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मैं नरेन्द्र कृष्णाजी देसाई’ करारी आवाज में उन्होंने अपना परिचय दिया था। इस घटना को तीस साल हो गए। संघ बैठक में जिला कार्यकर्ता के तौर पर उन्होंने अपना परिचय दिया। मुंबई के पश्चिम उपनगर में निवास, तथा नौकरी महापालिका के जी. एस. चिकित्सा महाविद्यालय में फार्मसी के प्राध्यापक। यह शुरुआती पहचान विगत तीन दशकों में दृढ़ हुई। वे जिला संघचालक और तीन जिलों के विभागीय संघचालक थे। इस कारण बैठक में, सफर में उनसे मिलना-जुलना होता था। इस से स्नेह सम्बंध दृढ़ बना। मुझे पता चला उनका परिपक्व स्वयंसेवक होना। करीब सभी बैठकों में उपस्थित होना, कार्यक्रम उपक्रम में सम्मिलित होना, जरूरी कार्यों में उपस्थित होना, बैठक में सक्रिय हिस्सा लेना जैसे उनके गुण मेरे मन पर प्रतिबिंबित हुए। उनसे ज्यादा मेलजोल बढ़ने के बाद पता चला कि सफ़र करना और निम्न स्तर के कार्यकर्ताओं से अनौपचारिक मेल-मुलाकात करने में श्री नरेन्द्र देसाई परिपूर्ण थे। यह कहा जा सकता है कि वे एक परिपूर्ण स्वयंसेवक एवं जिम्मेदार कार्यकर्ता थे।
विभागीय कार्यकर्ता के तौर पर हमारा सम्पर्क बढ़ा। जनकल्याण समिति के काम में उनका सहयोग बढ़ा। उस माध्यम से सेवा क्षेत्र में रूचि होने के कारन उनका योगदान बढ़ा। चिकित्सा महाविद्यालय के प्राध्यापक, संशोधक की सारी जिम्मेदारी संभाल कर शेष समय वे संघ कार्य और जनकल्याण समिति के काम को देते थे। ‘फार्मसी’ विषय में उन्होंने डॉक्टरेट प्राप्त की थी। संशोधन कार्य में उनका सहभाग होता था। इन सारी बातों का उन्होंने संघ कार्य पर असर नहीं होने दिया। इस से परिवार के लिए उनके पास समय कम बचता था। यह बात अन्य कार्यकर्ताओं की तरह परिवार के सदस्यों ने भी स्वीकार की थी।
सेवा क्षेत्र में उनकी रूचि और गति समझ कर मैंने उन्हें जनकल्याण समिति का कार्यवाह पद सौंपना चाहा। तब तक जनकल्याण समिति के कार्य का विस्तार प्रांत भर में हुआ था। यह पूर्ण समय कार्यकर्ता का काम था। पर उन्होंने परिश्रम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। नौकरी के कार्यकाल में उन्हें और बढ़ोत्तरी मिलने वाली थी, अच्छा धनलाभ भी हो सकता था, फिर भी उन्होंने संघ प्रचारक की तरह जनकल्याण समिति का काम पूर्ण कार्यकर्ता के तौर पर निभाया। जनकल्याण की बड़ी योजनाओं में उनकी दिलचस्पी थी। पूर्वांचल के महाराष्ट्र के छात्रालयों के कामकाज देखना उनका पसंदीदा काम था। छात्रों को मिलना तथा उनकी शिक्षा व्यवस्था, विशेष भोजन व्यवस्था की ओर वे स्वयं ध्यान देते थे। जनकल्याण समिति के अध्यक्ष किशोरपंत बापट और डॉ. देसाई ने पूर्वांचल का कई बार दौरा किया। पूर्वांचल के राज्य और महाराष्ट्र के बीच आर्थिक सम्बंध दृढ़ बनाना तथा राष्ट्र भावना का वृद्धिंगत होना इसमें छात्रालयों का महत्वपूर्ण योगदान है। लातूर जिले की बड़ी योजना जनकल्याण निवासी विद्यालय, विविध स्थलों के भारत माता मंदिर, इत्यादि के लिए वे कई बार यात्रा करते थे। ठाणे जिले के ‘चलती-फिरती प्रयोगशाला’ में उनकी रूचि थी, पर उनका विशेष प्रेम था पनवेल की चिकित्सालय योजना के प्रति। पनवेल के संघ कार्यकर्त्ता शल्य विशारद डॉ. प्रभाकर पटवर्धन की मृत्य के बाद उनकी पत्नी श्रीमती नीलाताई पटवर्धन ने वह पूरा हॉस्पिटल जनकल्याण समिति को दे दिया। कार्यवाह पद के कार्यकाल में इस योजना को विस्तृत रूप देने के लिए उन्होंने कोशिश की। निधि जमा किया, नया भवन बनाया, सुविधाएं उपलब्ध कीं। ‘डॉ. प्रभाकर पटवर्धन स्मृति रुग्णालय’ का पनवेल में विशेष स्थान निर्माण किया। व्यावसायिक डॉक्टरों ने अगर साथ दिया होता तो डॉ. देसाई का योगदान और प्रभावी रीति से पता चलता।
जनकल्याण समिति के कार्य के साथ-साथ ‘नाना पालकर स्मृति समिति’, ‘आरोग्य भारती’, और अब ‘सेवा भारती’ आदि संस्थाओ में उनका सहयोग रहा। इन सारे कामों के लिए वे पर्याप्त समय देते थे। ‘सेवा भारती’ संस्था का अखिल भारतीय दायित्व होने के कारण उनका पूरे देशभर में अविरत रूप से संचार होता था।
‘अविरत मेहनत यानि संघकार्य’ जैसी पद्य पंक्ति उनके व्यवहार से पता चलती थी। इस कालावधि में मानसिक तनावों का सामना करने के प्रसंग आए होंगे और आए भी। अनुशासित स्वयंसेवक होते हुए, उन्होंने किसी पद के लिए अभिलाषा व्यक्त नहीं की। सूचित करने पर पद से अवकाश ले लिया। उनकी मृत्यु आकस्मिक थी। ७५ वर्ष की उम्र में मृत्यु जल्दी नहीं, लेकिन आजकल के समय में जल्दी ही मानी जाएगी। ‘कार्यमग्न जीवन हो और मृत्यु हो विश्राम’ इस पंक्ति के अनुसार अंतिम सांस तक कार्यरत रहने वाले इस पूर्ण रूप से संघ को समर्पित कार्यकर्ता को नमन।

                                         

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