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१९८४ के बाद किसी भी पार्टी को न मिलने वाला पूर्ण बहुमत लेकर भारतीय जनता पार्टी २०१४ में केंद्र में सत्तासीन हुई। अब इसका पूरा इतिहास सभी को ज्ञात है। इन दो वर्षों के भाजपा के शासन का यश क्या है, इसकी विस्तृत चर्चा अनेक मान्यवरों ने इसी अंक के अन्य लेखों में की है। हम इस लेख में माननीय नरेंद्र मोदी की प्रेरणा का स्रोत खोजने का प्रयत्न करेंगे। हम उनकी कविताओं का भी विचार करेंगे।
कविताओं का विचार इसलिए भी, क्योंकि कविता साहित्य का स्वयंभू आत्मलक्ष्यी और प्रामाणिक आविष्कार होता है। कविता यह सच्चे अर्थों में कवि का आत्मसंवाद है, कवि द्वारा स्वत: की खोज है। मा. नरेंद्र मोदी सिद्धहस्त कवि हैं, यह बहुतों को ज्ञात नहीं। परंतु मोदी जी ने उत्तमोत्तम कई कविताएं ने लिखी हैं। अपने काव्यसंग्रह के प्रकाशन समारोह के अवसर पर मोदी जी ने कहा था, ‘‘आज मैं मुख्यमंत्री हूं, कल शायद मैं नहीं रहूंगा; पर मैं कवि था, कवि हूं, और रहूंगा।’’ श्री सुरेश दलाल ने मोदी जी के कविताओं का संग्रह ‘‘आ आंख धन्य छे’’ नाम से प्रकाशित किया। श्री दलाल जैसे सापेक्षिक सम्पादक द्वारा कविताएं प्रकाशित करना मोदी जी की प्रतिभा को मिलने वाली सार्थक प्रशंसा है।
शब्द एवं विस्तृत वाचन मा. नरेंद्र मोदी की पहली प्रेरणा है। बचपन में जब बाकी के बालक, संगीसाथी, खेतों एवं अन्य कारगुजारियों में व्यस्त रहते थे ‘तब बाल नरेंद्र वडनगर के पुस्तकालय में बैठ कर घंटों अध्ययन करते थे। वहां शिवचरित्र के दो खंड थे। ‘‘यह इतना छोटा बालक क्या पढ़ेगा? इस विचार से ग्रंथपाल ने वे खंड देने हेतु शुरू में आनाकानी की। परंतु बाद में जिस तरह पुस्तकालय की अलमारी में ये खंड रखे हैं वैसे नरेंद्र के घर में रहेंगे’’ यह विचार कर उन्होंने वे दोनों खंड नरेंद्र को दे दिए। रात-दिन पढ़ कर नरेंद्र ने वे खण्ड पूर्ण किए। उन दिनों का वर्णन करते हुए मोदी जी बताते हैं, ‘‘ वह शायद एक माह की समाधि अवस्था ही थी। मुझे शिवचरित्र के अलावा अन्य कुछ सूझता ही नहीं था, दिखता ही नहीं था।’’ केवल शिवचरित्र ही नहीं नरेंद्र का सभी विषयों का वाचन चल रहा था। वाचन का ऐसा सीधा परिणाम कभी प्रदर्शित नही किया जा सकता, परंतु जानकारियां समृद्ध होती गईं। इतिहास का आकलन बढ़ता गया। यह सब एक पुस्तक या एक दिन में नहीं हुआ। परंतु मन की दिशा निश्चित होने लगी। उसमें और वृद्धि हुई, संघ की शाखा के माध्यम से। प्रारंभ में आलस आता था परंतु बाद में संघ की शाखा ही जीवन का ध्येय बन गया।
बीच में कुछ दिन हिमालय में भ्रमण किया। हमारी दृष्टि से हिमालय यह केवल एक पर्वत नहीं है, पर्वतारोहण का स्थान नहीं है परंतु हमारी दृष्टि से हिमालय अध्यात्म एवं साधना की सीढ़ी है। आधुनिक काल में भी स्वामी विवेकानंद से लेकर श्री गुरुजी तक अनेक श्रेष्ठ पुरषों को हिमालय का अपार आकर्षण था। एक मुलाकात में मैंने नरेंद्र मोदी से पूछा था, ‘हिमालय के अनुभव कैसे थे?’ उस पर मोदी ने प्रसन्नतापूर्वक हंसते हुए कहा था, ‘‘इस बारे में मैं बहुत कंजूस हूं। वे अनुभव केवल मेरे हैं और मैं उस पर कभी लिखूंगा।’’
