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प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने प्रख्यात चिंतक एवं नवनियुक्त केंद्रीय मंत्री श्री अनिल माधव दवे की पुस्तक शिवाजी एवं सुराज पुस्तक की प्रस्तावना में लिखा कि, ‘‘प्रजा-केंद्रित विकास ही सुशासन का मूल तत्व हैं। इतिहास गवाह है कि जब-जब जन सामान्य को विकास का केन्द्र एवं साझेदार बनाया गया तब-तब उस राज्य ने सफलता और समृद्धि की ऊंचाइयों को छुआ है। प्रजा की भागीदारी के बिना किसी राज्य ने प्रगति नहीं देखी।’’

सुशासन की लगभग ऐसी ही कुछ विवेचना इन्फोसिस के जनक तथा देश के मूर्धन्य उद्योगपति एवं विचारक श्री नारायण मूर्ति ने जे.आर.डी. टाटा स्मृति व्याख्यान माला में प्रभावी सुशासन विषय पर बोलते हुए की थी कि सुशासन का सीधा सम्बंध देश और समाज के लोगों के सामाजिक विकास एवं परिवर्तन के साथ जुड़ा हुआ है। देश के विकास के लिए महत्वाकांक्षी एवं रोमांचक लश्यों का निर्धारण तथा उसकी प्राप्ति के लिए पूरी निष्ठा और समर्पण भाव से जन भागीदारी को सुनिश्चित करने का प्रयास ही सुशासन है। अत: एक बात तो निश्चित है कि सुशासन का सीधा अर्थ जन विकास को जन आंदोलन में परिवर्तित करना है, जिसमें शासन के नेतृत्व में जनता की सक्रिय भागीदारी हो। भारत में सुशासन की उपर्युक्त अवधारणा आज की नहीं है; बल्कि भारतीय मनीषा एवं चिंतन परंपरा में यह पुरातन-सनातन काल से चली आ रही है। महाकवि गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीमद् राम चरित मानस में सुशासन के सम्बंध में लिखा-

जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी, सो नृप अवसि नरक अधिकारी।

अर्थात जिस शासक के शासनकाल में प्रजा दु:खी, असुरक्षित और असंतुष्ट रहती है, वह राजा (शासक) नरक का अधिकारी होता है और फिर तुलसी उत्तरकांड में राम राज्य में सुशासन का वर्णन करते हुए लिखते हैं-

दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज्य काडू नहीं व्याना।
सब नर कर हिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिदीति॥

अर्थात राम राज्य में दैहिक दैविक और भौतिक ताप किसी को नहीं व्याप्त होते थे। सब मनुष्य परस्पर प्रेम से रहते थे और अपनी मर्यादा के अनुसार सभी अपने-अपने कर्तव्य का पालन करते थे।
राम राज्य में न कोई दरिद्र, न दु:खी और न ही कोई दीन था, न कोई अज्ञानी मूर्ख था और न ही शुभ लक्षणों से हीन था, अर्थात राम राज्य में प्रजा केवल आर्थिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि सामाजिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक दृष्टि से भी पूर्णत: विकसित समृद्ध तथा सम्पन्न थी। सभी लोग अपने कर्तव्य को समझते थे और बिना किसी छल-कपट के आचरण करते थे। सुशासन का यही तो संदर्भ है और यही तो अर्थ है कि राज्य व्यवस्था ऐसी हो, जिसमें सभी लोगों को न्याय, स्वतंत्रता, समानता तथा विकास के समान अवसर उपलब्ध हो जिसमें समाज, देश के सभी लोग अपनी-अपनी प्रतिभा और कौशल के साथ स्वयं का विकास करके देश और समाज की प्रगति में अपना योगदान देने का समान अवसर प्राप्त कर सके। भारत की सनातन परम्परा और शास्त्रों का यदि अवलोकन करें तो उनमें सुशासन के सम्बंध में अनेक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। मनुस्मृति भारतीय प्राचीन जीवन शैली का साक्षात्कार कराता है। सुप्रसिद्ध न्यायविद् एवं न्यायमूर्ति डॉ. एम रामा जॉयस ने मनुस्मृति का बड़ा गहन अध्ययन एवं अनुशीलन किया है। मनुस्मृति में शासक के अधिकार एवं कर्तव्यों तथा राजधर्म का वर्णन करते हुए का गया है-

