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हरियाणा का एक अर्थ ‘भगवान का निवास’ माना गया है, जो संस्कृत शब्द हरि और अयण से मिल कर बना है। विद्वानों के अनुसार, हरियाणा में शब्द की उत्पत्ति हरि (हरित, हरा) और अरण्य से हुई है। दिल्ली के निकट सारवान से मिले विक्रमी संवत १३८५ के शिलालेख पर अंकित ‘देशोऽस्ति हरणाख्य: पृथिव्यां स्वर्गसन्निभ:’ अर्थात हरियाणा नामक एक देश (प्रदेश) है, जो इस धरती पर स्वर्ग के समान है, भी हरियाणा की गौरवशाली संस्कृति का परिचयदेता है। वैदिक संस्कृति में इसको बहुधान्यक प्रदेश कहा गया है।

हरियाणा सांकृतिक और ऐतिहासिक रूप से विभिन्न मत-मतान्तरों और पंथों का मिलन स्थल रहा है। भिन्न-भिन्न मजहबों को मानने वाले इस भूमि पर पहुंचे और घुलमिल गए। अपनी बेजोड़ भौगोलिक स्थिति के कारण भी हरियाणा भारत में आने वाले बाहरी आक्रमणकारियों का मार्ग रहा है और उन्होंने अपने निशान इस भूमि पर छोड़े भी। मानव श्रृंखला के क्रमबद्ध विकास में पहले-पहल औजार बनाने वाले आदि मानव ने भी शिवालिक और अरावली पर्वत श्रृंखलाओं के साथ-साथ वर्तमान हरियाणा में भी विचरण किया था। इस बात के प्रमाण पुरातत्वविदों ने खोज निकाले हैं। खुदाई के दौरान कुरुक्षेत्र और उसके आसपास के स्थानों से प्राप्त अवशेष संकेत करते हैं कि यहीं सरस्वती नदी के किनारे विश्व की प्राचीन हडप्पा संस्कृति का विकास हुआ। प्रागैतिहासिक काल, जिसने भारत में सोलह महाजनपदों को विकसित होते देखा, उसी काल में अपने समय का सबसे बड़ा, शक्तिशाली और उन्नत कुरु महाजनपद भी भारत के इसी क्षेत्र में विकसित हुआ था। धर्म और अधर्म के बीच निर्णायक युद्ध के लिए भगवान कृष्ण ने इसी क्षेत्र को चुना और कुरुक्षेत्र में भगवान के श्रीमुख से श्रीमद् भगवद्गीता का पावन उपदेश भी यहीं दिया गया, कालांतर में यह भू-भाग मौर्य साम्राज्य के विस्तार का भी गवाह बना। कलिंग युद्ध में भारी रक्तपात के बाद सम्राट अशोक संसार से विरक्त होकर बौद्ध अनुयायी बने और उन्होंने जगाधरी के पास टोपरा गांव में एक लौह स्तंभ बनवाया था, जिसे उखाड़ कर फिरोज शाह तुगलक दिल्ली ले गया था।
सांस्कृतिक दृष्टिकोण से हरायाणा में राजस्थानी, पंजाबी और उत्तर प्रदेश के साथ हरियाणा की अपनी एक मूल छवि स्पष्ट दिखाई पड़ती है। विदेशी आक्रांताओं का मुख्य मार्ग होने के कारण यह क्षेत्र कई बार बर्बरतापूर्वक उजाड़ दिया गया; लेकिन फिर भी इसकी आत्मा नष्ट नहीं हुई। ग्रामीण अंचल में आज भी लोकगीतों में ऐसे किस्से मिलते हैं। हरियाणवी लोक संस्कृति की अपनी ही निराली छटा है। हरियाणा की सांस्कृतिक परम्परा और उपलब्धियां अतीत से ही बहुत गौरवशाली रही हैं।