बीस वर्ष की उम्र में प्रचारक बनने का निर्णय मोदी जी ने लिया। यह उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ था। प्रचारक कौन बनता है? समाज के संबंध में जिनकी भावना मूलत: तरल एवं संवेदनक्षम होती है, जिसे यह लगता है कि उसके हाथों से कुछ समाजसेवा, कुछ राष्ट्रसेवा हो, ऐसी भावनात्मक वृत्ति का व्यक्ति ही प्रचारक हो सकता है एवं होता है। प्रचारक होना बहुत कठिन कार्य है। सही अर्थों में न केवल संन्यास है वरन उससे आगे बढ़ कर समर्पण है। संन्यासी को तो एकाध झोपड़ी मिल जाती हैं, चार शिष्य मिल जाते हैं। कुछ मनुष्य आदरपूर्वक नमस्कार करते हैं। संन्यासी का अहंकार संतुष्ट हो सकता है। परंतु इतनी भी छूट संघ प्रचारक को नहीं है। क्योंकि प्रचारक का कहां काम करना है, कितने समय करना है इसका निर्णय वह स्वयं नहीं करता वरन् उसके वरिष्ठ करते हैं। प्रचारक को नाम, कीर्ति नहीं मिलती। उसकी जयजयकार नहीं होती है। ‘मैं’ का संपूर्ण लोप होने पर ही प्रचारक बना जा सकता है। ‘मैं’ का लोप एवं उत्कट समर्पण यह प्रचारक की विशेषता है। भारत भूमि पर जो कुछ आक्रमण हो रहा है अथवा यहां कुछ कमियां हैं उससे प्रचारक अस्वस्थ होता है। उन आक्रमणों का एवं प्रचारक के व्यक्तिगत जीवन का कोई संबंध नहीं होता है। परंतु फिर भी वह युवक अस्वस्थ होता है। ‘‘हमें कुछ करना चाहिए’’ यह चुभन उसे अस्वस्थ करती है। तभी वह प्रचारक जीवन के लिए गृह-त्याग करता है। ऐसी संवेदनशीलता बहुत कम मिलती है। जो युवक प्रचारक निकलते हैं वे अच्छे, सक्षम, एवं सुशिक्षित होते हैं। यदि वे प्रचारक नहीं बनें तो वैभवशाली जीवन व्यतीत करने की क्षमता उनके पास होती है। परंतु इन सारे व्यक्तिगत सुखों का परित्याग कर ये युवक ‘हिंदू राष्ट्र’ और भारत माता को ‘परमवैभव’ के शिखर पर पहुंचाने की कामना के साथ प्रचारक बनते हैं। यह आसान बात नहीं है। उत्कट समर्पण एवं दृढ़ भक्तिभाव दोनों होने पर ही प्रचारक बना जा सकता है। ऐरोंगैरों का यह काम नहीं है। ये भावनाएं जब मन में उठती हैं, तब डर नहीं लगता या मन में संशय भी निर्माण नहीं होता एवं मोह तो आसपास भी नहीं फटकता। मुख्यमंत्री बनने के बाद मा. नरेंद्र मोदी जी ने ‘भ्रष्टाचारमुक्त’ शासन देने का जो अविरत प्रयत्न किया है उसके पीछे मूलत: समर्पण व सेवा की प्रेरणा है। ‘‘राजा को निर्भय एवं निर्मोही होना चाहिए’’ यह पैमाना आचार्य चाणक्य का है। ‘‘जो जितेंद्रीय है, वही उत्तम शासक हो सकता है’’ यह सूत्र भी आचार्य चाणक्य ने ही दिया है।
भूतपूर्व राष्ट्रपति एवं चिंतक डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने एक जगह लिखा है, ‘‘खपवळरप ळींशीळींश ळप वळषषीरपीं श्ररपर्सीरसशी र्लीीं ींहशू ींशश्रश्र ींहश ीराश ीींेीू’’। मुंबई के षण्मुखानंद हॉल में जुलाई २००७ में गुजराती समाज ने मोदीजी का अभिनंदन समारोह आयोजित किया था एवं उसमें अपार भीड़ थी। जैसे ही मोदी जी बोलने खड़े हुए तालियों की गड़गड़ाहट हुई एवं आवाज आने लगी-‘‘गुजराती-गुजराती’’ अर्थात गुजराती में बोलिए। मोदी जी ने तुरंत कहा-‘‘हम भाषा के मुद्दे पर चर्चा नहीं करेंगे, मैं हिंदी में ही बोलूंगा।’’ हजारों की सभा एक क्षण में शांत हो गई। मोदी जी बोलने लगे। उस क्षण मुझे लगा कि इस छोटी-सी घटना के पीछे संघ का कितना बड़ा संस्कार है। संघ ने भाषा को कभी मुद्दा ही नहीं बनाया। भाषा यह संघर्ष का मुद्दा है यह विचार भी संघ के मन में कभी आया नहीं। उस सभा में मैंने ‘‘सावरकर साहित्य अभ्यास मंडल’’ की ओर से मोदी जी को सभा प्रारंभ होने के पूर्व मानपत्र दिया। मोदी जी ने उसे पढ़ कर कहा, ‘‘ सावरकर जी के नाम से दिया गया यह मानपत्र मेरे लिए आशीर्वाद-पत्र है।’’ इस प्रकार मेरी मोदी जी से २-३ मुलाकातें हुईं।
मई २००७ की एक चिंतन बैठक में, तब गोध्रा कांड की ज्वालाएं शांत नहीं हुई थीं एवं सारा वातावरण, सामाजिक एवं राजनीतिक, मोदी जी के विरोध में था, उन्होंने कहा, ‘‘आज का सामाजिक वातावरण इतना प्रदूषित हो गया है कि सामाजिक नैतिकता एवं राजनीति के बीच किसी तरह का भी संबंध नहीं रहा ऐसा निष्कर्ष हम निकाल सकते हैं। वातावरण बहुत खराब है। पर मेरा ऐसा अनुभव है कि यदि आपके मन में कुछ सामाजिक संस्कार ‘गहराई से पैठे हैं, और ईश्वर कृपा से यदि आपको सत्ता प्राप्त हुई तो सत्ता के माध्यम से बहुत कुछ किया जा सकता है।’’ इस प्रस्तावना के साथ उन्होंने भाषण प्रारंभ किया। २००२-२००७ की पहली टर्म समाप्त कर दिसम्बर में तमाम अटकलबाजियों के बावजूद मोदी पुन: गुजरात की सत्ता में लौटे।
२००२ में मुख्यमंत्री का पद संभालते ही नरेंद्र मोदी ने अनेक योजनाएं एवं प्रकल्प घोषित किए। उन्होंने केवल घोषणाएं ही नहीं कीं वरन् उन पर अमल हो यह भी सुनिश्चित किया। आज कभी-कभी ऐसा लगता है कि मोदी ने इतना बड़ा विश्व एवं इतनी सारी समस्याएं देखी भी कब थीं? इसका उत्तर यह हो सकता है कि प्रचारक रहते वक्त उन्होंने जो बहुत प्रवास किया, उसने मोदीजी को संसार दिखाया, दृष्टि दी। छोटी-छोटी सामाजिक सुविधा हो तो संसार प्रपंच किस प्रकार दुखी एवं दीन होता है यह उन्होंने प्रत्यक्ष देखा। केवल शासकिय अधिकारियों की रिपोर्ट के आधार पर उन्होंने परिस्थिति नहीं देखी वरन् स्वत: की नज़र से देखी एवं अनुभव किया। समर्थ रामदास ने खूब कहा ह ‘‘ब्राह्मण क्षमता बरा’’ अर्थात ब्राह्मण घूमने वाला हो। जो ज्ञानेच्छु है, उसे भ्रमण करते रहना चाहिए, निरीक्षण करते रहना चाहिए।
अत्यंत विस्तृत एवं साक्षेपी पठन-पाठन, अखंड प्रवास, समर्पण एवं सेवा भाव एवं इन सबकी नींव में काव्य प्रतिभा मा. नरेंद्र मोदी जी की प्रेरणा है। नरेंद्र मोदी की एक कविता को उद्धृत करते हुए मैं अपनी लेखनी को विराम देता हूं-

प्रारब्ध की यहां परवाह करता कौन है
मैं तो चुनौतियां स्वीकार करता हूं।
उधार का प्रकाश मैं क्यों चाहूं
मैं तो खुद ही एक मशाल हूं
मुझे जगमगाहट की लालसा नहीं
आत्मप्रकाश ही पर्याप्त है
अंधःकार को नष्ट करने वाला
एक विमल प्रकाश है
संदिग्ध से मुझे घृणा है
मैं तो स्पष्टवादी प्रांजल व्यक्ति हूं
प्रारब्ध की यहां परवाह करता कौन है
मैं तो चुनौतियां स्वीकार करता हूं।
बारह ग्रहों के घर में मन मेरा नहीं रमता
बेवजह कहीं भी मैं नहीं झुकाता शीश
कायरों की बिसात पर बन कर प्यादा
नहीं मरूंगा मैं
मैं ही अपना पूर्वज हूं
मैं ही अपना वारिस हूं
प्रारब्ध की यहां परवाह करता कौन है
मैं तो चुनौतियां स्वीकार करता हूं।

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