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केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने पिछले दो वर्षों में महिलाओं एवं बच्चों के स्वास्थ्य सुधार के लिए भरसक कदम तो उठाए ही हैं, आम जनों को स्वास्थ्य सुविधाएं एवं रियाती दवाएं उपलब्ध कराने के लिए भी कई कदम उठाए हैं। कैंसर, हृदयरोग, मधुमेह, काला ज्वर, चेचक, पेचीश आदि बीमारियों को दूर करने के लिए देशभर में व्यापक अभियान चलाया गया और उसे सफलता भी मिली। मेडिकल शिक्षा को तवज्जो दी जा रही है और नए कॉलेज स्थापित हुए हैं। ई-पहल ने स्वास्थ्य सेवाओं में क्रांति ला दी है। इन योजनाओं का संक्षिप्त विवरण यहां प्रस्तुत है।

बाल कल्याण योजनाएं

इंद्रधनुषः यह योजना २५ दिसम्बर २०१४ को आरंभ की गई। इसमें पेचीश, कूकर खांसी, धनुर्वात, क्षय, पोलियो, हेपेटाइटिस बी, चेचक इन सात बीमारियों से सुरक्षा के लिए टीकाकरण किया गया। २०२० तक सम्पूर्ण टीकाकरण का लक्ष्य रखा गया है। इसके अंतर्गत नियमित टीकाकरण के दौरा छूट गए बच्चों को शामिल किया गया है। प्रथम चरण में २८ राज्यों के २०१ जिले और द्वितीय चरण में ३४ राज्यों के ३५२ जिले इसमें शामिल किए गए हैं। इस अभियान के तहत ३० बच्चों का पूरा टीकाकरण किया गया और ३८ लाख गर्भवती महिलाओं को धनुर्वात का टीका लगवाया गया। इससे देश में टीकाकरण में ५-७% की वृद्धि दर्ज हुई है। पैतृक एवं शिशु धनुर्वात के खात्मे के लिए योजना शुरू की गई है। धनुर्वात से हर साल देश में करीब ९ लाख मौतें होती हैं। इस अभियान में सभी राज्यों एवं केंद्रशासित राज्यों को शामिल किया गया। वैश्विक लक्ष्य के पूर्व ही देश में दिसम्बर २०१५ में लक्ष्य पूरा किया गया।
शिशु मृत्यु दर घटाने की योजनाः भारत में प्रति वर्ष लगभग ७.५ लाख नवजात शिशुओं की मौत होती है। इसे दो-तिहाई कम करने के लिए सितम्बर २०१४ में अभियान आरंभ किया गया। समयपूर्व प्रसव होने वाले शिशुओं की मृत्यु दर कम करने के लिए विभिन्न दवाओं को मुहैया कराया गया। सभी नवजात को विटामिन के का इंजेक्शन उसी स्थान पर दिया जाएगा।
रिप्राडक्टिव मैटर्नल चाइल्ड हेल्थ एण्ड एडोलसेंस हेल्थः इस योजना के अंतर्गत किशारों को भी शामिल किया गया। राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य योजना २०१४ में आरंभ की गई। जन्म के समय की गड़बड़ियों, बीमारियों, कमियों को समय पर पता लगाने से उन पर नियंत्रण किया जा सकता है। इसके लिए खंड स्तर पर परीक्षण मोबाइल वाहन की योजना शुरू की गई। २०१५-१६ में कोई ११.४ करोड़ बच्चों का परीक्षण किया गया।
नए टीकेः देश की पोलियोमुक्त स्थिति को कायम रखने के लिए नया टीका लगवाया गया। ७ लाख डोजेस वितरित किए गए। वयस्कों के लिए मस्तिष्क ज्वर पर जापानी टीका लगवाया गया। असम, उप्र एवं प.बंगाल के पीड़ित जिलों में ३ करोड़ लोगों को यह टीका लगाया गया। हिमाचल प्रदेश, ओडिशा, हरियाणा एवं आंध्र में रोटावायरस टीका लगवाने की योजना मार्च २०१६ में शुरू की गई। भारत मे इन बीमारियों से हर वर्ष ८० हजार बच्चों की मौत होती है और करीब १० लाख पीड़ित होते हैं। इस टीके से इसका निवारण होगा। चेचक एवं रूबेला बीमारियों की रोकथाम के लिए नया टीका प्रस्तुत किया जा रहा है। यह टीका ९ माह एवं १६-२४ माह की उम्र में दो बार दिया जाएगा। न्यूमोनिया पर नियंत्रण के लिए भी नया टीका प्रस्तुत करने की योजना है।

