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समाज में स्थापित मान्यताओं, विश्वासों, परम्पराओं, आदर्शों एवं मूल्यों को बनाए रखने एवं लोगां के असामाजिक कार्यों पर अकुंश लगाने के लिए समाज के प्रबु़द्ध, जिम्मेदार एवं अनुभवी लोगों द्वारा निष्पक्ष न्याय करने की व्यवस्था शुरू की गई, जो आगे चल कर पंचायतों के रूप में सामने आई। ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर लोक साहित्यकार देवी शंकर प्रभाकर ने खाप पंचायतों का इतिहास लगभग १५०० वर्ष पुराना बताया है। पाणिनी ने भी अपनी रचना अष्टाध्यायी में खाप पंचायतों को उचित स्थान दिया है। मुंशी प्रेमचंद ने पंच परमेश्वर कहानी में बताया था कि पंचों में परमेश्वर का वास होता है।

वास्तव में खाप शब्द दो शब्दों ख और आप से मिलकर बना है। ख का अर्थ है आकाश व आप का अर्थ है जल यानि ऐसा संगठन जो आकाश की तरह सर्वोच्च व जल की तरह स्वच्छ व निर्मल और सब के लिए उपलब्ध अर्थात न्यायकारी हो। खाप पंचायतों की अवधारणा गौत्र भाईचारे पर आधरित है। हर खाप में कुछ गांव एक ही गौत्र के होते हैं। यदि गांव स्तर पर कोई मामला नहीं सुलझता तो पड़ोसी व आसपास के गांव की पंचायत को बुलाया जाता है, जिसे प्रचलित भाषा मे गुहांड कहा जाता है। गांव व गुहांड के लोगों का किसी एक स्थान पर (ज्यादातर चबूतरा खाप का उद्गम स्थल) सामूहिक रूप से एकत्रित होना, खाप पंचायत के रूप में जाना जाता है। दूसरे शब्दों में, इसे गौत्र केन्द्रित पंचायत भी कहा जा सकता है।

खाप पंचायतें उत्तरी भारत विशेषकर हरियाणा, पंजाब, पश्चिम उतर प्रदेश के ग्रामीण स्तर पर बहुत ही महत्वपूर्ण, शक्तिशाली एवं निर्णायक भूमिका में है। वर्तमान हरियाणा में सौ से अधिक खाप पंचायतें सक्रिय हैं। हरियाणा में खाप पंचायतों के फैसले भिन्न-भिन्न कारणों से सुर्खियों में होते हैं। इतिहास साक्षी है कि खाप पंचायतों ने ऐसे भी निर्णय दिए हैं जो सर्वत्र सराहे गए हैं और ऐसे फरमान भी दिए जो विवादों में रहे। यह सही है कि विगत वर्षों में खाप पंचायतों पर उंगली उठी जिसके अनेक कारण थे, इनमें जाति विशेष का दबदबा, महिला व गरीब तबके का अपर्याप्त प्रतिनिधित्व, अशिक्षा एवं सियासी वफादारी शामिल हैं।

शुरूआती दौर मेें खाप पंचायतें सामाजिक तौर पर अनेक पारिवारिक, जातीय एवं सामाजिक वाद विवाद सुलझाने में अग्रणी रही। आजकल हर कोई खाप पंचायतों के नकारात्मक कार्यों पर वाद विवाद कर रहा है। लेकिन क्या इससे खापों द्वारा किए गए सकारात्मक कार्य एवं प्रयास गौण हो जाएंगेे? नहीं। जरूरत इस बात की है कि सकारात्मक कार्यों एवं प्रयासों की भी सराहना होनी चाहिए। आज ज्यादातर मीडिया चाहे वह प्रिंट हो या इलैक्ट्रोनिक मीडिया खाप पंचायतों की नकारात्मक छवि बनाने में लगा हुआ है। लेकिन सच्चाई ये है कि ज्यादातर मीडिया खाप व उनकी गतिविधियों के बारे में बहुत कम जानता है। इनमें भी अधिकतर वामपंथी विचारधारा के लोग हैं। घर से भाग कर मां बाप की मर्जी के विरूद्ध शादी करना या प्रेमी युगलों द्वारा आत्महत्या कर लेना स्वस्थ समाज के लिए एक गंभीर खतरे की निशानी है। अगर हम खापों पंचायतों द्वारा किए गए सकारात्मक कार्यों एवं प्रयासों पर गौर करें तो पाएंगे कि खापों ने सामाजिक व्यवस्था, संस्कृति एवं परम्पराओं को बनाए रखने के लिए अनेकों सराहनीय कार्य किए हैं। जिनका सार निम्न प्रकार से है-
-सन् १९११ में रोहतक, वर्तमान सोनीपत के गांव बरोना में खाप पंचायत हुई जिसमें शिक्षा समेत २८ सामाजिक विषयों पर प्रस्ताव पास किए गए। जिनके फलस्वरूप रोहतक में जाट शिक्षण संस्थाएं अस्तित्व में आईं। २०११ में इसके १०० वर्ष पूरे होने पर फिर एक खाप पंचायत हुई जिसमें समाज सुधार के २८ विषयों पर प्रस्ताव पास किए गए।

