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दीपावली का आलोक पर्व भीतर बाहर सर्वत्र प्रकाश भरने के लिए आता है। यह याद दिलाता है कि असत्य का हर अंधेरा सत्य के छोटे-छोटे दीपकों के प्रकाश से भी छंट सकता है। आवश्यकता है सत्य के प्रकाश के संकल्प की, प्रयास के पहल की।

– भारत में हर ॠतु के विशेष पर्व हैं। प्रत्येक महीने की प्रत्येक तिथि को कोई न कोई व्रत-पर्व, त्योहार होता है। कहावत है कि-“सात वार नौ त्योहार”।

आलोक पर्व दीपावली भारत का प्रतिनिधि पर्व है। लोक और शास्त्र दोनों में इसका विशेष महत्व है। इस पर्व का लोक प्रचलित स्वरूप अनेकानेक विशेषताओं को उजागर करता है।

दीपावली की रात, जागरण की रात है। अपने हृदय और मन के द्वार के साथ ही सभी घरों के दरवाजे खुले रखे जाते हैं। लक्ष्मी जी की अगवानी में लोग जागरण करते हैं।

लोक विश्वास है कि दीवाली की रात लक्ष्मी जी भी विष्णु की शेषशैय्या त्याग कर अपनी बहन दरिद्रा के साथ धरती पर विचरते हुए प्रश्न करती हैं- कौन जग रहा है? जो घर साफ-सुथरा प्रकाशित होता है, लोग जाग रहे होते हैं उसमें लक्ष्मी प्रवेश कर जाती हैं। जो गंदा, अंधेरा होता है, लोग सोते हुए मिलते हैं उसमें दरिद्रा चली जाती हैं।

भारतवर्ष ऊपर से भले ही गरीब दिखे पर भीतर से इसका मन बहुत सम्पन्न है। गरीब से गरीब आदमी भी खुशी मनाना चाहता है, इसलिए कि इस खुशी की हिलोर समूची जिन्दगी को छुए। भारत में चाहे वह किसी जाति का, मजहब का हो, यहां की मिट्टी के प्रभाव से हर एक आदमी यह विश्वास करता है कि हर खुशी बंटती है तो बढ़ जाती है।

त्योहार और पर्व में एक मामूली सा अन्तर है। प्राय: तो हर पर्व को त्योहार भी कहा जाता है और त्योहार को पर्व। पर जब हम पर्व कहते हैं तो समय के एक विशेष बिन्दु का ध्यान अवश्य रहता है। जैसे दीपावली, कार्तिक बदी अमावस्या को संध्या समय मनाई जाएगी पर दीवाली का त्योहार धनतेरस से ही प्रारम्भ हो जाता है।

कार्तिक माह का शरद ॠतु की द़ृष्टि से भी विशेष महत्व है। इस मास का स्वागत ही शरद-पूर्णिमा के उत्सव में चन्द्रमा से टपकते सुधा बिंदु मिश्रित खीर से प्रथम दिवस की प्रात: ही मुंह मीठा करके होता है। आयुर्वेद की द़ृष्टि से भी शरद ॠतु विषेष महत्वपूर्ण है।

प्रकाश पर्व दीपावली, अंधकार के खिलाफ प्रकाश का संदेश है। इस पर्व को मनाने की लोक प्रचलित विधि प्रत्येक क्षेत्र की थोड़ी भिन्न होते हुए भी पूरे देश में यह पर्व एक अनोखी एकरूपता लिए मनाया जाता है।

दीपावली के पहले घर में सफाई की भीतर-बाहर तैयारी होती है। कच्चा फर्श गोबर से और दीवालें रामरज मिट्टी से, चूने से पोती जाती हैं। एक-एक कोने से जाले हटाए जाते हैं। बाहर का कूड़ा सब बटोरा जाता है। अब तो गांव में भी पक्के मकान हैं। उनकी पुताई-रंगाई होती है।

कुम्हार के घर मिट्टी के दीये महीनों पहले से तैयार होने लगते हैं। मिट्टी की घंटियां बनाई जाती हैं। हलवाई के यहां गुड़ के बताशे, चीनी के खिलौने बनते हैं।