परिवार कल्याण

परिवार नियोजनः चयन के लिए इंजेक्शन डीएमपीए, पीओपी की सुविधा उपलब्ध की गई। परिवार नियोजन के अन्य साधनों की पैकेजिंग में सुधार किया गया। नए लोगो के साथ परिवार नियोजन का अभियान व्यापक स्तर पर चलाया गया। उत्तर प्रदेश एवं बिहार में निजी क्षेत्र की सहभागिता के लिए नई योजना जारी की गई। २०१४-१५ में ५,९०,२१७ एवं २०१५-१६ में दिसम्बर २०१५ तक ६,८१,१४७ पीपीआईयूसीडी लगाए गए।
पेचीश नियंत्रण पखवाड़ाः २७ जुलाई से ८ अगस्त २०१५ पेचीश नियंत्रण पखवाड़ा मनाया गया और ओआरएस, जिंक गोलियां वितरित की गई एवं पेचीश के दौरान बच्चों के उचित पोषण प्रणालियों को प्रचारित किया गया। इस अभियान के दौरान ६.६ करोड़ घरों में ओआरएस का वितरण किया गया और ३६.३ लाख बच्चों की ओआरएस एवं जिंक दवाएं बांट कर चिकित्सा की गई। ३.४ लाख दवा वितरण केंद्रों को कायम किया गया।
राष्ट्रीय कृमिनाशक दिनः फरवरी २०१५ में जनजागरण के लिए यह दिन मनाया गया। फरवरी २०१६ में ३० राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में इस दिन के अवसर पर २०.१६ करोड़ बच्चों को कृमिनाशक दवा अलबेंडाझॉल दी गई।
कायाकल्पः स्वच्छता एवं संक्रमण नियंत्रण को प्रोत्साहन देने के लिए पुरस्कार की स्थापना की गई। पहला पुरस्कार मार्च २०१६ में प्रदान किया गया। पीजीआईएमइर्-आर चंडीगड़ को ५ करोड़ का पहला पुरस्कार प्रदान किया गया। २०१५-१६ से इस योजना को केंद्रीय एवं जिला अस्पलालों में लागू किया गया। कायाकल्प पुरस्कार प्राप्त लोगों का १६ मार्च २०१६ को सम्मान किया गया। २०१६-१७ में इसे अन्य स्वास्थ्य केंद्रों में लागू किया गया है।

राष्ट्रीय शहर स्वास्थ्य मिशन

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में वर्तमान सेवाओं को मजबूत कर वंचितों के लिए नई सेवाओं को प्रदान करने के लिए कार्य किया गया। इसके अंतर्गत ९९३ शहरों और कस्बों को शामिल किया गया है। शहरी क्षेत्रों के ४३२५ केंद्रों में संरचनात्मक, उपकरणों एवं कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने को मंजूरी दी गई। ७६२ नए पीयूपीएचसी एवं शहरी क्षेत्रों में ५१ नए सीएचसी के निर्माण का मंजूरी दी गई। इसके तहत २७६३ चिकित्सा अधिकारियों, १८,५६२ सहायकों, ६५९७ परिचारिकाओं, ३५०३ फार्मासिस्टों एवं ३८७५ लैब टेक्निशियनों के पदों को मंजूरी दी गई। झुग्गी झोपड़ियों में ६२,८०३ एएसएच को मंजूरी प्रदान की गई।

