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मई २०१४ में जब नरेंद्र मोदी सरकार का गठन हुआ था उस समय यह आरोप लगाया गया था कि यह कार्पोरेट और उद्योगपतियों की सरकार है। हालांकि खुद प्रधान मंत्री ने और भारतीय जनता पार्टी ने इस बात को गलत बताते हुए यह स्पष्ट किया था कि सरकार देश के कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देने में कोई कसर बाकी नहीं रखेगी।

लेकिन अपनी कार्पोरेट हितैषी छवि तोड़ने के सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद, ये कयास रह-रहकर लगाए जाते रहे कि सरकार आखिरकार उद्योग और कार्पोरेट की तरफ ही झुकेगी। मोदी सरकार ने इस छवि को तोड़ने का सबसे प्रभावी कदम वर्ष २०१६-१७ के बजट में उठाया, जब उसने पूरे बजट का फोकस ही कृषि और ग्रामीण विकास पर रखा। उसके बाद से यह स्पष्ट हो गया कि सरकार पर चस्पा की जा रही कार्पोरेटवादी होने की छवि दरअसल राजनीतिक विरोधियों का ही शगूफा थी।
पिछले दो सालों से अधिक की अवधि में मोदी सरकार द्वारा किसानों के कल्याण के लिए चलाए गए बहुत सारे कार्यक्रमों के सकारात्ममक परिणाम आने लगे हैं। लगातार दो साल तक मानसून की बारिश औसत से काफी कम रहने के बावजूद देश में अनाज के उत्पादन में कोई कमी नहीं आई। वर्ष २०१४-१५ में जहां २५२.०२ मिलियन टन अनाज का उत्पादन हुआ था, वहीं २०१५-१६ में यह उत्पादन २५२.२३ मिलियन टन रहा। इसे देश के किसानों की अथक मेहनत और सरकार की नीतियों का सुपरिणाम ही कहा जाएगा कि, कई राज्यों में भारी सूखे और अनेक जगहों पर विपरीत मौसम के कारण हुई ओलावृष्टि आदि की मार से फसलों को भारी नुकसान होने के बावजूद अनाज का उत्पादन बेहतर रहा।
आंकड़ों के लिहाज से ही यदि देखें तो यूपीए सरकार के दौरान सामान्य मानसून वाले वर्ष २०१३-१४ में अनाज का उत्पादन २६४.३८ मिलियन टन था, जबकि उस शासनकाल में २००९-१० में पड़े सूखे के दौरान उत्पादन सिर्फ २१८.१० मिलियन टन ही हो पाया था। यानी यह बात तो स्पष्ट है कि विपरीत परिस्थितियों में भी मोदी सरकार ने अपनी नीतियों और बेहतर प्रबंधन के कारण स्थिति पर काफी हद तक काबू पाया। इस दौरान सही समय पर पानी, बीज, खाद, बिजली और आवश्यकता अनुसार ऋण उपलब्ध कराने जैसे निर्णय तेजी से लिए गए और इससे किसानों का मनोबल नहीं टूटा।

मोदी सरकार ने अपने गठन के बाद कृषि और ग्रामीण क्षेत्र को मजबूत करने के लिए दिखावटी उपाय करने के बजाय ठोस कदम उठाते हुए बुनियादी सुधारों की ओर ध्यान दिया है। सरकार के इसी दूरगामी विजन के चलते ऐसी कई योजनाएं लागू की गई हैं जो फौरी तौर पर चमत्कार दिखाने वाली भले ही न लगे, लेकिन भविष्य में वे चमत्कारिक सिद्ध होंगी इससे इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसी ही कुछ योजनाओं के बारे में जानना जरूरी है-

स्वाइल हेल्थ कार्ड

सरकार की ओर से किए जा रहे बहुत से नए प्रयासों में ‘स्वाइल हेल्थ कार्ड’ अत्यंत महत्वपूर्ण योजना है। इस योजना का मकसद मिट्टी की उचित जांच को बढ़ावा देना है, ताकि किसान को मिट्टी की उत्पादकता के बारे में सही जानकारी हो सके। इससे किसान कम लागत पर उच्च उत्पादन दर हासिल कर सकेंगे। इसके साथ ही, मिट्टी की सेहत को भी ठीक रखा जा सकता है। योजना के तहत किसानों को १४ करोड़ कार्ड मुहैया कराए जाने हैं जिसमें से अभी तक १.८४ करोड़ कार्ड वितरित किए जा चुके हैं। यह योजना मार्च २०१७ तक पूरी करने का लक्ष्य है।

