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वैश्विक व भारतीय राजनीति में फिलहाल एक ज्वलंत प्रश्न है मुस्लिम जगत में बढ़ती दाहकता को समझने का। विश्व में कहीं भी होने वाले आतंकवादी हमलों में एकमात्र समानता यह होती कि ये हमले करने वाले मुस्लिम होते हैं। फिर वह तुर्की का इस्तंबूल हो, फ्रांस का पेरिस हो, आस्ट्रिया का विएन्ना हो, अमेरिका का न्यूयार्क हो, थाईलैण्ड का बैंकाक हो या कि भारत का श्रीनगर। इन सभी स्थानों में भौगोलिक अंतर काफी है। लेकिन मुस्लिम आतंकवादियों की खतरनाक विचारधारा इन सभी घटनाओं में समान है। अमेरिका, यूरोप जैसी पश्चिैमी विचारधारा को और अब हिंदुओं के स्थल के रूप में भारत को अपना निशाना बनाने वाले आतंकवादियों ने मुस्लिम राष्ट्रों में भी अपनी आतंकवादी कार्रवाइयों को अंजाम देना शुरू किया है। सऊदी अरब की मदिना मस्जिद मुहम्मद पैगंबर ने स्थापित की है। इस मस्जिद को रमज़ान के पवित्र माह में मानवी बम के विस्फोट से निशाना बनाया गया। बांग्लादेश के ढाका और इराक के बगदाद में भी भीषण आत्मघाती हमलों में २०० से अधिक लोग मारे गए।

     इन घटनाओं पर मुस्लिम जगत में कुछेक छिटपुट प्रतिक्रियाएं उभरीं। निर्वासित जीवन जी रही बांग्लादेश की लेखिका तस्लिमा नसरीन ने कहा है कि ‘‘इस्लाम को अब शांति का धर्म कहना बंद कर दिया जाना चाहिए।’’ फिल्म अभिनेता सलमान खान के अब्बाजान ट्विटर पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहते हैं, ‘‘दुनियाभर के आतंकवादी स्वयं को मुस्लिम कहते हैं। मुस्लिम व्यक्ति तो मुहम्म्द पैगंबर एवं कुरान का अनुशीलन करता है। परंतु ये आतंकवादी किसका अनुशीलन करते हैं कौन जानें? लिहाजा, ये आतंकवादी इस्लाम का अनुशीलन नहीं करते और ऐसे आतंकवादी यदि अपने को मुस्लिम कहते होंगे तो मैं तो फिर मुस्लिम हूं ही नहीं।’’ हर घटना के बाद इस तरह के बयान प्रकाशित होते रहते हैं कि ये आतंकवादी सच्चे मुसलमान नहीं हैं। लेकिन प्रत्यक्ष में इन वक्तव्यों का इस्लामी जगत में क्या कोई महत्व है? क्योंकि, पूरी दुनिया में हो रही ध्वंसक, आतंकवादी घटनाओं पर गौर करें तो लगता है कि किसके माथे पर मुसलमान एवं किसके माथे