मिशन की अन्य उपलब्धियों में हैं- १८४ उच्च प्राथमिकता वाले जिलों के स्वास्थ्य केंद्रों को ३०% अधिक वित्तीय सहायता, हर राज्य में कम्पोजिट हेल्थ इंडेक्स के आधार पर सब से कमजोर २५% केंद्रों को उच्च प्राथमिकता जिला माना गया। जिन जिलों में यह सूचकांक ५०% से कम हैं ऐसे वनवासी जिलों को भी इसमें शामिल किया गया है। लगभग २.३ लाख कर्मचारियों को बढ़ाया गया। ३०,७५० नए निर्माणों एवं ३२,८४७ नवीनीकरण परियोजनाओं को मंजूरी दी गई। ६०२ रुग्ण नवजात चिकित्सा इकाइयों, २,२२८ नवजात शिशु स्थिरीकरण इकाइयों और १६,९६८ नवजात केयर काउंटरों की स्थापना की गई। ६७२ जिलों में से ३३१ जिलों में मोबाइल यूनिट चल रहे हैं। राष्ट्रीय एम्बूलेंस सेवा शुरू की गई। १०८/१०४/१०२ नम्बरों पर कॉल कर ३१ जिलों में एम्बूलेंस सेवा प्राप्त की जा सकती है। १६ हजार से अधिक एम्बूलेंस को सहायता दी गई है। ११,६०० से अधिक स्वास्थ्य केंद्रों में आयुष सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। स्वास्थ्य संस्थानों में २९,०६३ रोगी कल्याण समितियां एवं ४.९९ लाख ग्राम स्वास्थ्य स्वच्छता एवं पोषण समितियों का गठन किया गया है।

संशोधित टीबी नियंत्रण कार्यक्रम

टीबी-एचआईवी से पीड़ित रुग्णों के लिए एकल खिड़की सेवाएं शुरू की गईं। टीबी दवाओं के प्रतिरोध का पता लगाने के लिए राष्ट्रीय दवा प्रतिरोध सर्वेक्षण किया गया, जो विश्व में सब से बड़ा सर्वेक्षण है। दवा-प्रतिरोधक टीबी का पता लगाने के लिए ५०० सीबीनैट मशीनें लगाई गईं। नई टीबी विरोधी दवा बेंडाक्विलाइन उपलब्ध की गई। संशोधित दिशानिर्देश जारी किए गए। स्वास्थ्य सेवकों की निगरानी के लिए प्रावधान किया गया।
इस कार्यक्रम के अंतर्गत टीबी के ९० लाख आशंकित रोगियों के थूक की जांच की गई। १४ लाख रोगियों का इलाज किया गया। ३.५ लाख दवा-प्रतिरोधी रुग्णों का डीएसटी के जरिए इलाज किया गया। २७,००० दवा-प्रतिरोगी रुग्णों की नई दवाओं से चिकित्सा की गई। ७९% टीबी रुग्ण एचआईवी बाधित पाए गए। ९२% एचआईवी रुग्णों की एआरटी दवाओं से चिकित्सा की गई। ९३% एचआईवी रुग्णों को सीपीटी दवाएं दी गईं। निजी क्षेत्र ने १.८४ लाख टीबी रुग्णों की सूचना दी, जो कि पूर्व वर्ष से १०% ज्यादा है। संशोधित टीबी नियंत्रण कार्यक्रम से २५,००० अतिरिक्त लोगों की जान बचाई जा सकी। इस कार्यक्रम के कारण प्रति लाख जनसंख्या पर २११ रुग्णों की संख्या घट कर १९५ हो गई। मृत्यु दर प्रति लाख १९ से घट कर १७ हो गई।

