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जिस दिन भारतीय मनीषा ने यह मंत्र देखा होगा वह कितना गरिमावान अवसर होगा। समठा मानवता के कल्याणार्थ ऋषियों ने इस त्रिपुटी को ध्यान की अनंत गहराइयों में देखा था, तब उनकी वाणी साधिकार सावक हो गयी और यह प्रस्फुटित हुआ-

’’असतो मा सदगमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय॥

मृत्योर्मामृतं गमयेति॥।’

इन सभी मंत्रों का निहितार्थ अंधकार से प्रकाश की ओर यात्रा ही है। अंधकार अजान है, एक नकारात्मक भाव है, माया है, माया अर्थात जो ’है’ नहीं पर ’है’ जैसी अनुभूति होती है। गोस्वामी तुलसीदासजी इसे ’’रज्जो यथा हे भ्रम:’’ (रस्सी में सांप की कल्पना) कहते हैं। अंधकार मृत्यु है, असत्य (मिथ्या) है।

प्रकाश दिव्य है, ज्ञान है, मोक्ष है, अमरत्व है, देव है। भाषा विज्ञान के स्तर पर भी यह शब्द अत्यंत मूल्यवान है। अंठोजी के ’डे’ ’डिवाइन’ भी इसी मूल के शब्द हैं। संस्कृत का दिन, दिवस, दीप, दिवा, दिव्य, देव, देवी इत्यादि का उच्चारिणक उत्स समान ही है।

प्रकाश में मूल ’काश’ ही है। ’प्र’ प्रकृष्ट है। अर्थात प्रकृष्ट उजाला। हमारे ऋषिगण इसी से कहते हैं-

’’काश्यां मरणान्मुक्ति:’’

ज्ञान (काशी) ही मोक्षप्रद है।

काशी को इसी कारण मोक्षपुरी कहते हैं कि वहां साक्षात ज्ञान (भगवान शिव) रहते हैं।

’’मुक्ति जन्म महि जानि, ज्ञान खानि अघ हानिकर।

जहं बस सम्धु भवानि, सो कासी सेइय कस न॥

-किष्किन्धाकाण्ड

भारत अनादि से ज्ञान का साधक रहा है। भारत शब्द भी ज्ञान में तल्लीनता का ही नाम है। भा (प्रकाश) आभा है। ’रत’ लीन होना। ’भारत’ ज्ञान में डूबना है। इसी कारण यह समठा भूभाग ही मोक्ष भूमि है। सारा भारत काशी है। तभी तो देवता भी इसके गीत गाते हैं-

’गायान्ति देवा: किल गीतकानि

धन्यास्तुते भारत भूमि भागे।’’      – श्री विष्णु पुराण (2.3.24)

भारत के इतर यह वसुन्धरा केवल भोग भूमि है। भारत कर्मभूमि है-

’’अत्रापि भारतं श्रेष्ठं जम्बुद्वीपे महामुने।

यतो हि कर्म भूरेषा ह्यतोडन्या भोगभूमय:॥

-श्री विष्णु पुराण (2.3.22)

समठा भारत उस प्रकाश की साधना में वर्ष भर अनेक उपाय करता रहता है। इसी क्रम में कार्तिक अमावस्या को दीपों की पंक्ति (अवली) या शृंखला सुसज्जित करते हैं। रातभर परा और अपरा विद्या की अधिष्ठात्री का स्तवन-पूजन करते हैं। उसी भवानी का एक रूप लक्ष्मी भी है। अपरा वही हैं।

’’विद्यासमरस्तास्तवदेवि भेद:

स्त्रिय: समस्ता: सकला जगतस्यु।’’

-(श्री मारकण्डेय पुराण)

