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हरियाणा का अलग अस्तित्व १९६६ को पंजाब पुनर्गठन अधिनियम के लागू होने पर हुआ। १९४७ में अंग्रेजों के चले जाने के बाद भारत में भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का निर्णय हुआ था। लेकिन उस समय कांग्रेस ने अनेक कारणों से पंजाब को इस पुनर्गठन प्रक्रिया से बाहर रखा। इसके लिए पंजाब के लोगों ने आंदोलन किया जिसके परिणाम स्वरुप १९६६ में श्रीमती इंदिरा गांधी ने भाषा के आधार पर पंजाब के पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू की। हिन्दी भाषी क्षेत्रों को हरियाणा नाम दिया गया। लेकिन यह नाम ऐतिहासिक है और इसका नाम प्राचीन ग्रंथों में मिलता है।

हरियाणा का इतिहास भी पुराना है और राजनीति भी। १९४७ से पहले जब पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी की सरकार थी और उसमें हरियाणा के सर छोटू राम मंत्री थे तो उन्होंने कानून बनवाया था कि कोई भी साहूकार किसी किसान द्वारा कर्ज न चुकाने पर भी उसकी ज़मीन और बैल कुर्क नहीं करवा सकता। हरियाणा में सर छोटू राम आज भी किसानों के मसीहा माने जाते हैं।
हरियाणा के पहले मुख्यमंत्री भगवत दयाल शर्मा थे जिनका सम्बंध कांग्रेस से था। लेकिन उनकी सरकार मुश्किल पॉंच महीने चली। १९६७ में पूरे देश में, खासकर उत्तर भारत में संयुक्त मोर्चा सरकारों का गठन हुआ था। इन मोर्चों के गठन करने में कांग्रेस के भीतर से टूट कर आए विधायकों के समूह थे। हरियाणा में भी कांग्रेस की सरकार गिर गई और विशाल हरियाणा पार्टी ने सरकार बना ली। यह अलग बात है कि विशाल हरियाणा पार्टी का गठन करने वाले विधायक ज्यादातर कांग्रेस से ही टूट कर आए थे। इसके बाद १९७७ से लेकर २००५ तक हरियाणा की राजनीति चौधरी देवी लाल, ओम प्रकाश चौटाला, बंसी लाल, भजन लाल के बीच ही घूमती रही। चौधरी देवी लाल का कद हरियाणा की राजनीति में सबसे ऊंचा कहा जा सकता है। जिस समय पंजाब, हरियाणा का ही अंग था उस समय कांग्रेस के भीतर उस समय के मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों के साथ हस्तपंजा लड़ाने का साहस देवी लाल ही रखते थे। हरियाणा के निर्माण में भी चौधरी देवी लाल की प्रमुख भूमिका रही है। यही देवी लाल बाद में भारत के उप प्रधान मंत्री भी बने। लेकिन उनका नाम प्रधान मंत्री के पद के लिए प्रस्तावित था।