यथा सर्वाणि भूतानि धरा धारयेत सभम।
तथा सर्वाणि भूतानि वभ्रत: पार्थिव व्रतभ॥

अर्थात राजा (शासक) को अपनी प्रजा को उसी प्रकार आश्रय देना व रक्षण करना चाहिए, जिस प्रकार पृथ्वी समी जीवित प्राणियों को आश्रय देती है।
मनुस्मृति के सातवें अध्याय के ३९ वे एवं ४० वें श्लोक में राजा (शासक) के चरित्र एवं आचरण की व्याख्या की गई है-

तेम्यो घिगच्छेद्विनयं विनीतात्मपि नित्यश:।
विनीतात्मा हि नृपतिर्न निनश्यति क हिचित॥
बहवो विनयान्नष्टा राजान: सपरिच्छ दा:।
वनस्था अपि राज्यानि विन वात्प्रतिपेदिरे॥

सबसे पहले शासक का आवश्यक गुण, जो राज्य पर शासन करने के लिए जरूरी है, वह है राजा को विनम्र होना चाहिए, एक राजकुमार में विनम्रता और ईमानदारी का गुण अवश्य होना चाहिए। विनीत राजा का कभी नाश नहीं होता। अतीत में अनेक राजाओं के अविनम्र होने के कारण सभी साधनों के साथ वे नष्ट हो गए और विनय से वन में रहने वालों को भी राज्य प्राप्त करने में सफलता मिली।
एक बात बिलकुल स्पष्ट है कि सुशासन शासक के आचरण और चरित्र पर निर्भर करता है। यदि शासक चरित्रवान, कर्मठ, पारदर्शी तथा प्रामाणिक चरित्र का है, तो निश्चय ही उसका प्रभाव उक्त देश की व्यवस्था पर पड़ता है। हमें याद रखना चाहिए कि वर्ष १९६४ में जब देश में भयंकर सूखा पड़ा था, देश में अन्न की भारी कमी थी, उस समय तत्कालीन प्रधान मंत्री स्व. लाल बहादुर शास्त्री ने देशवासियों का आह्वान किया था, कि सभी देशवासी सप्ताह में एक दिन का उपवास रख कर इस चुनौती का मुकाबला करें। इसके लिए कोई सरकारी आदेश या कानून नहीं लागू किया गया था, केवल जनता से अपील की गई थी और तब देश की जनता ने पूरी ईमानदारी के साथ उसका अनुपालन किया था, उस समय सोमवार को स्वयंस्फूर्त भाव से सभी रेस्तरां, होटल आदि बंद रहते थे। यह उस छोटे कद के प्रधान मंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री के विशाल व्यक्तित्व का देश के जनमन प्रभाव था और यही बात वर्ष २०१५-१६ में प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के उस अपील में भी दिखी, जिसमे उन्होंने समर्थ देशवासियों से गैस की सब्सिडी छोड़ने का अनुरोध किया था और यह उनके आह्वान का ही प्रभाव था कि एक करोड़ लोगों ने उनकी अपील पर सब्सिडी को तिलांजलि देकर देश के ५ करोड़ गरीब गांव वासियों को रसोई गैस की सुविधा उपलब्ध कराने में अपना योगदान दिया है। ये शासक के चरित्र के प्रभाव के उदाहरण हैं, जो सुशासन ही है। महाभारत में पितामह भीष्म युधिष्ठिर के बीच संवाद में राजधर्म का बड़ा ही विशद वर्णन आया है। श्रीकृष्ण की प्रेरणा से महाराज युधिष्ठर ने भीष्म से अपने चारों भाइयों सहित सुशासन और राजधर्म के सम्बंध में उपदेश देने की प्रार्थना की थी, तब पितामह भीष्म ने शासक के गुणों का वर्णन करते हुए बताया कि राजा अर्थात शासक को सदैव पुरुषार्थ करते रहना चाहिए और सदैव सत्य का ही आश्रय लेना चाहिए। भीष्म ने कहा-

