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अश्विन शुद्ध प्रतिपदा से लेकर नवमी तक मनाए जाने वाले नवरात्रि के त्यौहार को शारदीय नवरात्रि कहते हैं। दशहरे के दिन इस नवरात्रि महोत्सव की पूर्तता होती है। यह श्रद्धा, भक्ति का उत्सव तो है ही, आजकल वह ‘इवेंट’ जैसा भी मनाया जाने लगा है।

 

भारतीय संस्कृति में तीन प्रकार की नवरात्रियाँ मनाई जाती हैं। चैत्र महीने में राम की, अश्विन मास में देवी मां की, अगहन के महीने में खंडोबा की नवरात्रि मनाई जाती है। आदिमाया ने दानवों की पीड़ा से मानव की मुक्ति कराने के लिए नौ दिन सतत युद्ध किया था। सूर्यास्त के बाद भी यह युद्ध जारी रहता था। माता ने राक्षसों का संहार किया। उसकी याद में नवरात्रि होती है। इसलिए इसका विशेष महत्व है।

अश्विन शुद्ध प्रतिपदा से शरद ऋतु का आगमन होता है। प्रतिपदा से लेकर नवमी तक मनाए जाने वाले नवरात्रि के त्यौहार को शारदीय नवरात्रि कहते हैं। दशहरे के दिन इस नवरात्रि महोत्सव की पूर्तता होती है।

नवरात्रि में महत्वपूर्ण कुल रीति का पालन होता है। यह एक प्रकार का व्रत ही है। इस व्रत का आचरण किया जाता है।

घर में हम रोज ईश्वर की पूजा-अर्चना करते हैं। अपनी कुल देवता का देवत्व और बढ़े, पूरे घर-बार पर उसकी छत्रछाया बनी रहे, बुरी शक्तियों से हमारी सुरक्षा हो इसलिए यह व्रत किया जाता है। यह व्रत जितनी श्रद्धा, भक्ति से किया जाए उतना अच्छा। इससे घर में सुख-शांति-संतोष बना रहता है।

उपवास, वेदी, देवता-स्थापना, हार, अखंड दीप प्रज्वलन इत्यादि रूपों में नवरात्रि मनाई जाती है। मूल रूप में आद्यशक्ति – महामाया- दुर्गा- चंडी एक ही देवता है। मार्केंडेय पुराण में चंडी देवता की महत्ता का वर्णन है। इसमें से सात सौ श्लोकों को अलग कर ‘सप्तशती’ नामक देवी उपासना का एक ग्रंथ बनाया गया। मानव को सुख, लाभ, जय मिलें, उसकी इच्छापूर्ति हो इसलिए सप्तशती का पाठ किया जाता है। खासकर अश्विन मास की नवरात्रि में इसे पढ़ा जाता है। पाठ करने के अनंतर हवन भी किया जाता है। देवता का शक्ति तत्व विश्व भर में व्याप्त है, प्रभावी है। सत्व, रज, तम जैसी त्रिगुणात्मक शक्ति जब प्रकट होती है, तब वह महासरस्वती, महालक्ष्मी, महाकाली जैसे रूप धारण करती है।

नौ दिन रोजाना सप्तशती का पाठ और हवन करने पर उसे नवचंडी कहा जाता है। सौ पाठ और हवन करने पर शतचंडी कहा जाता है। सहस्र पाठ करने पर सहस्त्रचंडी और लक्ष पाठ करने पर लक्षचंडी कहा जाता है। पाठ संख्या बढ़ने पर अनुष्ठान का स्वरूप भी बदलता है।

श्रीसूक्त यानी ‘श्री’ की प्रशंसा, उपासना। ‘श्री’ यानी लक्ष्मी। ऊँचे दर्जे की, ऊँचे विचारों की, श्रेष्ठ वैभव की उपासना। श्रीसूक्त पढ़ने पर देवता का असीम अद्भुत सामर्थ्य पता चलता है। आर्थिक विवंचना उसी प्रकार आपत्ति के समय श्रीसूक्त का पारायण किया जाता है। नवरात्रि में कई परिवारों में इस कुलधर्म तथा कुलरीति का पालन करने के लिए यह व्रत किया जाता है।

एक पत्तल पर खेतों से काली मिट्टी लाकर ऊँगली जितनी ऊंचाई, हाथ के पंजे जितनी लंबी मिट्टी फैलाई जाती है। यानी छोटा सा खेत तैयार किया जाता है। उस में एक मुट्ठीभर अनाज बोया जाता है। बोने से पहले हल्दी के पानी में डुबाकर फिर बोया जाता है। खेत की पूजा की जाती है, फिर उस में सात प्रकार का अनाज बोया जाता है। उस पर जल सिंचन होता है। घट तैयार कर उसकी पूजा होती है। दीप प्रज्वलन होता है। माता की स्थापना कर नौ दिन षोडश उपचारों से उसकी पूजा होती है। अखंड दीप जलता रहता है। संभव हो तो नौ दिन उपवास रखा जाता है।