१९७५ में देश में आपातकाल लगा तो हरियाणा में कांग्रेस का राज्य था और बंसीलाल मुख्यमंत्री थे। बंसीलाल की प्रसिद्धि हरियाणा के विकास पुरुष होने के साथ-साथ सख्त प्रशासक की रही है। लेकिन इसके साथ ही उनकी ख्याति कांग्रेस के दिल्ली दरबार को किसी भी तरह प्रसन्न रख कर अपनी कार्यसिद्धि करने वाले व्यक्ति की भी थी। आपातकाल में बंसीलाल की सरकार ने हरियाणा में जो अत्याचार किए वे अपने आप में रिकार्ड बन गए। वहीं से इंदिरा गांधी के पतन की गाथा भी शुरू हुई। आपातकाल के शुरू के पांच महीने मुख्यमंत्री बंसीलाल रहे, बाद में केन्द्र में मंत्री बन जाने पर राज्य में किसी बनारसी दास को मुख्यमंत्री बना कर परोक्ष रूप से स्वयं ही शासन चलाते रहे। आपातकाल के बाद जब १९७७ में विधान सभा के चुनाव हुए तो हरियाणा में भी सभी विपक्षी दलों ने जनता पार्टी बना ली। इसमें कांग्रेस छोड़ कर आने वाले अनेक लोग भी शामिल थे। सरकार जनता पार्टी की बनी और मुख्यमंत्री हुए देवी लाल। लेकिन इसी दौरान हरियाणा की राजनीति में धूमकेतू की तरह उभरे चौधरी भजन लाल। वे अधिकांश जनता पार्टी को कांग्रेस में घसीट कर ले गए और स्वयं मुख्यमंत्री बन गए। भजन लाल के रंगमंच पर आ जाने के बाद हरियाणा की राजनीति इन तीनों लालों के इर्द गिर्द घूमती रही। देवीलाल, बंसीलाल और भजन लाल। जब देवी लाल का देहांत हो गया तो उनका स्थान ले लिया उनके लख्ते जिगर ओम प्रकाश चौटाला ने, लेकिन राजनीति की धुरी इन तीनों परिवारों से बाहर नहीं निकली। बीच में जब बंसीलाल कांग्रेस से बाहर हो लिए तो उन्होंने हरियाणा विकास पार्टी बना ली और मुख्यमंत्री बन गए थे। हरियाणा की राजनीति को इस त्रिकोणीय में से बाहर निकाला सोनिया गांधी ने, जब उसने चौधरी भजन लाल के बलबूते जीती गई विधान सभा में कमान भूपेन्द्र सिंह हुड्डा को थमा कर उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया। अनजान से भूपेन्द्र सिंह ने २००४ में मुख्यमंत्री का पद संभाला तो वे २०१४ तक वहीं जमे रहे। इसी खंड में हरियाणा के तीनों साल- देवीलाल, बंसीलाल और भजन लाल भी इस नश्वर संसार को छोड़ परलोकवासी हुए। इतना ही नहीं देवी लाल के सुपुत्र ओम प्रकाश चौटाला अपने पुत्र को लेकर जेलवासी हुए। भजन लाल के सुपुत्र चन्द्र मोहन एक दूसरे विवाह के चक्कर में पहले मुसलमान बन गए और बाद में फिर दूसरी विवाहिता को तलाक देकर हिन्दू हुए। बंसीलाल के परिवार के झगड़ों में किसी को न जेल जाने की जरूरत पड़ी न ही मतान्तरण की; लेकिन जमीन जायदाद के मामलों ने खासी किरकिरी कराई।

हरियाणा की राजनीति में समाजवादी या साम्यवादी ताकतें कभी सही तरीके से अपनी जमीन तो नहीं तलाश पाईं लेकिन व्यक्तिगत तौर पर जिन्होंने अपनी धाक छोड़ी उसमें मनी राम बागड़ी और प्रकाशवीर शास्त्री का नाम सबसे आगे लिया जा सकता है। इसी तरह एक बार हरियाणा में इन्द्रवेश और अग्निवेश की जोड़ी ने धूम मचाई थी लेकिन यह जोड़ी हरियाणा की जमीन पर ज़्यादा देर टिक नहीं पाई। इन्द्रवेश जो एक बार हरियाणा से लोकसभा के लिए चुन लिए गए थे, जून २००६ में अल्लाह को प्यारे हुए और अग्निवेश हरियाणा से बाहर अभी भी धुआं छोड़ते हुए घूम रहे हैं।

हरियाणा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक का काम पिछली शताब्दी के चौथे दशक में ही शुरू हो गया था। यही कारण था जब १९५२ में डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने नेहरू मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देकर, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की सहायता से भारतीय जनसंघ की स्थापना की तो हरियाणा में उसको पुख़्ता आधार मिल गया। जब डॉ. मुखर्जी जम्मू-कश्मीर गए तो हरियाणा के पानीपत, करनाल व अम्बाला में उनका ऐतिहासिक स्वागत हुआ। हरियाणा जनसंघ के शलाका पुरुष डॉ. मंगलसेन थे जो जनता पार्टी की सरकार में उप मुख्यमंत्री भी बने। वे रोहतक से सात बार विधायक चुने गए थे। अनेक वर्षों तक हरियाणा जनसंघ के अध्यक्ष रहे। हरियाणा की राजनीति को वैचारिक आधार प्रदान करने में डॉ मंगल सेन का बहुत योगदान है। वे प्रभावशाली वक्ता थे और उनकी तोड़ का कोई प्रखर वक्ता आज तक हरियाणा ने नहीं दिया है। सुषमा स्वराज और प्रो. गणेशी लाल को इसका अपवाद कहा जा सकता है।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि हरियाणा की राजनीति में दो समूह ही प्रभावी रहे। कांग्रेस और उसके मुकाबले कांग्रेस से ही निकले हुए कुछ लोग जो नाम बदल बदल कर राजनैतिक दलों का गठन करते रहे। अलबत्ता चौधरी देवीलाल और उनके परिवार ने कैरों के समय से ही कांग्रेस के विरोध में मोर्चा संभाल लिया था जो अभी भी इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के नाम से प्रमुख विरोधी दल के रूप में सक्रिय है। भारतीय जनसंघ या फिर भारतीय जनता पार्टी इसी लोकदल के साथ मिल कर प्रदेश में पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और बाद में सोनिया कांग्रेस को उखाड़ फेंकने का प्रयास करती रही। भाजपा ने हरियाणा विकास पार्टी या फिर ‘इनेलो’ के साथ सत्ता में भागीदारी भी की तो छोटे भागीदार के नाते ही। दरअसल हरियाणा की राजनीति में दो प्रमुख पार्टियां स्थापित हो गईं। कांग्रेस और कालान्तर में सोनिया कांग्रेस और देवीलाल परिवार का क्षेत्रीय दल, इंडियन नेशनल लोकदल। भाजपा इस परिदृश्य में सीमित आधार व क्षेत्र वाली पार्टी बनी रही। इसका अन्दाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि १९६६ में हरियाणा की स्थापना के बाद १९६७ में हुए पहले विधान सभा चुनावों में भारतीय जनसंघ को १३ सीटें प्राप्त हुईं और सदी के अन्त तक आते-आते भी पार्टी लगभग उसी स्थान पर खड़ी थी। २०००, २००५ और २००९ के विधान सभा चुनावों में भाजपा को क्रमश: ६, २, और चार सीटें प्राप्त हुईं। साम्यवादी दलों का हरियाणा में कभी भी कोई आधार नहीं रहा।

