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भौतिक विकास के साथ आज पग-पग पर नियमों को दरकाने अथवा उन्हें शिथिल करने की परिपाटी बन चुकी है, लेकिन पं. दीनदयाल को यह कतई बर्दाश्त नहीं था। विकास के लिए सुशासन को पहली शर्त मान कर स्वयं सिद्धांतों को जी कर दिखाने के लिए वे कृतसंकल्प थे। भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के निधन के बाद जब आम धारणा बन चुकी थी कि जनसंघ अपने आप विसर्जित हो जाएगा, तो उन्होंने समर्पित भाव से कमान संभाली और उसका विस्तार किया। सिद्धांत को, विचार को सर्वोपरि सिद्ध किया। राजनीति में कांग्रेस का एकाधिकार था। जनसंघ प्रत्याशी की जमानत बचना खुशी का अवसर होता था।
एक वाकया याद आता है। जब पार्टी के दस उम्मीदवार विजयी होकर राजस्थान विधान सभा में पहुंच गए। जमींदारी प्रथा समाप्त करने का मुद्दा गरम था। सदन में आठ विधायकों ने जमींदारी प्रथा का समर्थन कर दिया। लेकिन पार्टी ने घोषणा-पत्र में जमींदारी प्रथा उन्मूलन का समर्थन किया था। पार्टी में लंबी बहस हुई कि अनुशासन भंग हुआ है। लेकिन मुश्किल से दस विधायक बन पाए थे। पं. दीनदयाल ने विधेयक का समर्थन करने वाले उन दस में से आठों विधायकों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। उन्होंने कहा कि विधायकों का अंक बल नहीं सिद्धांत अनुशासन सर्वोपरि है। विकास और सुशासन उनके लिए नारा नहीं जीवन की हकीकत थी।
एक दफा पूजनीय गुरूजी के साथ उन्हें मुंबई से नागपुर जाना पड़ा। गुरूजी प्रथम श्रेणी और पंडित जी तृतीय श्रेणी के कोच में सफर कर रहे थे। गुरूजी ने विचार-विमर्श के लिए उन्हें अपने डिब्बे में बुलाया और चर्चा दो स्टेशनों तक चलती गई। दीनदयाल जी को आत्मग्लानि हुई कि तीसरे दर्जे का टिकट लेकर उन्होंने प्रथम श्रेणी में यात्रा कर अपराध किया। उन्होनें ट्रेन में टीटीई को खोजने की मशक्कत की और उससे निवेदन किया कि उनसे अपराध हुआ है, कृपया दो स्टेशनों का किराया प्रभार ले लें। टीटीई उनकी स्पष्टवादिता पर श्रद्धानवत् हो गया, सहयात्री विस्मित हुए।
पं. दीनदयाल जी कहते थे कि हम समाज के साथ एकात्म की अनुभूति करें तो हमारा सुख समाज के सुख में परिवर्तित होगा। संपूर्ण जीव जगत के साथ हमारा तादात्म्य हो जाएगा। भारत में विश्वात्मा का भाव है। इसलिए हम सबके पोषण की चिंता में चिंतातुर हो जाएंगे। राष्ट्र और विश्व राज्य पं. दीनदयाल के एकात्म मानव दर्शन की चरम परिणति है। पूंजीवाद, समाजवाद, वामपंथ सभी अपने लक्ष्य में जहां विफल साबित हो जाते हैं वहां पं. दीनदयालजी का एकात्म मानव दर्शन विश्व कल्याण की एक किरण दिखाई देता है। पं. दीनदयाल ने नर को नारायण के रूप में देखा और अंत्योदय, सबसे पिछड़े की समुन्नति का बीड़ा उठाया। इसके लिए सबका साथ-सबका विकास जो नारा है उसे उन्होंने समाज के अंतिम व्यक्ति को अपनी सेवोन्मुखी सक्रियता की धुरी बनाया। सुशासन विकास की आरंभिक कड़ी होती है। इसके लिए उन्होंने लोक जीवन में शुचिता का शंखनाद किया। २१वीं सदी में यदि भारत को अपनी सांस्कृतिक समृद्धि के बल पर विश्व में अपना खोया हुआ स्थान पाना है, विश्वगुरू के रूप में प्रतिष्ठा हासिल करना है तो राजनैतिक जीवन में शुचिता और सुशासन सुनिश्चित करना होगा। भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य के रूप में पं. दीनदयाल ने विकास और सुशासन की कल्पना जब की थी, कम लोगों को ही अहसास था कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने स्वराज, डॉ. राममनोहर लोहिया ने समाजवाद, कौटिल्य ने अर्थशास्त्र के क्षेत्र में जो प्रतिष्ठा अर्जित की, एक दिन पं. दीनदयाल का एकात्म मानव दर्शन समाज के वंचित लोगों के विकास और सुशासन का रूप लेगा। आज देश में १३ राज्यों में, जिनमें चार राज्य एनडीए शासित भी हैं, अंत्योदय के प्रकारांतर में एकात्म मानव दर्शन धरातल पर यथार्थ बन रहा है। भारतीय जनता पार्टी की सरकारें एकात्म मानव दर्शन को परिभाषित करती हुई भारत की प्रगति में अग्रणी सिद्ध हो रही हैं। दो वर्ष पूर्व यूपीए सरकार में भी जब जीडीपी का आंकलन होता था, भाजपा की सरकारों के योगदान की मुक्त कंठ से सराहना की गई। पंडित दीनदयाल जी की विकास की अपनी अनूठी कल्पना, जिसमें सबको अवसर, सबको न्याय, तुष्टिकरण किसी का नहीं। जाति, पंथ, भाषा, लिंग के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं। सकारात्मक पंथ निरपेक्षता की जो अवधारणा उन्होनें दी थी उसके अनुरूप भाजपा शासित राज्यों में सरकारों का व्यवहार और आचरण का ही परिणाम है कि देश में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में गठित नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व के कार्यकाल में कहीं साम्प्रदायिक उत्पात नहीं हुआ। बाबरी ढांचा के मुख्य मुद्दई हाशिम अंसारी जिनका हाल ही में इंतकाल हुआ है उनका यह कथन कि आज़ादी के बाद नरेन्द्र मोदी एक मात्र प्रधान मंत्री हैं जिनके कार्यकाल में मुसलमानों को उनका हक सुनिश्चित ही नहीं हुआ, अपितु उनके जीवन में खुशहाली का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
