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गत वर्ष २० जून २०१५ को कविवर्य आलोक भट्टाचार्य का हृदयाघात से अचानक निधन हुआ। इस वर्षभर में उनके काव्य के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। उनके सम्बंध में विशेषांक भी निकाले गए हैं। उनके जीवन के विविध पहलुओं पर विशेषांक में अनेक परिचितों ने, कवियों ने और पत्रकारों ने विशेष रूप से लेखन किया है। अकाल मृत्यु को प्राप्त आलोक भट्टाचार्य का व्यक्तित्व उनके सम्पर्क में आने वालों को मोहित करने वाला था।
     आलोकजी का जन्म यद्यपि कोलकाता का था फिर भी सिरपुर कागजनगर सरीखी छोटी सी बस्ती में उन्हेंं रहना पड़ा एवं वहीं उनका बाल्यकाल व्यतीत हुआ। उस बस्ती में गाय बांधने के स्थान पर लगने वाले बाल विद्यामंदिर स्कूल में उनकी आठवीं तक की शिक्षा हुई। वहां आगे की पढ़ाई हेतु स्कूल न होने के कारण चंद्रपुर में छात्रावास में रह कर आगे की पढ़ाई करनी पड़ी। सप्ताह के सातों दिन बेसन-रोटी यही भोजन रहता था। परंतु इस स्थिति में भी उन्होंने माध्यमिक शिक्षा पूर्ण की। इसी समय में उन्होंने कविता लिखना प्रारंभ किया। एक कविता उन्होंने सहज ही रेडिओ सिलोन को भेजी और आश्चर्य कि वह स्वीकार कर ली गई एवं प्रसारित भी हुई। केवल बीस वर्ष की उम्र में आलोकजी को कवि संमेलन के निमंत्रण प्राप्त होने लगे और उसी समय बांग्लादेश से आने वाले शरणार्थियों हेतु निर्मित तंबूनुमा ऑफिस में उन्हें नौकरी मिली। परंतु इस छोटी सी नौकरी पर भी संकट आ गया एवं उससे छुटकारा प्राप्त करने हेतु उन्हेंं कोलकाता भेजा गया। वहां उन्हेंं साहित्यिक वातावरण मिला। परंतु उसके साथ ही नक्सलवादी किसान आंदोलन आदि का भी उन पर प्रभाव पड़ा। अपना लेखन एवं अन्य व्यवहार बांये हाथ से प्रभावी रूप से करने वाले आलोक वामपंथी विचारधारा की ओर झुके। बहुत समय तक उनका कोलकाता में रहना संभव नहीं हुआ और उन्हें कागजनगर वापस आना पड़ा। कुछ काल, जहां वे पढ़े थे उस बाल विद्यामंदिर में उन्होंने शिक्षक की नौकरी की। १९७६ में पिताजी के निधन के बाद उन्होंने मुंबई की राह पकड़ी और डोंबिवली में अपने भाई के यहां रहते हुए डोंबिवली के रेल्वे पुल पर अपने बनाए हुए चित्र एवं अन्य कला वस्तुएं बेच कर कुछ कमाने का प्रयत्न किया। इस अल्पकालीन प्रयत्न के साथ नौकरी प्राप्त करने के प्रयत्न भी शुरू थे। ‘एशिया महान’, ‘सूरज’, ‘उल्हास-विकास’, ‘सहकार संदेश’ इत्यादि समाचार-पत्रों में सहायक संपादक के रूप में उन्हें नौकरी मिली थी परंतु सभी अल्पजीवी रही। डोंबिवली में उन्होंने जनवादी लेखक संघ भी चलाया परंतु वे ज्यादा समय उसमें नहीं रह सके।