पर काफिर (गैर-मुस्लिम) लिखें यह दायित्व तो इस्लामिक स्टेट, तालिबान, अलकायदा जैसे आतंकवादी संगठनों ने अपने ऊपर ले रखा है। इस तरह की प्रतिक्रियाएं दबी जुबान में आती दिखाई देती हैं और ऐसी दबी, आतंकित प्रतिक्रियाओं में से जब ‘इस्लाम’ को परिभाषित करने का प्रयास होता है तो वह सच्चे अर्थों तक नहीं पहुंच पाता। कुरान और पैगंबर मुहम्मद ये दो बातें ही इस्लाम में महत्वपूर्ण होती हैं। हर मुसलमान इन दो बातों को ही प्रमाण के तौर पर पेश करता है। पवित्र कुरान में ४१ बार आए ‘जिहाद’ शब्द का अर्थ ‘बदला’ शब्द से साधर्म्य नहीं रखता, जबकि ‘जिहाद’ का अर्थ ‘संघर्ष’ का बोध कराता है। उसका हिंसा या बदला से किंचित भी सम्बंध ही नहीं है। इस्लाम में जबरदस्ती धर्मांतरण को बिल्कुल स्थान नहीं है। इस तरह इस्लाम के मूल तत्व विशद करने वाले बयान करते समय एक पंक्ति यह अवश्य जोड़ी जाती है कि ‘आतंकवाद एक विकृति है और इस विकृति का कोई धार्मिक चेहरा नहीं होता।’ ये सारे बयान सुनते समय यह प्रश्नल मन में अवश्य उभरता है कि यह सब सच होने पर भी दुनियाभर में होने वाली आतंकवादी घटनाओं में मुस्लिम मानसिकता क्यों मौजूद होती है? मुस्लिम धर्मियों का ही चेहरा क्यों सामने आता है? दुनियाभर में फैली इस्लामी कट्टरता ने इस्लाम की शांति की मूल शिक्षा के बारे में प्रश्नर उपस्थित किए हैं। इतिहास के पन्ने पलटे तो इस्लाम का ध्वंसक चेहरा ही सामने आता है। ऐसे समय में तस्लिमा नसरीन का दबी जुबान और आतंक के साये में किया गया बयान हमें ठीक लगने लगता है। दुनियाभर में होने वाला भीषण, विनाशक आतंकवाद और उसमें हजारों लोगों की जान मुस्लिम आतंकवादी लेते हैं और वे इसके लिए यदि इस्लाम का आधार लेते हों तो इस्लाम शांति का धर्म है, यह बात गले नहीं उतरती। कोई भी धर्म एक ही परिभाषा पर नहीं टिकता। समय के साथ परिवर्तन हर धर्म में हुए हैं। लेकिन इस्लाम धर्मीय कोई भी परिवर्तन स्वीकार नहीं करते। उनकी विचारधारा में कुरान के शब्द अंतिम हैं। कुरान में यदि शांति का संदेश है तो अलकायदा के ओसाम बिन लादेन का इस्लाम, इसिस के खलिफा अल बकर अल बगदादी का इस्लाम, इसिस का आतंकवादी इस्लाम क्यों पनप रहा हे?

