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दोष लडकियों के पहनावे में नहीं मर्दों की नजरों में हैं। पाबंदी तो पुरूषों की विकृत सोच एवं वहशी नजरिये पर लगनी चाहिए। जिस दिन समाज का हर एक मर्द अपने अंदर के जानवर पर पाबंदी लगा देगा, उस दिन महिलाओं के फैशन पर पाबंदी का मुद्दा ही खत्म हो जाएगा।

नीले आसमान में उड़ रहे जिस जहाज को लड़कियां कुछ समय पहले तक जमीन पर खड़ी होकर एक टक निहारती थीं आज उसी आसमान में उड़ रहे, उसी जहाज की वह पायलट बन चुकी है। जिस चांद से उनकी खूबसूरती की तुलना की जाती थी, आज वह उस चांद पर भी कदम रख कर लोट चुकी हैं। अपनी अस्मिता की सुरक्षा के लिए वह जिन ऊंचे पदों के सुरक्षा अधिकारियों एवं न्यायधीशों से गुहार लगाती थी, आज वह स्वयं उन्हीं पदों पर कार्यरत हैं।

महिलाएं चाहे कितनी भी उन्नति क्यों ना कर लें, कितनी ही आगे क्यों ना निकल जाए, लेकिन यह पुरुष प्रधान समाज हमेशा उन्हें कम ही आकता है और जब उनसे यह हकीकत स्वीकार नहीं की जाती तब वह महिलाओं के पैरों में बेड़ियां डाल उन्हें पीछे खींचने की कोशिश करते हैं।

औरतों के पहनावे को लेकर लोगों की नजरों में कल भी प्रश्नचिह्न था और आज भी प्रश्नचिह्न है। आज हमारे पहनावे और फैशन पर पाबंदी लगाई जा रही है। उसे सकारात्मकता और नकारात्मकता के तराजू में तौला जा रहा है। आज हमारे भारत में 80% ऐसी लड़कियां हैं जो कभी ना कभी अपनी सीधे सादे कपड़ों को भी लेकर अपने माता-पिता द्वारा टोकी की गई हैं। हमारे यहां तो स्थिति ऐसी है कि लड़कियों को कपड़े क्या, कपड़ों के रंग तक को पसंद करने में टोका जाता है। यह रंग तुम पर खिलेगा नहीं, तुम काली हो, यह तुम पर गाढ़ा लगेगा, तुम गोरी हो ऐसे रंग के कपड़े पहनोगी तो जल्दी ही लोगों की नजरों में आ जाओगी वगैराह-वगैराह।

ऐसी ही सोच धीरे-धीरे विकसित होती जाती हैं और एक संकीर्ण मानसिकता का जन्म होता है, जो आगे चलकर फतवों का रूप धारण कर लेती है। आज से दो वर्ष पूर्व हरियाणा की खाप पंचायतों ने कई फतवे जारी किए कि लड़कियां जींस-टॉप नहीं पहनेंगी, फोन का इस्तेमाल नहीं करेंगी, मोबाइल फोन के कारण ही लड़कियां भटकती जा रही हैं और घर से भागकर परिवार वालों की इज्जत मिट्टी में मिला देती है। इसी प्रकार कॉलेज एवं स्कूलों में भी बड़े-बड़े पर्चे लगाए गए कि, जो लड़कियां जींस, टॉप और हील पहनेंगी उन पर रहम नहीं किया जाएगा। कॉलेज में ऐसी हरकतें किसने की, इन पर्चियों को किसने चिपकाया, इस बात का कुछ खास पता नहीं चला। लेकिन इस मामले को मीडिया ने हाथों-हाथ लेकर खूब प्राइम टाइम में चलाया।

इसका नतीजा यह निकला कि वर्ष 2018 में हरियाणा की बेटी मानुषी छिल्लर सभी फतवों को फतह कर विश्व सुंदरी बनी। अगर मनुषी के माता-पिता ने भी इन फतवों के कारण उनके फैशन, आजादी एवं आगे बढ़ने की चाह पर पाबंदी लगा दी होती तो क्या वह इस मुकाम को हासिल कर पाती? आधुनिक समाज के साथ चलने के लिए अपनी सोच और पहनावे में बदलाव करना बहुत जरूरी है। अगर मानुषी रैंप पर बैकलेस, गाउन, मिनी स्कर्ट और बिकनी की जगह चार हाथ का घूंघट लेकर रैंप वॉक करती तो क्या वह इस मुकाम को पा सकती? बिल्कुल भी नहीं। सफलता पाने के लिए लिबास और फैशन में  बदलाव तो लाना ही होगा। मिनी स्कर्ट, बैकलेस और बिकनी जैसे कपड़े आज से ही नहीं बल्कि कई दशकों से चलन में है और इन्हीं कपड़ों को पहनकर भारतीय नारियों ने सौंदर्य प्रतियोगिताओं के माध्यम से संपूर्ण विश्व के समक्ष अपनी खूबसूरती का लोहा मनवाया है। सत्यम् शिवम् सुंदरम् 19वीं सदी की फिल्म थी। जिसकी नायिका जीनतअमान ने  ऐसी गांव की लड़की का किरदार निभाया था जो गरीब एवं बदसूरत होने के बावजूद भी काफी तंग कपड़े पहनती थी। इस फिल्म में उनके पहनावे को लेकर काफी शोरशराबा हुआ। लेकिन इन सबके बावजूद भी यह एक सुपरहिट फिल्म बनी। जिसकी गिनती आज तक मशहूर फिल्मों में होती है।