     एक दिन गयाचरण त्रिवेदी ने आलोकजी को माईक पर बोलते सुना। उनकी वजनदार आवाज से त्रिवेदी प्रभावित हुए और अन्य कुछ लोगों को भी उसका अनुभव होने पर शिवानंद स्वामी संगीत प्रतिष्ठान के शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम में आलोक जी को सूत्र संचालन करने का मौका मिला। उन्होंने उसका भरपूर लाभ उठाया। कार्यक्रम मराठी में परंतु सूत्र संचालन हिंदी में। डोंबिवली के रसिक श्रोताओं को वह बहुत पसंद आया और वामपंथी विचारों के परंतु साहित्य लेखन एवं काव्य प्रतिभा के धनी आलोक सहज रूप से डोंबिवली के साहित्यिक जीवन में रममाण हो गए। आलोकजी का डोंबिवली में आना उनके जीवन का ‘टर्निंग पाईंट’ था। उन्हें लेखक-कवि, कार्यकर्ता एवं मित्रों का अच्छा परिवार मिला। दक्षिणपंथी विचारधारा के लिए पहचानी जाने वाली डोंबिवली में वामपंथी विचारधारा के आलोकजी को एक नया पहलू मिला। वह था डोंबिवलीवासियों की गुणग्राहकता। डोंबिवली ने न केवल उन्हें स्वीकार किया वरन् उनके कलागुणों का सम्मान भी किया। आलोकजी का लेखन-काव्य फलता-फूलता गया। एक बार नहीं, दो बार उन्होंने राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त किए। प्रत्यक्ष अटलजी ने उनके ‘भाषा नहीं बैसाखी शब्दों की’ इस पुस्तक का गौरवपूर्ण उल्लेख करते हुए एक लाख लोगों की भव्य सभा में उनका सत्कार किया था। अनेक सेवा कार्यों का परिचय, साहित्य संगम, डोंबिवली के कार्यकर्ताओं का कई उपक्रमों में विशेषकर तलासरी में वनवासी बंधुओं के लिए चलाए जा रहे प्रकल्प जहां सेवा कार्यों के माध्यम से स्वयंसेवकों ने अनेक वर्षों से पालित पोषित वामपंथी विचारधारा को पुनर्विचार हेतु बाध्य किया था, ऐसे उपक्रमों में सहयोग आलोकजी ने पास से देखा। आलोकजी को शायद यह लगा होगा कि उनके विचारों से कोई भी मतभेद या विरोध न दर्शा कर ये लोग उनको मन से स्वीकार कर रहे हैं, सहकार्य कर रहे हैं, ‘आचारः परमो धर्मः’ का पालन कर रहे हैं। वामपंथी विचारधारा वाले परंतु गैर पोथीनिष्ठ आलोकजी डोंबिवली के सामाजिक जीवन में सहजता से समरस होते गए। भारतीय नववर्ष स्वागत यात्रा में अपने रौबदार बंगाली पहनावे में शामिल आलोकजी को जैसे डोंबिवली निवासियों ने देखा वैसे ही डोंबिवली में प्रभावी रूप से काम करने वाले तेरापंथियों के कार्यक्रम में अहम् भूमिका निभाने वाले आलोकजी को प्रत्यक्ष आचार्य तुलसी, आचार्य महाप्रज्ञ जी के उत्स्फूर्त आशीर्वाद का लाभ प्राप्त हुआ।
    

 आलोकजी न केवल अणुव्रती बने वरन् उसके प्रचारक बने। इतना ही नहीं; उस पंथ द्वारा डोंबिवली में गरीब महिलाओं के लिए चलाए जाने वाले उपक्रमों में सहभागी भी हुए। अहिंसा समदाय यात्रा के निमित्त जब आचार्य महाप्रज्ञ डोंबिवली आए तब उनका गणेश मंदिर की ओर से भावभीना स्वागत किया गया तब आलोकजी ने भावविभोर होकर मुझ से कहा, ‘‘आबासाहेब, इस प्रकार का प्रत्यक्ष सर्वधर्मसमभाव मैंने अन्यत्र कहीं नहीं देखा।’’
