हिंदी विवेक : we work for better world...

           

भारत विभाजन के पश्चात् पश्चिमी पंजाब (वर्तमान पाकिस्तान) से विस्थापितों के लिए स्थापित ३ शिविरों में से एक शिविर पानीपत जिला स्थित समालखा में लगा था। यहां से व्यथित हिन्दू बंधुओं को एक-एक करके अलग-अलग स्थानों पर (हरियाणा में) भेजने की व्यवस्था की गई थी। उसी ऐतिहासिक स्थान के निवासी अपने चिरंजीव संस्कार नर सेवा नारायण सेवा को जीवित रखते हुए सेवाभारती के मार्गदर्शन में अपने ही समाज में रहने वाले भिन्न और उपेक्षित समझे जा रहे लोढ़ा जाति के बच्चों का भविष्य संवारने में लगे हैं।

 देखने में एक सामान्य मकान जैसा लगने वाला छोटा बाल विद्यालय है। एक महिला अपनी दोहिति को मिलने एक दिन विद्यालय में आई। दूसरी कक्षा की छात्रा की नानी उस बच्ची से घर की चाबी लेने आई है यह जानकारी होने पर अध्यापिका उस वृद्धा के पास गई और पूछा कि आपकी दोहती के पढ़ने का कोई लाभ भी हो रहा या नहीं? अध्यापिका द्वारा यह प्रश्न पूछने पर वृद्धा के चेहरे पर चमक आ गई और कहने लगी कि वह तो मेरा और अपने नाना का नाम भी बांच लेती है, यह कह कर नानी ने स्वेटर की बांह हटा कर हाथों पर गुदवाया गया नाम दिखाया जहां पर दोनों के नाम गुदे हुए थे (इस जाति की महिलाएं विवाह पश्चात् अपनी बाजू पर स्वयं का और अपने पति का नाम गुदवाती हैं)। यह कह कर भावुक होते हुए वे बोलने लगीं कि कई पीढ़ियों के बाद उनके परिवार में पढ़ाई ने प्रवेश किया है।   

हरियाणा प्रदेश के २२ जिलों में शिक्षा संस्कार के क्षेत्र में चल रहे १६२ सेवा कार्यों (बालसंस्कार केंद्र, विद्यालय) में समालखा सेवाभारती भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही है। समालखा नगर में इस समय ६ सेवा कार्य चल रहे हैं।

 इस नगर के पश्चिमी भाग में स्थित एक बस्ती है,जो लोढ़ा बस्ती के नाम से जानी जाती है। इस बस्ती में अधिकतर लोग लोढ़ा जाति के लोग रहते हैं। काफी समय पहले घुमंतू समझी जानी वाली यह जाति अब यहां स्थायी निवास कर रही है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार से आये हुए कुछ मजदूर परिवार भी इस बस्ती के आसपास रहते हैं। इस बस्ती में रहने वाले लोगों का रहन-सहन, भोजन और भाषा यहां के स्थानीय लोगों से सर्वथा भिन्न है। इस कारण इस बस्ती के बच्चों को स्थानीय विद्यालय में प्रवेश नहीं मिल सका था। लगभग एक हजार की आबादी वाली इस बस्ती के बच्चों की जीवनचर्या अस्वच्छता, कुसंस्कार, अशिक्षा और अस्वास्थ्य के कारण अंधकारमय बनी हुई थी।

 सेवाभारती, समालखा नगर की टोली को यह स्थिति बहुत कचोटती थी। फिर एक दानी सज्जन ने अपना भवन बिना किराये सेदेना तय किया और सन २०१० में एक छोटा-सा संस्कार केंद्र शुरू किया। तीन अध्यापकों और स्थानीय लोगों की मदद से ४५ विद्यार्थियों की नर्सरी तथा प्रथम कक्षा प्रारंभ की गई। प्रति वर्ष संख्या बढ़ती गई और अब २०१६ में इस विद्यालय में १४० विद्यार्थी नर्सरी से पांचवीं कक्षा तक शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। प्रधानाचार्य सहित छह अध्यापिकाएं इस विद्यालय में कार्यरत हैं। यह विद्यालय अब भी उन्हीं दानी सज्जन के मकान में ही चलाया जा रहा है। यह विद्यालय अब १४० विद्यार्थियों के लिए तो वरदान साबित हो रहा है, क्योंकि यहां आकर बच्चे स्वच्छता के प्रति सजग हो गए हैं, अतः प्रधान मंत्री का ‘स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत’ का सपना सार्थक हो रहा है यहां।

