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जैन मुनि तरुण सागर जी सुनने में कटु लगने वाले मीठे वचन सुनाकर सबको रुलाते जुए असमय चल बसे। दिगंबर सम्प्रदाय के होने के कारण स्वयं तो निर्वस्त्र रहे, लेकिन समाज को सन्मार्ग का वस्त्र उन्होंने उढ़ाया। मृत्यु को वे रिटर्न टिकट कहते थे। वे फिर अपनी यात्रा शुरू करेंगे। कौन जाने बक, कहां और कैसी?

–  भारतभूमि का वर्णन करते हुए स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि, भारत धर्मभूमि है। धर्म भारत की आत्मा है। भारत से धर्म निकाल दिया जाए तो कुछ भी शेष नहीं रहेगा। विवेकानंद के इन वचनों की अनुभूति भारत में लगातार आती रहती है। हर सम्प्रदाय में साधु-संतों, महात्माओं का जन्म होता है और वे अपने तईं समाज को धर्म का दर्शन कराते रहते हैं। यह कहीं खंडित नहीं हुआ। राष्ट्रसंत रामदास स्वामी का अभंग है, “धर्मसंस्थापनेचे नर। ईश्वराचे अवतार। झाले आहे पुढे होणार। देणे ईश्वराचे॥” (यह ईश्वर की देन है कि धर्म की संस्थापना के लिए वह अवतार लेता है, ऐसे अवतार हुए हैं और होते रहेंगे।) मध्यकाल में उत्तर से दक्षिण तक एवं पूरब से पश्चिम तक संतों की शृंखला दिखाई देती है। अंग्रेजों के काल में भी अनेक संत और सत्पुरुष हुए। स्वामी रामतीर्थ, स्वामी विवेकानंद, शिर्डी के साईं बाबा, अक्कलकोट के स्वामी समर्थ आदि अनेक नाम हम ले सकते हैं। स्वतंत्रता के बाद भी यह प्रवाह नहीं रुका। हाल के समय में श्री श्री रविशंकर, माता अमृतानंदमयी, रामायण कथावाचक मोरारी बापू, गोविंदगिरी महाराज आदि अनेक नाम लिए जा सकते हैं। इनमें एक नाम है हाल में दिवंगम जैन मुनि तरुण सागरजी महाराज।

जैन मुनि तरुण सागर अन्य संतों से कुछ अलग थे। वे दिगंगर पंथ के मुनि थे। वे निर्वस्त्र रहते थे। प्रवचनकार की भाषा मधुर एवं रसीली होती है। तरुण सागर के प्रवचनों को ‘कटु प्रवचन’ कहा जाता है। उनके कठोर प्रवचनों के आठ खंड हैं। प्रत्येक खंड लगभग 175 पृष्ठों का है और प्रत्येक पृष्ठ पर दस से बीस पंक्तियों का एक प्रवचन है। किसी ने उनसे पूछा, आप इतना कटु प्रवचन क्यों करते हैं? उनका उत्तर था, आरंभ मैं मधुर भाषा बोला करता था। मेरा प्रवचन सुनने के लिए तीस-चालीस वयस्क लोग आते थे। उनमें से आधे सोते रहते थे। बाद में मैंने कटु प्रवचन देना शुरू किया। उसे सुनने के लिए समाज आने लगा। उनमें केवल जैन ही नहीं थे। समाज के सभी स्तरों के लोग प्रवचन सुनने के लिए आते थे।

