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अर्णब गोस्वामी ने उनके जीवन में जो दो महत्वपूर्ण साक्षात्कार लिए वे लोगों को स्मरण रहे। उसमें से पहला राहुल गांधी का एवं दूसरा प्रधान मंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी का। अब ऐसा नहीं लगता कि राहुल गांधी पुन: अर्णब गोस्वामी को साक्षात्कार देंगे और फिर से उनका साक्षात्कार लिया जाए इतना उनका महत्व भविष्य में रहेगा; ऐसे संकेत भी नहीं हैं। परंतु मोदीजी से पुन: इस प्रकार के साक्षात्कार हो सकते हैं। इस साक्षात्कार के माध्यम से प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने सवा दो वर्ष के कार्यकाल में विश्व राजनीति पर उनकी कितनी पकड़ है और कितने आत्मविश्वास से वे अंतरराष्ट्रीय जगत में संचार कर रहे हैं इसकी बानगी प्रस्तुत की है।

इस साक्षात्कार को प्रकाशित करते समय विविध प्रसार माध्यमों ने इस बात को अत्यधिक महत्व दिया कि मोदी ने सुब्रह्मण्यम स्वामी पर क्या टिप्पणी की। ऐसा वातावरण निर्माण किया जिससे लगे कि रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन को उनके अच्छे बर्ताव का प्रमाण-पत्र देने और सुब्रह्मण्यम स्वामी को उनके गलत बर्ताव की सजा देने के लिए ही यह साक्षात्कार दिया गया है। सच कहा जाए तो यह उनके साक्षात्कार का एक बहुत ही छोटा-सा हिस्सा था। उसके आगे जाकर उन्होंने विश्व मंच पर भारत की स्थिति और उस पार्श्वभूमि पर उनकी आंखों के सामने भारत का चित्र इस पर किया गया विचार मंथन अधिक मूलगामी एवं प्रचलित विचारों को नई दिशा देने वाला है।

वास्तविक रूप से देखा जाए तो नरेन्द्र मोदी ने दून स्कूल, ऑक्सफर्ड, केंब्रिज या हार्वर्ड जैसे विश्वविद्यालयों से शिक्षा ग्रहण नहीं की है, अत: स्वाभाविक ही था कि वे वैश्विक परिस्थिति का पूर्ण संज्ञान रखने वाले नेता नहीं थे। एक गांव में जन्मे, संघ जैसे ‘‘मध्ययुगीन, प्रतिगामी और पुरातन’’ विचारधारा में पले बढ़े, अपनी कोमल आयु में संघ की शाखा, शिविर, संघ शिक्षा वर्ग आदि की व्यवस्था में रत रहे, फर्राटेदार अंग्रेजी न बोल सकने वाले, गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रसार माध्यमों की टिप्पणियों का केंद्र बनने के कारण यूरोप और अमेरिका जैसे देशों में प्रवेशबंदी का सामना करने वाले इस नेता ने प्रधान मंत्री बनने के बाद जिस विलक्षण गति से, स्पष्ट दृष्टिकोण से विश्व में जो स्थान निर्माण किया है, वह चकित करने वाला है। इसमें मोदीजी का स्वत: का कर्तृत्व तो है ही, साथ ही जिस सांस्कृतिक विचारधारा से उनके विचारविश्व, अनुभवविश्व, मनोभूमिका और कार्यपद्धति का गठन हुआ उसका भी बहुत बड़ा हिस्सा है। इतने सारे राष्ट्रों के नेताओं से उन्होंने क्यों मुलाकातें कीं इसका जो उत्तर उन्होंने दिया, वह किसी भी संघ कार्यकर्ता का उत्तर है। संघ तथा मोदी के सम्बंध में प्रसार माध्यमों ने एक प्रतिमा निर्माण की है, परंतु जब उन दोनों में सीधा सम्बंध आता है, तब सभी को अनुभव होता है कि प्रतिमा एवं वास्तविकता में बहुत अतंर हैै। इसलिए अपने विविध विदेश दौरों का कारण बताते हुए उन्होंने कहा, ‘‘विश्व मुझे जानता नहीं था; पर वह होना आवश्यक था। यदि केवल प्रसार माध्यमों के माध्यम के जरिए मुझे जाना जाता तो उन्हें निराशा होती। यदि ऐसा होता तो उसमें देश की हानि थी। मेरा व्यक्तित्व देश की विश्वसनीयता के आड़े आना ठीक नहीं है।’’