कृषि आय दुगुनी करना

मोदी सरकार ने खाद्य सुरक्षा से एक कदम और आगे बढ़ाकर देश के किसानों की आय को दोगुना करने का संकल्प लिया है। प्रधान मंत्री ने इस आशय का संकल्प फरवरी २०१६ में मध्यप्रदेश के शेरपुर में किसान महासम्मेलन को संबोधित करते हुए व्यक्त किया था। कथनी और करनी में कोई अंतर न रखते हुए, इस सपने को साकार करने के लिए कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय को वर्ष २०१६-१७ के बजट में ३५,९८४ करोड़ रुपए आवंटित किए गए जो पिछले सालों की तुलना में काफी अधिक राशि है। सरकार संसाधनों का उचित इस्तेमाल कर, मूलभूत सुविधाओं को लंबे समय तक उपलब्ध कराने का लक्ष्य लेकर चल रही है।

इस उद्देश्य से सरकार ने जिन बातों को टारगेट किया है उनमें जल संसाधनों का प्रभावशाली उपयोग, सिंचाई के लिए नए आधारभूत ढांचे का निर्माण, खाद का संतुलित मात्रा में उपयोग, मिट्टी की उर्वरता को संरक्षित करना एवं उपज का सही मूल्य दिलाने के लिए खेत से बाजार तक सम्पर्क की मजबूत श्रृंखला मुहैया कराना जैसे उपाय शामिल हैं।

पर ड्रॉप, मोर क्रॉप

यह कोई नया तथ्य नहीं है कि भारत में आज भी खेती ज्यादातर मानसून की बारिश पर ही निर्भर है। ऐसे में खेती को यदि बचाना है तो सिंचाई के संसाधन विकसित करना पहली जरूरत है। हर खेत में सिंचाई के उचित प्रबंध के लिए प्रधान मंत्री ने अपने कई भाषणों में दो नारे दिए। पहला नारा ‘हर खेत को पानी’ और दूसरा ‘पर ड्राप मोर क्राप’। इन नारों को हकीकत में बदलने के लिए कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए, जिनमें प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना सबसे महत्वपूर्ण है।
देश में आजादी के छह दशक बाद भी ४६ प्रतिशत कृषि भूमि ही सिंचाई योग्य है। अतः ग्रामीण एवं कृषि व्यवस्था को सूखे की समस्या से पूरी तरह निजात दिलाने के लिए जन अभियान के रूप में प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना शुरू की गई। अभी तक देश में १४ करोड़ १० लाख हेक्टेयर शुद्ध खेती वाले क्षेत्रों में से केवल ६.५ करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र ही सिंचित हैं। ‘प्रधान मंत्री सिंचाई योजना’ के तहत लगभग २८.५ लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई के दायरे में लाने का लक्ष्य मिशन मोड से क्रियान्वित किया जाएगा। वर्ष २०१५-१६ में इस योजना के लिए १५५० करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था, जबकि वर्ष २०१६-१७ में यह आवंटन ५१% बढ़ा कर २३४० करोड़ कर दिया गया। यह प्रावधान इस बात का संकेत है कि सरकार जल्द से जल्द, ज्यादा से ज्यादा असिंचित हिस्से को पानी की सुविधा पहुंचाना चाहती है।
सिंचाई के लिए आवश्यक अधोसंरचना निर्माण के लिए राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक के अंतर्गत शुरुआती तौर पर २० हजार करोड़ के सिंचाई कोष का गठन किया गया है। इसके साथ ही मनरेगा के तहत वर्षा सिंचित इलाकों में ५ लाख तालाब व कुंए खोदने का निर्णय लिया गया है, ताकि पानी का संचय कर उसका सही इस्तेमाल किया जा सके। इससे मनरेगा में होने वाले काम को भी सार्थक व लाभकारी बनाया जा सकेगा।

जैविक खेती को बढ़ावा

सरकार जैविक खेती के लिए ५ लाख एकड़ वर्षा सिंचित क्षेत्रों में परंपरागत कृषि विकास योजना पर भी पूरी ताकत से काम कर रही है। पूर्वोत्तर क्षेत्रों में ‘जैव मूल्य श्रृंखला विकास योजना’ प्रारंभ की गई है जिससे उन खेतों में पैदा होने वाले जैव उत्पादों को घरेलू बाजार के साथ-साथ निर्यात का अवसर भी मिल सके।