कार्तिक भर तुलसी के चौरे पर शाम को दीया जला कर हर घर में तुलसी की पूजा होती है। कार्तिक की ओस भीगी भोर में उठ कर नदी नहाने की तैयारी होती है। कार्तिक का प्रातः नहान बड़ा ही पवित्र स्नान है।

दीपावली के एक दिन पहले चौदह यमों को दीप अर्पित किया जाता है और घूरे (गोबर की खाद एकत्र करने का स्थान) पर दीये जलाये जाते हैं। फिर घर में बड़े कोसे (दीपक) में तेल भरकर एक दीया जलाया जाता है और उसे सुरक्षित रखने के लिए एक छेद वाली हंडिया से ढंक दिया जाता है। उसमें दीये का काजल भीतर भरता जाता है। नए धान की ढेरी पर ‘सेई’ (धान मापने वाला बर्तन) औंधा कर रख दिया जाता है। आंगन में चावल के आटे का घोल बनाकर लिपी-पुती जमीन पर चौक पूरा जाता है। पुरखिनें किशोरियों को चौक पूरना सिखाती हैं। जिन नई बहुओं को चौक पूरना आता है, उन्हें आज के दिन बड़ा आदर मिलता है।

बच्चे सबेरे से ही मिट्टी की घंटी करधनी के रूप में बांध कर इधर-उधर घूमते हैं। उनकी मधुर टुनटुन और कार्तिक के गीतों के स्वर गांवों में गूंज उठते हैं। गांव के खेतों से अगहनी धान की गंध आती है।

दीपावली की सांझ बच्चों के लिए बड़े उमंग की सांझ होती है। सुबह से धोकर मिट्टी के दीये औंधाये रखे रहते हैं। उन्हें टोकरी में भर-भरकर पंक्ति में सजाते हैं। थाली में आंगन के चौक में दीये सजा कर उस पर सूप से हल्के से हवा देकर फिर घर के कोने-कोने में हर एक दरवाजे और हर एक खिड़की के पास दीये रखते हैं और शाम होते ही उसमें तेल डाल कर एक-एक दीया जलाते हैं। फिर दीवाली की सजावट देखने निकल पड़ते हैं। घर के भीतर अनाज की ढेरी के पास पूरे गए चौक पर लक्ष्मी की पूजा होती है। जल रहे दीये का जो काजल हंडिया में संचित होता रहता है उसी को कजरौटा में रखा जाता है। उसे सबकी आंखों में सोने जाने से पहले लगाया जाता है, जिससे दीपावली की ज्योति हमारी आंखों में समा जाय।

दीपावली की रात को जहां लक्ष्मी-गणेश का पूजन होता है, वहीं चौक पूर कर एक ‘नदवा’ (मिट्टी का पात्र) में चावल जगाए जाते हैं। इसके ऊपर बड़ा सा दीपक रखकर तेल भर देते हैं। इस दीपक को रात भर जलना चाहिए। कह दिया जाता है, “सब घर सोवै, नदवा जागै।” यहीं पर पितरों के लिए तेरह दीपक जलाए जाते हैं। यह सब पूजा होने के बाद ठाकुर जी, तुलसी जी, तिजोरी, मोटर गाड़ी आदि हर कमरे व कूड़े दान तक पर मिट्टी के दीपक जलाए जाते हैं। चार बजे तड़के ही नदवा खोल कर चावल पीस लिए जाते हैं। इसमें घी, शक्कर मिलाअकर दूध में सान कर चि़िड़या, पुस्तक, खड़ाऊं आदि बनाई जाती हैं।

सब सुहागिनें नहा-धोकर श्रृंगार करके दीवार पर उरेही हुई दीवाली के पास बैठ कर चिड़िया की भी पूजा करती हैं। फिर इसके अंड़ों को बायें पैर के अंगूठे के नीचे हलके से दबाकर पूंछ की ओर से यह चिड़िया मौन होकर खाती हैं। इसके अंड़ों को छत पर डाल कर, हाथ धोकर, गौर का सुहाग लेकर तब बोलती हैं। सम्भवत: यह रीति पशु पक्षियों की बलि प्रथा के विरोध में लोक विश्वास की रक्षा करते हुए चिड़ियों के प्रतीक बना कर उनकी बलि करने के परिवर्तित रूप में प्रारम्भ की गई।