     

 इतिहास में हुई इस्लामिक ध्वंस की बातों के साथ वर्तमान में हो रही घटनाएं भी बहुत कुछ बोलती हैं। न्यूयार्क में वैश्वितक पूंजीवाद के प्रतीक वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला कर उसे जमींदोज करने का अर्थ है अमेरिका को चपत लगाकर विश्वा को यह भान करना कि उनके लिए कुछ भी असंभव नहीं है। मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले से लेकर मेड्रिड, लंदन तक हुई आतंकवादी घटनाएं, सलमान रुश्दी से शार्ली हेब्दो तक, आविष्कार स्वतंत्रता के विरोध में हुई हिंसक इस्लामी प्रतिक्रिया, बांग्लादेश, इराक तथा फ्रान्स में आतंकवादियों द्वारा लोगों को ट्रक से कुचलने की घटना के साथ दुनियाभर में होने वाले आतंकवादी हमलों पर गौर करें तो एक प्रश्नी मन में उभरता है कि क्या इस्लाम शांति का धर्म है?

      इतिहास का अध्ययन कर, वैश्विाक राजनीतिक इतिहास पर बारीकी से गौर कर और वर्तमान भौगोलिक, सामाजिक घटनाक्रम पर विस्तृत विचार कर इस प्रश्नि का उत्तर खोजें तो ‘इस्लाम शांति का धर्म है’ यह स्वीकार करने लायक उत्तर नहीं मिलता।

      ‘यदि आतंकवाद विजयी रहा तो उसके सर्वाधिक एवं सर्वप्रथम बलि तो इस्लामी नागरिक ही होंगे। वे अकेले बलि नहीं जाएंगे, अन्यों को भी उनके साथ कष्ट भुगतने होंगे। यह इस्लामी कट्टरवादी, जिहादी इस्लाम का एक कटु सत्य है।’ यह बयान कहीं पढ़ा था। आज दुनियाभर में जो आतंकवादी हिंसाचार जारी है वह बड़े पैमाने पर इस्लामी जगत में भी चल रहा है। मिस्र, सीरिया, तुर्की, पाकिस्तान, इराक, ईरान, नाइजेरिया और अन्य इस्लामी देशों में भी रक्तरंजित हिंसाचार जारी है। इस्लामी विचारधारा के जिहादी आतंकवादी जिन इस्लामी तत्वों को सही मानते हैं, उन तत्वों को स्वीकार करें या मौत के लिए तैयार रहें। अपना इस्लाम छोड़ कर शेष सारी दुनिया से उन्होंने जिहाद छेड़ा है यह भी नहीं है; अपितु शिया और सुन्नी के बीच तनाव से भी विश्वं शांति भंग हो रही है। जहां कहीं शिया या सुन्नी बहुसंख्या में होते हैं वहां एक दूसरे का खात्मा करने के लिए कार्रवाइयां करते रहते हैं। एक-दूसरे के खिलाफ भयानक नरसंहार करवा रहे हैं।

      यवनों का आतंकवादी संगठन तो सोचता है कि अन्य सभी धर्म बुरे हैं इसलिए उन्हें खत्म किया जाना चाहिए। इसीलिए तोड़फोड़ कर आधुनिक होटलों एवं अन्य स्थानों पर आतंकवादी हमले किए जाते हैं। शिया और सुन्नी एक-दूसरे की मस्जिदों पर हमेशा हमले करते रहते हैं, ध्वंस कराते रहते हैं। इससे इस्लामिक विचारधारा में संघर्ष बढ़ गए हैं। वे विश्वप के अन्य सभी धर्मियों को ‘काफिर’ मानते हैं। इस्लामिक वैचारिक भिन्नता- कट्टरता ने इतना विकृत स्वरूप ले लिया है कि वे मुस्लिम समुदाय में भी एक दूसरे को मुसलमान नहीं मानते। इस विचारधारा के कारण ही मुस्लिम जगत में भी विनाशक ध्वंस हो रहा है। फलस्वरूप जब-जब आतंकवादी हमले होते हैं तब ‘इस्लाम शांति का धर्म है और सभी मुस्लिम आतंकवादी नहीं हैं’ जैसे बयान करने वाले लोगों को दुनिया आरोपी के पिंजड़े में खड़ा करती है। कौनसा इस्लाम सही- आपका या आतंकवादियों का? समय के साथ बदलना धर्म का मूल तत्व होना चाहिए। हजारेक सालों में भी वह मुस्लिम समाज के समझ में नहीं आया यह सत्य है। इसी कारण इस्लामी बुरखा, सिर की टोपी, मस्जिद की अजान इन पर समाज में व्यक्त होने वाला रोष इस समस्या का केवल बाह्य लक्षण है। सच बात यह है कि इस्लामिक विचारधारा ने आज दुनिया को एक विस्फोटक परिस्थिति में लाकर खड़ा किया है, यह सारे विश्वत के अज्ञानी लोगों तक को अनुभव होने लगा है।

