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पश्चिमोत्तर और मध्य एशियाई क्षेत्रों से हुई घुसपैठों के रास्ते में पड़ने वाले हरियाणा को सिकंदर के समय से अनेक सेनाओं के हमलों का सामना करना पड़ा। यह भारतीय इतिहास की अनेक निर्णायक लड़ाइयों का प्रत्यक्षदर्शी रहा है।

पानीपत की लड़ाई १५२६ में जब मुगल बादशाह बाबर ने इब्राहीम लोदी को हरा कर भारत में मुगल साम्राज्य की नींव डाली। १५५६ में अफगान सेना मुगल शहंशाह अकबर की सेना से पराजित हुई। करनाल की १७३९ में हुई लड़ाई में फारस के नादिरशाह ने ध्वस्त होते मुगल साम्राज्य को जोरदार शिकस्त दी। १७६१ में अहमदशाह अब्दाली ने मराठा सेना को निर्णायक शिकस्त देकर भारत में ब्रिटिश हुकूमत का रास्ता साफ कर दिया।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में हरियाणा के अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने योगदान दिया है जिसमें प्रमुख हैं-चौधरी देवी लाल और अरुणा आसफ अली। इसके अलावा बंसीलाल और सुचेता कृपलानी के योगदान को कौन भूल सकता है? १८५७ का विद्रोह दबाने के बाद ब्रिटिश शासन के स्थापित होने पर अंग्रेजों ने झज्जर और बहादुरगढ़ के नवाब, बल्लभगढ़ के राजा और रेवाड़ी के राव तुलाराम के क्षेत्र या तो ब्रिटिश शासन में मिला लिए या फिर पटियाला, नाभ और जींद के शासकों को सौंप दिए और इस प्रकार हरियाणा पंजाब प्रांत का भाग बन गया। एक नवंबर, १९६६ को पंजाब प्रांत के पुनर्गठन के पश्चात हरियाणा को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। देश की राजधानी दिल्ली से सटे हुए हरियाणा ने अनेक साम्राज्यों के उत्थान और पतन को देखा है। लेकिन यहां के जन-जीवन में उन सब राजनैतिक परिवर्तनों का बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ा; क्योंकि अपनी आंतरिक-सामाजिक व्यवस्था में कभी भी इन लोगों ने बाह्म हस्तक्षेप को सहन नहीं किया।

हरियाणा की गणपरम्परा को शासकों ने भी सदा मान्यता दी। हर्ष काल से लेकर मुगल काल के अंत तक हरियाणा की सर्वोच्च पंचायत को शासन की ओर से महत्व दिया जाता रहा। सर्वखाप पंचायत के पुराने दस्तावेजों से पता चलता है कि मुगल शासकों की ओर सेे सर्वखाप पंचायत के प्रमुख को पदवी दी जाती थी और पंचायत के फैसलों को पूरी मान्यता मिलती थी। मुगल काल में जनपदों का स्थान खापों ने और गणों का स्थान सर्वखाप पंचायतों ने ले लिया था। सर्वखाप पंचायत की सत्ता को सतलुज से गंगा तक मान्यता प्राप्त रही है। इस प्रदेश में रोमन और ग्रीक गणपरम्पराओं से भी कहीं अधिक सुव्यवस्थित गणव्यवस्था रही है। मध्य युग में उत्तर-पश्चिम से आक्रांताओं का तांता सा बंध गया। आक्रांता सिंधु-प्रदेश में, बिना किसी अवरोध के घुस आते थे परन्तु जब वे कुरू प्रदेश के योद्धाओं से टकराते तो उनका सामना नहीं कर पाते थे। बौद्ध काल के प्रारंभ में भी इस प्रदेश में यौधेयगण के शक्तिशाली संगठन का पता चलता है। सिकन्दर ने व्यास नदी को पार करने का साहस इसीलिए तो नहीं किया था कि व्यास के इस पार मगधों और यौधेयों की शक्ति से वह अच्छी तरह से परिचित हो चुका था। वह जानता था कि यौधेयगण के शूरवीरों से मुकाबला करना आसान नहीं है। बाहर की शक्तियों से टकराने वाले इन योद्धाओं ने भारत के सिंहद्वार के पहरेदारों के रूप में पीढ़ियों तक पहरा दिया। इसलिए तो सतलुज से इस पार को ही भारत का सिंहद्वार कहा जाने लगा।