पं. दीनदयाल का तात्पर्य विकास से बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं, प्रासादों का निर्माण करना मात्र नहीं था। वे मानस गरिमा और उसके साथ सह अस्तित्व आध्यात्मिक खुशहाली के पक्षधर थे। भारत की पुरातन योग परंपरा का नरेन्द्र मोदी ने अंतरराष्ट्रीयकरण करके सांस्कृतिक नवजागरण और अध्यात्म की खिड़की खोली है। भौतिक विकास के साथ देश की अतीत की समृद्ध विरासत का दुनिया से साक्षात्कार कराया है। योग का विश्वव्यापीकरण करके वास्तव में भारत ने विश्व मानव से तादात्म्य बनाकर एकात्म मानव दर्शन का ही विस्तार किया है। आज दहशतगर्दी विश्वव्यापी समस्या बन चुकी है। इसका कारण संस्कारों, मानव धर्म से विचलन ही है। प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने आतंकवाद के मूल में संस्कारहीनता, परस्पर घृणा, विस्तारवाद की ललक बताते हुए विश्व की एकजुटता की आवश्यकता रेखांकित की है। अफसोस की बात है कि मानव-मानव के बीच तादात्म्य की कमी ने मजहब के नाम पर नर को पशु बना दिया है। एकात्म मानवदर्शन ही इस व्याधि में संजीवनी का काम कर सकता है। यहां यह भी गौर करने की बात है कि जहां जिन मुल्कों में दहशतगर्दी को पनाह मिली है, वे विकास और सुशासन में या तो पिछड़े है अथवा उन्हें विकास और सुशासन का मंत्र ही नहीं मिला है। पड़ोसी मुल्क इसका उदाहरण है।
समिष्टगत व्यवहार विकास और सुशासन का आधार पं. दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन मानता है कि सारे सरोकार समष्टिगत व्यवहार में समाहित हैं। प्रकृति मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति में स्वयं समर्थ है, लेकिन आवश्यकता दोहन की है शोषण की नहीं। व्यक्ति जब इच्छापूरित कदम उठाता है शोषण का क्रम आरंभ होता है और प्रकृति भी असमर्थ हो जाती है जिसे हम प्रकृति की क्रूरता बता कर आत्मपरितोष करते है। यह वही भावना है जहां मिनिमम गवर्नेंस और मैक्सीमम गवर्नेंस की कल्पना की जाती है। सबका साथ सबका विकास जिसका प्रकारान्तर है। विकास और सुशासन जिसका मूर्त रूप है।
विकास और सुशासन का संस्करण भारत के हर युग हर काल में किसी न किसी रूप में विद्यमान तो रहा है; लेकिन इसकी धुरी अंतिम व्यक्ति हो यह विचार पं. दीनदयाल ने दिया है। व्यष्टि, समाष्टि, सृष्टि और परमेष्टि की कल्पना में अर्थ, धर्म, काम मोक्ष सनातन विचार हैं, लेकिन पं. दीनदयाल ने इसे व्यवहार और आचरण में परिभाषित कर दिखाया। उन्होंने माना है कि मनुष्य बुरा नहीं है। परिस्थितियों का वह क्रीत दास हो जाता है। मिट्टी में स्वर्ण छिपा होता है। एकात्म मानव व्यष्टि है। अर्थ, काम, धर्म आधारित होता है तो मोक्ष की अंतिम परिणति स्वाभाविक है।
एकात्मता का लक्ष्य विपरीत दिशा में चल कर प्राप्त नहीं कर सकते हैं। आज पं. दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन को सरोकार के रूप में भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों में अपनाने के लिए जो प्रयास हो रहे हैं उनका आधार विकास और सुशासन हीं है। सुशासन की कल्पना में नागरिकोचित अधिकार सुरक्षित करके भ्रष्टाचार का उन्मूलन करना है। लोक सेवा गारंटी योजना में हर काम के लिए सरकारों ने अवधि तय की है। इसकी उपेक्षा दंडनीय है। गांव, गरीब, किसान को सामाजिक, आर्थिक सुरक्षा देने के लिए प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना, जन धन योजना, अटल पेंशन योजना जैसे काम अंजाम दिए जा रहे हैं। अंतिम व्यक्ति अनुन्नत न रहे और समुन्नति के शिखर पर पहुंचे, यह राज्य की प्रमुख प्रतिबद्धता बनने जा रही है। इसकी सफल परिणति ही उस महापुरूष के प्रति इक्कीसवीं सदी की सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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