तरुण सागरजी महाराज अपने प्रवचनों में गहन तत्वज्ञान सुनाया नहीं करते थे। वे जैन थे और महावीर का स्वतंत्र तत्वज्ञान है। उसे अनेकांतवाद कहते हैं। आम आदमी की तत्वज्ञान में बहुत रुचि नहीं होती। उसे व्यावहारिक जीवन, धर्म के आधार पर किस तरह जीये यह बताना होता है। तरुण सागरजी मरते दम तक यही काम करते रहे। उनके तीखे प्रवचनों की किताब में तत्वज्ञान की चर्चा हमें दिखाई नहीं देगी। लेकिन, तत्वज्ञान को किस तरह जीये इसकी चर्चा पन्ने-दर-पन्ने पर दिखाई देगी। उन्होंने जो कुछ कहा वह कोई नया नहीं था, इसके पूर्व किसी ने नहीं बताया यह भी नहीं था। संत कबीर के दोहों की भाषा भी कटु ही है जैसे क्या पत्थर की पूजा करने से भगवान मिलता है? उसके बजाय चक्की की पूजा करें, उससे कम से कम आटा तो मिलता है। संत तुकाराम की भाषा भी मुंहफट और कभी-कभी गालीगलौज़ वाली भी है। जैन मुनि तरुण सागरजी महाराज ने यही परंपरा वर्तमान समय में आगे बढ़ाई।

वे अपनी खास शैली में विषय को प्रस्तुत करते थे। मशीन गन से गोलियां निकले उस भांति उनके मुंह से शब्द निकलते थे और चिकौटी काटने वाला वाक्य वे ऊंची आवाज में बोला करते थे। उसी समय हाथों और उंगलियों की हलचल अत्यंत मार्मिक हुआ करती थी। सुनने वालों के दिमाग और मन को वह छू जाता था। प्रवचन में उनके लिए कोई विषय वर्ज्य नहीं था। आम तौर पर साधु-संत राजनीति पर नहीं बोलते। तरुण सागरजी महाराज के लिए राजनीति का विषय अस्पृश्य नहीं था। वे कहते हैं, “धर्म ही राजनीति को नियंत्रित कर सकता है। यदि धर्म पति है तो राजनीति पत्नी है। पत्नी को सुरक्षा प्रदान करना पति का कर्तव्य है। धर्म पति के अनुशासन का स्वीकार करना चाहिए। राजनीति और धर्म में इसी तरह का रिश्ता होना चाहिए।” इसी तरह उनका दूसरा तल्ख प्रवचन है, “दुनिया का धर्म के प्रति कर्तव्य होता है। दुनिया को ध्यान नहीं चाहिए, धन चाहिए। भजन नहीं, भोजन चाहिए। सत्संग नहीं, राग रंग चाहिए।”

तत्वज्ञान का विषय भी अत्यंत सरल और मार्मिक भाषा में कहने की उनकी अपनी शैली थी। प्रत्येक धर्म कहता है कि दुनिया में कोई चीज शाश्वत नहीं है। पैसा, सम्पत्ति, धन-दौलत हमारे साथ नहीं आती। अंतिम यात्रा अकेले ही करनी होती है। तरुण सागरजी कहते हैं, “आज की दुनिया में हरेक को अपने रूप की चिंता है। इसके लिए स्त्री-पुरुष क्या नहीं करते। लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि रूप का स्वरूप ज्यादा समय नहीं टिकता। वह नश्वर है। स्व-रूप शाश्वत है। रूप बाहर से दिखता है, स्व-रूप भीतर होता है। रूप अनेक प्रकारों में दिखता है, परंतु स्व-रूप एक ही होता है। रूप बदलता है, स्व-रूप कभी नहीं बदलता। इसलिए हर व्यक्ति को अपने रूप की चिंता करने के बजाय अपने स्व-रूप की चिंता करनी चाहिए।” जीवन में मृत्यु शाश्वत होती है, यह बताते हुए मुनि कहते हैं, “वियोग मुख्य है, संयोग नहीं। इस दुनिया में हमें सदा नहीं रहना है। फिर मृत्यु तो रिटर्न टिकट है। जन्म के साथ मृत्यु याने यात्रा के समय लिया रिटर्न टिकट है।”

