने वाली समस्याएं : रिश्तेदार चाहे आपके कितने भी करीबी क्यों न हों लेकिन कई बार अनकही समस्याओं का सामना विद्यार्थियों को करना पड़ सकता है। देखा जाए तो विद्यार्थी अपने रिश्तेदारों की एक जिम्मेदारी होता है। पहले से ही वह नए माहौल और रहन-सहन को लेकर परेशान होता है, ऊपर से रिश्तेदारों की जिम्मेदारी होने का दबाव आ जाता है। ऐसे में अनजाने में भी कोई गलती ना हों इस बात को मन में लेकर कई विद्यार्थी सकपका जाते हैं और सहजता से रह नहीं पाते। कई बार रिश्तेदारों के घर का रहन-सहन आपके स्वयं के घर के रहन-सहन से काफी भिन्न होता है। हर घर के चाय बनाने का तरीका तक अलग होता है, तो बाकी की बातें तो दूर ही हैं। ऐसी स्थिति में रिश्तेदारों का मन दुखाए बिना स्वयं की आदतें बदलनी पड़ती हैं, स्वयं को नए घर और माहौल के साथ ढालना पडता है। रिश्तेदारों की भी कुछ अपेक्षाएं होती हैं। कई बार युवा विद्यार्थी कॉलेज और युवा जिंदगी के नए अनुभवों और समय की कमी के कारण वे अपेक्षाएं पूरी नहीं कर पाते, और छोटी- छोटी बातों से रिश्ते खराब हो जाते हैं। इस समस्या का कोई एक उपाय नहीं है। केवल स्वयं को मानसिक रूप से स्थिर व ताकतवर रख कर हर माहौल में खुद को ढाला जा सकता है। और दोस्तों के साथ पेईंग गेस्ट या किराए पर मकान लेकर रहना भी एक उपाय हो सकता है।
     वैसे तो नए शहर में आकर विद्यार्थी बहुत कुछ सीखते हैं। परिस्थिति से तालमेल बिठाना, आत्मनिर्भर होना, खुद का निर्णय खुद लेना, अपनी सीमाओं को समझना ये सभी तभी समझा जा सकता है जब विद्यार्थी अपने सिक्योर झोन से बाहर निकलें। सभी अपने परिवार में बहुत सुरक्षित वातावरण में रहते हैं। परंतु इस तरह बाहर निकल कर छोटी आयु और कम समय में बहुत कुछ सीखा जा सकता है।

                                                                                                              

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