       धर्म और संस्कृति के मामले में मुसलमान व अन्य समुदायों में दूरी अधिक बढ़ रही है और उसकी गति तीव्र है। आतंकवादी कार्रवाइयां उसका मुख्य कारण है। यूरोप में मुसलमानों के अवमान की घटनाएं बढ़ रही हैं। व्यक्ति मुसलमान है यह उसके पेहराव, दाढ़ी से पता चलने पर तिरस्कार की भावनाएं व्यक्त हो रही हैं। दुनियाभर में मुसलमानों के प्रति शक, दूरी, क्रोध, द्वेष के भाव लगातार बढ़ रहे हैं। कोई घटना होने पर ये भाव अधिक उफन उठते हैं। इन घटनाओं पर गौर करें तो गैर कुछ नहीं लगता, क्योंकि इस्लामी आतंकवादी दुनियाभर में लोगों को जीने नहीं दे रहे हैं। ऐसे समय में उस स्थान के मुसलमान संगठित होकर आतंकवादियों को नहीं रोकते। उनके देश में या प्रांत में आतंकवाद को रोकने के लिए अन्य बाहरी लोगों का हस्तक्षेप वे पसंद नहीं करते। दुनियाभर के मुसलमान आतंकवाद के विरोध में कठोरता से एवं परिणामकारक रूप से खड़े दिखाई नहीं देते। सारी दुनिया में मुस्लिम युवा बड़े पैमाने पर आतंकवादी कार्रवाइयों में सक्रिय दिखाई देते हैं। विश्वत को ‘दारुल हब’ से मुक्त कर ‘दारूल इस्लाम’ में परिवर्तित करने का नशा इस्लामी धार्मिकता देती है। मुल्ला-मौलवी विश्वे में ‘सच्चा इस्लामी राज्य’ स्थापित करने का सपना युवकों में जगाते हैं। किसी आतंकवादी संगठन से फौजियों की जब मुठभेड़ होती है तब फौजियों का मनोबल बढ़ाने के बजाय मुस्लिम समाज की भीड़ उन पर पीछे से हमले करती है। कोई आतंकवादी मारा जाने या उसे फांसी दिए जाने पर उसके जनाजे में हजारों की संख्या में मुस्लिम समाज एकत्रित होता है। यह सब देखने के बाद मुस्लिम मानसिकता अपने-आप ही विश्वे के समक्ष आती होगी।

      और ऐसे समय मन में प्रश्नस आते हैं कि ‘प्रत्येक हमले के बाद इस्लाम शांति का धर्म है’, ‘हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता’ ऐसे हमेशा जारी किए जाने वाले बयान झूठे लगते हैं। यदि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता तो फिर मुसलमानों के आतंकवादी होने का प्रश्नन दुनिया के समक्ष क्यों आता है?

       जब तक ‘दुनिया में सच्चे इस्लामी धर्म की स्थापना करने’ का गैर-विश्वा्स मुस्लिम समाज के मन में है तब तक दुनियाभर के मुसलमानों में परिवर्तन होने की संभावना नहीं है। इससे सच्चा मुसलमान और गैर-मुसलमान की भावना जोर पकड़ रही है और जो गैर हैं उन्हें जीने का अधिकार न होने की मानसिकता बढ़ रही है। इस मानसिकता का परिणाम विश्वु के अन्य धर्मों के साथ मुस्लिम धर्म का भी ध्वंस कर रही है। इसी भावना पर आघात करने की जरूरत है। आज जो मुस्लिम विचारक मुस्लिम धर्म की वकीली करते हैं उनका उद्देश्य भी स्पष्ट नहीं होता। क्या ये लोग दुनिया को इस्लामी बनाने की प्रक्रिया के ही अंग हैं? यह संदेह पैदा होता है। मुस्लिमों की जो पारंपारिक धार्मिकता है उसे ही काटने वाले, उस पर प्रहार करने वाले मुस्लिम प्रतिनिधि दुनियाभर में नहीं दिखाई दे रहे हैं।