जिन मोदी पर प्रसार माध्यमों ने आरोपों की झड़ी लगा दी थी, विध्वसंक तथा हिंसक के रूप में उनकी छवि निर्माण की थी, वे मोदी प्रत्यक्ष में कैसे हैं इसका अनुभव विश्व नेताओं को हुआ होगा। इससे मोदी की ही नहीं वरन् भारत की भी नई छवि विश्व नेताओं के मन में निर्माण हुई होगी।

ऐसा आभास निर्माण किया जाता है या छवि बनाई जाती है कि संघ मध्ययुगीन मानसिकता में रहता है इसलिए इक्कीसवीं सदी की समस्याओं की जानकारी उसे नहीं हैै। परंतु प्रधान मंत्री मोदी ने अत्यंत सरल शब्दों में, भावुक न होते हुए, किसी पर भी टीका न करते हुए इक्कीसवीं सदी की विश्व की जटिलताएं सामने रखीं। विश्व की विविधताओं को अपने भीतर समाहित करने वाला भारतीय सरंस्कृतिक दृष्टिकोण आज तक केवल तात्विक चर्चा में ही था। परंतु इसी दृष्टिकोण को व्यवहार में सिद्धांत के रूप में कैसे अमल में लाया जाए इसका उत्कृष्ट उदाहरण नरेन्द्र मोदी द्वारा विकसित की जा रही विदेश नीति है। विश्व के प्रत्येक देश की अपनी अपनी भूमिका है, उनके अपने दृष्टिकोण हैं, उनके हितसम्बंध हैं, वैसे ही भारत के भी हैं। व्यक्तिगत मुलाकातों- चर्चाओं के कारण ऐसी भूमिकाओं, दृष्टिकोणों, हितसम्बंधों में सामंजस्य निर्माण होने की संभावना नजर आती है, परंतु वह एक ही बार में हो जाए ऐसी प्रक्रिया नहीं है। वह प्रक्रिया सतत चालू रखनी पड़ती है। एकाध घटना से निराश न होते हुए या उससे अंतिम निष्कर्ष न निकालते हुए अपनी भूमिका, दृष्टिकोण, हितसम्बंध में दृढ़ता एवं लचीलेपन का मिश्रण करते रहना पड़ता है। प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी को इसकी जानकारी भलीभांतिहै इसका नमूना मोदी ने अपने साक्षात्कार में पेश किया। विशेषत: हाफिज सईद को आतंकवादी घोषित करने के संदर्भ में एवं एनएसजी में भारत के प्रवेश का चीन द्वारा विरोध किए जाने के बावजूद उस सम्बंध में उन्होंने जो वास्तवदर्शी भाष्य किया वह विदेश नीति में माहिर किसी नेता को भी चकित करने वाला है। सभी देश सभी प्रश्नों पर हमसे सहमत नहीं हो सकते। वे कुछ प्रश्नों पर हमसे सहमत नहीं हैं इसलिए हमारे शत्रु हैं ऐसा नहीं है। आज की स्थिति जस की तस भविष्य में भी रहेगी ऐसा नहीं है और वे हमारे साथ आएं इसलिए हमें अपने दृष्टिकोण, अपनी भूमिका एवं हितसंबधों का त्याग करना पड़ेगा ऐसा भी नहीं है। प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने साक्षात्कार से यह स्पष्ट कर दिया है कि वे परिपक्व अंतरराष्ट्रीय व्यवहार के निष्णात खिलाड़ी हो गए हैं। पाकिस्तान के साथ व्यवहार करते समय अलग-अलग स्थितियों में अलग-अलग प्रकार की चुनौतियां हैं और उन्हें उसी प्रकार उत्तर दिया जा रहा है यह भी प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्पष्ट किया। इसके साथ पाकिस्तान की तरफ बढ़ाया हुआ दोस्ती का हाथ यह हमारा भोलाभाला आशावाद या राजनीति न होकर विश्व में भारत की भूमिका को स्पष्ट करने का प्रयत्न है और उसे विश्व के देशों का अच्छा, प्रतिसाद मिल रहा है यह उन्होंने स्पष्ट किया। भावुक न होते हुए, वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण से और स्वत: का किसी भी प्रकार बड़प्पन न दिखाते हुए उन्होंने विश्व की परिस्थिति एवं वास्तविकता का दर्शन कराया। इससे प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी की आंखों के सामने विश्व का जो एकात्म एवं समग्र चित्र है वह स्पष्ट हुआ है।