नवरात्रि में कुमारी – पूजा भी होती है। पुरातन काल में रोज एक इस प्रकार नौ दिन नौ कुमारियों की पूजा की जाती थी।

देवी मां को रोजाना गेंदे के फूलों की एक माला इस प्रकार नौ दिन नौ मालाएं बांधने का रिवाज है। कुछ स्थलों पर पहले दिन ‘नागवेल’ (खाने के पान की बेल) के पत्ते की माला बांधी जाती है।

घट यानी मटका। मानवी शरीर पंच महाभूतों से बना है। उसमें सांस भरना जीवात्मा का प्रतीक है। वाद्य की धुन पर महिलाएं घट में सांस भरती हैं।

ललिता पंचमी का भी कुलधर्म किया जाता है। उपांग ललिता पूजन भी किया जाता है। यह पूजा षोडष उपचारों से होती है।

षष्ठी से लेकर नवमी तक सरस्वती आवाहन, सरस्वती पूजन, सरस्वती बलिदान और सरस्वती विसर्जन जैसी चार विधियां की जाती हैं।

अष्टमी के दिन सूजी, मैदा और शक्कर डालकर, दूध में गूंथ कर पूरी जैसा व्यंजन बनाया जाता है। इसे मंडप में बांध कर रखते हैं। कई जगहों पर अष्टमी के दिन जोरशोर से देवी मां के गीत गाए जाते हैं। रात कों घट फूंकते हैं। घट में जोर-जोर से मुंह से आवाज कर सांस भरते हैं। कोकणस्थ ब्राह्मण लोगों में पांच साल तक देवी मां की पूजा और ‘घट फूंकना’ यह व्रत रहता है। (जैसा मंगला गौरी पूजा होता है वैसे ही)।

नवरात्रि के नवमी को खंडेनवमी कहा जाता है। पहले अष्टमी के दिन रात को चंडी होम करके पशु की बलि चढाई जाती थी। इस दिन शस्त्र-अस्त्रों की पूजा होती है। उसी प्रकार वाहन, उपकरण, घर के और कारखानों के यंत्रों की पूजा होती है।

क्वार महीने की नवरात्रि यानी शक्ति की उपासना के, पूजा के दिन, भक्ति में महत्ता बताने वाले दिन।

महिष यानी भैसा, केवल अपने ही बारे में सोचने वाला पशु। आधुनिक काल में यह प्रवृत्ति मनुष्य में भी दिखाई पड़ती है। समाज स्वार्थी, भावनाशून्य बन रहा है। व्यक्ति को कुछ ज्यादा ही महत्व दिया जा रहा है।

संघ प्रवृत्ति का निर्माण होना आज की जरूरत है। नवरात्रि के खेलों से सारा समाज एकत्रित होता है। इकट्ठा होने से एक दूसरे के प्रति माया, करुणा, प्रेम निर्माण होता है।

समाज के नेता इस काम के लिए आगे आए। केवल चार आठ दिन का इवेंट ना बनाएं। सालभर यह कर्तव्य बना रहे, तभी इस नवरात्रि का, दहीहंडी का, गणेश उत्सव का, दिवाली का त्यौहार मनाने का पुरखों का हेतु सफल होगा।

उत्सवप्रियता

पहले सिर्फ गुजराती समाज तक ही सीमित नवरात्रि का यह खेल, इन दिनों भाषा की सारी सीमाएं लांघ कर सब के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। वैसे भी भक्ति और आनंद के लिए भाषा की मर्यादा थोड़े ही न होती है? मराठी लड़के लड़कियां भी पारंपरिक पोशाक पहनकर दांडिया खेलते हैं। आजकल हिंदी-मराठी फिल्म और सीरियल के कलाकारों का इसमें सहभाग होता है। ऊँची आवाज में डीजे जिससे जनता त्रस्त होती थी, इसका भी खयाल नहीं किया जाता था। अब आवाज पर नियंत्रण रखा जाता है।

गुजराती समाज का गरबा और उत्तर प्रदेश का रास इनका मिश्रण सब जगह पाया जाता है। चन्द्रमा के शीतल प्रकाश में, यमुना किनारे, कन्हैया की बांसुरी के सूर और दांडिया के ताल पर रास लीला रंग लाती थी।  गुजराती समाज हाथ से ताली बजाकर गरबा खेलता था। इनको मिलाकर आज के युवक-युवतियाँ दांडिया खेलते है। दांडिया की धुन में रंग जाना सर्वत्र देखा जाता है।

