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अटलजी बस अटल जी थे। अनुपमेय। आज वातावरण में व्याप्त राजनीतिक कलुष में उनकी बातें सबको बहुत याद आती हैं। वे सत्य ही वर्तमान युग के अजातशत्रु थे जिन्होंने भारत की आराधना की। इसीलिए वे कह सके “मेरी आस्था -भारत।”

 

अटल जी ने जो जीवन जिया, उसका यह पुण्य प्रभाव था कि मृत्यु में वे जीवन से भी विराट दिखे। उन्होंने अपने लिए कभी वह ऊंचाई नहीं मांगी जहां सिर्फ बर्फ जमे, पत्थर हों, जो ऊंचाई हो वह इतनी अधिक न हो कि जहां कोई गोरैया अपना घोंसला न बना सके। उनकी इसी भाव वाली कविता की अंतिम पंक्तियां हैं-

मेरे प्रभु!

मुझे इतनी उंचाई कभी मत देना,

गैरों को गले न लगा संकू,

इतनी रुखाई कभी मत देना।

जो भावुक पाठक को रुला भी देती हैं। उनकी अंतिम यात्रा में मुखरित जन-जन के मन का स्नेह छंद बड़े-बड़े सम्राटों और शासकों को भी शायद न मिला हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तुरंत निर्णय लिया कि वे अंतिम यात्रा में पैदल चलेंगे और अटल जी के साथ-साथ चलेंगे और मात्र कुछ मील की यात्रा ने भारत के सवा अरब नागरिकों को भी इस यात्रा में मोदी के माथे पर झलके स्वेद बिंदुओं से जोड़ दिया। क्या अद्भुत दृश्य था! सिर्फ आंखें ही नहीं थीं मन और तन भीतर-बाहर से भीग-भीग सा गया।

अटलजी के बारे में लिखना उतना ही कठिन है जैसे गंगा की बहती धारा का वर्णन प्राय: शब्दातीत हो जाता है। कठोर होते हुए भी मृदुल, प्रतिपक्षी की आक्रामकता सहेजते हुए भी संबंधों में मैत्री की शालीनता, कठोर प्रहार करते हुए भी शब्द संयम और वाणी में सौम्यता, ऊंचाई होते हुए भी हरी दूब सी विनम्रता अटल जी को बस अटल जी बनाने वाले गण हैं। बड़ी बात है कि उनका मन बड़ा है। उनका मनपसंद वाक्य अक्सर सुनने में आता है- ‘मतभेद रखो मनभेद नहीं’। उनके साथ बहुत लंबे अरसे तक मिलने, बैठने और यात्राएं करने का अवसर मिला। उनमें सुनने का जितना अद्भुत धैर्य था वैसा शायद ही किसी और में हो। जब भी मिलने गया, अत्यंत व्यस्तता में भी उन्होंने कभी यह एहसास नहीं होने दिया कि अपना कहना बंद करो, अब मुझे जाना है। वे अपनी बात कहने आए व्यक्ति को इस बात का अपार संतोष धन देते थे कि अटल जी ने मेरी बात सुन ली। आज संगठनों और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सबसे बड़ी पीड़ा और वेदना इसी बात की है कि सब सुनाने वाले मिलते हैं, सुनने वाले नहीं। मैंने एक बार अटलजी से कहा कि आपके साथ दिल्ली से मथुरा दीननयाल धाम तक अकेले चार घंटे सफर करने का मौका मिला। बहुत कुछ सुनाने के भाव से मैं ही बकबक करता गया और आप सुनते रहे। इतना धैर्य कहां से आया? अटल जी खूब हंसे और बोले, यह तो मन की बात है। सुनने से कुछ मिलता ही है। जो पसंद आए उसे रख लो, बाकी छोड़ दो।

वे अपने घनघोर विपक्षी पर भी घनघोर व्यक्तिगत प्रहार के पक्षधर नहीं थे। हम पांचजन्य में उन दिनों सोनिया जी के नेतृत्व में कांग्रेस की अलोचना करते हुए अक्सर तीखी आलोचना करते थे। ऐसे ही एक अंक को देखकर उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय से ही फोन किया- विजय जी, नीतियों और कार्यक्रमों पर चोट करिए, व्यक्तिगत बातों को आक्षेप से बाहर रखिए। यह अच्छा होगा। एक बार हमने धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र अंक निकाला जिसके मुखपृष्ठ पर काशी के डोमराजा के साथ संतों, शंकराचार्य और विश्व हिंदू परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष श्री अशोक सिंहल का भोजन करते हुए चित्र छापा। अटलजी ये देखकर बहुत प्रसन्न हुए और कहा कि ऐसी बातों का जितना अधिक प्रचार प्रसार हो, उतना अच्छा है। ऐसे कार्यक्रम और होने चाहिए। लेकिन मन से होने चाहिए, फोटो -वोटो के लिए नहींं। पांचजन्य के प्रथम संपादक तो थे ही, प्रथम पाठक भी थे। प्रधानमंत्री रहते हुए हमारे अंकों पर उनकी प्रतिक्रियाएं मिलती थीं। एक बार स्वेदशी पर केंद्रित हमारे अंक के आवरण पर भारत माता का द्रौपदी के चीरहरण जैसा चित्र देख वे क्रुध्द हुए- ‘हमारे जीते जी ऐसा दृश्यांकन। हम मर गए हैं क्या? संयम और शालीनता के बिना क्या पत्रकारिता नहीं हो सकती?’