       आज मुस्लिम समाज में परिवर्तन का जो प्रवाह आना अपेक्षित है वह प्रवाह स्पष्ट रूप से प्रतिपादित करने वाले, समझाने वाले समाज सुधारक उनमें निर्माण नहीं हो रहे हैं। आज मुस्लिम समाज में ज्ञानेश्वमर, विवेकानंद जैसे विचारकों, समाज सुधारकों की आवश्यकता है। आज दुनिया बदल रही है, तेजी से बदल रही है। दस साल पहले की दुनिया आज नहीं है। आज की दुनिया कब तक यथावत रहेगी, इसकी कल्पना नहीं है। तकनीकी के क्षेत्र में हो रहे विलक्षण बदलाव हमारे जीवन में भी बदलाव ला रहे हैं। ऐसे समय में आधुनिकता एवं अपनी संस्कृति के साथ रहने की धार्मिक भूमिका स्पष्ट नहीं हो रही है। हमें छोड़ कर सारी दुनिया अंधकारमय है यह इस्लाम की भूमिका है। समय के साथ बदलना धर्म का मूल तत्व है, यह मुस्लिम समाज ने नहीं समझा है।

       और यह समझने के लिए डॉ.जाकिर नाईक या अडेलटट्टू धर्मांध मुल्लाओं के वक्तव्य काम नहीं आने वाले हैं। इस्लाम में सुधार करना याने अपनी पहचान नष्ट करना यह विचार रखने वाले विचारक इस्लाम में परिवर्तन नहीं ला सकेंगे। सुधारों के लिए इस भय से मुक्त होना होगा कि सुधार करने पर इस्लामी समाज बहिष्कृत करेगा, आतंकवादियों की दबंगाई सहनी पड़ेगी। इस्लामी धर्म के विचारकों को अगुवाई कर स्वधर्म में भेद (जो सारी दुनिया को कष्टदायक सिद्ध हो रहे हैं) व अन्य धर्मियों के सम्बंध में ‘काफिर’ की भावना से मुस्लिम समाज को बाहर निकालने के लिए आमूल परिवर्तन कराने के प्रयास करने चाहिए।

       इस तरह के समयानुसार परिवर्तनों एवं सुधारों की हिंदू संस्कृति एवं दर्शन एक मिसाल है। कृष्ण ने गीता कथन की और उसका हिंदू दर्शन में समावेश होता है। लेकिन पांच हजार वर्षों में गीता भी प्रवाही और लचीली बनी रही और समय के साथ वह कदम मिलाती रही। गीता में धर्म, सेवा, संन्यास के साथ युद्ध एवं जीवनावश्यक बातों का भी समावेश है। गीता हिंदू दर्शन भले हो, लेकिन दुनिया के समस्त लोगों के लिए जीवन के व्यवहार में उतनी ही सहायक भी है। इसी तरह संत ज्ञानेश्वसर का ‘विश्वव कल्याण का दर्शन’ भी महत्वपूर्ण है। आज हिंदू दर्शन की ओर देखें तो दिखाई देगा कि वह समय के साथ प्रवाही एवं परिवर्तनशील रहा है। उसमें समय के अनुसार परिवर्तन सम्बंधित क्षेत्रों के प्रतिनिधियों ने समाज के समक्ष प्रभावी रूप से रखा। कभी ज्ञानेश्विर, रामदास, विवेकानंद, दयानंद जैसे अनेक रूप दिखाई देते हैं। उन्होंने समाज की समस्याओं को प्रभावी रूप से प्रस्तुत किया और न्यून स्थानों पर प्रचंड प्रहार भी किए।

       भारतीय मुसलमान यदि भारतीय दर्शन पर गौर करें तो परिवर्तन एवं सुधारों के मामले में वे अगुवाई कर सकते हैं। भारतीय दर्शन में विश्वि शांति के बीज हैं। आवश्यकता केवल यह है कि मुस्लिम विचारक ‘इस्लाम शांति का धर्म है’ यह कहते रहने के बजाय इस बात पर भी गौर करें। इस्लामी समाज को इस समय दुनिया को इस्लाममय बनाने की धुन से बाहर आकर ‘विश्वात्मक’ की भावना में समाज को ले जाने वाले, क्रांतिकारी विचार देने वाले नेतृत्व की आवश्यकता है।

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