जब तक तेल रहता है जलते-बुझते दीये टिमटिमाते रहते हैं। कहीं-कहीं ब्रह्म मुहूर्त में घर की पुरखिन उठ कर घर भर में एक मंत्र सा पढ़ती घ्ाूमती हैं। वह मंत्र है, “ईश्वर आवैं, दरिद्दर जायें।” कहीं-कहीं यह दरिद्र भगाने का रिवाज देवोत्थान एकादशी को ही होता है।

दीपावली के दिन बच्चे शोर करते गाते हैं-

करवा करवारी वोके बरहे दियारी,

दियारी बैठी कोने बारह रोज डिठउने,

आगि लाग डिठउने।

डिठवन मारिस गोली चार महिना बादे होली।

(करवा चौथ के बारहवें दिन दीवाली, दीवाली कोने में बैठी तो बारहवें दिन देवोत्थान एकादशी, उसके चार महीने बाद होली पड़ती है।)

दीपावली में लक्ष्मी-गणेश पूजन होता है। भोग में लइया, खील, बताशे, चीनी के खिलौने, मेवा, फल, मिठाई आदि चढ़ाए जाते हैं। कहीं-कहीं कुबेर और यमराज का पूजन भी किया जाता है।

दीपावली के संबंध में जो अन्य कथाएं प्रचलित हैं, उनमें भी विविधता है। कहते हैं कि इस दिन राजा बलि पृथ्वी के साम्राज्य से वंचित कर पाताल भेजे गए थे। महाराष्ट्र में इस दिन स्त्रियां राजा बलि की मूर्तियां बना कर पूजती हैं।

दीपावली को राजा बलि ने दान का व्रत लिया था। वह किसी भी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाते थे। राज्य में कहीं भी जीव-हिंसा, मदिरापान, चोरी, विश्वासघात, वेश्यागमन आदि पांच महापातकों का नामोनिशन नहीं था। दया, दान, सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य का सभी पालन करते थे। इस राज्य की अच्छाइयों से आकर्षित होकर भगवान विष्णु ने राजा बलि का द्वारपाल बनना स्वीकार कर लिया था और राजा की धर्म में निष्ठा बनी रहे, इसलिए तीन दिन और तीन रात तक महोत्सव का निश्चय किया था एवं दीपमालिका सजाई थी। तभी से दीपावली मनाई जाने लगी।

श्रीराम चौदह वर्ष का वनवास काट कर इसी दिन अयोध्या वापस लौटे थे और उनके स्वागत के उल्लास में दीपावली मनाई गई थी। अन्य कथा है कि लंका से वापस आने के बाद महाराज श्री रामचन्द्र जी इसी दिन सिंहासन पर बैठे थे। एक कथा है कि धर्मराज युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ उसी दिन पूरा हुआ था। तभी उत्सव मनाया गया था।

दीपावली के एक दिन पहले कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को विष्णु भगवान ने ‘नरकासुर’ दैत्य को मारा था, तभी यह त्योहार मनाया जाता है। कहते हैं कि इसी दिन महाराज विक्रमादित्य का राज्याभिषेक हुआ था।

जैन धर्म के प्रवर्तक वर्द्धमान महावीर तथा आर्य समाज के प्रवर्तक स्वामी दयानंद का परिनिर्वाण दीपावली को ही हुआ था। उनके अनुयायी इस दिन दीपक जला कर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