प्राचीन हरियाणा की सबल गण-परम्परा के फलस्वरूप ही यहां के लोग सदा से राष्ट्रवादी रहे। राष्ट्रवाद की इस ज्वाला के कारण ही कालांतर में उन्होंने हर उस साम्राज्यवादी शक्ति से टक्कर ली जिन्होंने भी उनकी राष्ट्रवादी व्यवस्था में हस्तक्षेप किया। सन् १८५७ का जन-विद्रोह भी उसी आस्था का प्रतीक था। यौधेय गणराज्य ने कालांतर में एक शक्तिशाली गणसंघ का रूप ले लिया था, जिसके अंतर्गत अनेक गणों की शक्ति जुड़ गई थी। यौधेय गणसंघ के मुख्य गण थै- यौधेय, आर्जुनायन मालव, अग्रेय तथा भद्र। आर्जुनायन गणराज्य आधुनिक भरतपुर और अलवर क्षेत्रों पर आधारित था तथा मालव गणराज्य पहले पंजाब के आधुनिक मालवा क्षेत्र में स्थित था परन्तु इण्डोग्रीक आक्रमणों के कारण मालव राजपूताना क्षेत्र चले गए। जयपुर क्षेत्र में मालवनगर नामक प्राचीन स्थान उनकी राजधानी थी। अग्रेय गण की राजधानी आज का अग्रोहा था। एक मत के अनुसार यहां के गणपति एवं गणाध्यक्ष को अग्रसेन की उपाधि से अलंकृत किया जाता था।

मौर्यकाल में भी यौधेय पूरी तरह शक्ति सम्पन्न रहे और उनका बहुधान्यक प्रदेश अपनी समुद्वि के लिए भारत में प्रसिद्ध रहा जबकि देश के अन्य गण लगभग ध्वस्त हो चुके थे। गुप्त काल में आकर यौधेयों का गुप्त सम्राटों से संघर्ष चला। पहले के गुप्त शासकों ने यौधेयों को केवल उनकी प्रभुसत्ता स्वीकार करने तक को राजी करने का प्रयास किया किन्तु यौधये जिन्हें अपने गणराज्य पर गर्व था किसी भी रूप में साम्राज्यवादी प्रभुत्व स्वीकारने को तैयार नहीं हुए। परन्तु यह स्थिति चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के समय में बदल गई। सम्राट विक्रमादित्य ने यौधेय को मटियामेट करने का संकल्प किया और एक धारणा के अनुसार दोनों शक्तियों में लगभग चौथाई शताब्दी तक घोर संघर्ष चला और अंत में उस विशाल साम्राज्यवादी शक्ति ने देश की सम्भवत: अंतिम गण-शक्ति को ध्वस्त कर दिया।

मल्लयुद्ध और युद्ध-कौशल में हरियाणा का जवाब नहीं था। वे जहां विकट योद्धा थे वहीं सरल जीवन वाले किसान भी थे। यह गर्व की बात है कि पूरे एक हजार वर्ष तक इस गणराज्य ने भारत के इतिहास में अपूर्व प्रसिद्धि प्राप्त की और अपने प्रदेश को गणतंत्रात्मक राजनैतिक व्यवस्था के अधीन चरम विकास तक पहुंचाया।

हर्ष काल में हर्ष के पिता प्रभाकर वर्धन ने स्थाण्वीश्वर (थानेश्वर) में बैठ कर ही एक शक्तिशाली साम्राज्य की शक्ति को बढ़ाया था। उन्होंने हूणों की बढ़ती हुई शक्ति पर जोरदार प्रहार करके उन्हें भारत से भगा दिया। गुप्तों और गांधारों की शक्ति को नष्ट करके वर्द्धनों ने उत्तर भारत के सभी भूभागों पर अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया। वर्द्धन वंश का सबसे प्रतापी शासक हर्षवर्धन था, जिन्होंने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की। हरियाणा प्रदेश का वह एक गौरव युग था। चीनी भिक्षु स्रेनसांग ने हर्ष की राजधानी स्थाण्वीश्वर (थानेश्वर) के वैभव और समृद्धि का सुंदर चित्रण किया है। बाणभट्ट ने अपने हर्षचरित नामक ग्रंथ में उस समय के हरियाणा प्रदेश के जन-जीवन और सांस्कृतिक-परम्पराओं का व्यापक वर्णन किया है। १०१४ ई. में महमूद गजनवी ने थानेश्वर पर आक्रमण करके चक्रतीर्थ स्वामिन की मूर्ति तथा अनेक मंदिरों को नष्ट-भ्रष्ट किया। हरियाणा के तोमर शासक ने गजनवियों को भगाने के लिए अन्य भारतीय शासकों से सहायता मांगी। ग्यारहवीं शताब्दी में हरियाणा के तोमर शासकों को गजनवी वंश, कश्मीर के लोहार शासक तथा राजस्थान के चौहान (चाहमान) शासकों के घोर विरोध का सामना करना पड़ा। बारहवीं शताब्दी में चौहान शासक अर्णोराजा (१३३१-५१) ने हरियाणा प्रदेश पर आक्रमण कर तोमरों को पराजित कर दिया। दिल्ली तथा हरियाणा पर ११५६ में बीसलदेव या विग्रहराज षष्ठ ने विजय प्राप्त कर तोमरों से दिल्ली और हांसी हस्तगत कर लिए। इस विजय ने चौहानों को भारत की सर्वोच्च शक्ति बना दिया, क्योंकि तोमरों के अधीन दिल्ली व हरियाणा पर अधिकार अखिल भारतीय प्रतिष्ठा का सूचक बन गया था। बाहरवीं शताब्दी में हरियाणा पर चौहानों का प्रभुत्व स्थापित हो गया। उस समय दिल्ली राजनीतिक क्रियाकलापों का केन्द्र था। दिल्ली पर भी चौहानों का प्रभुत्व स्थापित हो गया था। ११९१ में दिल्ली के चौहान शासक पृृथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद गोरी को परास्त किया था, किन्तु ११९२ में वह मुहम्मद गोरी के हाथों पराजित होकर मारा गया। इस प्रकार दिल्ली के साथ-साथ हरियाणा प्रदेश पर भी मुस्लिम आक्रमणकारियों का अधिकार स्थापित हो गया।