पचास के दशक के उस दौर से जब नेहरूवादी मानसिकता के कारण भिन्न मत के वर्ग पर एक प्रकार की वैचारिक अस्पृश्यता का प्रहार था और तब अटलजी के संपादकत्व में पाचंजन्य, राष्ट्रधर्म, स्वदेश, हिन्दुस्तान जैसे पत्र निकले। अटलजी ने इस सभी पत्रों को नई दिशा और कलेवर दिया। वे संघर्ष के दिन थे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के साथ कठिनाइयों में भी वे खूब मेहनत से काम करते। तब उन्होंने लिखा-

बाधाएं आती हैं आएं, घिरे प्रलय की घोर घटाएं,

पावों के नीचे अंगारे, सिर पर बरसे यदि ज्वालाएं,

निज हाथों में हंसते-हंसते, आग लगाकर जलना होगा,

कदम मिलाकर चलना होगा।

जब से सरकार के पहले दौर में 13 दिन के लिए प्रधानमंत्री बने तो मैंने उनसे कहा कि सरकार सब तरह की यात्राओं को मदद देती है, कैलास -मानसरोवर यात्रा को भी सरकार की सहायता मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा- तुम तुरंत पत्र लिखो, मैं कुछ करता हूं। मैंने अपना हस्तलिखित आवेदन ही सम्पूर्ण पृष्ठमूमि समझाते हुए दे दिया। तब उनके प्रमुख सचिव श्री बिशन टंडन थे। वह पत्र उस समय लोकसभा में भेजा गया जब अटल जी इस्तीफा देने वाले थे। वहीं से उन्होंने हस्ताक्षर करके वह अनुदान स्वीकृत करवाया जो अभी तक चल रहा है और उसके बाद अनेक राज्य सरकारों ने भी अनुदान प्रारंभ किए।

जब वे दोबारा प्रधानमंत्री बने तो अधिक आत्मविश्वास के साथ कठोर निर्णय भी लेने में हिचकिचाए नहीं। पोखरण-2 का विस्फोट ऐसा  ही चमत्कारिक क्षण था। अमेरिका जैसा तथाकथित सर्वशक्तिशाली देश भी भौचक्का और हैरान रह गया। दुनिया भर से प्रतिबंध लगने लगे पर अटलजी ने परवाह नहीं की। अमेरिका से सुपर कंप्यूटर नहीं मिला तो महान वैज्ञानिक विजय भाटकर को प्रोत्साहित कर भारत में ही सुपर कंप्यूटर बनवाया। क्रायोजेनिक इंजन नहीं मिला तो भारत में ही उसका विकास किया।

कारगिल में पाकिस्तान को करारी शिकस्त देने के बाद भी आगरा शिखर वार्ता उनके आत्मविश्वास का ही द्योतक थी।

सूचना प्रोद्योगिकी में क्रांति, मोबाइल टेलिफोन को सस्ता बनाकर घर-घर पहुंचाना, भारत के ओर-छोर स्वर्णिम चतुर्भुज राजमार्गों से जोड़ना और हथियारों के मामले में भारत को अधिक सैन्य सक्षम बनाना अटल जी की वीरता एवं विकास केंद्रित नीति के शानदार परिचय हैं। अंतिम व्यक्ति की गरीबी को दूर करने के लिए बेहद चिंतित रहते थे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के एकात्म मानववाद और गांधी चिंतन में उनकी गहरी श्रद्धा थी। इसीलिए भाजपा निर्माण के बाद उन्होंने गांधीवादी समाजवाद को अपनाया।

अटलजी का व्यक्तित्व एक ऐसे स्वयंसेवक के पुण्य प्रवाह का प्रतिबिम्ब है जिसकी कलम ने लिखा था, “गगन में लहराता है भगवा हमारा, रग-रग हिंदू मेरा परिचय और केशव के आजीवन तप की यह पवित्रतम धारा…. साठ सहस ही तरेगा इससे भारत सारा”। ’हिरोशिमा की वेदना’, और ‘मनाली मत जइयो’ उनके कवि हृदय की वेदना एवं उछाह दर्शाते हैं तो एक समय ऐसा भी आया जब दु:ख व कष्टों ने घेरा। अपनों की मार से हुई व्यथा ने उन्हें झकझोरा, पर वे टूटे नहीं। तार तोड़े नहीं।