जैसे मराठी समाज की तुलजा भवानी, कोल्हापुर की अम्बाबाई वैसे ही गुजराती समाज की भी अम्बा माता। इस अम्बा माता को प्रसन्न करने का यह उत्सव है। मन्नत पूरी करने हेतु, या मन्नत मानने हेतु, एक गरबी यानी छोटी मटकी खरीदी जाती है। नौ दिन उसकी पूजा होती है। अंदर दिया जलाया जाता है। मटकी रंगी जाती है, सजाई जाती है। हर साल अम्बा माता के सामने गरबी लाकर उसकी पूजा की जाती है। तालियाँ बजाकर आरती गाई जाती है। देवी माँ हमारी मनोकामना पूरी करें इसलिए गरबा खेला जाता है।

सालों पहले गुजरात के ‘खारवा’ समाज के युवक कामकाज की खोज में मुंबई आए। ‘खारवा’ यानी हमारे आगरी (मच्छीमार) भाई। खारवा समाज उत्सवप्रिय है। उन्होंने अपनी संस्कृति मुंबई में प्रस्थापित की। उत्सव मंडल की स्थापना हुई, हाथ से ताली बजाकर रात में गरबा खेला जाने लगा। प्रारंभ में अम्बा माता की पूजा विधिवत संपन्न होने लगी, फिर आरती और भोग चढ़ाया जाने लगा। पारंपरिक पोशाक पहनकर स्त्री पुरुष, गरबा रास नृत्य में सहभागी होने लगे। ढोल बजने पर सबके पांव थिरकने लगे। अम्बा माता के विविध रूप दिखाई देने लगे।

गरबा दांडिया खेलने जाते समय, सजधज कर जाने का रिवाज ही बन गया। चनिया चोली, घागरा और उस पर अप्रतिम कारीगरी, गहरा रंग, एम्ब्रॉयडरी करते समय कांच, सीपियां, छोटे-छोटे शीशें, जरी का धागा लेकर, की गई एम्ब्रॉयडरी, उसी के अनुसार अलग-अलग गहने। ऑक्सिडाइज्ड गहनों की मांग ज्यादा है। बिंदी, गजरे, कान की बाली, छोटे बड़े नेकलेस, चूडियां, अंगूठियां, पायल इन सबके सेट बाजार में मिलते हैं।

दांडिया इवेंट बन गया। उसमें सेलिब्रिटी आए, राजनेता भी शामिल हुए। इवेंट का बिजिनेस बन गया। यातायात में बाधा, कर्णकटु आवाज, और करोड़ों का बिजिनेस हुआ। इसकी पवित्रता आनंद नष्ट हुआ।

हम आशा करेंगे कि भविष्य में इसमें अच्छा फर्क आएगा।

विजया दशमी

शरद ऋतु  क्वार महीना, क्वार शुद्ध दशमी के दिन दशहरा होता है, इसलिए विजया दशमी या दशहरा यह नाम है।

दुर्गा ने चंडी माता का अवतार धारण कर नौ दिन और नौ रात्रि शुम्भ-निशुम्भ, रक्तबीज और महिषासुर इत्यादि राक्षसों कों मार डाला। राक्षसों की आसुरी प्रवृत्ति, बुरे कृत्य करने वालों का देवी माता ने नाश किया। क्वार शुद्ध दशमी को विजयोत्सव मनाया। इस मंगल विजय मुहूर्त कों विजयादशमी या दशहरा कहा जाता है। यह प्रसिद्ध साढ़े तीन मुहूर्तों में से एक है। शमी के पेड़ के नीचे अपराजिता देवी मां की मूर्ति बनाकर श्रद्धायुक्त मन से पूजा करके, उसी प्रकार शमी वृक्ष की भी पूजा कर के श्री रामचंद्र ने रावण वध के लिए प्रस्थान किया।

गुरु दक्षिणा के रूप में चौदह करोड़ सुवर्ण मुद्रा मांगने वाले कौत्स के लिए रघु राजा ने कुबेर के साथ युद्ध की तैयारी की। भयग्रस्त कुबेर ने शमी वृक्ष पर सुवर्ण की बौछार की। उसने सारी मोहरें कौत्स को दीं, पर कौत्स ने सिर्फ चौदह करोड़ सुवर्ण मुद्राएं ही लीं। बची खुची मोहरें जनता को ले जाने के लिए कहा।

