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उससे उन करोड़ों लोगों को स्वराज्य मिल सकेगा
जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त है?’

भारत को आज़ाद हुए एक लम्बा अरसा बीत चुका है। आज़ादी के साथ-साथ लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने की जिम्मेदारी भी देश के नवनिर्मित नेतृत्व के हाथों में आ पड़ी। उस समय देश के सामने दो रास्ते थे-एक अमेरिका का पूंजी केंद्रित मॉडल और दूसरा सोवियत रूस का समाजवादी मॉडल। लेकिन इससे पहले महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ही देश के भावी विकास के लिए एक अलग ही रास्ते की परिकल्पना पेश की थी। उनकी परिकल्पना में शासन और विकास का सूत्र गांवों से बंधा था। इसलिए उन्होंने ग्राम स्वराज्य का लक्ष्य रखा था। ग्राम-स्वराज्य अर्थात् आत्मनिर्भर और परस्पर सहयोगी विकास की व्यवस्था। यह स्पष्ट है कि उनकी यह अवधारणा ऐसी थी, जिसे आजकल सुशासन के नाम से जाना जाता है।
भारत ने इन सभी मॉडलों को ध्यान में रखते हुए बीच का एक रास्ता निकाला। कल्याणकारी राज्य होने की अपनी भावना के अनुरूप उसने मिश्रित अर्थव्यवस्था को अंगीकार किया। जिसमें निर्विवाद रूप से ‘सबसे कमजोर आदमी की हित-चिंता’ का खयाल रखा गया था, दूसरी ओर दुनिया के अन्य देशों के साथ कदम मिलाकर प्रगति के पथ पर चलने की आकांक्षा भी निहित थी।
हम यदि सुशासन जैसी व्यवस्था के बारे में सोचते हैं तो महात्मा गांधी की शासन व्यवस्था को लेकर जो उनका चिंतन था उसे जेहन में रखने की आवश्यकता है; क्योंकि गांधीजी ने सिर्फ शास्त्रीय विचार नहीं दिया बल्कि उसका व्यावहारिक पक्ष ज्यादा प्रबलता से रूपायित किया। आज गांव-गांव तक विकास की रोशनी पहुंचाने और शासन में स्थानीय भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए कई तरह की योजनाएं शुरू की गईं। परन्तु विकास और शासन में अच्छे तालमेल के अभाव में लक्ष्य तक पहुंचने की प्रक्रिया बहुत धीमी रही। सुशासन का तात्पर्य सिर्फ अच्छी शासन व्यवस्था से नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है कम से कम समय में ज्यादा-से-ज्यादा लाभ देश के अंतिम आदमी को मिल सके। इस व्यवस्था को प्राप्त करने के लिए तरह तरह से विचार किए जा रहे हैं और कार्यरूप प्रदान करने की कोशिश हो रही है। यही वजह है कि सुशासन का लक्ष्य आज भी महत्वपूर्ण बना हुआ है।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी गांधीजी ने लगातार रचनात्मक कार्यक्रमों का संचालन किया। उनका मानना था कि सिर्फ राजनीतिक स्वतंत्रता ही असल स्वतंत्रता नहीं हो सकती। लोगों को और समाज को आत्मनिर्भर होने के साथ-साथ दूसरे की सहायता करने में भी सक्षम होना चाहिए। गांधीजी सोचते थे कि कोई भी शासन व्यवस्था यदि भय और दंड पर ही आधारित होगी, तब वह सबको अपने हृदय और कार्यों द्वारा भी परस्पर जिम्मेदारी बोध करानी होगी। अपनत्व का यह भाव ही सच्चा स्वराज्य ला सकता है।