१२०६ में मुहम्मद गोरी की मौत के बाद उसके गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक ने भारत में गुलाम वंश की नींव डाली। १२६५ में गुलाम वंश के शासक बलबन ने यहां शक्तिशाली मेवों की शक्ति को कुचलने का पूर्ण प्रयास किया। सन् १२९० में गुलामवंश के पतन के पश्चात् खिलजी वंश का उदय हुआ। अलाउद्दीन से, जो कि सबसे प्रसिद्ध खिलजी शासक था, तुगलक वंश का प्रारम्भ हुआ। फिरोज तुगलक नामक तुगलक शासक ने हिसार जिले में फतेहाबाद नामक एक नगर अपने पुत्र फतेह खां के नाम पर बसाया। १३९८ में तैमूर ने भारत पर आक्रमण किया। तैमूर विजयी होकर घग्घर नदी के साथ-साथ हरियाणा में प्रविष्ट हुआ। तैमूर के आने की सूचना पाते ही सिरसा के हिन्दू अपने घरों को छोड़ कर भाग गए। यहां से बहुत सी सम्पत्ति तैमूर के हाथ लगी। तैमूर ने फतेहाबाद पर आक्रमण किया तथा वहां तैमूर के सैनिकों ने बड़ी बेरहमी से लोगों को कत्ल किया। हिसार, करनाल, कैथल, असन्ध, तुगलकपुर तथा सालवान आदि को नष्ट-भ्रष्ट करने के बाद तैमूर पानीपत पहुंचा जहां पर तैमूर ने खूब लूट-पाट की। तैमूर के भारत से जाने के पश्चात् फैली अराजकता से संवरने का कार्य हरियाणावासियों ने किया।

तत्कालीन समय में हरियाणा में हसन खांमेवाती, जलाल खांतथा मोहन सिंह मंढार की रिसायतंें सर्वाधिक प्रसिद्ध थीं। इनमें भी हसन खांमेवाती सब से शक्तिशाली शासक था। उसके राज्य में गुड़गांव जिले का मेवात क्षेत्र, महेन्द्रगढ़ का नारनौल, कानोंड का कुछ क्षेत्र तथा राजस्थान में अलवर के आसपास का बहुत बड़ा भू-भाग शामिल था। उसके पास १०,००० मेवातियों की सेना थी। दिल्ली के शासक उसकी वीरता से प्रभावित थे। मेवाड़ के महाराणा संग्राम सिंह से उसकी अभिन्न मित्रता थी। १५२६-२७ में जब बाबर ने भारत पर आक्रमण किया तब हसन खां की खानवा के युद्ध में मृत्यु हो गई। जलाल खां तावडू के परगने का शासक था और जाति से खानजादा था। वह हसन खांमेवाती को अपना बड़ा भाई मानता था। उसके पास भी मेवों की एक बड़ी सेना थी। इसलिए शाही सेना से उसकी टक्कर होती रहती थी। जलाल खांबड़ा कला-प्रेमी था। उसने सोहना व तावडू में कई इमारतों का निर्माण करवाया। जलाल खां का अंत गुमनामी की अवस्था में हुआ। मोहन सिंह मंढ़ार की रियासत कैथल के परगने मंढ़ार में थी। वह बड़ा वीर और लोकप्रिय था। इस वीर राजपूत ने लम्बे समय तक बाबर से मुकाबला किया।