भंडारण सुविधा

सरकार ने जल्दी खराब हो जाने वाले कृषि उत्पादों के भंडारण के लिए भी युद्ध स्तर पर काम शुरू किया है। इससे किसान अपनी फसल को सुरक्षित रखने के साथ-साथ बेहतर मार्केटिंग कर अपनी आय में इजाफा कर सकेंगे। भारत ने लगभग ३ करोड़ २० लाख टन की शीत भंडारण क्षमता स्थापित की है। पिछले दो वर्षों में १० लाख टन की क्षमता से भी अधिक की लगभग २५० परियोजनाएं आरंभ की गई हैं।

डेयरी उत्पादों को बढ़ावा

भारत डेयरी उत्पाद वाले देशों के बीच में एक प्रमुख ताकत बन कर उभर रहा है। २०१५-१६ में हमारे किसानों और पशुपालकों ने १६ करोड़ ३५ लाख टन दूध का उत्पादन किया जिसकी कीमत लगभग ४ लाख करोड़ रुपये बैठती है। पहली बार १० वर्षों के औसत उत्पादन में वार्षिक वृद्धि दर भारत में ४.६ प्रतिशत और विश्व की २.२४ प्रतिशत रही। यानी हम डेयरी उत्पादों के मामले में विश्व के औसत से दुगुना उत्पादिन कर रहे हैं।

गन्ना किसानों की चिंता

मोदी सरकार ने गन्ना उत्पादक किसानों के हितों की भी चिंता की है। उन्हें गन्ना का बकाया भुगतान दिलाया गया है। गन्ना उत्पादक किसानों के हित में निर्णय लिया गया है कि गन्ने से एथनाल बना कर उसे पेट्रोल में १० प्रतिशत मिलाया जाएगा। यह पर्यावरण और किसानों के फायदे की दृष्टि से भी बेहतर होगा।

फूड प्रोसेसिंग में एफडीआई

सरकार ने एक और महत्वपूर्ण फैसला फूड प्रोसेसिंग में सौ फीसदी एफडीआई का किया है। किसानों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर ई मंडी योजना का शुभारंभ करते हुए खुद प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने फूड प्रोसेसिंग का महत्व किसानों को सरल भाषा में समझाया। उन्होंने कहा- ये फूड प्रोसेसिंग किसान को बहुत बड़ी ताकत देती है। अगर वह कोई ऐसी पैदावार करता है जिसको तकनीक की मदद से और बेहतर या उपयोगी बनाया जा सकता है, तो उसके उत्पाद की कीमत बहुत बढ़ जाती है। उस काम में पूंजी निवेश के लिए दुनिया से पैसे आते हैं। जैसे किसान यदि कच्चे आम बेचे तो कम पैसा आता है, पके हुए बेचे तो थोड़ा ज्यादा आता है। लेकिन कच्चे आम यदि अचार बनाकर बेचो तो और ज्यादा पैसा आता है। यह अचार भी बढ़िया सी बोतल में पैक करके बेचो तो और ज्यादा पैसा आता है और बोतल का विज्ञापन कोई अभिनेता या अभिनेत्री करते हो तो पैसा और बढ़ जाता है।

अन्य उपाय

कृषि क्षेत्र में केवल संसाधनों से ही काम नहीं चल सकता। एक बड़ी समस्या इन संसाधनों के लिए दी जाने वाली राशि के सही इस्तेमाल की तो है ही, इसके साथ ही किसानों को मिलने वाले जरूरी सामान जैसे खाद, बीज, कीटनाशक आदि की गुणवत्ता सुनिश्चित करते हुए भ्रष्टाचार मुक्त तंत्र बना कर इन्हें किसानों तक पहुंचाना एक बड़ी चुनौती है। मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार रोकने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए किसानों को दिए जाने वाले यूरिया पर नीम की परत चढ़ाना शुरू कर दिया है। सरकार के इस कदम से यूरिया की मांग में लगभग १५% तक की कमी आई जो इस बात साफ प्रमाण है कि अब तक यह यूरिया या तो बिचौलियों के हाथ में चला जाता था या फिर उसका कहीं अन्यत्र इस्तेमाल हो रहा था।
कुल मिलाकर नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले दो सालों में किसानों की स्थिति मजबूत करने और खेती को लाभकारी बनाने के लिए अनेक उपाय किए हैं। प्रधान मंत्री खुद कहते हैं कि- ‘‘आने वाले दिनों में किसानों का भविष्य उज्ज्वल बनाया जा सकता है, सोची-समझी व्यवस्था हो तो यह संभव है।’’
प्रधान मंत्री का यह विश्वास, किसानों को भी भरोसा दिलाता है कि योजनाओं पर अमल होने और उनके रफ्तार पकड़ने में थोड़ा वक्त जरूर लग जाए लेकिन उनके अच्छे दिन जरूर आने वाले हैं।

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