समाज के दूषित मानसिकता वाले लोगों का काम है फतवे जारी कर महिलाओं की सफलता के रास्ते का पत्थर बनना। फतवों को जारी करने का उद्देश्य ही होता है लड़कियों एवं उनके माता-पिता के मन में डर पैदा करना। हम जब तक डरते रहेंगे यह हमें एक पर एक फतवे जारी कर कर डराते रहेंगे। एक कहावत है जब हाथी चले बाजार तो कुत्ते भोंके हजार, उसी प्रकार हमें इन फतवों से बेपरवाह होकर बस अपनी सफलता के रास्ते पर अग्रसर होकर चलते रहना है।

अभी कुछ समय पहले सऊदी अरब में एक फैशन शो हुआ था। यह फैशन शो ‘घोस्ट शो’ होने के कारण काफी सुर्खियों में रहा। अब आप इस सोच के दोराहे पर होंगे कि यह फैशन शो से ‘घोस्ट शो’ कैसे बन गया? क्या यहां के दर्शक भूत थे? या फिर इस शो के संचालक? अब मैं आपको बताती हूं कि यह फैशन शो ‘घोस्ट शो’ कैसे बन गया। इस शो में मॉडल्स कपड़े पहनकर रैंप पर नहीं उतरीं बल्कि उनकी-जगह ड्रोन कपड़ों को लेकर स्टेज पर उड़ रहे थे। इस हरकत के कारण पूरी दुनिया में सऊदी अरब का खूब मजाक उड़ाया गया। सोशल मीडिया पर इस हरकत की जमकर निंदा हुई। लोगों ने यहां तक कह दिया कि सऊदी अरब में महिलाओं से ज्यादा आजादी और इज्जत ड्रोन्स को मिलती है।

महाराष्ट्र में पहले नौ गज की साड़ियां पहनी जाती थीं। एक तो इस साड़ी की लंबाई और उससे पहनने का तरीका- इन दोनों के बारे में कभी-कभी सोचती हूं तो लगता है कितना जटिल होता होगा इस साड़ी को पहनना और फिर उसे संभालना। एक बात मुझे बार-बार रह रहकर बेचैन करती है कि इस नौ गज की साड़ी को पहनकर नित्यक्रिया करना कितना जटिल होता होगा अर्थात अगर कोई महिला अपने मानसिक धर्म या पेट खराब होने की समस्या से गुजर रही हो तो उनके लिए इस साड़ी को बार-बार खोलना या पहनना कितना जटिल होता होगा।

बिहार और राजस्थान में पर्दा प्रथा के कारण महिलाओं की स्थिति कुछ इसी प्रकार दयनीय थी। शादी होते ही महिलाओं के चेहरे पर चार हाथ का घूंघट डाल दिया जाता था। नया घर, नई जगह और चेहरे पर चार हाथ का घूंघट। चेहरे पर इस घूंघट के रहने के कारण चारों तरफ अंधेरा छाया रहता था। एक-एक कदम फूंक-फूंक कर उठाना पड़ता था, जहां सावधानी हटी वही दुर्घटना बाहें खोलकर आप पर टूट पड़ी।

इसी प्रकार मुस्लिम महिलाओं को भी बुर्के में कैद करके रखा गया ताकि उनकी इज्जत पर कोई खतरा ना मंडराए। कभी-कभी मुझे लोगों की मानसिकता पर आश्चर्य भी होता है और हंसी भी आती है। महिला बुर्का पहनकर अपनी इज्जत की तो हिफ़ाज़त कर सकती है; लेकिन जब एक पुरुष सड़कों पर चार-चार बीवियों को लेकर निकलता है, तब क्या वह अकेला पुरुष उन चार महिलाओं की आबरू की हिफाज़त कर पाएगा? नहीं….बिल्कुल भी नहीं। पहनावे से जुर्म को नहीं बल्कि नजरिए से जुर्म को नियंत्रित किया जा सकता है। आज से 70 साल पहले की बात की जाए तो पति की मृत्यु के बाद पत्नी से उसकी खूबसूरती ही छीन ली जाती थी। मांग और गले से सिंदूर एवं मंगलसूत्र तो छीना जाता ही था पर इसके साथ-साथ उनके कपड़ों से रंग एवं सर से बालों तक को अगवा कर लिया जाता था। चिता पर सिर्फ पति का शरीर ही नहीं बल्कि पत्नी के सारे अरमान, ख्वाब, जिंदगी एवं उसके श्रृंगार भी जलकर राख हो जाते थे। वहीं अगर पत्नी की मृत्यु हो जाए तो पति इन सभी प्रकार की परंपराओं से स्वतंत्र होकर दूसरी महिला की मांग में सिंदूर भरने की तैयारी करने लगता था। कितना दोहरा नजरिया है हमारा। बेटी भी हमारी है और बेटा भी हमारा है। तब भी मापदंड इतनी अलग-अलग क्यों है?