भारत के हितसम्बंधों का खयाल रखते हुए उन्होंने सभी पहलुओं पर विचार किया है। इसमें व्यापारिक सम्बंध हैं, सुरक्षा सम्बंध हैं, सांस्कृतिक तथा सामाजिक सम्बंध भी हैं। प्रत्येक देश में रहने वाले भारतीयों की अस्मिता को वे आवाहन करते हैं और उस देश में उन्हें सम्मान से स्थान मिले ऐसी परिस्थिति निर्माण करते हैं। अपने देशवासियों का इतना विचार करने वाले वे पहले प्रधान मंत्री हैं।

प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने साक्षात्कार में यह भी स्पष्ट किया कि उनकी इस समग्रता में केवल बड़े देशों को ही स्थान है ऐसा नहीं वरन् छोटे देशों को भी स्थान है। छोटे देशों की समस्याओं की भी उन्हें उतनी ही जानकारी है। मोदीजी की प्रतिमा मुस्लिम विरोधी बनाए जाने के बावजूद भी ईरान एवं सऊदी अरब में उन्होंने जिस सहजता से सम्बंध प्रस्थापित किए वह भी उनकी इसी विचारधारा एवं कार्यपद्धति से निर्माण हुई नैसर्गिक मानसिकता का परिणाम था। केवल विदेश नीति में ही नहीं वरन् भारत के आंतरिक प्रश्नों के हल निकालने के लिए पारम्परिक पद्धति से कार्य न करते हुए, प्रश्न का विश्लेषण कर उसमें से हल निकालने की पद्धति विकसित करने की उनकी भूमिका है। इसलिए पानी के संदर्भ में केवल एक परिषद बुला कर नारेबाजी करने की बजाय हर राज्य की बैठक में उनके अनेक प्रश्नों का सिलसिलेवार ब्योरा लेकर उसमें से उत्तर निकालना उन्होंने अधिक पसंद किया। वे जानते हैं कि किसी भी प्रश्न का यदि हल ढूंढना है तो उस प्रश्न से सम्बंधित सभी घटकों की भावनात्मकएवं व्यवस्थात्मक स्थितियों का विचार किए बिना वह प्रश्न हमेशा के लिए हल नहीं होता। उनकी विदेश नीति एवं आंतरिक कार्य प्रणाली ये दोनों बातें प्रचलित पद्धति से भिन्न है। किसी तार्किक एवं व्यवस्थात्मक दायरे में प्रश्न को रखना एवं फिर उसका हल निकालने का प्रयत्न करना यही आज तक की पद्धति थी। काल के प्रवाह में ऐसी पद्धतियां बाहर होती जाती हैं और प्रश्न शेष रह जाते हैं। परंतु शासक, प्रशासन, स्वत: को विचारक समझने वाले, प्रसार माध्यम इत्यादि इन पद्धतियों से ऐसे चिपके रहते हैं जैसे कि उन्होंने अमरत्व प्राप्त कर लिया हो। प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि ‘‘मैं भूतकाल का कोई भी बोझ पीठ पर लाद कर नहीं आया हूं’’ वह इसी संदर्भहीन दायरे का बोझ लिए विचार करने वालों के बाबत कहते हैं। हमारी सांस्कृतिक विचारपद्धति किसी विशिष्ट प्रश्न को हल करने के संदर्भ में विचार न करते हुए एक ऐसी प्रक्रिया निर्माण करती है कि जिससे सभी प्रश्न अपने-आप हल होना आरंभ हो जाते हैं। मोदी इसी विद्यापीठ के पढ़े हुए छात्र हैं। उनकी भूमिका किसी विशिष्ट प्रश्न को हल करने की अपेक्षा प्रक्रिया निर्माण करने की है। वैश्विक परिस्थिति के संदर्भ में उनकी जो नीति हैं, उसमें उनका यह दृष्टिकोण अत्यंत स्पष्ट दीखता है। भारत की आंतरिक परिस्थिति में उसका प्रतिबिंब दिखने में देर लगेगी; परंतु उन्होनें उसकी दिशा स्पष्ट कर दी है।