हरियाणा का लोक साहित्य बड़ा ही समृद्ध है। हरियाणा के लोकगीत, लोक कथाएं, लोक नाट्य, लोक कहावतें और पहेलियां हरियाणावी जनजीवन की विशेषताओं पर अच्छा प्रकाश डालती हैं। हरियाणवी जनता की वीरता, दृढ़ता, देशभक्ति, धर्म-परायणता, सात्विकता आदि गुणों से लोक साहित्य भरा पड़ा है। हरियाणा के पास पं. बस्तीराम जैसे लोक गायक हैं, जिन्होनें पाखण्ड खण्डन के लिए अपनी प्रतिभा का सदुपयोग किया है और अपने भजनों से असंख्य व्यक्तियों को प्रेरणा दी है। महाकवि स्वामी शंकर दास की कर्मभूमि भी हरियाणा ही रही है, जिन्होंने ‘ब्रह्मज्ञान-प्रकाश’ जैसी कृति द्वारा अनपढ़ जनता को वेदांत के गूढ़ रहस्यों से परिचित कराया। फिर संगीत शिरोमणि लखमीचंद को कौन भुला सकता है, जिनके सांगो की धाक उत्तर प्रदेश और राजस्थान के गांव-गांव में जम चुकी है। जब उनके सांगो का आयोजन होता था तो लोग बीस-बीस तीस-तीस कोस से चल कर सांग प्रारंभ होने से पहले ही जमा हो जाते थे। पं. बस्तीराम ने अपने आर्य समाजी भजनों द्वारा जो कार्य किया, वही पं. लखमीचंद ने अपने सांगों द्वारा किया।

हरियाणा कृषि प्रदेश है। ऋतु प्रकृति को नयापन देती रहती है, जिसका मानव पर बहुत प्रभाव पड़ता है। इस बात की अनुभूति को पहचानने के लिए लोकगीतों का प्रयोग बहुत ही उपयोगी होता है। ग्रीष्म, वर्षा, शरद, शिशिर, हेमंत तथा बसंत षड्ऋतु क्रम की पृष्ठभूमि में प्रकृति का वर्णन लोक संगीत में सहज रूप में उभरता है। एक ऋतु आई दूसरी चली गई। किसी वृक्ष में फूल खिलते हैं तो कहीं पत्ते झड़ जाते हैं। नए पत्ते, नई कोपलें ऐसे वातावरण में मधुर व सरस गीत का उपजना स्वाभाविक है। हरियाणा लोकगीतों को शस्त्रीय राग व रागनियों में अनुबद्ध करने में भारतीय नृत्य संगीत के सिद्ध कलाकार श्री राजकुमार, के.पी. सिन्हा का नाम उल्लेखनीय है।

भारत के इतिहास में हरियाणा प्रदेश का गौरवमय स्थान है। इसका कारण यह है कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता का पहले पहल विकास इसी प्रदेश में हुआ। यहीं की सरस्वती और दृषद्वती नदियों के तटों पर वैदिक यज्ञों के आयोजन हुए। वैदिक ऋचाओं के सृजन से आर्य संस्कृति के प्रथम अंकुर भी प्रस्फुटित हुए। मनुस्मृति में इस देव निवसित प्रदेश को ब्रह्मावर्त कहा गया है और यहां के निवासियों में जो आचार-व्यवहार प्रचलित था उसे आदर्श माना गया था। कदाचित इसलिए लिखा है-

एतद्देश प्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मत:।
स्वं स्वयं चरित्र शिक्षेरन पृथिद्यां स्वभानवा:।

अर्थात, पृथ्वी के समस्त मानव इस आर्यावर्त के निवासी ब्राह्मणों के शिष्य बन कर अपने चरित्र को सुधारने का प्रयत्न करें।

हरियाणा आदि-मानव की जन्मभूमि होने के साथ-साथ आदि सभ्यता का भी पोषक रहा है। प्राचीन परम्परा के अनुसार हरियाणा को सृष्टि का जन्म स्थल माना जाता है। संसार के प्राच्य विद्या-विशारदों द्वारा भारतीय संस्कृति की विकास भूमि के रूप में भी हरियाणा को ही स्वीकारा गया है। विदित है कि मानव जाति का आविर्भाव सर्वप्रथम यहीं हुआ और हरियाणा क्षेत्र की ही पावन नदियों-दृषद्वती एवं सरस्वती की घाटियों में राजनीतिक एवं सांस्कृतिक चेतना जागृत हुई।

हरियाणा के बहुत से नगरों के नाम भी प्राचीनतम संस्कृत साहित्य में मिलते हैं। कपिष्ठल कंठ संहिता के नाम से कपिष्ठल-कैथल, वाल्मीकि रामायण में अजकूल-पंचकूला, वैयाकरण पाणिनी में आसंदिवत-असंध, जौलायन-जुलाना, रोणी-रोड़ी, युगंधर-जगाधरी, शैरीषक-सिरसा आदि।