उत्थानेन सदा पुत्र प्रयतेथा युधिष्ठिर
न हात्थानुमते दैवं राज्ञामर्थ प्रसादयेत

युधिष्ठिर! शासक को सदा पुरुषार्थ के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। पुरुषार्थ के बिना केवल प्रारब्ध से राजाओं का प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। सत्य के सम्बंध में भीष्म कहते हैं-

न हि सत्याद्ते किचिद राज्ञा वै सिद्धिकारकम।
सत्येहि राजा निरत: प्रेत्य चेह च निन्दति॥

सत्य के सिवा दूसरी कोई वस्तु राजाओं के लिए सिद्धिकारक नही है। सत्यनारायण राजा इहलोक और परलोक में भी सुख पाता है।

राज्य तिष्ठिंत दशसतय संगृहीते न्द्रिवस्य च।
आर्त़़स्य बुद्धिमूल हि विगयं मनूरब्रवीत॥

जो शासक जितेन्द्रिय और कार्यदक्ष है, उसीका राज्य स्थिर रहता है। संकट की स्थिति में शासक की विजय का आघात उसकी बुद्धि बल ही होता है।
उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि भारत की चिंतन परंपरा में शासक के कर्तव्यों तथा उसके उत्तरदायित्वों के सम्बंध में बड़े विस्तार से चर्चा की गई है। किन्तु सब से महत्वपूर्ण बात यह कही गई है कि सुशासन के लिए शासक को सच्चरित्र, संवेदनशील, और सर्वस्पर्शी भाव रखने वाला होना चाहिए। जिस शासन व्यवस्था में मानवीय मूल्यों के रक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है, वह सुशासन है और उसके लिए मानवीय दृष्टिकोण और उदार चरित्र शासक उसकी पहली और सबसे महत्वपूर्ण शर्त है।

सुशासन सम्बंधी बहुत ही गंभीरतम तथा गहन विचार हमें श्रीमद् भगवद् गीता में मिलते हैं, जिसका बहुत ही सरल निरुपण श्री रामकृष्ण मठ के पूर्व अध्यक्ष स्वामी श्री रंगनाथानंद जी ने कई वर्ष पूर्व भारतीय बैंकरों को दिए गए व्याख्यान में किया था। उन्होंने कहा था कि यदि भारत को सही दृष्टि से एक कल्याणकारी, मानवीय दृष्टि से संवेदनशील तथा सर्वांगीण विकास और समृद्धि के पथ पर ले चलना है तो गीता के अंतिम श्लोक के अर्थ को सही दृष्टि से समझ कर उसे अपने आचरण में उतारना होगा-

यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थी धनुर्धर।
तंत्र श्री विजयों भूति: ध्रृवानीति भतिर्मम॥

संजय कहते हैं, जहां योगेश्वर कृष्ण हैं, धनुर्धारी अर्जुन हैं, वहां अर्थात उस सामाजिक राजकीय व्यवस्था में संपत्ति, विजय, सामान्य व्यक्ति का कल्याण, स्थिर न्याय और नैतिक भावना-जीवनमूल्यों के आदर्श हमेशा रहेंगे, ऐसा मेरा विश्वास है।

स्वामीजी ने इस श्लोक की सुशासन की दृष्टि से विलक्षण व्याख्या की है, जिसका अनुशीलन और अनुकरण शासन के पूरे दृष्टिबोध की व्याख्या करता है। उक्त श्लोक, सुशासन द्वारा समग्र मानव कल्याण तथा समृद्धि की घोषणा करता है। स्वामीजी के अनुसार श्री कृष्ण जीवन मूल्यों की सही दृष्टि, शांति तथा आध्यात्मिकता के प्रतीक हैं, जिन्होंने महाभारत के युद्ध में वस्तुतः भाग नहीं लिया, किन्तु रणांगण में अर्जुन का केवल मार्गदर्शन किया। दूसरा तत्व अर्जुन है, जो कर्म का, शासन का वास्तविक प्रतिनिधि है। अर्जुन कार्यकुशलता, सात्विक जीवन दृष्टि और उसके सही प्रकार से कार्यान्वयन का प्रतिनिधि है।