महात्मा गांधी के समाज और शासन व्यवस्था तथा जीवन को लेकर जो विचार थे, जिनका प्रतिपादन दैनिक साधन के माध्यम से गुजरते हुए किया था, जिसमें व्यावहारिकता का पक्ष प्रबल दिखाई पड़ता है। गांधीजी के सामने आज़ादी के बाद के भारत की तस्वीर साफ थी। सुशासन का उनके लिए क्या मतलब हो सकता था, उसे उनकी इस बात से समझा जा सकता है। वे कहते हैं- ‘मैं ऐसे भारत के लिए कोशिश करूंगा, जिसमें गरीब से गरीब आदमी भी यह महसूस करे कि यह उनका देश है, जिसके निर्माण में उसकी आवाज का महत्व है। मैं ऐसे भारत के लिए कोशिश करूंगा, जिसमें ऊंच-नीच का कोई भेद न हो। जातियां मिलजुल कर रहती हों। ऐसे भारत में अस्पृष्यता व शराब तथा नशीली चीजों के अनिष्टों के लिए कोई स्थान न होगा। उसमें स्त्रियों को पुरूषों के समान अधिकार मिलेंगे। सारी दुनिया से हमारा सम्बंध शांति और भाईचारे का होगा।’ स्पष्टत: महात्मा गांधी के सुशासन की अवधारणा सिर्फ कानून या पुलिस व्यवस्था तक सीमित नहीं थी। वह जितनी भौतिक उन्नति चाहते थे उतनी ही आत्मिक उन्नति भी। दोनों के मेल को वह स्वस्थ समाज के लिए आवश्यक मानते थे। यही वजह है कि उनका ईश्वर और कर्म दोनों ही में अटल विश्वास था।
गांधीजी के स्वराज्य की संकल्पना में ही बेहतर सुशासन का अर्थ निहित है। सबसे पहले गांधीजी के स्वराज्य का निहितार्थ समझें। उनकी दृष्टि में स्वराज्य का अर्थ है यह देश जितना किसी राजा का होगा उतना ही किसान का, जितना किसी धनवान जमींदार के लिए होगा उतना ही भूमिहीन के लिए, जितना हिन्दुओं के लिए होगा उतना ही मुसलमानों के लिए, अर्थात् बिना किसी भेदभाव के सबके लिए होगा। यही था गांधीजी के सुशासन का अभिप्राय।
दूसरी तरफ महात्मा गांधी के लिए स्वराज्य का मतलब था सत्ता का विकेन्द्रीकरण। सत्ता के केन्द्र में गांव स्थित है। जिसमें सबकी सहभागीता हो। गांव सबल बने। इसके लिए आवश्यक है गांवों को वह सारी सुविधा उपलब्ध हो जो आवश्यक है। जैसे- गांव में ग्राम पंचायत हो जहां सभी तरह के फैसले आपसी सद्भाव से किए जाएं; शिक्षा सबके लिए अनिवार्य हो, परन्तु शिक्षा का माध्यम स्थानीय भाषा रहे, बच्चों के लिए खेल-कूद का मैदान होना चाहिए, चिकित्सालय आदि सभी आवश्यकताओं की पूर्ति हो। गांधीजी इस तरह की व्यवस्था के लिए ही रामराज्य जैसे प्रतीकों का इस्तेमाल करते थे। उनका ‘रामराज्य’ जैसे प्रत्यय का सम्बंध धर्म से नहीं था। इस शब्द का निहितार्थ बहुत व्यापक है। रामराज्य का अर्थ भेदभाव विहीन समाज का निर्माण करना है। भयमुक्त अहिंसक वातावरण बने। समरस समाज बने। सरकार भी अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करे। शासक की भावना नहीं सेवक भाव से समाज के उत्थान का प्रयास हो। जनता सर्वोपरि है। गांधीजी ने कहा था, ‘जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा हो, उसकी शक्ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो वह, उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा। क्या उससे, उसे कुछ लाभ पहुंचेगा? क्या उससे, वह अपने ही जीवन और भाग्य पर कुछ काबू रख सकेगा, यानी क्या उससे उन करोड़ों लोगों को स्वराज्य मिल सकेगा, जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त है?’ कहना न होगा कि सुशासन की वह कल्पना गांधीजी की नजरों में अधूरी है जिसमें किसी का पेट न भर पाये और कोई सम्मान से वंचित हो।
आज सुशासन एक समकालीन विमर्श का विषय है। आज भी सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक क्षेत्र में लागू करने की कोशिश की जा रही है। भ्रष्टाचार, कुरीतियों, स्वच्छता, भूख मुक्ति, शिक्षा की बात हो इन तमाम मुद्दों को सुशासन के परिप्रेक्ष्य में देखा जाता है। इसमें रोजगार गारंटी की बात भी सम्मिलित है। इन सारे प्रयासों में आज गांधी जी के नाम और काम से जिन चीजों की व्यापक चर्चा हुई उसमें अहिंसा का प्रमुख स्थान है। इसलिए जब हम सुशासन की चर्चा करते हैं वहां दमन और दंड की कोई बात न हो।

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