लेकिन २०१४ में हुए विधान सभा चुनावों में नरेन्द्र मोदी की लहर के चलते भारतीय जनता पार्टी अचानक हरियाणा में सर्व समावेशी प्रमुख दल के रूप में उभर कर सामने आ गई। पार्टी ने अपने बलबूते चुनाव लड़ा था और उसने ९० में से ४७ सीटें जीत कर इतिहास बना दिया। सोनिया कांग्रेस को महज़ १५ और लोकदल को १९ सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। दरअसल हरियाणा में सोनिया कांग्रेस और लोकदल वैचारिक लिहाज़ से एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों का कोई वैचारिक संघर्ष नहीं है बल्कि सत्ता के लिए ही संघर्ष हैं। दोनों दलों के लोग समयानुसार एक दूसरे की पार्टी में बिना संकोच के शामिल होते रहते हैं। इसीलिए हरियाणा ने हिन्दी साहित्य में नया मुहावरा ‘आया राम गया राम’ स्थापित किया। लेकिन पहली बार हरियाणा के इतिहास में ऐसी पार्टी ने सभी समूहों/जातियों के समर्थन से सत्ता प्राप्त की है, जिसके पास भारत को लेकर एक विशिष्ट दृष्टि है। भाजपा के एक वरिष्ठ विधायक, जो अनेक वर्षों तक भारतीय किसान संघ के संगठन मंत्री रहे, घनश्याम मानिकटाहला के अनुसार प्रदेश की राजनीति में भाजपा के केन्द्र बिन्दु में आ जाने से निश्चय ही प्रदेश की राजनीति स्थायी रूप से बदलेगी।

हो सकता है भविष्य में प्रदेश में दो प्रमुख दल रह जाएं, भाजपा और क्षेत्रीय पार्टी लोकदल। या यह भी हो सकता है भविष्य में सोनिया कांग्रेस और लोकदल ही आपस में हाथ मिला लें। क्योंकि दोनों का उद्देश्य शुद्ध रूप से सत्ता भोगना है, मूलभूत परिवर्तन नहीं। इन दोनों दलों ने पिछले दिनों प्रदेश में राज्य सभा के लिए चुनाव में ऐसा करके भी दिखा दिया है। दोनों दल जातीय संघर्ष एवं क्षेत्रीय विद्वेष बढ़ाने का काम भी कर सकते हैं। इसलिए भाजपा सरकार के सामने प्रमुख चुनौती इन दोनों दलों की इस प्रकार की साम्प्रदायिक एवं जातीय संघर्ष की राजनीति को लगाम लगाना ही होगा। सोनिया कांग्रेस ने तो पिछले दिनों हरियाणा में इसका एक प्रयोग भी करके दिखा दिया। जाट आरक्षण के नाम पर कांग्रेस के क्षत्रपों ने प्रदेश में हिंसा, लूटमार और दंगा फ़साद की जो बिसात कुछ नौकरशाहों के साथ मिल कर बिछाई उसने पार्टी की भविष्य की राजनीति की ओर संकेत भी कर दिया है। मनोहर लाल खट्टर की सरकार को इसी से सावधान रहना होगा।

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