देश के समक्ष स्त्री-भ्रूण हत्या, भ्रष्टाचार, आतंकवाद पर भी उन्होंने अपनी स्पष्ट और कठोर राय किसी की परवाह न करते हुए रखी है। कन्या भू्रूण-हत्या के बारे में उन्होंने कहा, “जिसे कन्या न हो उसे चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं होना चाहिए। जिस घर में कन्या न हो, उस घर से रिश्तें नहीं बनाने चाहिए और साधु-संतों को ऐसे घरों से भिक्षा नहीं लेनी चाहिए। आतंकवाद पर वे कहते हैं, आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। जो धर्म आतंवादियों का प्रसव करता है वह धर्म ही नहीं है। राष्ट्रनिष्ठा पर उनका कहना है, यदि हम अपने जीवन में देश को प्रथम स्थान दें तो विकास के मार्ग पर देश बहुत बड़ी ऊंचाई पा लेगा। राजनीति के बारे में उन्होंने कहा, “राजनीति की विषबेल ने पूरे वृक्ष को अपने आगोश में लिया है। उस पर हर्षित होने वाले बहुत थोड़े लोग हैं। राजनीति सिद्धांतविहीन हो गई है। वह अपने चरित्र को सुधार नहीं सकती तो देश के चरित्र को क्या सुधारेगी? देश की राजनीति में सुधार करना हो तो जो भी भ्रष्ट नेता हैं उन्हें पागलखाने में डाल देना चाहिए।”

तरुण सागरजी महाराज युवा वर्ग में बहुत लोकप्रिय हुए। उन्हें धन की कोई लालसा नहीं थी। वे किसी भी मठ के मठाधिपाति नहीं हुए। मठ के नाम पर जमीन अथवा स्थिर सम्पदा उन्होंने नहीं जुटाई। पैसे का मोह न होने से वे किसी के किसी भी बंधन में नहीं बंधे थे। वे सच्चे अर्थ में मुक्त थे। इसलिए उनके कटु वचन भी किसी को चुभते नहीं थे। क्योंकि, वे सत्य कहते थे। सत्य कहने वाले के पास बड़ा नैतिक बल जरूरी होता है। तत्वज्ञान तो सभी बताते हैं। वे जो कुछ बताते थे वह लोगों को पता नहीं था, ऐसा नहीं था। लेकिन वह कहने के पीछे उनका जो नैतिक बल था, वह अतुलनीय था। इसलिए उनके शब्दों को सामर्थ्य प्राप्त होता था। राजस्थान विधान सभा में उन्हें सम्मानपूर्वक आमंत्रित कर उनके प्रवचन का कार्यक्रम आयोजित किया गया। विधान सभा में एक वस्त्रहीन संन्यासी कुछ कथित प्रगतिवादियों को खटका। उन्होंने उसकी निंदा की। तरुण जी की इस सम्बंध में जो राय है वह यह है कि स्तुति और निंदा का व्यक्ति को विचार नहीं करना चाहिए। जो जिस स्थिति में है उस स्थिति में आनंद पाये। एक साधु का उदाहरण देकर उन्होंने कहा कि, साधु ने एक दुष्ट से पूछा- कितने बजे हैं? दुष्ट ने साधु के सिर पर लठ दे मारा और कहा- एक बजा है। साधु हंसने लगा। शिष्य ने कहा, “आप क्रोधित न होते हुए हंस रहे हैं?” साधु ने कहा, “अच्छा हुआ मैंने उसे एक घंटे पूर्व नहीं पूछा। अन्यथा बारह बार लठ खानी पड़ती।”