निद्रा, लक्ष्मी, लज्जा, तुष्टि, पुष्टि आदि बीस रूपों में वह स्वयं भासमान हैं।

प्रकाश के इस महापर्व के पूर्व नरकासुर का वध होता है। और उसी दिन ज्ञानिनामठागण्य, भक्तराज, अतुलित बलधाम श्री हनुमानजी अवतीर्ण होते हैं।

’’ अश्विनास्यासिते पक्षे

भूतयां च महानिशि।

भौमवारेडज्जना देवी

हनुमन्तमजीजनत्॥’’ (व्रत रत्नाकर)

इस वर्ष (25 अक्टूबर सन्, 2011) तो बड़े सौभाग्य की बात है कि चतुर्दशी (हनुमज्जन्मपर्व) मंगलवार को ही है।

तिथि क्षय के कारण देवताओं के वैद्य भगवान धनवन्तरि का जन्म और गोवत्स द्वादशी एक ही दिन है। इसके पूर्व रम्भा एकादशी। पांच दिन तक पर्वों की यह शृंखला प्रकाश (मोक्ष) मार्गी ही हैं।

सुदूर श्रीलंका में लंकेश्वर रावण वध के बीस दिवस पश्चात् प्रभु श्रीराम कार्तिक अमावस्या को ही अयोध्या धाम पहुंचे थे। एक भंयकर युद्ध जीतने के बाद अयोध्या (जहां युद्ध नहीं होता है) पहुंचते हैं। अयोध्या इंद्रजीत है। युद्ध द्वंद्व है। अयोध्या इसी कारण मोक्षदायिनी है। वह अद्वैत है। वह निर्द्वंद्व है।

श्री भगवान श्री प्रकाश पर्व पर अयोध्या पधारते हैं। अतएव तीनों दृश्यमान (साक्षात भगवान अयोध्या और यह पर्व) मोक्षकारी हैं। तीनों प्रकाशित हैं। और चौथा उनका नाम (राम) तो अपदार्थिक (चिन्मय) मोक्षद है ही। इसी कारण योगीजन चारों को पुरुषार्थ प्राप्ति का दिव्य कारक मानते हैं।

’नाम, रूप, लीला और धाम।’’

मुंबई टाइम्स आफ इंडिया (18.4.2001) के अनुसार प्रभु श्रीराम 6 दिसंबर, 7292 ई. पू. अयोध्या लौटे थे।

महर्षि दयानंद सरस्वती का अविर्भाव, स्वामी रामतीर्थ का जन्मोत्सव और मरणोत्सव, महावीर स्वामी का महाप्रयाण और राष्ट्रर्षि दत्तोपंतजी ेंठेंगड़ी का जन्मोत्सव इस पावन ज्योति पर्व पर ही हुआ था।

’’जोतिहि जोति समानी’’

इस सन्तवाणी के अनुसार ज्योतिपर्व की परम ज्योति भारत और भारतवासी जन को ज्योतित करती रही।

भारतीय संस्कृति का प्रभाव समठा विश्व को आलोकित करता रहा है। अभी दो वर्ष पूर्व नागपुर में संपन्न हुए प्रकृतिपूजकों के एक वैश्विक सम्मेलन में हमने देखा कि विश्व के अधिकांश भाग में प्रकाश पर्व को मनाया जाता है। मैक्सिको, ग्वाटेमाला, पेरू, सेल्वाडोर, लिथुवानिया, कोस्टारिका, घाना, हंगरी, असीरिया, फिनिशिया आदि 32 देशों के प्रतिनिधि आये थे। सूर्य भगवान, अग्नि, जल और वायु देवता के पूजन में सब समान थे। यद्यपि सबकी भाषा भिन्न थी। पारसी समाज पूर्णत: अग्निपूजक है। जर्मनी के ड्रोइट्स भी धूमधाम से दीवाली मनाते हैं।

निशीथ (मध्यारात्रि) की महापूजा में महागौरी का स्तवन होता है। वाममार्गी कापालिक भी इस महानिशा को तंत्र साधाना के लिए अत्युपयुक्त मानते हैं। अवन्ती, काशी, तारापीठ, कामरूप और भद्रकाली उनके प्रमुख केंद्र रहे हैं।

