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“मैं धरती पर विकंलाग के रूप में पैदा हुआ, परंतु मैं असमर्थ नहीं हूं। मैं आगे बढ़ सकता हूं। मुझे सहयोग चाहिए, दया की भीख नहीं। मुझे मार्गदर्शन चाहिए, अवरोध नहीं। मैं हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा दिखा सकता हूं; पर उसके लिए परिवेश चाहिए, निराशा नहीं।”
किसी विकलांग के ये विश्वास से भरे बोल सत्य ही हैं। हाल ही में विकलांग लोगों के सम्बंध में ऐसी घटना घटी है जिस पर सदृढ़ लोग भी मन में गर्व अनुभव करेंगे। भारत के मरियप्पन थांगवेल नामक दिव्यांग खिलाड़ी ने यह चमत्कार कर दिखाया है। २१ वर्षीय मरियप्पन थांगवेल ने रियो पैरालम्पिक में ऊंची छलांग लगा कर स्वर्ण पदक हासिल कर इतिहास रचा है। साथ ही देवेन्द्र जाझारिया ने भालाफेंक में सुवर्ण पदक, दीपा मलिक ने निशानेबाजी में रजत पदक और वरूण सिंह भाटी ने उंची छलांग में कांस्य पदक प्राप्त किया है। गरीब परिवार में पैदा हुए मरियप्पन का एक पैर उम्र के पांचवें वर्ष में हुए एक हादसे के कारण काटना पड़ा। पिता का साथ छोड देना और गरीबी, ये आघात क्या कम थे कि उसे दिव्यांगता ने और बढ़ा दिया। परंतु ये संकट मरियप्पन का जज्बा पस्त नहीं कर सके। मरियप्पन को आघातों ने, मुश्किलों ने और भी मजबूत कर दिया। इस दिव्यांग ने वह कर दिखाया जो शारीरिक रूप से मजबूत खिलाड़ी मुख्य ओलंपिक में भी नहीं कर सके। किसी विदेशी क्रीड़ा प्रशिक्षक या अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधा के अभाव के बावजूद मरियप्पन ने रियो में तिरंगा फहराया। सुविधाओं के अभाव ने भी उसे हताश नहीं किया। उसकी सफलता का यही राज है, जो सुदृढ़ों में कम दिखाई देता है। लेकिन इससे फिर एक बार यह बात उजागर हुई कि विकलांग खिलाड़ियों को मिलने वाली सुविधाओं का हाल बहुत बुरा है। विकसित देशों के एथलिटों द्वारा ज्यादा पदक जीतने और विकासशील देशों के खिलाड़ियों के पिछड़ जाने का यही कारण है।

चराचर में हम खास है; क्योंकि हम इंसान हैं। कुदरत ने हमें क्षमताओं का अपार भंड़ार दिया है। इंसानी क्षमताओं की उड़ान सिर्फ हाथ पैरों या शारीरिक सीमाओं से जुड़ी नहीं है। उसकी असली ताकत है उसका जुझारूपन या जज्बा।

अगर हम अतीत में झांके तो दिखाई देगा कि सूरदास, आईन्स्टिन, मोजार्ट, न्यूटन, डार्विन, स्टिफन हॉकिंग, हेलेन केलर ऐसे व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने अपनी विकलांगता के सत्य को स्वीकार कर खुद की प्रतिभा को साबित कर दिखाया है। इन सभी ने अपने-अपने क्षेत्रों में महत्वपूर्ण उपलब्धियां प्राप्त की हैं। उन्होंने विश्व भर के लोगों को विभिन्न स्तरों पर नई सोच विकसित करने के लिए प्रेरित किया है। दृष्टिहीनता सूरदास को एक महान कवि बनने से नहीं रोक पाई। आईन्स्टिन, न्यूटन, डार्विन ये सभी स्वलीनता अथवा ऑटिज्म से पीड़ित थे; परंतु वे अपने जुझारूपन से खुद विश्व के महानतम व्यक्तियों के श्रेणी में स्थान पा गए। वर्तमान में स्टीफन हॉकिंग और हेलेन केलर दो ऐसे महान व्यक्ति हैं जिन्होंने अपनी विकलांगता के बावजूद भी न केवल अपनी प्रतिभा को साबित किया बल्कि एक बेहतर विश्व के निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। पहला मूक-बधिर और व्हीलचेयर से बंधा व्यक्ति आज ब्रम्हांडवेत्ता है तो दूसरी विश्व की महान लेखिकाओं में गिनी जाती हैं।