चार यक्ष स्थानों का भी महाभारत एवं पुराणों में वर्णन किया गया है, जो हरियाणा में स्थित है। इनमें अरंतुक पृथुदक में, तरन्तुक थानेसर में, कपिल पूरंडी में तथा मचक्रुक पश्चिम में। भारत का हृदय कहलाने वाले हरियाणा में भी भारतीय संस्कृति और सभ्यता का सर्वप्रथम विकास हुआ। मान्यतानुसार के यज्ञ से सृष्टि का आरंभ भी यहीं से हुआ। इसी कारण इसे उत्तरवेदी नाम से भी जाना जाता है।

सिन्धु घाटी सभ्यता के अनेक नगर भी इसी प्रदेश में स्थित थे। दौलतपुर (करनाल), खोखराकोट (रोहतक), श्रुघ (हिसार) आदि में उत्खनन से इसके प्रभाग उपलब्ध हुए थे।

हरियाणा का प्रत्येक व्यक्ति कृषि कार्य से सम्बद्ध है। यही कारण है जो लोग नौकरी और व्यापार करते हैं वे भी कृषि से सम्बद्ध विच्छेद नहीं कर पाते। परिणाम यह है कि हरियाणा के गांव भारत के अन्य सभी प्रदेशों के गांवों से अधिक विशाल, अधिक सम्पन्न, अधिक जागरुक और अधिक प्रगतिशील हैं। अन्य प्रांतों के कस्बों में भी जिन सुविधाओं का अभाव रहता है वे हरियाणा के गांवों में सहज ही उपलब्ध हो जाती हैं। सच तो यह है कि हरियाणा के गांव स्वत: पूर्ण इकाई हैं और महात्मा गांधी के ‘ग्राम स्वराज्य’ के स्वप्न को मूर्त करने वाले हैं। गांवों के प्रति हरियाणावासियों के इस लगाव ने हरियाणा को जहां कृषि के साथ जोड़े रखा है, वहां गांवों को छोड़ कर शहरों में बसने की दूषित प्रवृत्ति से भी उसकी रक्षा की है। आज हमारे देश के समक्ष यह विषम समस्या है कि गांव उजड़ रहे हैं और शहर विशाल होते जा रहे हैं। इस समस्या का समाधान गांवों को समृद्ध बनाने में ही निहित है और हरियाणा इसमें अग्रसर है।

संगीत के तीन मुख्य अंग गायन, वादन तथा नृत्य हैं और इनके समुच्चय को संगीत की संज्ञा दी गई है। यह त्रिपुटी प्राचीन काल से चली आ रही है और नृत्य का अर्थ है ‘लय और ताल के साथ अंग संचालन करते हुए हृदयगत भावनाओं को शरीर की चेष्टाओं द्वारा प्रकट करना।’

लोक नृत्य किसी एक व्यक्ति विशेष की थाती नहीं। इनकी प्रेरणा भूमि है-खेत-खलिहान, खुले मैदान, लहलहाते खेत, ऋतु परिवर्तन, तीज-त्योहार और युद्ध में विजय आदि। पकी फसल को देखकर झूम उठना, शत्रु पर विजय पाकर उन्मत्त हो नाचना, हर्ष के समय उछलना-कूदना, झूमती घटाओं को देखकर लहरा जाना, ये सब कुछ नृत्य नहीं तो और क्या है। लोक नृत्य का स्रष्टा सम्पूर्ण लोक है। यह नृत्य एक का भी है और सबका भी। हरियाणा के प्राचीन इतिहास से में ज्ञात होता है कि नृत्य के द्वारा यहां भगवत स्तुति, देव पूजा तथा वीर पूजा का आयोजन भी होता रहा है।

हरियाणा की संस्कृति सभी भारतवासियों की संस्कृति का एक समन्वित प्रतीक है। यहां के ‘रास‘ नृत्य ने भारत के अन्य कई नृत्यों को जन्म दिया है। फाग नृत्य, धमाल या धमियाल, रास नृत्य, डफ नृत्य, रसिया नृत्य, बीन -बांसुरी के साथ नृत्य, खोरिया नृत्य, रक्तबाई का नृत्य, खेड्डा नृत्य, गणगौर पूजा नृत्य, लूर नृत्य, गुग्गा नृत्य, सांग में लोक नृत्य, तीज नृत्य, आखातीज नृत्य हरियाणा के प्रमुख नृत्य रहे हैं।