शाक्त मतानुसार महालक्ष्मी और नासिक के इस श्री क्षेत्र की शक्ति महिषमर्दिनी और भ्रामरी हैं। अमावस्या के दिन इनका स्तवन काल 6.00 बजे से रात्रि 8.00 बजे तक है।

महालक्ष्मी पूजन के बाद घर-घर में श्रीराम चरितमानस के उत्तराखंड के प्रारंभ से दोहा 68 तक का परायण होता है। इसमें भगवान के अवधागमन और राज्याभिषेकादि की संपूर्ण चर्चा है।

कुछ समाज में आज के पावन अवसर पर द्युुत (क्रीड़ा) भी होती है। यह कुप्रथा क्यों चली समझ में नहीं आता है। कुछ थोड़ी दलील भी देते हैं कि जुआ में जीतने पर वर्ष भर लक्ष्मी का आगमन होता है। परंतु इसी तर्क के आधारानुसार उनका क्या जो हारते हैं? द्युत कर्म अत्यंत निषिद्ध है। भारत के सभी धर्म ठांथ इसकी निंदा करते हैं। इसमें अनर्थ और लोभ का निवास होता है, जो आचार और विचार दोनों को मलिन करते हैं। इसी कारण पाप की वृद्धि होती है। श्रीमदभागवत महापुराण के अनुसार इसमें कलियुग के समस्त दोषों का निवास होता है। अतएव किसी भी दशा में ताश पत्ता या अन्य किसी भी विधि द्वारा जुआ खेलना वर्जित होना चाहिए। और वह भी अमावस्या के पावन अवसर पर तो सपने में भी जुआ जैसा कुकर्म नहीं होना चाहिए।

यह भगवान के अयोध्या आगमन का पर्व है। इसमें तो हम सभी को अपना हृदय अयोध्या बनाना है कि प्रभु राम आ सकें। हृदय को द्वन्द्वातीत बनाना है। जुआ तो लोभ बढ़ाता है, वह हृदय को इन्द्रातीत कैसे होने देगा? अयोध्या प्रभु राम को इतना प्रिय है कि उसे पाने के लिए स्वर्णमयी लंका छोड़ देते हैं। यह दैविक, दैहिक और भौतिक तीनों तापों का नाश करती है। इस भूमि को श्रीराम भी प्रणाम करते हैं। अतएव हमें अपना मानस अयोध्या बनाना है, जहां रामजी आ सकें। इसके लिए यह दीपावली बड़ा पवित्र अवसर है।

सच पूछिए तो त्योहारों का असली आनंद तो बच्चों को ही मिलता है। और दीपावली जैसा प्रमुख पर्व हो तो बात ही क्या? परंतु जरा सावधानी भी अपेक्षित है। पटाखों और फुलझड़ियों के धुएं और ध्वनि दोनों हमारे लिए हानिकर है। एक से फेफड़े संबंधी अनेक विधि रोग और दूसरे से ध्वनि प्रदूषण भी होता है। अतएव इनका प्रयोग मर्यादित हो। सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए। वरिष्ठ अभिभावकों की उपस्थिति में ही पटाखे आदि छोड़ें।

अंतत: पवित्र दीपों से हम प्रार्थना करते हैं कि वे हमारे परिवार, समाज और राष्ट्र का सदैव कल्याण करें, सुख संपत्ति से भरें, सबको निरोग रखें और हमारे भीतर जो द्वेष (शत्रबुद्धि) हो उसको समाप्त करें।

’’शुभं करोति कल्याणं

आरोग्यं सुख सम्पदाम्।

शत्रु बुद्धि विनाशाय

दीपज्योति नमोस्तुते।

————–                                                                                                               -गजेंद्र मालवीय

 

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