     पांडवों ने अज्ञातवास को जाते समय अपने सारे शस्त्र शमी के वृक्ष पर छुपाये थे।

     ऐसा यह शमी वृक्ष महादोषों का निवारण करने वाला वृक्ष है।

रावण दहन

उत्तर भारत में दशहरे के दिन रावण के पुतले को जलाया जाता है। मैसूर का दशहरा देखने देश-विदेश से लोग आते हैं। मैसूर शहर दीपों से झिलमिलाता है। राजमहल में रौशनी की जगमगाहट होती है। हाथी घोड़े सजाकर शोभा यात्रा निकलती है। चामुंडा हिल्स की देवी माता का दर्शन करने के बाद हर्षोल्लास में दशहरा मनाया जाता है।

राजस्थान में दशहरे के दिन शमी पूजा कर के गुरु के दर्शन किए जाते हैं। ठाकुर घराने की ललनाएं पारंपरिक पोशाक और अलंकार पहन कर नृत्य करती है। शमी कों वहां पर खेजड़ी कहा जाता है।

हिमालय की कुलू घाटी में दशहरे के दिन रघुनाथ की पूजा संपन्न होती है। उत्सव मनाया जाता है। बड़ी यात्रा निकलती है।

जयपुर दशहरे की शोभा यात्रा आंखों को प्रसन्न करती है।

महाराष्ट्र में अम्बे मां के नाम का जागरण होता है। गीत गाए जाते हैं (जोगवा)। दशहरे के दिन सीमोल्लंघन होता है। शस्त्रों की पूजा होती है। आप्त जनों में ‘आपटा’ (कांचन) वृक्ष के पत्ते बांटे जाते हैं,  जिसे ‘सोना’ कहा जाता है। पुराने समय में ‘आपटा’ वृक्ष की पूजा मंत्र से होती थी। इस पेड़ की जद में चावल, सुपारी, एकाध सिक्का रखा जाता था। वृक्ष की परिक्रमा कर तने के पास की मिट्टी और पत्ते घर लाए जाते हैं। भगवान को पत्ता चढा कर ‘आपटा’ वृक्ष के पत्ते ‘सोना’ कहकर आप्त जनों में बांटे जाते हैं। यह सोना याने कि ये पत्ते छोटों ने बड़ों को देने का रिवाज है।

प्रारंभिक काल में यह कृषि से सम्बंधित त्यौहार था। पहली फसल घर लेने के बाद यह उत्सव मनाने का रिवाज था। अनाज का अंकुर या उपरी हिस्सा भगवान को चढ़ा कर धान की बाली घर के प्रवेश द्वार पर बंदनवार की तरह लटकाई जाती थी। बाद में इस त्यौहार का रंग रूप ही बदल गया।

दुर्गा पूजा

मुंबई में जैसे गुजराती समाज का गरबा मशहूर है, वैसे ही बंगाल की दुर्गा पूजा। यह त्यौहार षष्टी से लेकर दशहरे तक संपन्न होता है। बंगला में इस पूजा को दुग्गा पूजा कहा जाता है।

दुर्गा पूजा में प्रमुख प्रतिमा दुर्गा की होती है, शस्त्रों से लैश सिंहासनारूढ़, पांव के निचे महिषासुर, उसे मारने के लिए हाथ में शस्त्र, जीभ बाहर की ओर, शक्ति स्वरूपा देवी माता। गणपति, कार्तिकेय, लक्ष्मी, सरस्वती की अपने-अपने वाहनों सहित बनी हुई मूर्तियां। यह दुर्गा माता अपने बच्चों समेत, षष्टी से लेकर दशमी तक मायके रहने आती है। उसकी इस छवि को काठात्म्य कहते हैं।

देवी मां की मूर्ति बाम्बू की चपटी पट्टी, और मिट्टी का उपयोग कर बनाई जाती है। ‘शोला’ नामक पेड़ के अंदरूनी हिस्से से माता के गहने और साजसज्जा की जाती है। ‘काठशोला’ और ‘भातशोला’, जैसे दो प्रकार के पेड़ हैं। भूरे रंग का छिलका निकाल देने पर अंदर का हलका, नरम, छोटे-छोटे छिद्रों वाला, लचीला पदार्थ मिलता है। उसका उपयोग कर देवी मां के जेवरात और सजावट की जाती है। मुंबई/ठाणे में बंगाली समाज बड़ी मात्रा में पाया जाता है।

