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मनोविज्ञान की भाषा में आत्ममोही (narcissist) वैसे लोगों को कहा जाता है, जिन्हें बाहर की दुनिया से कम मतलब होता है और वे खुद को ही सबसे बेहतर मानते हैं. अपने आप के लिए जीते हैं और हमेशा खुद की चिंता करते हैं.

इसके विपरीत कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो दूसरों की खुशी के लिए अक्सर अपने आपको दुखी कर लेते हैं या फिर खुद को मुसीबत में डाल लेते हैं. ऐसे लोगों को पीड़ा सुखभोगी या मैसोचिस्ट (masochist) कहा जाता है.  व्यक्तित्व का यह प्रकार भी सामान्य नहीं माना जाता, क्योंकि एक सुखद एवं सफल जीवन के लिए व्यक्ति के लिए अपने आत्मसम्मान की भावना को बनाये रखना बेहद जरूरी है. जानिए क्या है मैसोचिस्ट पर्सनैलिटी की पहचान.

– मैसोचिस्ट लोगों की सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि वे किसी काम के लिए ‘ना’ नहीं कह पाते, भले ही उन्हें खुद इसके लिए कोई परेशानी उठानी पड़े. इसी वजह से कई बार ऐसे लोग फालतू के बेतुके कामों में भी उलझ जाते हैं. इससे न केवल इनका समय बर्बाद होता है, बल्कि इन्हें खुद भी इसका अफसोस होता है, लेकिन ये अपनी इस आदत से मजबूर होते हैं. कई बार अन्य लोग मैसोचिस्ट लोगों का भावनात्मक रूप से फायदा उठाते हैं.

–  ऐसे लोग अक्सर नारसिस्ट लोगों के चंगुल में फंस जाते हैं.  नारसिस्ट जो कि हमेशा खुद की चिंता करते हैं. अपने लिए जीते हैं. आत्मविश्वास से भरपूर होते हैं. उन्हें लगता है कि वे कभी गलत हो ही नहीं सकते हैं. वे हर काम में खुद को परफेक्ट मानते हैं और अपने आपको सही साबित करने के लिए सामनेवाले को नीचा दिखाने या उसका दिल दुखाने से भी नहीं चूकते. वे मैसोचिस्ट लोगों का भरपूर फायदा उठाते हैं और वे चाह कर उनके चंगुल में बचने से खुद को रोक नहीं पाते. मन-ही-मन घुटते रहते हैं.

– ऐसे लोग अक्सर अपने आपको दुख पहुंचाकर दूसरों को खुश करने की कोशिश करते हैं. कई बार भरी सभा में लोग इनकी हंसी उड़ाते हैं और ये लोग यह सोच कर कि ‘चलो मुझे बेवकूफ बना कर ही सही, सामनेवाले को खुशी तो मिल रही है’- कुछ नहीं कहते. हालांकि ऐसा नहीं है कि इन्हें बुरा नहीं लगता या फिर ये खुद को अपमानित महसूस नहीं करते, लेकिन ये ‘खुद का मखौल बनाये जाने का’ विरोध नहीं कर पाते. यह प्रवृत्ति वास्तव में किसी भी व्यक्ति के

मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है. ऐसे लोगों को यह समझना जरूरी है कि हम कभी भी पूरी दुनिया को अपनी बात से सहमत या खुश नहीं कर सकते, इसलिए जो बात पसंद नहीं, उसके लिए ‘ना’ कहना सीखें. खुद को खुश रख कर ही कोई इंसान दुसरों को भी खुश रख सकता है, वरना दुखी मन का प्रभाव व्यक्ति के विचारों और व्यवहारों पर भी पड़ना स्वाभाविक है.

– इस प्रकार के लोग बार-बार अपमानित होने के बावजूद भी अपनी गलतियों को दुहराने से बाज नहीं आते. कुछ समय बाद वे सब कुछ भूल कर सामनेवाले को माफ कर देते हैं और दुबारा से सहज हो जाते हैं. इस तरह बार-बार भावनात्मक चोट खाने की वजह से ऐसे लोग जल्दी ही अवसाद का शिकार हो जाते हैं.मैसोचिस्ट लोग रक्षक प्रवृत्ति के होते हैं. वह हमेशा लोगों और चीजों को बचाने की कोशिश करते हैं. अपने जीवन में शामिल रिश्तों और परिस्थिति को बचाने के लिए किसी भी तरह का समझौता करने को तैयार हो जाते हैं, चाहे इसके लिए उन्हें अपने ‘आत्म’ को ही दांव पर क्यों न लगना पड़े. इस चक्कर में कई बार वे खुद को परेशानी में फंसा लेते हैं. उनकी इस प्रवृत्ति की वजह से उनमें आत्मविश्वास की कमी होने लगती है. वे अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने से कतराने लगते हैं.

-एक स्वस्थ व्यक्तित्व की यह पहचान है कि वह हमेशा सकारात्मक परिस्थितियों और विचारों की ओर उन्मुख रहता है, लेकिन मैसोचिस्ट लोग अपनी नकारात्मक भावनाओं को खुद से अलग नहीं कर पाते. नकारात्मक बातें और चीजें लगातार उनके दिमाग पर हावी रहती हैं.

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