गीता के उक्त श्लोक के अनुसार जब उपर्युक्त दोनों शक्तियां एक साथ मिलती हैं तो उस समन्वय की पहली फलश्रृति श्री अर्थात आर्थिक समृद्धि में परिलक्षित होती है। यह विकास का पहला सोपान है और सुशासन की पहली वास्तविक सफलता होती है। श्री अर्थात सम्पन्नता की मुस्कान उक्त समाज या राज्य के घर-घर को प्रकाशित करें।

शक्तियों के उक्त समन्वय का दूसरा प्रतिफल है विजय अर्थात प्रत्येक योजना और प्रयत्न में सफलता। यह कार्य परिश्रम और चरित्र का समन्वय होता है- सुशासन का यह दूसरा सोपान है। हमारे देश के लगभग ७० वर्ष के स्वंतत्रता काल में विकास की योजनाएं तो बहुत बनीं; किन्तु उनका कार्यान्वयन परिश्रम और चरित्र के अभाव में भ्रष्टाचार और असफलता की भेंट चढ़ गया, जिसका परिणाम यह हुआ कि विश्व का श्रेष्ठतम संविधान होने के बावजूद देश में सुशासन का अभाव रहा।

कृष्णार्जुन समन्वित शक्तियों की तीसरी फलश्रृति यह है भूति: अर्थात जन सामान्य का कल्याण एवं उत्कर्ष। श्री और भूति: से मिलकर ही कल्याण उत्कर्ष संभव होता है। अंत में श्लोक में एक चौथे सिद्धांत की ओर भी संकेत किया गया है जिसका ध्रुवनीति के रूप में उल्लेख हैं, जिसका अर्थ है न्याय और नैतिक भावना। कोई भी शासन या प्रणाली तब तक सफल और न्यायपूर्ण नहीं हो सकती, जब तक उसके पास नैतिक भावना और मानवीय मूल्यों के प्रति सम्मान नहीं होता है और इसे ही भारत की सनातन मनीषा और चिंतन परंपरा में धर्म आध्यात्म कहा गया है, जिससे प्रेरित होकर चलाया गया शासन सुशासन में परिवर्तित होता है और उसके परिणाम स्वरूप समाज आशा और विश्वास के साथ प्रगति के पथ पर निरंतर अग्रसर होता है।

सुशासन के अर्थ को और अधिक विस्तार देते हुए श्री नरेन्द्र मोदी ने उक्त पुस्तक की प्रस्तावना में लिखा, ‘‘सुशासन को परिभाषित करना अत्यंत कठिन है। कुछ के लिए यह न्यायप्राप्ति, सशक्तिकरण, रोजगार व सेवा प्रदान करने का कुशल तरीका है, वही कुछ इसे व्यापार, समाज व राज्य का बोध रखने का सूत्र मानते हैं। एशियन डेवलमेंट बैंक के अनुसार सुशासन के चार घटक है- जवाबदेही, पारदर्शिता, पूर्वानुमान क्षमता तथा सहभागिता। हालांकि व्यावहारिक तौर पर ‘‘सुशासन एक सच्चाई है, जिसे कोई भी सरकार सक्रियता से अपने कार्यों में स्थापित कर सकती है।’’ लोकतंत्र में सुशासन का अर्थ विकास और प्रगति की प्रक्रिया में जनता को केन्द्र में रखकर किया गया कार्य। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं- ‘‘परस्पर भाक्यन्त:श्रेय: परमवाप्स्यथ’’ अर्थात परस्पर एक दूसरे का सहयोग करते हुए परम कल्याण और प्रगति के लक्ष्य को प्राप्त करने का मार्ग ही सुशासन है, जिसकी आधारशिला शासक और जनता में उच्च कोटी का आत्मानुशासन, मानव कल्याण के प्रति चिन्ता, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक सम्पन्नता तथा व्यावहाीरक कार्य कुशलता के सिद्धांत पर टिकी रहती है और जिसका लक्ष्य सभी का मंगल एवं कल्याण होता है।

शुभमस्तु सर्वजगत: परहित निरवा भवन्तु भूतगणा:।
दोषा: प्रयान्तु नाश सर्वत्र जन:सदा सुखी भवतु॥

विश्व में सभी का मंगल हो भूतमात्र में परोपकार वृत्ति निर्माण हो, सब के दोष दूर हों और सर्वत्र जन-जन सदा सुखी हों।

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