लोक संगीत की दृष्टि से हरियाणा की कला, चित्रकला, मूर्तिकला, वास्तुकला, नृत्यकला तथा संगीत-कला के अवलोकन से यह निष्कर्ष निकलता है कि कला मनुष्य की एक रचनात्मक क्रिया है जिसका अपना अलग ही एक अस्तित्व है; किन्तु यह मानव जगत से बाहर की गतिविधि नहीं है। मानव प्रकृति, सामाजिक गतिविधि, समय व स्थान की झलक कम या अधिक मात्रा में कला के अस्तित्व में अवश्य उभरती है। प्रत्येक व्यक्ति की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि वह अपने हृदयगत भावों को किसी न किसी रूप में प्रकट करे। यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि इसके बिना व्यक्ति का जीवन कठिन हो जाता है। मनोविज्ञान की भाषा में इसे भावनाओं की अभिव्यक्ति कहा जाता है जो अनुभूति का परिणाम है। हृदय में पनपते अमूर्त भाव जब किसी न किसी वस्तु के सहारे मूर्त रूप में प्रगट होते हैं तो उसे हम संगीत, चित्रकला, मूर्तिकला इत्यादि संज्ञा दे देते हैं। इससे स्पष्ट है कि कला व मानव जीवन का बहुत गहरा सम्बंध है। सभ्यता व संस्कृति के विकास में यही मूल प्रवृत्ति काम करती है। अभिव्यक्ति के अतिरिक्त मनुष्य की इस रचनात्मक क्रिया में सौंदर्य बोध भी अपना स्थान रखता है। सौंदर्यानुभूति आत्म अभिव्यक्ति का गुण विशेष है जो कला को उत्तम अवस्था की ओर विकसित करता है।

हरियाणा के लोक राग गाथा संगीत में लोकप्रिय भावनाओं का वास्तविक प्रतिबिम्ब है। इन रागों की एक विशेषता यह है कि इनका प्रवाह बड़ा तीव्र होता है। श्रोता सुनते-सुनते उकताता नहीं। इन रागों की रचना में नैसर्गिक गुणों की छटा दिखाई पड़ती है। इनमें छंद नहीं है। पर रस अवश्य है। लोक रागों में टेक की आवृत्ति होती रहती है। लोक रागों को गायक तथा रागों के भावों की दृष्टि से चार भागों में बांटा जाता है- (१) जोगी राग पूर्ण भक्त, ध्रुव भगत, हरफूल जाट (२) भाट तथा ड्रम-किस्सा, निहालदे ढोलामारु, आल्हा नरसी का भात इत्यादि।(३) पेरना-रागनी देसी ठुमरी टप्पा आदि। (४) भवानी-किस्सा लीलावती। महाभारत, किस्सा विक्रमाजीत आदि। जोगी, भाट तथा पेरना व्यवसायी संगीतकार होते हैं। जोगी प्रात: काल झोली व दोतारा लेकर भीख मांगने घर से निकल जाते हैं।

किस्सा राग: संगीत सौंदर्य की दृष्टि से ‘निहालदे’, ‘ढोलामारु’, ‘नरसी का भात’, हरफूल जाट जुलानी वाला हरियाणा प्रदेश के प्रसद्ध लोक राग हैं। इनकी गायकी, सारंगी, ढोलक, मंजीरे पर होती है तथा इन्हें दो गायक मिल कर गाते हैं। श्रावण मास इस राग का उपयुक्त समय होता है। इस राग का कथानक बड़ा रोचक है।

गुग्गा राग: गुग्गा राग बहुत ही सर्वसाधारण लोक राग है और गुग्गा पीर गाथा है। गुग्गा नौमी के दिन गुग्गा पीर के सम्प्रदायी एक बहुत लम्बे बांस पर रंग- बिरंगे कपड़े बांध कर, जिसे लोक भाषा में गुग्गा पीर की छड़ी कहते हैं, ढोलक की तान पर लोक राग का द्वार-द्वार पर अलाप करते हैं। गुग्गाराम का कथानक ऐतिहासिक व पौराणिक संदर्भों के जोड़-तोड़ से बनाया गया है।

नरसिंह का भात: गायन व वादन दोनों कलाओं में दक्ष छुट्टन सिंह डकोत ‘नरसी का भात’ राग गाने में गुरु हैं। इस गवैये की एक विशेषता यह है कि वह अकेला ही एक बार में चार-पांच साजों का प्रयोग बड़ी निपुणता से करता है। इससे एक नए ढंग का साज भी बनाया है जिसकी ध्वनि में चंग तथा डमरु की ध्वनि का सामंजस्य है। लोक संगीत के रसिक इस साज की आवाज के आधार पर छुट्टन सिंह को आजकल अपंग कहते हैं तथा इस साज का नाम भी अपंग ही पड़ गया है।