चार हाथ का घूंघट और बुर्का तब तक ही ठीक है जब तक कि वह समाज के सामने मजाक ना बने। अगर हम ऑफिस में चार हाथ का घूंघट और चेहरे पर नकाब डाल कर जाने लगे तो सोचिए क्या हम उपहास के पात्र नहीं बन जाएंगे? लोगों ने लड़कियों के कपड़े को ही जुर्म का पर्यायवाची बना दिया है। अगर लड़की चुस्त कपड़े पहन लें तो समाज उसके चाल-चलन पर प्रश्नचिह्न लगा देता है। हर बार हमारे पहनावे से हमारे चरित्र का अंदाजा क्यों लगाया जाता है? लोग कहते हैं कि हमारे पहनावे से उत्तेजित होकर लड़के बलात्कार जैसे कुकर्म को अंजाम देते हैं। जो लोग ऐसा कहते हैं मैं उन लोगों से यह पूछना चाहती हूं कि दिल्ली के दिसंबर महीने की कड़ाके की ठंड में निर्भया ने ऐसे कौन से कपड़े पहने थे, जिससे उत्तेजित होकर अपराधियों ने ऐसे जघन्य को कुकर्म को अंजाम दिया? एक नन का पहनावा कैसे होते हैं, इससे हम सभी भली भांति परिचित हैं। पांच साल पहले कोलकाता के 62 साल की वृद्ध नन ने ऐसे कौन से उत्तेजित करने वाले कपड़े पहन लिए थे जो उसके साथ चार युवकों ने बलात्कार किया? हमारे देश में तो छह महीने की अबोध बच्चियों को भी नहीं बख्शा जाता, उन्हें भी हवस के अग्निकुंड में अपनी इज्जत एवं ज़िंदगी की आहुति देनी पड़ती है। क्या अब गोद की इन दुधमुंही बच्चियों को भी अपनी अस्मिता की रक्षा करने के लिए चार हाथ का घूंघट और बुर्के का सहारा लेना पड़ेगा?

महिलाओं को पहनावे एवं श्रृंगार में अगर कुछ छूट भी दी गई है तो इसलिए ताकि वह सज-संवर कर पतियों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर उनकी कामुक इच्छाओं को चरम सीमा तक पहुंचा सके और जब पति का उनके आकर्षण से मन भर जाए तब वह बच्चे पैदा करने में लग जाएं। क्या महिला कोई वस्तु है, जिसकी पूरी जिंदगी का उद्देश्य ही पति को आकर्षित करना है? क्या वह कभी अपने मन से अपने लिए सिंगार नहीं कर सकतीं? जब बनाने वाले भगवान ने महिलाओं को पुरुषों से अधिक आकर्षक एवं मोहक बनाकर भेजा है तो समाज कौन है इस आकर्षण को दबाने वाला? आखिरकार सबके सामने आकर्षक दिखना हर किसी का ख्वाब होता है, तो फिर महिलाएं अपने आकर्षण में चार चांद क्यों ना लगाएं? हम स्वतंत्र भारत की स्वतंत्र महिलाएं हैं। लोग कहते हैं कि लड़कियों को ढंग के कपड़े पहन कर घर से बाहर निकलना चाहिए। यह बात चलो कुछ हद तक समझ भी आती है। लेकिन हमें तो घर में भी ढंग से कपड़े पहनने की हिदायत दी जाती है। ऐसा क्यों? घर पर हम चार हाथ का घूंघट अपने चेहरे पर क्यों लें? क्या हम घर के अंदर भी सुरक्षित नहीं हैं? क्या घर में भी हमें नोच कर खाने वाले गिद्ध मौजूद हैं?

टर्की एक ऐसा मुस्लिम देश है जहां की महिलाएं हर प्रकार की पाबंदियों एवं फतवों से   मुक्त हैं इसलिए यह बाकी मुस्लिम देशों की तुलना में सबसे अधिक सम्पन्न है। यहां की लड़कियां मनचाहा पहनावा एवं फैशन करने के लिए सम्पूर्ण रूप से स्वतंत्र हैं। लड़कियों के फैशन पर पाबंदी लगाकर एवं फतवे जारी कर अपराध को नहीं रोका जा सकता। दोष लडकियों के पहनावे में नहीं मर्दों की नजरों में हैं। पाबंदी तो पुरूषों की विकृत सोच एवं वहशी नजरिये पर लगनी चाहिए। जिस दिन समाज का हर एक मर्द अपने अंदर के जानवर पर पाबंदी लगा देगा, उस दिन महिलाओं के फैशन पर पाबंदी का मुद्दा ही खत्म हो जाएगा।

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