षष्ठी के दिन दुग्गा माता का मायके में आगमन होता है। सप्तमी के दिन दुग्गा माता को, बोधन, आवाहन, आमंत्रण दिया जाता है। अष्टमी, नवमी इन दो तिथियों के दौरान ४८ मिनट का मुहूर्त होता है। इसी समय देवी माता ने महिषासुर राक्षस को मारा था, इसलिए, इस समय माता की संधि पूजा की जाती है।

दशहरे के दिन सुबह आरती उतारने के पश्चात् देवी मां को फलो का भोग चढ़ाया जाता है। माध्यान्ह काल में ढोल और शंख बजाया जाता है। घंटा नाद करते हुए देवी मां की प्रार्थना की जाती है। दशहरे के दिन सूर्यास्त के पहले दुर्गा माता के दर्शन शीशे में या पानी में किए जाते हैं। तदनंतर पानी में विसर्जन होता है। देवी माता को सिंदूर चढ़ा कर महिलाएं अपने मांग में सिंदूर भर लेती हैं। इसे सिंदूर पूजा कहा जाता है।

पंचमी से लेकर दशहरे तक मनाए जाने वाले उत्सव में पांच दिन सब को नरनारायण भोग यानी महाप्रसाद दिया जाता है। दुर्गा माता के साथ-साथ गणपति, कार्तिक स्वामी, लक्ष्मी, सरस्वती की स्थापना कर पूजा की जाती है।

कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं। उसमें संगीत, नाटक, ऑर्केस्ट्रा, पारंपरिक बंगाली ढाक यानी ढोल बजाने का कार्यक्रम होता है।

नवमी के दिन कुमारी पूजन किया जाता है। दस साल की कुमारी कन्या को दुर्गा माता बना कर, उसकी पूजा की जाती है। पांच दिन के इस काल में चंडी पाठ होता है।

बंगाल में बहुत बड़ी मात्रा में यह उत्सव मनाया जाता है। कचहरी, पाठशाला, महाविद्यालयों में छुट्टी रहती है। दुर्गा माता की दस भुजों वाली मूर्ति मिट्टी से बनाई जाती है। सुंदर सजावट होती है। यह उत्सव हजारों सालों से मनाए जाने की परंपरा है। महिलाएं, लडकियां इन दिनों मायके आती हैं।

बंगाल, बिहार, ओडिशा, असम, उत्तर प्रदेश आदि जगहों पर दुर्गा पूजा होती है।

भोंडला/भुलाबाई/हादगा

नवरात्रि यानी गरबा। मुंबई/ठाणे की यह आम बात है, परंतु गुजरे चार पांच सालों में ‘भोंडला’ इस खेल की भी शुरुआत हो गई है। सारी जाति, धर्म, पंथ के भेदों कों दूर कर हर साल ‘महाभोंडला’ का आयोजन होने लगा है।

पहले घर-घर भोंडला खेला जाता था। आंगन में रंगोली बनाकर उस पर पाटा रखा जाता था। उस पर हाथी का चित्र बना कर, आसपास की सारी महिलाएं एकत्रित होकर उसकी पूजा करती थीं। पाटे के आसपास गोल घूम कर गाने गाए जाते थे। ये गाने पारंपरिक होते थे। सब थक कर नीचे बैठने पर जो चीजें खाने के लिए दी जाती थी, उन्हें पहचाना जाता था। नवरात्रि नौ दिन गांव में शोर मचा रहता था।

महाराष्ट्र में ‘भोंडला’ यह खेल भुलाबाई, हादगा इन नामों से परिचित है।

भुलाबाई के गानों में शंकर पार्वती का नाम आता है। पुरातन काल में घर गृहस्थी के चक्कर में उलझी स्त्रियों के लिए आपस में सुख-दुख बांटने के लिए यह खेल खेला जाता था। यह भी एक तरह से त्यौहार ही है। गाने भी विशेषता लिए हुए हैं। अब ‘भोंडला’ खेल के भी मेगा इवेंट शुरू हो गए हैं। चित्र के बदले में सचमुच हाथी को लाया जाता है। पांच साल की बालिका से लेकर पचहत्तर साल की वृद्धा तक सब इस इवेंट में हिस्सा लेती हैं।

‘भोंडला’ यह खेल सेहत से भरा संस्कृति की जानकारी देने वाला खेल है। इसके गीत हैं ऐलम्मा पैल्लमा गणेश देवा यह गीत गाकर गणपति की वंदना होती है। सारी महिलाएं मिल कर पारंपरिक गीत गाती हैं। धार्मिक गाना जिसे ‘गोंधळ’ कहा जाता है और ‘जोगवा’ कहा जाता है, गाया जाता है।

रब्बी की फसल पनपने के लिए यह हस्त नक्षत्र की पूजा ‘भोंडला’ होती है।

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