आल्हा: आल्हा राग के रचयिता जगनीक को मानते हैं। आल्लाह राग को सर्वसाधारण से लेकर व्यवसायी संगीतज्ञ सब गाते हैं। आल्हा राग-प्रबंध, ताल, लय व छंद की दृष्टि से अपने-आप में ही एक लोक संगीत की शैली बन जाता है। इस राग के न्यूनतम व अधिकतम नाद में विशेष अंतर नहीं है। यह एक ही नाद परिणाम पर गाया जाता है। इसका गायन कौतूहलजनक है तथा इसमें वीर, रौद्र, विस्मय रस की निष्पत्ति होती है।

सांग संगीत: सांग संगीत हरियाणा प्रदेश के समृद्ध लोक-रंगमंच का अंश है। भारतीय रंगमंच में इस शैली का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है तथा भारतीय नाट्यकार आधुनिक रंगमंच के लिए इसका प्रयोग कर रहे हैं। कला की दृष्टि से इसे तीन प्रकार से समझा जा सकता है- अभिनय-कौशल, नृत्य-कौशल, संगीत कौशल।

सांगी: सांगी ‘सांग संगीत’ के पात्रों का चयन उनके गायन की क्षमता के आधार पर किया जाता है। प्रत्येक पात्र को गायन काल की शिक्षा दी जाती है।
लघु लोकसंगीत: लघु लोकगीत के अवलोकन से स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक सभी सामान्य अथवा विशेष अवसरों पर लोकगीत गाए जाते हैं। गांवों में बच्चे के जन्म पर आस- पड़ोस की स्त्रियां इकट्ठी होकर जन्म संस्कार के गीत गाती हैं। इसी तरह विवाह की कोई रस्म बिना गीत गाए पूरी नहीं होती। किसान जब खेत-खलिहानों में काम करते-करते थक जाता है तो हुक्के का दम लगाते समय, ग्वाला दूध दूहते समय कोई न कोई गीत गुनगुनाता है। ऋतुओं के परिवर्तन के साथ-साथ गीतों के रूप बदल जाते हैं। समयानुसार संगीत कला की दृष्टि से लघुगीत के मुख्य तत्व शब्दों का काल व स्थान की दृष्टि से उपयुक्त चयन, भाव प्रवाह तथा लय है।

वेशभूषा के लिहाज से सहज रूप से ‘जैसा देस वैसा भेस’ अर्थात व्यक्ति जिस देश में रहता है उसे उसी देश की वेशभूषा धारण करनी चाहिए। हरियाणवी की यह लोकोक्ति इस तथ्य की ओर स्पष्ट संकेत करती है कि प्रत्येक देश का वेश कुछ निजी विशिष्टताओं के कारण दूसरे देशों से कुछ भिन्न ही होता है। यह वेश उस प्रदेश के किसी क्षेत्र विशेष का वेश नहीं होता अपितु यह वह ‘जनवेश’ होता है, जिसे पहन कर व्यक्ति केवल परिधान से ही अपने प्रदेश का परिचय दे देता है। इस ठेठ पेहरावे की विशेषता तब और भी उभर कर सामने आती है जब विभिन्न प्रांतीय नागरिकों के समुदाय से व्यक्ति अपनी देशी वेशभूषा के कारण अलग-अलग दिखाई देता है। स्त्रियों के वस्त्रों में ओड़ना, आंगी, घाघरी ये तीन मिल कर तील कहलाते हैं। इनमें सिर पर ओढ़ना, वक्ष पर आंगी और कटि पर घाघरी पहनी जाती है। हरियाणा में आभूषणों का जितना प्रचार है उतना संभवत: किसी अन्य प्रांत में नहीं है। पुरुष, स्त्रियां और बच्चे आभूषणों के दीवाने होते हैं। किसी भी परिवार की सम्पन्नता इस परिवार के सदस्यों द्वारा प्रयुक्त आभूषणों से आंकी जाती है। विवाह में कन्या पक्ष की सम्पन्नता यदि दान दहेज से आंकी जाती है तो वर पक्ष की सम्पन्नता उसके द्वारा वधु के लिए लाए गए आभूषणों से ही है। श्रृंगार सोलह तरह के माने गए हैं।