बच्चों को शिक्षा के लिए आकृष्ट करना सरल बात नहीं है; किन्तु यह विद्यालय अन्तेवासियों में संस्कार प्रदान कर रहा है। अब तो इनकी शिक्षा संस्कार के प्रति नगर की अन्य बहुत-सी संस्थाएं और दानी सज्जन भी जागरूक होकर सेवाभारती, समालखा का बढ़ चढ़ कर सहयोग कर रहे हैं। सभी बच्चों को विद्यालय के सत्र प्रारंभ से स्कूल किट ( बैग, पाठ्य-पुस्तकें, कापियां, पेन, पेन्सिल इत्यादि) दिया जाता है। वर्ष के बीच-बीच में भी स्टेशनरी मुफ्त में दी जाती है। प्रति वर्ष प्रत्येक विद्यार्थी को दो जोड़ी गणवेश, एक जोड़ी जूते, दो जोड़ी जुराबें तथा सर्दियों में गर्म वस्त्र- स्वेटर, जर्सी, गरम टोपी भी विद्यालय द्वारा निःशुल्क दिए जाते हैं। इन सभी प्रयासों के उपलक्ष्य में हमें बहुत से उत्साहवर्धक अनुभव भी हो रहे हैं, जैसे-

 लड़ाई-झगड़े की समाप्ति

यह तो और भी रोचक अनुभव है- एक महिला अपनी पोती को मिलने विद्यालय में आई। उस महिला से जब अध्यापिका ने पूछा कि आपकी पोती के स्कूल में आने से कुछ सुधार भी हुआ है? यह सुन कर बहुत प्रसन्न होते हुए कहा कि अब मेरी पोती प्रातःकाल उठते ही बड़ों को ‘नमस्ते’ और ‘राम राम’ बोलती है। मेरे और अपनी मां के गले लगती है। अब पूरा परिवार बच्ची का अनुकरण करते हुए एक दूसरे को ‘नमस्ते’ और ‘राम राम’ बोलता है। यहां तक कि पड़ोसी परिवारों में भी इसका प्रभाव देखा जा रहा है। जैसा कि हम जानते हैं कि घर गृहस्थी में कभी-कभार कहासुनी हो जाना स्वाभाविक है। उस महिला ने कहा कि जब हमारे घर में ऐसा माहौल बनता है तो यह पोती जोर-जोर से रोने लगती है। अतः हममें से इसे पकड़ने/ चुप करवाने कोई एक तो जाता ही है और तभी सारा झगडा भी ठंडा हो जाता है। वे कहती है की सेवाभारती के दिए संस्कारों और शिक्षा से ही आज हमारा घर स्वर्ग जैसा बन गया है।

 यह विद्यालय आसपास के परिवेश में सामाजिक स्तर को बचाने तथा बच्चों में शैक्षिक एवं नैतिक स्तर को ऊंचा उठाने में अध्यापक, अध्यापिकाओं और अभिभावकों के सहयोग से निरंतर प्रयासरत है। इस विद्यालय को और अधिक ऊंचाइयों तक ले जाने में स्थानीय समाजसेवी लोगों एवं संस्थाओं का सहयोग भी निरंतर प्राप्त हो रहा है। बच्चों की पढ़ाई को आगे बढ़ने के लिए आवश्यक सभी जरूरतें इनके द्वारा पूरी करवा दी जाती हैं। इन सबके सहयोग के कारण ही सेवाभारती, समालखा द्वारा गीत, संगीत, वार्ता एवं राष्ट्रीय कार्यक्रम जैसे सफाई अभियान, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम आदि सफलतापूर्वक चलाए जाते हैं।

बच्चों में अपनी भारतीय संस्कृति के प्रति प्रेम उत्पन्न करने के लिए लगभग सभी त्यौहार जैसे ‘नवसंवत्सर, तीज, रक्षाबंधन, कन्जकपूजन, दशहरा, दीपावली, मकर-संक्रांति, गणतंत्र-दिवस, स्वतंत्रता-दिवस, होली, भक्त रविदास जयंती, सूरदास जयंती, बाबा साहेब आंबेडकर जयंती, वार्षिक उत्सव और अध्यापक दिवस आदि श्रद्धा और उत्साहपूर्वक मनाते हैं।

 

 

आपकी प्रतिक्रिया...

Close Menu