     आलोकजी अधिकाधिक अंतर्मुख होते गए और एक दिन भजन सम्राट अनंतबुआ भोईर द्वारा आयोजीत चार दिवसीय हिंदी गीत रामायण महोत्सव में सूत्र संचालक के आसन पर विराजमान हुए। उस महोत्सव को बहुत ख्याति मिली। रामायण गीतों को भी और उसके साथ आलोकजी के मधुर हिन्दी प्रस्तुतिकरण को भी। अनंतबुवा ने मुझ से कहा, ‘‘आबासाहेब, आलोकजी ने हफ्ताभर मेहनत की एवं हमारे हिंदी उच्चारण को याद कराया। इसलिए हम अच्छी तरह से गा सके। ‘‘सु-संचालक आलोकजी रामायण के भाष्यकार बने।’’
      ‘हिंदी विवेक’ के शुभारंभ से आलोकजी की लेखनी को एक और नया क्षेत्र मिला। उनके अनेक लेख ‘हिंदी विवेक’ में प्रकाशित होने लगे। उसको प्रतिसाद भी बहुत अच्छा मिलने लगा। ‘हिंदी विवेक’ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमोल पेड़णेकर आलोकजी का कृतज्ञतापूर्वक उल्लेख करते हुए बोले, ‘‘प्रारंभ में जब ‘हिंदी विवेक’ आकार ले रहा था उस समय आलोकजी के लेखों से ‘हिंदी विवेक’ की ओर साहित्यिकों का ध्यान आकृष्ट हुआ। आज ‘हिंदी विवेक’ को मिलने वाली प्रतिष्ठा में आलोक जी का सहभाग महत्वपूर्ण है।’’
      लेखन के साथ ही आलोक जी का वाचन भी बहुत चलता रहता था। प्रवास में रहते हुए भी बस्ते में चार-दो पुस्तकें रहती थीं। एक बार मेरी किताबों की आलमारी के सामने खड़े होकर पुस्तकें देखते हुए उनका ध्यान पं. दीनदयालजी की ‘एकात्म मानववाद’ पुस्तक की ओर गया। उन्होंने वह पुस्तक मांगी एवं पढ़ कर वापस करते समय कहा, ‘‘बहुत अच्छा चिंतन है, केवल आर्थिक दृष्टिकोण से विचार करने की अपेक्षा मनुष्य का सर्वांगीण विचार करते समय दीनदयालजी ने जो नैतिकता का ऊहापोह किया है वह मानवी जीवन में संपत्ति के साथ समृद्धि लाने वाला है।’’
      हास्य, विनोद, लेखन, काव्य, शेरोशायरी में मन से रम जाने वाले आलोक जी दिल के बहुत खुले थे। यह उनका विशेष गुण था। वे केवल पोथीनिष्ठ विचारक नहीं थे। इसीलिए प्रत्यक्ष अनुभव के कारण अपनी विचारधारा में होने वाला बदलाव उन्होंने विचारपूर्वक स्वीकार किया। इसका कारण बाहर से कुछ आक्रमक एवं निग्रही दिखने वाले इस व्यक्ति के अंतरंग से स्नेह एवं भावुकता का अखंड बढ़ने वाला झरना था।
      उनके आकस्मिक निधन के बाद डॉ. सुलभा कोरे द्वारा सम्पादित ‘आसरा मुक्तांगन’ के विशेष अंक में उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलू अनेकों की लेखनी से प्रकट हुए हैं। एक छोटे लेख की मर्यादा में समाविष्ट होने वाला वह व्यक्तित्व नहीं था। उनके प्रथम स्मृतिदिन के निमित्त १६ जून को डोंबिवली में अनिल त्रिवेदी द्वारा आयोजित कार्यक्रम में डोंबिवली निवासी एवं अन्य ज्येष्ठ साहित्यकारों को भी आलोकजी के बारे में बहुत कुछ बोलते हुए भी अपने शब्द कम पड़ते महसूस हुए होंगे।
                                                                                                                     

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