इस दिन जुआ खेलने के प्रचलन के संबंध में एक लोक कथा है कि इसी दिन शिव जी के पास जो कुछ था, सब पार्वती के साथ पांसा खेलने में हार गए। इसलिए दुखी होकर कैलास छोड़ कर गंगा तट पर निवास करने लगे। कार्तिकेय ने जब देखा कि जुए में सब हार जाने के कारण पिता महादेव जी दुखी रहते हैं तो उन्होंने भी पांसा फेंकना सीखा और जब अच्छी तरह सीख गए तो अपनी माता के पास गए। पार्वती जी कार्तिकेय से जुए में सब कुछ हार गईं। कार्तिकेय ने इस तरह से महादेव जी की हारी हुई संपदा फिर दिला दी। पार्वती जी को दुख हुआ। जब गणेश जी ने यह देखा कि जुए में हार कर माता दुखी हैं तो इन्होंने भी पांसा फेंकना सीखा और भाई कार्तिकेय को हरा दिया। शिव जी ने गणेश जी से कहा कि जाकर पार्वती जी को बुला लाओ, जिससे आपस में सुलह हो जाए।

गणेश जी चूहे पर सवार हो गंगा जी के किनारे-किनारे जा रहे थे कि नारद जी को पता चल गया। उन्होंने विष्णु से बता दिया कि गणेश जी पार्वती को शिव जी से मेल कराने के लिए बुलाने जा रहे हैं। विष्णु ने फौरन ही पांसे का रूप धारण कर लिया। शिव और पार्वती ने उसी पांसे से जुआ खेलना शुरू किया, किन्तु पांसा तो विष्णु स्वयं ही थे, बार-बार पार्वती जी के खिलाफ लुढ़क जाते थे। पार्वती जी सब कुछ हार गईं किन्तु जब बाद में उनको पता चला कि यह विष्णु भगवान का मजाक था तो क्रोधित होकर उन्होंने शाप देना चाहा। किन्तु शिव के समझाने पर प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया कि जो दीपावली के दिन जुआ खेलेगा वह साल भर बराबर समृद्ध और प्रसन्न रहेगा। पर धीरे-धीरे यह प्रथा समाज के लिए विष बन गई।

दीपावली की रात में जो भी हुनर या विद्या जिसे आती है, उसे जगाया जाता है। दीपावली के दीपक के प्रकाश में तंत्र-मंत्र भी लोग जगाते हैं। विश्वास है कि इन दिन जो भी कार्य किया जाता है, उसकी पुनरावृत्ति होती रहती है। इसलिए इस दिन अच्छे कार्य, प्रसन्नतादायक कार्य किए जाते हैं और बुरे तथा दुखदायी कामों से बचा जाता है।

आज दीपावली पर्व मनाने में बहुत अंतर आ गया है। गांव की दीपावली में धान्य के रूप में लक्ष्मी उतरती थीं (आश्विन माह से धान की फसल घर में आ जाती है)। आज नगरों, महानगरों में काले धन की लक्ष्मी उतरती हैं। वहां भीतर का तरल मधुर प्रकाश था, अब भीतर अंधेरा है, बाहर प्रकाश है। उस तरल मधुर स्मृति से ही मन आलोकित हो जाता है और कुछ देर के लिए काली लक्ष्मी का आसुरी प्रकाश मन से दूर चला जाता है।

एक लोककथा है- एक लड़की रोज पीपल में जल डालने जाती थी। पीपल में से लक्ष्मी जी निकलतीं, कभी आग के रंग की, कभी गुलाबी रंग की। वे रोज उस लड़की से कहतीं कि तुम मेरी बहन बन जाओ। लड़की कहती कि पिता जी से पूछ कर बन जाऊंगी। उसने अपने पिता से पूरी बात कही। पिता ने कहा कि अच्छा है, बहन बन जाओ।

लक्ष्मी जी से बहनापा हो गया। लक्ष्मी जी बोलीं, “मेरे घर भोजन करने चलो।” लड़की पिता से आज्ञा लेकर गई। वहां सोने की चौकी पर बैठाकर लक्ष्मी ने छप्पन भोग परसा। वह चलने लगी तो लक्ष्मी ने उसका आंचल पकड़ कर कहा कि हमें कब न्योता दोगी? वह बोली, “पिता से पूछ कर बताऊंगी।” पिता ने कहा, बुला लाना। उसने न्यौता दे दिया। पर चिंतित थी। वहां तो सोने की चौकी पर बैठ कर छप्पन भोग खाया। यहां टूटी काठ की चौकी भी नहीं। गरीबी में छप्पन भोग बने तो कैसे? पिता ने समझाया, जो भी है, उसी से स्वागत करो। दरवाजे पर दीपक जला कर रख दो।