-हरियाणा के जींद जिले के गांव बीबीपुर जिसकी चर्चा प्रधान मंत्री ने अपने कार्यक्रम ‘मन की बात’ में की थी, में जुलाई २०१२ में एक खाप पंचायत आयोजित की गई जिसमें १००० से अधिक खाप प्रतिनिधियों ने कन्या भू्रण हत्या पर रोक लगाने का प्रस्ताव पास किया।

-अप्रैल २०१४ में हिसार जिले की सातरोड खाप द्वारा गांव गुवांड को छोड़ सभी बंद रिश्ते दुबारा खोलने व प्रेम विवाह पर आपत्ति ना करने के प्रस्ताव पास किए गए जिसका समर्थन सांगवान खाप द्वारा भी किया गया।

-भिवानी जिले में लाखलान खाप द्वारा २०११ में लोहारू क्षेत्र के तिहरे हत्याकांड तथा सिरसा में दो बड़े राजनीतिक घरानों की आपसी खूनी रंजिश, जिसमें दर्जनों लोग मारे जा चुके थे, का भी बैनीवाल खाप द्वारा समाधान करने का सराहनीय कार्य किया गया।

उपरोक्त तो कुछ उदाहरण मात्र हैं। इसके अलावा समय-समय पर खाप पंचायतों द्वारा दो परिवारों, कुनबों, जातियों व गांवों के दीवानी व फौजदारी मुकदमों का समाधान कर अमन चैन स्थापित करने का कार्य किया है। खाप पंचायतों ने समय समय पर अनेक सामाजिक बुराइयों एवं कुरीतियों को समाप्त करने के सार्थक प्रयास किए हैं। खाप पंचायतों द्वारा अनेक सामाजिक मुद्दों पर लिए गए निर्णय प्रभावी भी हुए जिनमेंे प्रमुख हैं-

* विवाह शादियों में बजने वाले डी जे, जिस कारण कई बार विवाद होता है, पर रोक।
* मृत्यू भोज (काज, सतरवीं, जग व जीवन जग आदि) पर रोक।
* बारातीयां की अधिकतम सीमा का निर्धारण।
* दहेज, कन्या भृण हत्या व नशे के खिलाफ सार्थक प्रयास।
* इसके अलावा अनेक शिक्षण एवं सार्वजनिक स्थलों जैसे धर्मशालाओं का निर्माण। न्यायलय व पुलिस प्रसाशन का भी मानना है कि खाप पंचायतों ने अधिकतर विवाद अपने स्तर पर निपटा कर पुलिस व न्यायलय का बोझ कम ही किया है।

११ सितम्बर २०१४ को खाप पंचायतों को उस समय नई ऑक्सीजन मिली जब प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने हरियाणा के जींद की एक रैली में खाप पंचायतों को नमन करते हुए अपने चुनाव अभियान की शुरूआत की। २५ नवम्बर २०१४ को ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ के संस्थापक आध्यात्मिक गुरू श्री श्री रविशंकर ने आध्यात्मिक शक्ति एवं खाप मिलन समारोह में खापों की सराहना करते हुए यहां तक कह दिया कि जो काम सरकार नहीं कर पा रही है वह काम खापें कर रही हैं। वास्तव में खाप हमारी महान प्राचीन संस्कृति एवं परंपराओं को बचाने का एक कारगर जरिया है। दूसरे शब्दों में खाप हमारी महान प्राचीन परंपराओं की ध्वजारोही भी है।

परंतु समय के साथ-साथ खापों को अपने-आप को भी बदलना होेगा। आधुनिक सन्दर्भों में अपनी नई पहचान को एक नए नजरीए से देख रही खापें अपनी परम्पराओं व संस्कृति को बनाए रखने के साथ-साथ बदलते वक्त की जरूरतों को समझते हुए खुद को बदल भी रही हैं। यह बदलाव भविष्य में खापों की नई छवि को गढ़ने वाला होगा। इसके साथ ही खापों को सर्वजात (छतीस बिरादरी) महिलाओं व गरीब तबके को भी साथ लेकर चलना होगा जिससे आम लोगों का भरोसा कायम रहे। अगर वे ऐसा करती है तो इसका स्वागत होगा।

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