1994 में रज्जू भैया ने आग्रहपूर्वक मेरी पुस्तक “कैलास-मानसरोवर यात्रा- साक्षात शिव से संवाद” का प्रकाशन करवाया। फिर कहा- इसका उद्घाटन समारोह करें- अटलजी से करवाओ। मैं अटलजी के पास गया तो वे बोले हम तो हैं ही। कर ही देंगे। रज्जू भैया ने कहा है। पर मेरी राय है ऐसे समारोहों में उन्हें भी साथ जोड़ना चाहिए जो साथ में न होते हुए भी चिर परिचित विद्वान और राष्ट्रभक्त हैं। मेंने कहा, कैसे? उन्होंने अपने चिर परिचित क्षणिक ठहराव के बाद कहा- डॉ. कर्ण सिंह। उन्हें बुलाइए। मैंने कहा- मेरा उनसे परिचय नहीं। उन्होंने फोन उठाया, सहायक से डॉ. कर्ण सिंह से बात करने को कहा। बात की और डॉ. कर्ण सिंह का पुस्तक लोकर्पण करने के लिए स्वयं आमंत्रित किया।

2007 की बात है। उनका स्वास्थ्य कुछ ठीक नहीं, पता चलने पर मैंने प्रश्न किया। एक क्षण के सुपरिचित मौन के बाद वे बोले, “देह धरण को दंड है, सब काहू को होय। ज्ञानी भुगते ज्ञान से, मूरख भते रोय” और वह कहकर हंस पड़े

मैंने पूछा, अटलजी ये किसकी पंक्तियां हैं। बोले, पता नहीं, पर मेरे पिता जी कृष्ण बिहारी वाजपेयी सुनाया करते थे। इसीलिए शरीर के कष्टों पर दु:खी नहीं होना चाहिए।

हमने 1996 से लेह में सिंधु दर्शन प्रारंभ किया था। आडवाणी जी का वरदहस्त था। साहिब सिंह वर्मा जी का उत्साहवर्द्धक सहयोग तो था ही, रज्जू भैया और हो. वे. शेषाद्रि जी का संरक्षण बहुत बड़ा संबल था। हम संकोच से अटल जी से सिंधु दर्शन के उद्घाटन हेतु कहने में हिचकते थे। एक बार उनका फोन आया, “विजय जी , सिंधु दर्शन अकेले ही करेंगे? हमें न्योता नहीं मिला।” उनका उलाहना हमें भिगो गया। वर्ष 2001 में उन्होंने सिंधु दर्शन अभियान का उद्घाटन किया और हृदय को रोमांचित करने वाला उद्बोधन दिया, ”इस उत्सव ने राष्ट्रगान के अधूरेपन को भर दिया”

सभ्यता और संस्कृति के बारे में उन्होंने बहुत गंभीर बात कहीं, “सभ्यता कलेवर है, संस्कृति उसका अंतरंग। सभ्यता स्थूल होती है, संस्कृति सूक्ष्म। समय के साथ सभ्यता बदलती है, क्योंकि उसका संबंध भौतिक जीवन से होता है किंतु उसकी तुलना में संस्कृति मुख्य रूप से आंतरिक जगत से जुड़ी होने के कारण अधिक स्थायी होती है। जब यह कहा जाता है ग्रीक, रोम, मिस्त्र, यूनान की सभ्यताएं नष्ट हो गईं तो निस्संदेह उसमें उनके स्थूल जीवन का ही नहीं, उनके जीवन मूल्यों का समावेश होता है।”

यह हमारी राष्ट्रीयता का ही अंग है कि हम एक ऐसा देश बनाना चाहते हैं जिसमें ”दैहिक, दैविक, भौतिक तापा, रामराज काहू नहीं व्यापा” की बात फलीभूत हो। खाद्य के क्षेत्र में सुरक्षा भी हमारी बहुत बड़ी उपलब्धि है। अब कहीं कोई भुखमरी का शिकार नहीं होता। अंत्योदय के अंतर्गत दो रुपए किलो गेहूं तथा तीन रुपए किलो चावल देते हैं। लेकिन अब तो हाल यह है कि लेने वाले नहीं मिलते। हालात सुधर रहे हैं।”

अटलजी बस अटल जी थे। अनुपमेय। आज वातावरण में व्याप्त राजनीतिक कलुष में उनकी बातें सबको बहुत याद आती हैं। वे सत्य ही वर्तमान युग के अजातशत्रु थे जिन्होंने भारत की आराधना की। इसीलिए वे कह सके “मेरी आस्था- भारत।”

वे भारत के राष्ट्रीय नेतृत्व का मानक बने हैं। यह मानक भारत को उजाला दे।

 

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