लक्ष्मी जी आईं, प्रेम से रूखा-सूखा खाया। जिस पीढ़े पर बैठीं, वह सोने का हो गया। जिस थाली में खाया वह सोने की हो गई। अनाज के भंड़ार भर गए। घर में चारों ओर सम्पत्ति हो गई।

“जैसे उनके दिन बहुरे, वैसे सबके बहुरैं।”

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा (अन्नकूट) का उत्सव होता है। यह उत्सव अहंकार पर प्रेम की जीत का पर्व है। श्रीकृष्ण ने इन्द्र के प्रकोप से जनता को बचाने के लिए गोवर्द्धन पर्वत उठा लिया था और गोवर्द्धन की पूजा की थी। यह पर्व प्रकृति के महत्व को स्वीकार करने के लिए है। प्रकृति हर आपदा से रक्षा करती है, उसकी कृपा से ही अन्न धन समृद्धि आती है। ये संदेश देते हैं ये पर्व। इस पर्व पर छप्पन भोग बनाए जाते हैं जिसमें सभी तरह की मौसमी सब्जियां और अन्न सम्मिलित होते हैं। गाय के गोबर से गोवर्द्धन बनाकर उस पर रुई और सीकें लगाई जाती हैं जो पर्वत पर जमीं बर्फ और वृक्षों की हरियाली के प्रतीक स्वरूप बनते हैं।

गोवर्द्धन पूजा गोवर्द्धन पर्वत की पूजा भी है और गोबर रूपी धन की भी। गोबर हमारी प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, ईंधन, खाद तथा स्वच्छता के उपकरण के रूप में। इसीलिए छोटी दीवाली (नरक चौदस) के दिन घ्रे पर दीप जलाते हैं। ‘घूरा’ गोबर की खाद का ढेर होता है जो धरती को अतिरिक्त ऊर्जा देता है।

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को ही चिरइया गौर भी मनाई जाती है और पिड़िया व्रत भी इसी दिन से प्रारम्भ होकर पंद्रह दिन तक चलता है। दीपावली के छठे दिन सूर्य षष्ठी “डाला छठ” का व्रत पर्व होता है। जिसमें तीन दिन तक सूर्य की पूजा की जाती है। कार्तिक शुक्लपक्ष नवमी को अक्षय नवमी कहते हैं। यह विश्वास है कि इस तिथि को दिया हुआ दान और किया हुआ पुण्य अक्षय होता है। इस दिन आंवला वृक्ष की पूजा करके उसकी परिक्रमा की जाती है। लोग आंवले के नीचे भोजन बनाते खाते हैं।

अयोध्या की परिक्रमा अक्षय नवमी से ही प्रारम्भ होती है और एकादशी को पूरी होती है। यह परिक्रमा चौदह कोसी होती है। देवोत्थान एकादशी के दिन पंचकोसी परिक्रमा की जाती है। कहा जाता है कि जब श्रीराम वनवास जा रहे थे तो उनके विछोह में विह्वल ग्रामवासियों ने अयोध्या की परिक्रमा उनके पीछे-पीछे चलते हुए की थी। यह परिक्रमा अत्यन्त फलदायिनी है। अयोध्या की परिक्रमा का अर्थ है- ब्रह्मा, विष्णु और महेश की परिक्रमा।

व्रत पर्व-कथाओं गीतों और लोक चित्रों में प्रकृति ही उपादान भी होती है और माध्यम भी। उस परिवेश में तुलसी का पौधा आता है और कार्तिक के महीने में उसके आगे दिया जलाया जाता है, उसकी जड़ों में प्रतिदिन प्रात: काल जल डाल कर जल ग्रहण करते हैं। कार्तिक पूर्णिमा को या देवत्थान एकादशी को तुलसी का शालिग्राम से विवाह करा कर तुलसी की विदाई की जाती है।

देवत्थान एकादशी को ही विष्णु भगवान जगते हैं। उन्हें जगाने के लिए एक मंत्र का पाठ किया जाता है-

उदितश्ठोतिश्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पते, त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत्सुप्तं भवेदिदम्।

उत्थिते चेश्टते सर्वमुत्तिश्ठोत्तिश्ठ माधव॥

जिसका भाव है कि हे कृष्ण! निद्रा का त्याग करके उठिए। यदि आप ही सोते रहेंगे तो इस विश्व को कौन जगाएगा?