भारत में दुर्भाग्य की बात यह है कि ‘विकलांग व्यक्ति भी समाज के लिए कुछ कर सकते हैं, इस बात का एहसास ही समाज के मन में दिखाई नहीं देता। सही मायने में जिस समाज के सभी वर्गों का, सभी स्तर का विकास होता हुआ दिखाई देता है वही राष्ट्र सक्षम होता है। हमारी सोच विकलांगों के लिए सहायता तक ही मर्यादित है। विकलांग इससे ज्यादा बहुत कुछ कर सकते हैं यह विचार हमारी सोच के दायरे में आता ही नहीं है। प्राचीन काल से शारीरिक अक्षमता को पूर्व जन्मों के किए गए पापों का परिणाम माना जाता था। अब इसे जीवन के प्रबंधन में असमर्थता का एक प्रमुख कारण समझा जा रहा है। परंतु वास्तविकता यह है कि विकलांगों को सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक कारणों से भेदभाव और उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। इन भेदभावों के कारण विकलांग स्वयं को अधिक अक्षम मानने लगते हैं।

विकास के तमाम नारों के बावजूद विकलांगता से ग्रस्त लोग हमारे समाज में सबसे अधिक बहिष्कृत हैं। सरकारी घोषणाओं व नीतियों के बावजूद भी सामाजिक स्तर पर विकलांगों के साथ होने वाले व्यवहार में बहुत अंतर है। एक अरब से अधिक आबादी वाले भारत जैसे देश में हर १००० में से २० व्यक्ति किसी न किसी प्रकार की मानसिक या शारीरिक कमजोरी के शिकार हैं। भारत में सभी नागरिकों को समता, न्याय और गरिमा का अधिकार है। इनमें विकलांग जन भी शामिल हैं। परंतु उनके प्रति इन अधिकारों की सार्थकता तभी साबित हो सकती है जब उनका सर्वांगीण विकास हो। इसके लिए विकलांगों की शिक्षा, जागरूकता, उन्नति हेतु अवसर, चिकित्सा सुविधा इत्यादी पर्याप्त व्यवस्था उपलब्ध हो। इन सबके बावजूद भी असली मुद्दा विकलांगता के प्रति सामाजिक प्रतिक्रिया का है। विकलांगता की समस्याओं के प्रति उपेक्षा का भाव रखने वाले समाज में जागरूकता तथा उसके नजरिए में परिवर्तन लाने के लिए बड़ी मात्रा में बदलाव लाना जरूरी है। हमारे प्रधान मंत्री ने विकलांगों के लिए दिव्यांग शब्द गढ़ कर अपनी संवेदनशीलता का परिचय दिया है। फिर भी भारत में विकलांगता और निर्धनता के बीच जो गहरा रिश्ता है उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामाजिक जागरूकता दो ऐसे महत्वपूर्ण पहलू हैं जिनके आधार पर विकलांग जनों की सर्वांगीण उन्नति की जा सकती है। विकलांग जनों को सबसे पहले एक व्यक्ति माना जाए। हम विश्वगुरु तभी कहलाएंगे जब विकलांगता के प्रति हमारी विकृत मानसिकता को बदलेंगे। इस सबके बावजूद प्रकृति, समाज और खुद अपने मन से लड़ते हुए हमारे पैराएथलिट्स ने १९६८ से अब तक चार स्वर्ण के साथ कुल १२ पदक भारत की झोली में डाले हैं। वर्तमान में इन सभी ने पैरालम्पिक में अपनी क्षमताओं का उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए विकलांगों को अपना सीना तान कर जीने का संदेश दिया है। मरियप्पन का यह स्वर्ण पदक उसी दिशा में उठाया गया क्रांतिकारी कदम है।

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