सोमवार २७ जून के इकोनॉमिक टाइम्स में महिंद्रा एण्ड महिंद्रा उद्योग समूह के अध्यक्ष आनंद महिंद्रा का साक्षात्कार प्रकाशित हुआ है। इस साक्षात्कार में भारत की आर्थिक नीतियों में हो रहे ठोस बदलावों की चर्चा होने के बावजूद प्रसार माध्यमों में इसे यथोचित स्थान नहीं मिला। जनमानस पर अपनी पकड़ कम न करते हुए आर्थिक सुधारों की दृष्टि से मोदी सरकार ने जो रास्ता अपनाया है, उसके अनेक उदाहरण अपने साक्षात्कार में आनंद महिंद्रा ने स्पष्ट किए हैं।

नरेन्द्र मोदी जब प्रधान मंत्री बने, तब भारत को सही अर्थों में स्वतत्रंता मिली ऐसा ‘गार्डियन’ समाचारपत्र ने वर्णन किया था। उस वर्णन का आशय धीरे-धीरे भविष्य में स्पष्ट होगा। मोदी का व्यक्तित्व संघ की जिस प्रक्रिया से निर्माण हुआ वह प्रक्रिया पुस्तक से या केवल तर्कबुद्धि से नहीं समझी जा सकती, वह तो अनुभव की बात है। जिस विचार प्रक्रिया व संस्कार प्रक्रिया से ऐसे व्यक्तित्व तैयार होते हैं उसी को समाज सही अर्थों में अपनाता है। ऐसे चरित्र ही उस प्रक्रिया का सच्चा साहित्य है। भाजपा आज सबसे बड़ी पार्टी हो गई है। यह कोई दुर्घटना नहीं है। इस प्रकार के असंख्य व्यक्तित्व जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। उन्होंने समाज का अपने स्तर पर विश्वास प्राप्त किया है और उस विश्वास का प्रतिबिंब राजनीतिक क्षेत्र में दृष्टिगोचर हो रहा है। यही विश्वास की प्रक्रिया वैश्विक स्तर पर किस प्रकार कायम हो सकती है, उसमें से वैश्विक वातावरण कैसे निर्माण हो सकता है, अपने हितसम्बंधों की अनदेखी न करते हुए सर्वसमावेशक दृष्टिकोण कैसे निर्माण किया जा सकता है, इसका उदाहरण प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी प्रस्तुत कर रहे हैं। उसी की एक छोटी सी झलक इस साक्षात्कार के निमित्त दिखाई दी है॥

आधुनिक तंत्रज्ञान के कारण विश्व एक ग्राम बन गया है, फिर भी अपनी अपनी विशेषता कायम रखते हुए उस गांव में व्यवहार कैसे करना है इस विषय में विश्व भ्रम में हैं; वही भ्रम ब्रेक्झिट के मतदान से भी स्पष्ट हुआ है। परंतु विविधता में भी अपनी विशेषता को कायम रखते हुए एकात्मभाव कैसे निर्माण हो सकता है, इसका प्रत्यक्ष दर्शन हमारे समाज ने सैकड़ों साल से दिखाया है। इसी सांस्कृतिक एकात्मता का प्रतिनिधित्व मोदी कर रहे हैं। उनकी विदेश नीति इसका व्यावहारिक आविष्कार है। विदेश नीति के संदर्भ में भारत आज कहां खड़ा है यह स्पष्ट करते हुए मोदीजी ने एक मार्मिक उदाहरण दिया- ‘‘आज तक हम समुद्र के किनारे बैठ कर लहरें गिनते थे। अब उन लहरों पर सवार कैसे हुआ जाए इसका विचार कर रहें हैं।’’ यह उदाहरण अपने आप में सब कह जाता है।

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