इसे देवप्रबोधिनी एकादशी भी कहते हैं जो संदेश देती है कि अकर्मण्यता को त्याग कर कर्म में रत हो। क्षीरसागर में सोये विष्णु योगनिद्रा से इसी तिथि को जगते हैं। आषाढ़ की देवशयनी एकादशी को शंखासुर को मार कर थकान मिटाने के लिए क्षीरसागर में श्री विष्णु सो गए थे और चार महीने बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी को जगे थे। इन चार महीनों को चातुर्मास कहा जाता है जिसमें शुभ कार्य करना वर्जित है क्योंकि इस अवधि में ॠतु परिवर्तन के कारण कई जीवाणु उत्पन्न होते हैं और उनसे संक्रमण हो सकता है। इसलिए देवत्थान एकादशी को व्रत रख कर उसके बाद शुभ कर्म प्रारम्भ किए जाते हैं।

इन व्रतों और त्योहारों का रूप कुछ दिखावटी और भावहीन होता जा रहा है। विशेषकर लोक व्रतों का अनुष्ठान एक अनियोजित नगरीकरण के कारण धीरे-धीरे लुप्त हो रहा है। जहां अनुष्ठान हो भी रहा है वहां उनके प्रयोजन की पहचान और वह प्रयोजन जिस विश्व द़ृष्टि से जुड़ा हुआ है, उस विश्व द़ृष्टि की पहचान खोती जा रही है। इसलिए आवश्यक है कि उनके बारे में प्रामाणिक जानकारी प्रस्तुत की जाय और उस जानकारी के साथ-साथ उससे सम्बद्ध कहानियों, चित्रांकनों की भी जानकारी यथासम्भव दी जाए।

ये सांस्कृतिक प्रतीक काल की चेतना के साथ बदल जाते हैं। पर्व उसी तरह से चले आ रहे हैं पर उनका रूप बदलता जा रहा है। पहले पकवानों का आदान-प्रदान थाल भर-भर होता था। आज त्योहार खुशी के उतने नहीं, जितने खर्च की चिन्ता के प्रतीक बनते जा रहे हैं। खान-पान का रूप बदला है। समयाभाव तथा रुचि और उत्साह की कमी के कारण अब घर में न बना कर बाजार से खरीदा जाता है। परस्पर अवलम्बिता और परस्पर सौमनस्य की भावना एक झूठे अभिमान के नीचे दबती जा रही है। यह झूठा अभिमान कृत्रिम सम्पन्नता से आ रहा है। सम्पन्नता तो ठीक ही है पर मूल्यों को छोड़अकर सम्पन्नता अच्छी नहीं लगती। यह सम्पन्नता अन्त में भयावह हो जाती है। इसका एक द़ृष्टान्त आज का समाज है। जहां सम्पन्नता आई है पर मजहबी और जातीय सीमाओं को लांघ कर जो भाईचारा पनपता था वह मुरझा रहा है और परस्पर अविश्वास व विद्वेष पनप रहे हैं।

भारतीय पर्व-त्यौहार लोक में, समाज में रीति-रिवाजों के प्रति लगाव की कामना से आते हैं। घर का निर्माण करके उसको सुविधा-सुरुचिपूर्ण बना कर प्रसन्नता का आलोक भरने वालों की प्रशंसा में गाए जाने वाले ये गीत जीवन में उत्साह का संचार करते हैं।

यह आलोक पर्व भीतर बाहर सर्वत्र प्रकाश भरने के लिए आता है। यह याद दिलाता है कि असत्य का हर अंधेरा सत्य के छोटे-छोटे दीपकों के प्रकाश से भी छंट सकता है। आवश्यकता है सत्य के प्रकाश के संकल्प की, प्रयास के पहल की।

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