तरुण सागरजी के प्रवचनों में भारतीय परंपराओं एवं विचारधारा का ही दर्शन होता था। जैन मुनि हैं, इसलिए अहिंसक ही हैं। वे भी अहिंसा ही बताते थे। लेकिन, रामायण, महाभारत, गौतम बुद्ध कुछ भी वर्ज्य नहीं था। प्रवचन में वे उसके उदाहरण दिया करते थे। दुर्योधन को सभी बुरे दिखाई देते हैं, जबकि युधिष्ठिर को कोई बुरा दिखाई नहीं देता। जिसका जैसा चश्मा वैसी उसकी दृष्टि। दुनिया उसे वैसी ही दिखाई देती है। संत वचनों का भी वे मार्मिक उपयोग किया करते थे। कबीर से एक ने पूछा, “सत्य और असत्य में कितना अंतर है?” कबीर ने कहा, “चार इंच!” कबीर का यह वचन सुनाकर तरुणजी कहते हैं, “प्रत्यक्ष आंखों से जो देखते हैं वह सत्य होता है। हम तो कान से चल रहे हैं। जिस किसी के बारे में हम कुछ सुन लेते हैं उसे ही सत्य मान कर चलते हैं। सत्य जानने के लिए हम कभी आंखों का इस्तेमाल नहीं करते।” नर्म विनोद उनकी एक और विशेषता थी। पति-पत्नी जा रहे थे। पेड़ पर एक बंदर था। उसकी ओर उंगली कर पति ने कहा, “वह देख तेरा रिश्तेदार बैठा है।” पत्नी ने कहा, “उसका मैं क्या करूं- शादी के बाद वह मेरा रिश्तेदार बन गया।”

भारत धर्मभूमि है। याने भारत भोगभूमि नहीं। त्यागभूमि है। आध्यात्मिक साधना में वस्त्रहीन रहना त्याग का सर्वोच्च आदर्श होता है। शरीर ढंकने के लिए वस्त्र का स्वामित्व भी न हो। तरुण सागरजी के पास एक मयूर पंख और एक कमंडल यही एकमात्र सम्पत्ति थी। अमेरिकी संस्कृति के बारे में उन्होंने कहा, “अमेरिका का सिद्धांत है- खाओ-पियो और मजा करो। रहो होटल में, मरो हॉस्पिटल में। हमारा सिद्धांत है- जीयो और जीने दो। रहो घर में, मरो तपोवन में।”

मरो लेकिन, ऐसे मरो कि आपके जो रिश्तेदार नहीं हैं, उनकी आंखों में भी पानी आ जाए। एक धेले की दक्षिणा न लेने वाला और समाज में रह कर मोह से अलिप्त रहने वाला यह संत सुनने में कटु लगने वाले मीठे वचन सुनाकर उम्र के इक्क्यावन वर्ष में सबको रुलाकर अनंत में विलीन हो गया। रिटर्न टिकट से उसकी यात्रा फिर शुरू होगी। वह कहां, कब और कैसी होगी यह हम नहीं बता सकते।

उनकी मृत्यु के बाद शोक प्रकट करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “उनके असमय निधान से मुझे बहुत दुख हुआ है। उनके समृद्ध आदर्श, सहानुभूति और समाज के लिए उन्होंने जो कार्य किया वह हमें सदैव स्मरण में रहेगा। उनका श्रेष्ठ मार्गदर्शन लोगों को सदा प्रेरणा देता रहेगा। उनके असंख्य शिष्यों और जैन समाज के दुख में मैं भी मन से शामिल हूं।” राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा, “जैन मुनि तरुण सागरजी महाराज के निधन का समाचार पाकर तीव्र दुख हुआ। उन्होंने अपने तीखे प्रवचनों के जरिए शांति और अहिंसा का समाज को संदेश दिया। अपने देश ने उनके रूप में एक सम्माननीय, आध्यात्मिक नेतृत्व खो दिया है।” दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने भी अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की है।

This Post Has One Comment

  1. बहुत सुंदर बहुत सुंदर तरुण सागर जी का प्रवचन लोगों को एक सही दिशा देने वाला प्रवचन है उस पर चलकर लोग अपने कर्तव्य के प्रति सजग रहते हैं और राष्ट्र धर्म के प्रति जागृत होती है

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