राष्ट्रीय रोग संक्रमण नियंत्रण कार्यक्रम

परजीवियों से संक्रमित होने वाले रोगों के नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम आरंभ किया गया। मलेरिया उन्मूलन के लिए ११ फरवरी २०१६ को राष्ट्रीय संरचना की घोषणा की गई। राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों से कहा गया कि वे मलेरिया को अधिसूचित करने वाली बीमारी घोषित करें। मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम को चलाने के लिए दिशानिर्देश तैयार किए गए। बिहार, झारखंड, प.बंगाल एवं उत्तर प्रदेश में काला-आजार संक्रामक बीमारी है। इसे रोकने के लिए विकास खंड स्तर पर हर दस हजार जनसंख्या पर रोगियों की संख्या १% तक लाने का प्रयास है। २०१५-१६ में संक्रमित ६२५ खंडों में से ५०२ खंडों में इस बीमारी का उन्मूलन हुआ। चिकित्सा के लिए एकल इंजेक्शन की व्यवस्था की गई। डेंग्यू एवं चिकनगुनिया की रोकथाम के लिए जांच करने वाले अस्पतालों की संख्या १७० से बढ़ा कर ५२१ की गई। इससे मृत्यु दर को सीमित रखा जा सका।

जापानी मस्तिष्क ज्वर के निदान के लिए केंद्रों की संख्या २००६ के ५१ से बढ़ा कर २०१५ में १२१ कर दी गई। असम, उत्तर प्रदेश एवं प.बंगाल में वयस्कों के टीकाकरण का कार्यक्रम चलाया गया। हाथीपांव रोग (फाइलेरिया) की रोकथाम के लिए सामूहिक दवा वितरण २००४ के ७३% से बढ़ कर २०१५ में ८८% हो गया। कुल माइक्रोफाइलेरिया दर २००४ के १.२४% से घट कर २०१५ में ०.४% तक रह गई। २५५ पीड़ित जिलों में कुल दर १% से भी कम हो गई। इंडियन मेडिकल कौंसिल के जरिए हाथीपांव रोग उन्मूलन का मूल्यांकन किया गया। मार्च २०१६ में लक्षित ११८ जिलों में से ७२ का सर्वेक्षण पूरा हो चुका था और शेष का सर्वेक्षण जारी था।

राष्ट्रीय मुख स्वास्थ्य कार्यक्रम

२८ राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में यह कार्यक्रम चल रहा है। अब तक १२० दंत इकाइयों (आंशिक/पूर्ण) को मंजूरी प्रदान की गई है। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर कार्यशाला का आयोजन किया गया, ताकि राज्यों में इस पर ठीक से अमल हो सके। २० मार्च २०१६ को मुख स्वास्थ्य दिवस मनाया गया।

मेडिकल शिक्षा

१८ नए मेडिकल कॉलेजों को मंजूरी दी गई, जिनमें ७ निजी एवं ११ सरकारी मेडिकल कॉलेज हैं। एमबीबीएस सीटें २७९ एवं स्नातकोत्तर सीटें ५०४ से बढ़ाई गईं। १४,७९२ एमबीबीएस सीटों को पुनः स्थापित किया गया। नए मेडिकल कॉलेजों को वर्तमान जिला अस्पतालों से संलग्न किया गया। लगभग सभी राज्यों से ५८ प्रस्ताव आए। ४७ प्रस्तावों को अब तक मंजूरी दी गई। इन पर ८८८३ करोड़ रु. की लागत आएगी, जिसमें केंद्र का हिस्सा ५६७० करोड़ रु. का है। इससे ४७०० नई एमबीबीएस की सीटें स्थापित होंगी। अब तक ३८ मेडिकल कॉलेजों को ६६० करोड़ रु. का निधि उपलब्ध किया गया। ४ मेडिकल कॉलेज पूर्वोत्तर राज्यों में होंगे।
राज्य सरकारों के वर्तमान मेडिकल कॉलेजों में उच्च श्रेणीकरण के कारण १७६५ नई एमबीबीएस सीटें उपलब्ध होंगी। वर्ष २०१५-१६ के दौरान २२ मेडिकल कॉलेजों को ५० करोड़ रु. उपलब्ध कराए गए। इस योजना पर कुल लागत २११८ करोड़ रु. की होगी, जिसमें केंद्र का हिस्सा १५८८.५० करोड़ रु. का होगा। कुल २२ मेडिकल कॉलेजों को अब तक १७६५ सीटों को मंजूरी दी गई।