यह सुखद संयोग है कि हरियाणवी स्त्रियां जिन अंगों पर आभूषण धारण करती हैं उनकी संख्या भी सोलह है। आभूषणों की संख्या उनके भेदोपभेद सहित लगभग सौ हो जाती है। आभूषणों से शोभित होने वाले अंग निम्नलिखित हैं:-१. पैर का अंगूठा और अंगुलियां, २. टखना, ३.जंघा, ४.कटि, ५.वक्ष, ६.ग्रीवा, ७. हाथ का अंगूठा और अंगुलियां, ८.करपृष्ठ, ९.कलाई, १०. कोहनी, ११.बांह, १२.कंधा, १३.नाक, १४.कान, १५.मस्तक, १६.सिर।

मेले और त्योहारों की सांस्कृतिक छटा दर्शाने वाला कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण के अवसर पर होने वाला मेला है। कुछ एक का महत्व प्रादेशिक रहता है, यथा राम राय एवं पंडारा आदि का मेला और अनेक का महत्व केवल स्थानीय अथवा पास-पड़ोस के गांवों तक सीमित रहता है, यथा हिण्डौल का मेला और बादली का सत्संग मेला, सूरजकुण्ड का क्राफ्ट मेला आदि। अनेक मेले ऐसे भी हैं जो त्योहारों के अवसर पर गांव-गांव में लगाए जाते हैं तथा गूगीपीर का मेला। यही स्थिति प्राय: त्योहारों की है। मेले प्राय: तीन प्रकार के हैं- १. पशु मेले-जिन्हें प्राय: सरकार की अनुमति और निर्देशन में स्थान-स्थान पर समय-समय पा लगाया जाता है, जैसे रोहतक जिले के अंतर्गत जहाजगढ़ का मेला अथवा झज्जर का पशुमेला। इनमें दूर निकट से अच्छी नस्ल के पशु बेचने के लिए लाए जाते हैं और इस प्रकार एक ही स्थान पर अपनी-अपनी पसंद और सामर्थ्य के अनुसार उन्हें खरीदा और बेचा जाता है। इनमें दूर-दूर के व्यापारी सम्मिलित होते हुए भी सरकार की इच्छानुसार इनमें वृद्धि अथवा कमी भी होती रहती है; परन्तु कुरुक्षेत्र का सूर्यग्रहण मेला तथा गीता जयंती का मेला विश्वविख्यात है।

रीति-रिवाज तथा संस्कार की हरियाणवी परम्परा, प्रथा, परिपाटी, पद्धति, रीति, रिवाज, रस्म, लीक, चाल, ढंग और व्यवहार इत्यादि शब्दों को भाव समान रूप से दिया जाता है। हरियाणा प्रदेश में उपर्युक्त शब्दों में से रीति-रिवाज शब्द ही अधिक बोला, समझा और लिखा जाता है। इसको नगरों में रहने वाले शिक्षित, अशिक्षित लोगों से लेकर गांवों में बसने वाले साधारण स्त्री-पुरुषों तक सभी लोग अपनी बोलचाल के व्यवहार में लाते हैं। इन रीतियों में कई भेद हैं, जिनमें से अधिक भेदों का प्रचलन धार्मिक-साम्प्रदायिक, मतमतांतरिक परम्पराओं के रुप में सदा से चला आ रहा है। कुछ रिवाज पारस्पारिक सामाजिक मेलजोल से पनपते हैं।

आधुनिक हरियाणा ने सांस्कृतिक रंगमंच के क्षेत्र में अनेक कीर्तिमान अपने होनहार कलाकारों के माध्यम से स्थापित किए हैं, जिनमें अभिनय के क्षेत्र में संगीत कौशिक महेंद्रगढ, ओमपुरी-अम्बाला, सुनील दत्त-यमुनानगर, जूही चावला- अम्बाला, परिणिती चोपडा-अम्बाला, रणबीर हुड्डा- रोहतक, निमानी कपूर-फरीदाबाद।

संगीत के क्षेत्र में अम्बाला की जोहराबाई, हिसार के पं. जसराज, फरीदाबाद के सोनू निगम तथा इसके साथ-साथ अनेक कवि, मूर्तिकार, चित्रकार, नृत्य कलाकारों को हरियाणा की धरती ने उत्पन्न कर सांस्कृतिक क्षेत्र में अपने उल्लेखनीय योगदान से गौवरशाली परम्परा सफलतापूर्वक स्थापित की है।

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