प्रथम मुगल शासक बाबर ने भारत पर कई बार आक्रमण किए, क्योंकि तत्कालीन समय में राजनीतिक दृष्टि से भारत की स्थिति बड़ी दयनीय थी। सम्पूर्ण देश छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त था, जो आपस में लड़ते रहते थे। वह बिना किसी विरोध के हरियाणा की ऊपरी सीमाओं तक बढ़ आया। यहां के पानीपत नामक स्थान पर बाबर और दिल्ली के शासक इब्राहिम लोदी का ऐतिहासिक युद्ध हुआ जिसमें इब्राहिम लोदी की पराजय हुई। पानीपत की विजय के पश्चात् बाबर ने बड़ी सरलता से दिल्ली पर अधिकार कर लिया। औरंगजेब ने अपने शासनकाल में हिन्दुओं पर भीषण अत्याचार किए। उसने हरियाणा की जनता पर कमरतोड़ कर लगा दिए। परिणामस्वरूप उसे नारनौल के सतनामियों के प्रबल विरोध का सामना करना पड़ा। सतनामियों के संघर्ष ने बाद में भीषण रूप धारण कर लिया तथा ३ मार्च, १७०७ में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् हरियाणा से मुगलों का अधिपत्य धीरे-धीरे समाप्त हो गया। सन् १७५० में मराठों ने दिल्ली पर आक्रमण किया। परन्तु उन्हें सफलता तीन वर्ष बाद मल्हारराव होल्कर के पुत्र खण्डेराव के दिल्ली आक्रमण से मिली।

हरियाणा पर अधिकार करने के उपरांत मराठा और आगे बढ़े और उन्होंने पंजाब पर भी अधिकार कर लिया। मराठों द्वारा पंजाब पर कब्जा करने के परिणामस्वरूप मराठों और अहमदशाह अब्दाली के बीच पानीपत (हरियाणा) का तीसरा युद्ध हुआ। इस युद्ध में अब्दाली की विजय हुई परन्तु वह उस विजय का लाभ नहीं उठा सका; क्योंकि उसकी अनुपस्थिति में उसके अपने देश में विद्रोह हो गया। अब्दाली ने अपने देश लौटते समय हरियाणा का उत्तरी भाग (अम्बाला, जींद, कुरूक्षेत्र, करनाल जिले को) सरहिन्द के गवर्नर जैन खां के दलों ने मिल कर सरहिन्द के दुर्रानी गवर्नर गेन खां, पर आक्रमण कर दिया। दुर्रानी गवन्रर ने सिखों का मुकाबला किया परन्तु अंत में वह सिखों के हाथों पराजित हुआ और मारा गया। जैन खां से सिखों को एक बड़ा क्षेत्र प्राप्त हुआ। यह क्षेत्र पूर्व में यमुना नदी से लेकर पश्चिम में बहाबलपुर राज्य तक तथा उत्तर में सतलुज नदी से लेकर दक्षिण में हिसार और रोहतक तक विस्तृत था। इसके बाद भी सिखों ने हरियाणा प्रदेश पर कई बार आक्रमण किए।

अंग्रेजों से संघषर्

सन् १७०८ में लार्ड वेलेजली कम्पनी का गवर्नर जनरल बन कर भारत आया और उसने आते ही अपनी विस्तारवादी योजना बनाई। ३० सितम्बर, १८०३ को सर्जीअर्जन की संधि के अनुसार दौलतराव सिंधिया ने अंग्रेजों को अपने अधिकृत स्थानों के साथ-साथ हरियाणा को भी प्रदान कर दिया। हरियाणा में गुड़गांव के मेव, अहीर और गूजरों ने, रोहतक के जाटों और रांघड़ों ने, हिसार के विश्नोई और जाटों ने, करनाल व कुरूक्षेत्र के राजपूत, रोड़, सैनी और सिखों ने, ब्रिटिश तथा उनके द्वारा नियुक्त किए गए स्थानीय सरदारों का लम्बे समय तक कड़ा विरोध किया। किन्तु अंत में १८०९-१० में समस्त हरियाणा पर अंग्रेजों का अधिकार स्थापित हो गया। १८५७ की जनक्रांति में हरियाणा के शूरवीरों ने महत्वपूर्ण भाग लिया किन्तु अंग्रजों ने इस क्रांति को बड़ी बर्बतापूर्वक दबा दिया और झज्जर व बहादुरगढ़ के नवाबों, बल्लभगढ़ व रेवाड़ी के राजा राव तुलाराम के राज्य छीन लिए। फिर ये राज्य या तो ब्रिटिश सामा्रज्य में मिला लिए गए या नाभा, जींद व पटियाला के शासकों को सौंप दिए गए। आजादी के पूर्व और बाद का हरियाणा का इतिहास युद्ध और शौर्य और बलिदान से भरा हुआ है।

इस तरह भारत की रक्षा में हरियाणा का हर देश काल परिस्थितियों में महत्वपूर्ण ऐतिहासिक योगदान रहा है।

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