नर्सिंग

भारतीय परिचारिकाओं का राष्ट्रीय रजिस्टर बनाया जाएगा। राष्ट्रीय नर्सिंग एवं मिडवाइफरी पोर्टल आरंभ किया गया है। एएनएम एवं जीएनएम स्कूलों की स्थापना के लिए १३६.९३ करोड़ रु. जारी किए गए। नर्सिंग स्कीम निगरानी साफ्टवेयर स्थापित किया गया। ४४३ नई नर्सिंग संस्थाएं स्थापित की जाएंगी। दो वर्षों में अतिरिक्त २०,००० सीटें सृजित की गईं।

अस्पतालों की सहायता

इस योजना के अंतर्गत ३७८८ करोड़ रु. व्यय किए गए हैं। अगले तीन वर्षों में अतिरिक्त ६३२० बिस्तरों की व्यवस्था होगी। इसमें देश के शीर्ष अस्पताल शामिल हैं। योजना के तहत नई संरचना स्थापित की गई, अतिरिक्त विभाग खोले गए, अध्यापन की सुविधाएं बढ़ाई गईं, एएमआरआईटी स्टोर खोले गए, स्वच्छता की कायाकल्प योजना लागू की गई और स्वचालन व्यवस्था को बढ़ावा दिया गया। इससे रुग्णों को बेहतर सेवाएं उपलब्ध होंगी।

इस योजना में बाह्य रुग्ण विभाग ५७३ करोड़ रु., नए प्राइवेट वार्डों पर ८२.०४ करोड़ रु., माता व शिशु कल्याण के लिए २०४.४४ करोड़ रु., राष्ट्रीय कैंसर इंस्टीट्यूट पर ५०५ करोड़ रु., जलने से पीड़ितों के लिए ३९०० इकाइयों की स्थापना के नए कार्य हाथ में लिए गए हैं। रूमेटालॉजी, बायो-टेक्नालॉजी, प्लास्टिक सर्जरी के नए विभाग जोड़े गए हैं। मरीजों के पंजीयन आसान एवं स्वयंचालित प्रणाली विकसित की गई है। देश के विभिन्न बड़े अस्पतालों में सुधार के विभिन्न कार्य चल रहे हैं।
प्रधान मंत्री स्वास्थ्य सेवा योजना के तहत ६ नए एम्स अस्पताल कार्यरत हो गए हैं। २०१४-१५ की तुलना में २०१५-१६ में इन पर खर्च ८४% हुआ है। मंत्रिमंडल ने आंध्र के गुंटुर जिले में मंगलागिरी, महाराष्ट्र के नागपुर एवं प.बंगाल के कल्याणी में ३ नए एम्स को मंजूरी दी है। पंजाब एवं असम में २ स्थानों को अंतिम रूप दिया गया है। ६ स्थानों पर निर्णय की प्रक्रिया चल रही है। इस योजना पर दो वर्षों में २३३३ करोड़ रु. से अधिक का व्यय हो चुका है। सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों के उच्च श्रेणीकरण के लिए तीन चरणों की योजना बनाई जा चुकी है और इस पर काम चल रहा है।

कैंसर, मधुमेह, हृद्रोग नियंत्रण (एनसीडी)

कैंसर, मधुमेह, हृदयरोग एवं हृदयाघात के निवारण एवं नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम आरंभ किया गया है। १९५ जिलों में एनसीडी प्रकोष्ठ एवं २०१ जलों में एनसीडी चिकित्सा केंद्रों की स्थापना की गई है। योजना के अंतर्गत ६५ कार्डियाक केयर यूनिटों, ८१ डे केयर केंद्रों एवं १३६२ सीएचसी केंद्रों की स्थापना की गई है। आयुष सुविधाएं एवं योग का समन्वय किया गया है। मधुमेह पर योग के प्रभाव का आकलन करने के लिए वैज्ञानिक अध्ययन का काम एस वैश्य विश्वविद्यालय एवं एचएलएल को सौंपा गया है।

एनसीडी योजना के अंतर्गत गैर-गर्भवती ३० से ६० वर्ष की आयु की महिलाओं वार्षिक रूप से स्तन कैंसर, गर्भाशय एवं मुख कैंसर, मधुमेह, उच्च रक्तदाब, टीबी, मलेरिया, मोतियाबिंद, थायराइड, लौह की कमी आदि बीमारियों के जांच की जाएगी। आयुष मेडिकल अधिकारी आंगनवाडी केंद्रों/पंचायत भवनों के उपकेंद्रों में यह जांच करेंगे। आशा कार्यकर्ता महिलाओं को जागरूक एवं एकत्रित करने का कार्य करेंगी।

राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण कार्यक्रम

इस कार्यक्रम को पूरी तरह लागू कर दिया गया है। राज्य स्तरीय संगठन स्थापित करने का काम चल रहा है। चौबीसों घंटे चलने वाला कॉल सेंटर स्थापित किया जा चुका है। वेबसाइट भी कार्यरत है। अंग दान करने वालों का ऑन-लाइन पंजीयन एवं अस्पतालों के ऑन-लाइन पंजीयन की व्यवस्था की गई है। राष्ट्रीय अंग प्रत्यारोपण दिन १३ अगस्त को मनाया जाएगा।
अमृत योजनाः अमृत योजना का पूरा नाम है- एफोर्डेबल मेडिसिन एण्ड रिलायबल इम्प्लांट्स फॉर ट्रीटमेंट। इस योजना के तहत कैंसर एवं हृदयरोग की दवाएं तथा इम्प्लांट्स ९०% की छूट पर उपलब्ध होंगे। १४ केंद्रीय सरकारी अस्पतालों में लागू की गई है।
ट्रामा सेंटरः १५७ ट्रामा सेंटरों को मंजूरी दी गई। ९९ का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है। ५७ कार्यरत हो चुके हैं। इसी तरह जलने से पीड़ित लोगों के लिए ८६ नए केंदों को मंजूरी दी गई है।
तम्बाकू नियंत्रणः ९ राज्यों ने सिगरेटों की खुली बिक्री पर प्रतिबंध लगाया है। १२ राज्यों ने तम्बाकू के धूम्ररहित सभी प्रकारों पर पाबंदी लगाई है। राष्ट्रीय टोल-फ्री हेल्पलाइन शुरू की गई है।
मानसिक स्वास्थ्यः यह योजना २४१ जिलों में लागू की गई। ११ सीओई एवं २७ पीजी विभाग स्थापित किए गए। वर्तमान वित्त वर्ष में इसमें और बढ़ोत्तरी के प्रयास किए जा रहे हैं।
वृद्ध जन योजनाः वृद्ध जनों के लिए नई दिल्ली के एम्स एवं चेन्नई के मद्रास मेडिकल कॉलेज में दो राष्ट्रीय केंद्र स्थापित किए गए। पांच नए केंद्रों की स्थापना की जा रही है।
दवा नियमनः इसी तरह दवाओं एवं खाद्यान्नों के नियम के लिए भी कई कदम उठाए गए हैं।

ई-पहल

स्वास्थ्य सेवाओं को ई-पहल के जरिए उपलब्ध करने की योजना कार्यान्वित की गई है। इंटरनेट आधारित नेशनल मेडिकल कॉलेज नेटवर्क, नेशनल हेल्थ पोर्टल, ई-रक्तकोष, ई-अस्पताल, गर्भवती महिलाओं की जांच आदि के लिए नाम आधारित एमसीटीएस, टेली एविडेंस, सुगम आदि सुविधाएं कायम की गई हैं। टेलीफोन/मोबाइल से टीबी के लिए मिस्ड कॉल, मोबाइल अकादमी, किलकारी, इंडिया फाइट्स डेंग्यू, स्वस्थ भारत, एम-सेसेशन फॉर टोबैको आदि एप एप्लीकेशन भी विकसित किए गए हैं।

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